Advocate Krishna Yadav

Advocate Krishna Yadav I started my practice under the guidance of Retd. Justice Sakha Ram Singh, farmer judge of Allahabad High Court and Senior Advocate Supreme Court.

I started independently practice from 2020 before the Hon'ble Supreme Court, Delhi High Court and Tribunals.

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04/04/2026

SUPREME COURT BAR ASSOCIATION ELECTION – 2026
Krishna Kumar Yadav
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17/01/2026

माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने SHIKSHA KUMARI Versus SANTOSH KUMAR (MAT.APP.(F.C.) 111/2025) में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13B और धारा 14(1) के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि आपसी सहमति से तलाक के मामलों में एक वर्ष की अनिवार्य अवधि तथा छह माह की कूलिंग-ऑफ अवधि को उपयुक्त परिस्थितियों में माफ (waive) किया जा सकता है।
न्यायालय ने कहा कि धारा 13B(1) के अंतर्गत प्रथम मोशन दायर करने से पूर्व निर्धारित एक वर्ष की अवधि को, धारा 14(1) के परंतुक (proviso) का सहारा लेकर, माफ किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, धारा 13B(1) के अंतर्गत एक वर्ष की अवधि को माफ किए जाने से यह आवश्यक नहीं हो जाता कि धारा 13B(2) के अंतर्गत छह माह की प्रतीक्षा अवधि स्वतः माफ हो जाए; दोनों अवधियों की माफी पर स्वतंत्र रूप से विचार किया जाना आवश्यक है।
यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि एक वर्ष तथा छह माह – दोनों अवधियाँ माफ किए जाने योग्य हैं, तो न्यायालय पर यह कानूनी बाध्यता नहीं है कि वह तलाक की डिक्री के प्रभावी होने की तिथि को स्थगित करे। ऐसी स्थिति में तलाक की डिक्री तत्काल प्रभाव से पारित की जा सकती है।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि अवधि की माफी सिर्फ मांग करने मात्र से नहीं दी जा सकती, बल्कि तभी दी जाएगी जब न्यायालय इस बात से संतुष्ट हो कि याचिकाकर्ता को असाधारण कठिनाई (exceptional hardship) हो रही है अथवा प्रतिवादी की ओर से असाधारण नैतिक पतन (exceptional depravity) के तत्व विद्यमान हैं, साथ ही Pooja Gupta मामले में निर्धारित मानकों पर भी मामले की कसौटी की जाए।
अवधि की यह माफी परिवार न्यायालय तथा उच्च न्यायालय, दोनों द्वारा दी जा सकती है। साथ ही, यदि यह पाया जाता है कि एक वर्ष की अवधि की माफी गलत प्रस्तुतीकरण या तथ्यों के दमन के आधार पर प्राप्त की गई है, तो न्यायालय को यह अधिकार है कि वह तलाक की डिक्री के प्रभावी होने की तिथि को आगे बढ़ा दे या याचिका को किसी भी चरण में खारिज कर दे। हालांकि, ऐसी स्थिति में पक्षकारों को एक वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद, समान या लगभग समान तथ्यों के आधार पर, पुनः नई याचिका दायर करने का अधिकार सुरक्षित रहेगा।

माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में दिशा निर्देश निर्धारित किया है

