Dr Vivek Singh

Dr Vivek Singh Dr Vivek Singh is an advocate at the Supreme Court of India. In the last 25-years, Dr Singh resolved

बागपतदेश खाप के मुखिया चौधरी सुरेंद्र सिंह जी का निधन अत्यंत दुःखद एवं समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। विनम्र श्रद्धांजलि।...
30/09/2026

बागपत
देश खाप के मुखिया चौधरी सुरेंद्र सिंह जी का निधन अत्यंत दुःखद एवं समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। विनम्र श्रद्धांजलि।

ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को सद्गति तथा शोकाकुल परिजनों को यह अथाह दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें।

ओम् शांति ओम् शांति ओम् शांति 🙏

आज चातुर्मास के द्वितीय माह का अंतिम दिन है और भाद्रपद की पूर्णिमा l आज से पितृपक्ष अर्थात श्राद्ध प्रारंभ हो रहे है lआप...
26/09/2026

आज चातुर्मास के द्वितीय माह का अंतिम दिन है और भाद्रपद की पूर्णिमा l आज से पितृपक्ष अर्थात श्राद्ध प्रारंभ हो रहे है l

आप सब जानते हैं कि श्राद्ध को लेकर समाज में अनेक प्रकार की धारणाएँ दिखाई देती हैं। कोई इसे केवल परंपरा मानता है, कोई केवल कर्मकाण्ड, तो कोई इसे केवल मृत व्यक्ति की स्मृति तक सीमित कर देता है।

किन्तु शास्त्रीय दृष्टि से श्राद्ध का मूल भाव इससे कहीं व्यापक है।

यह अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता है।

यह पितृऋण का स्मरण है।

यह अपने कुल, संस्कार और परंपरा के प्रति उत्तरदायित्व है।

पितृ पक्ष में दिखावा, अनावश्यक खर्च अथवा केवल सामाजिक प्रदर्शन के स्थान पर श्रद्धा, शुद्धता, सामर्थ्यानुसार दान, योग्य पात्रों का सत्कार और शास्त्रसम्मत विधि को महत्व देना चाहिए।

पितरों के प्रति हमारा कर्तव्य केवल वर्ष में कुछ दिनों का विषय नहीं है। जिस परिवार ने हमें जन्म, संस्कार, भाषा, परंपरा और जीवन का आधार दिया, उसके पूर्वजों का स्मरण हमारे जीवन में कृतज्ञता और धर्मबोध को जागृत करने वाला होना चाहिए।

श्राद्ध का अर्थ ही है श्रद्धापूर्वक किया गया कर्म। अतः यह केवल किसी मृत व्यक्ति के स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि धर्मशास्त्रों में निर्दिष्ट उस कर्तव्य का पालन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है।

गरुड़ पुराण में श्राद्ध, पिण्डदान, तर्पण तथा पितृकर्म का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। इसमें यह प्रश्न भी उठाया गया है कि जब श्राद्ध में अन्न ब्राह्मणों द्वारा ग्रहण किया जाता है अथवा अग्नि में आहुति दी जाती है, तब वह पितरों को किस प्रकार तृप्त करता हैं l

गरुड़ पुराण में श्राद्ध-विधि में ब्राह्मणों को आमंत्रित करने, पितरों का आवाहन, तर्पण, अर्घ्य, पिण्ड तथा दक्षिणा आदि का भी विधान मिलता है।

अर्थात् श्राद्ध केवल भोजन कराने का नाम नहीं है इसके पीछे विधि, मंत्र, संकल्प, पात्र, काल और श्रद्धा इन सभी का महत्व है।

विष्णु पुराण के तृतीय अंश में श्राद्ध के विषय में विस्तार से वर्णन मिलता है। वहाँ कहा गया है कि श्रद्धापूर्वक किया गया श्राद्ध अनेक देवताओं, पितृगणों तथा अन्य प्राणियों को प्रसन्न करने वाला होता है।

विष्णु पुराण में श्राद्ध के विभिन्न अवसरों का भी उल्लेख मिलता है। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि पितृकर्म किसी एक विशेष पखवाड़े तक सीमित नहीं है, बल्कि सनातन धर्म की व्यापक श्राद्ध परंपरा का एक अंग है।

इसलिए श्राद्ध का मूल आधार केवल तिथि नहीं, बल्कि शास्त्रविहित विधि के साथ श्रद्धापूर्वक किया गया पितृकर्म है।

महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को श्राद्ध की महिमा और विधि का उपदेश दिया गया है।

अनुशासन पर्व में श्राद्ध के विभिन्न पदार्थों तथा उनके द्वारा पितरों की तृप्ति का वर्णन मिलता है। तिल, चावल, जौ, उड़द, जल, मूल और फल आदि से किए गए श्राद्ध के विभिन्न फल बताए गए हैं।

महाभारत में श्राद्ध के विभिन्न तिथियों पर किए जाने वाले कर्मों के अलग अलग फल भी बताए गए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि श्राद्ध विधान केवल एक सामान्य धार्मिक भावना नहीं, बल्कि काल, पात्र, पदार्थ और विधि से संबंधित विस्तृत धर्मशास्त्रीय व्यवस्था है।

मनुस्मृति में भी पितृकर्म और श्राद्ध का विस्तृत विधान मिलता है। वहाँ श्राद्ध में योग्य पात्रों, भोजन, तर्पण, पिण्ड तथा पितरों के प्रति किए जाने वाले कर्तव्यों का वर्णन किया गया है।

