31/01/2026
आर्थिक सर्वे 2025-26 में RTI को लेकर टिप्पणी की गई है।
सर्वे में कहा गया है कि अनियंत्रित खुलासे प्रशासन की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकते हैं और आंतरिक निर्णय प्रक्रिया पर दबाव डालते हैं।
आर्थिक सर्वे में यह भी कहा गया है कि नीति-निर्माण की आंतरिक प्रक्रिया से जुड़ी सूचनाओं के मामले में एक सीमित और स्पष्ट रूप से परिभाषित मंत्रालयी विटो पर विचार किया जा सकता है, जिस पर संसदीय निगरानी भी हो। सर्वे में सुझाव दिया गया है कि ब्रेनस्टॉर्मिंग नोट्स, वर्किंग पेपर्स, ड्राफ्ट टिप्पणियाँ (जब तक वे अंतिम निर्णय का हिस्सा न बनें), सेवा रिकॉर्ड, तबादलों से जुड़ी फाइलें और गोपनीय स्टाफ रिपोर्ट जैसे दस्तावेजों को RTI के दायरे से बाहर रखने पर विचार होना चाहिए। रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि अगर हर मसौदा और आंतरिक टिप्पणी सार्वजनिक होने लगे, तो अधिकारी अत्यधिक सतर्क भाषा अपनाने लगेंगे और बोल्ड आइडियाज़ सामने आने की संभावना कम हो जाएगी। इसी क्रम में यह भी कहा गया है कि RTI को न तो बेकार जिज्ञासा का साधन बनाया जाना चाहिए और न ही सरकार के कामकाज को माइक्रोमैनेज करने का औज़ार, बल्कि इसे बेहतर शासन और जवाबदेही के संतुलित माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए।
लेकिन सर्वे यह भी स्वीकार करता है कि RTI अधिनियम, 2005 भारत के सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक सुधारों में से एक है और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई की आधारशिला रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में, धीरे-धीरे RTI कमजोर ही हुआ है।
पारदर्शिता, प्रशासन और लोकतंत्र की सबसे बुनियादी आधारशिला है। यह नागरिकों को भरोसा देती है कि सरकार कैसे काम कर रही है, फैसले कैसे लिए जा रहे हैं और सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल कैसे हो रहा है।
RTI इसी पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए लाया गया था। कुछ मामलों को छोड़कर, जहाँ इसके दुरुपयोग और काम में बाधा की बात उठती है, RTI नागरिकों को भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होने और शासन को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाए रखने का एक मजबूत हथियार बना है।
लगातार सामने आ रहे भ्रष्टाचार और सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के घटिया उदाहरणों के बीच, जरूरत RTI को और अधिक धारदार, अधिक प्रभावी और नागरिकों के लिए अधिक सुलभ बनाने की है।