57.1 हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13B(1) के अंतर्गत प्रथम मोशन प्रस्तुत करने के लिए निर्धारित एक वर्ष की वैधानिक अवधि को, धारा 14(1) के परंतुक को लागू करते हुए, माफ (waive) किया जा सकता है।
57.2 धारा 13B(1) के अंतर्गत एक वर्ष की पृथक्करण अवधि की माफी, धारा 13B(2) के अंतर्गत द्वितीय मोशन दायर करने हेतु निर्धारित छह माह की कूलिंग-ऑफ अवधि की माफी को स्वतः निषिद्ध नहीं करती। धारा 13B(1) के अंतर्गत एक वर्ष की अवधि तथा धारा 13B(2) के अंतर्गत छह माह की अवधि की माफी पर एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से विचार किया जाना होगा।
57.3 जहाँ न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि धारा 13B(1) के अंतर्गत एक वर्ष की अवधि तथा धारा 13B(2) के अंतर्गत छह माह की अवधि—दोनों को माफ किया जाना उपयुक्त है, वहाँ न्यायालय विधिक रूप से बाध्य नहीं है कि वह तलाक की डिक्री के प्रभावी होने की तिथि को स्थगित करे, और ऐसी डिक्री को तत्काल प्रभाव से लागू किया जा सकता है।
57.4 ऐसी माफी केवल माँग किए जाने मात्र से नहीं दी जाएगी, बल्कि तभी दी जाएगी जब न्यायालय इस बात से संतुष्ट हो कि याचिकाकर्ता को असाधारण कठिनाई (exceptional hardship) का सामना करना पड़ रहा है और/या प्रतिवादी की ओर से असाधारण नैतिक पतन (exceptional depravity) की परिस्थितियाँ विद्यमान हैं, तथा साथ ही Pooja Gupta प्रकरण में निर्धारित विचारणीय मानकों की कसौटी पर भी मामले को परखा जाए।
57.5 उपर्युक्त प्रकार की माफी परिवार न्यायालय तथा उच्च न्यायालय, दोनों द्वारा प्रदान की जा सकती है।
57.6 जैसा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 14(1) के परंतुक में परिकल्पित है, यदि न्यायालय यह पाता है कि धारा 13B(1) के अंतर्गत एक वर्ष की अवधि की माफी गलत प्रस्तुतीकरण (misrepresentation) या तथ्यों के दमन (concealment) के आधार पर प्राप्त की गई है, तो न्यायालय तलाक की डिक्री के प्रभावी होने की तिथि को उपयुक्त समझे जाने पर आगे बढ़ा सकता है; अथवा जिस किसी चरण पर याचिका लंबित हो, उसे खारिज कर सकता है। तथापि, इससे पक्षकारों के उस अधिकार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा कि वे एक वर्ष की अवधि समाप्त होने के पश्चात, समान या लगभग समान तथ्यों के आधार पर, धारा 13B(1) के अंतर्गत नई याचिका प्रस्तुत कर सके।

Krishna Kumar Yadav
Advocate
Mob. No. 9415106950

17/01/2026

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने The Director of Town Panchayat & Ors. v. M. Jayabal & Anr. (CIVIL APPEAL NOS.12640-12643 OF 2025) आदि मामलों में अनुकम्पा नियुक्ति के सिद्धांतों को पुनः स्पष्ट करते हुए कहा कि अनुकम्पा नियुक्ति सामान्य भर्ती का विकल्प नहीं है, बल्कि यह मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार को उसकी आकस्मिक मृत्यु से उत्पन्न तत्काल और गंभीर आर्थिक संकट से उबारने के लिए दी जाने वाली एक विशेष एवं अपवादात्मक राहत है। इस प्रकार की नियुक्ति को वरिष्ठता प्राप्त करने या उच्च पद पर पदोन्नति/नियुक्ति का माध्यम नहीं बनाया जा सकता, भले ही नियुक्त व्यक्ति उस उच्च पद के लिए शैक्षणिक अथवा अन्य रूप से पात्र क्यों न हो।
न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा पुनर्विचार याचिकाओं में पारित एक साझा निर्णय से उत्पन्न आठ सिविल अपीलों पर विचार किया। पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अनेक पूर्व निर्णयों (catena of judgments) में यह सिद्धांत स्थापित किया जा चुका है कि अनुकम्पा नियुक्ति का मूल उद्देश्य परिवार को दरिद्रता और भुखमरी से बचाना है। इसलिए, जब किसी मृत कर्मचारी के आश्रित को अनुकम्पा आधार पर नियुक्ति दी जाती है, तो वह नियुक्ति उसकी पात्रता या मेरिट के मूल्यांकन पर नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक आवश्यकता के आधार पर होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से यह रेखांकित किया कि अनुकम्पा नियुक्ति प्राप्त करने के बाद, लंबे समय पश्चात उच्च पद की मांग करना कानून की भावना के विपरीत है। इस मामले में उत्तरदाताओं ने पहले निचले पद पर अनुकम्पा नियुक्ति स्वीकार कर ली थी और उसके बाद काफी विलंब से उच्च पद के लिए दावा प्रस्तुत किया। न्यायालय ने इसे देरी और लापरवाही (delay and laches) का स्पष्ट उदाहरण माना।
पीठ ने यह भी दोहराया कि रिट याचिका दायर करने में अत्यधिक विलंब अपने आप में राहत देने से इंकार करने का पर्याप्त आधार है और यह सिद्धांत अनुकम्पा नियुक्ति के मामलों में और भी अधिक सख्ती से लागू होता है। State of Orissa v. Laxmi Narayan Das के निर्णय का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि विलंब किसी वादकारी की उदासीनता (indolence) को दर्शाता है और न्यायालय को यह जांचना चाहिए कि क्या ऐसे विलंबित विवाद को स्वीकार किया जाना चाहिए या नहीं।
न्यायालय ने आगे कहा कि अनुकम्पा नियुक्ति का उद्देश्य तत्काल सहायता प्रदान करना है। यदि परिवार लंबे समय तक मृत कर्मचारी की मृत्यु के बाद जीवित रह सका और बाद में न्यायालय का दरवाजा खटखटाता है, तो यह संकेत देता है कि परिवार के पास आजीविका का कोई अन्य साधन रहा होगा। ऐसे मामलों में राहत से इंकार किया जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकम्पा नियुक्ति कोई चयन प्रक्रिया या उम्मीदवार की पसंद का विषय नहीं है, बल्कि नियोक्ता द्वारा विभिन्न कारकों पर विचार कर परिवार को संकट से उबारने हेतु दिया गया उपाय है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि उच्च पद के लिए देर से किया गया आवेदन सक्षम प्राधिकारी द्वारा सही रूप में अस्वीकार किया गया था। मद्रास उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश और खंडपीठ द्वारा उच्च पद पर नियुक्ति का निर्देश देना सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित विधि सिद्धांतों के विपरीत और स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण था।
अंत में, न्यायालय ने कहा कि कानून की अज्ञानता कोई बहाना नहीं हो सकती और यदि विधि द्वारा कोई अधिकार मान्यता प्राप्त नहीं है, तो नकारात्मक भेदभाव (negative discrimination) का दावा भी स्वीकार्य नहीं है। इन सभी कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के विवादित आदेश को निरस्त कर दिया।
यह निर्णय अनुकम्पा नियुक्ति से जुड़े मामलों में यह स्पष्ट संदेश देता है कि ऐसी नियुक्ति केवल आपातकालीन मानवीय राहत है, न कि कैरियर उन्नति या उच्च पद प्राप्त करने का अधिकार।

कृष्णा कुमार यादव
एडवोकेट
सुप्रीम कोर्ट
मोबाइल नंबर 094151 06950

16/01/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्जी एफआईआर और पुलिस तंत्र के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए निर्देश दिया है कि यदि जांच में यह पाया जाए कि एफआईआर झूठी या भ्रामक सूचना के आधार पर दर्ज कराई गई थी, तो विवेचना अधिकारी के लिए सूचना देने वाले के खिलाफ झूठी सूचना और गुमराह करने के अपराध में अनिवार्य रूप से लिखित शिकायत दर्ज कराना आवश्यक होगा। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने 14 जनवरी 2026 को उम्मे फरवा बनाम राज्य उत्तर प्रदेश मामले में पारित किया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 212 और 217 (पुरानी IPC धारा 177 और 182) के तहत कार्रवाई करना पुलिस का वैधानिक दायित्व है। ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ धारा 199(b) BNS के तहत कार्रवाई की जा सकती है। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि आदेश का पालन न करना अदालती अवमानना माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि जब भी पुलिस किसी मामले में आरोपों को झूठा पाकर अंतिम रिपोर्ट (Final Report) दाखिल करे, तो मजिस्ट्रेट उसे तब तक स्वीकार न करें जब तक उसके साथ शिकायतकर्ता के खिलाफ लिखित शिकायत न हो। असंज्ञेय अपराधों में पुलिस रिपोर्ट को परिवाद (Complaint) माना जाएगा, न कि स्टेट केस।
मामले में वैवाहिक विवाद से जुड़ी एफआईआर को झूठा पाते हुए हाईकोर्ट ने अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का संज्ञान आदेश रद्द कर दिया और प्रकरण को कानून के अनुसार पुनर्विचार हेतु वापस भेज दिया। कोर्ट ने राज्य के डीजीपी और न्यायिक अधिकारियों को आदेश के अनुपालन के लिए 60 दिनों की समय-सीमा भी निर्धारित की।
यह निर्णय फर्जी मुकदमों की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने और पुलिस व न्यायिक व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

कृष्णा कुमार यादव
एडवोकेट
सुप्रीम कोर्ट
Mob No. 094151 06950

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