श्राद्ध का मूल भाव श्रद्धा है। इसलिए केवल बाहरी प्रदर्शन अथवा बहुत अधिक खर्च कर देना ही श्राद्ध की सार्थकता नहीं है। शास्त्रसम्मत विधि, शुद्ध आचरण, योग्य पात्र, श्रद्धा और सामर्थ्यानुसार दान इन सबका अपना महत्व है।

विभिन्न पुराणों में पितृकर्म, श्राद्ध, तर्पण, पिण्डदान, दान तथा ब्राह्मण सत्कार का वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में पितरों की तृप्ति के लिए अन्न, जल, तिल, फल, मूल आदि पदार्थों के प्रयोग तथा विभिन्न दानों की महिमा भी वर्णित है।

बहुत सारे लोग I हैं जो श्राद्धकर्म से सहमत नहीं हैं l लेकिन यहां इतना ही कहना चाहूँगा कि श्राद्धकर्म हमारी महान सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण भाग है l यह अपने पूर्वजों को स्मरण करने, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर हैं l श्राद्ध कर्म पितृऋण की स्मृति कराता हैं l नई पीढ़ी में अपने पूर्वजों के प्रति आदर सम्मान का भाव उत्पन्न होता हैं l अनेक भूखे लोगों को भोजन आदि प्राप्त होता हैं l सबसे बढ़कर अपने कुल और उसकी परंपरा के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन होता हैं l

आप सब भगवान श्रीकृष्ण के बारे में बहुत सी बाते जानते हैं l उनका जन्म आज के ही दिन अर्थात श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्...
04/09/2026

आप सब भगवान श्रीकृष्ण के बारे में बहुत सी बाते जानते हैं l उनका जन्म आज के ही दिन अर्थात श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात मे मथुरा के एक कारावास में 5252 वर्ष पूर्व हुआ था l उनकी माता का नाम देवकी एवं पिता का नाम वासुदेव था l नंद बाबा एवं यशोदा ने बचपन मे उनका लालन पालन किया l वे 08 वर्ष की अल्पायु में मथुरा छोड़कर सन्दीपनि ऋषि के आश्रम में योग, दर्शन एवं धर्म की शिक्षा लेने चले गये थे l और 48 वर्ष की आयु में उन्होंने रुक्मणी से विवाह किया, जिनसे उन्हें प्रद्युम्न के रूप में अत्यंत तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ l वे इस धरा पर करीब 125 वर्ष तक रहे l महाभारत के समय उनकी आयु 89 वर्ष की थी l
भागवत पुराण में क्या क्या लिखा हैं मै आज इस पर बात नहीं करूंगा l हमारे इतिहास और धर्म को अत्यंत दूषित कर दिया गया है l प्रत्येक शब्द के कई कई अर्थ होते हैं विशेष रूप से संस्कृत भाषा के शब्दों के तो अनेकानेक अर्थ निकलते हैं l हर शब्द का अर्थ सन्दर्भ के साथ बदल जाता है l हर शब्द की एक आत्मा होती हैं विशेष रूप से जब धर्म पर चर्चा हो, तो शब्द विशेष के मर्म को समझना, जानना विद्वानजन के लिए भी काफी दुरूह कार्य हैं l
आज तो श्रीकृष्ण पर ही बात करने का दिन है भारतीय जीवन, दर्शन एवं संस्कृति में श्रीकृष्ण का स्थान अत्यंत विशेष है। वे केवल भगवान के रूप में पूजे नहीं जाते, बल्कि एक ऐसे आदर्श पुरुष के रूप में भी स्मरण किए जाते हैं, जिन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक चरण में हमें कुछ न कुछ सिखाया। उनका जीवन प्रेम भी है, नीति भी है, करुणा भी है और आवश्यकता पड़ने पर अधर्म के विरुद्ध संघर्ष करने का साहस भी है।
संक्षेप में कहें तो श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन हमें यह सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को सत्य, धर्म और अपने कर्तव्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
श्रीकृष्ण का जीवन केवल बाल लीलाओं तक सीमित नहीं था। जैसे जैसे वे बड़े हुए, उनके सामने जीवन की बड़ी जिम्मेदारियाँ आती गईं। उन्होंने कंस के अत्याचार का अंत किया और अपने माता पिता को कारागार से मुक्त कराया। इसके बाद उनका जीवन समाज और राष्ट्र के व्यापक हित से जुड़ता चला गया। उन्होंने मथुरा की रक्षा की और बाद में द्वारका नगरी को अपनी कर्मभूमि बनाया। वे केवल युद्ध करने वाले योद्धा नहीं थे, बल्कि दूरदर्शी, कुशल राजनीतिज्ञ और श्रेष्ठ मार्गदर्शक भी थे।
महाभारत के समय श्रीकृष्ण की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है। उन्होंने स्वयं शस्त्र न उठाने का संकल्प लिया, फिर भी धर्म की रक्षा के लिए पांडवों का मार्गदर्शन किया। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन अपने ही संबंधियों को सामने देखकर मोह और भ्रम में पड़ गए, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन का महान सत्य समझाया। यही उपदेश आगे चलकर श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में संसार के सामने आया। इसी गीताजी के 700 श्लोक सनातन धर्म का निचोड़ हैं l
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि मनुष्य का अधिकार केवल अपने कर्म पर है, उसके परिणाम पर नहीं। उन्होंने उसे अपने कर्तव्य से विमुख न होने और धर्म के पक्ष में खड़े होने की प्रेरणा दी। गीता का संदेश केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है। यह प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए है, जो जीवन में किसी कठिन परिस्थिति, भ्रम या निर्णय के सामने खड़ा है। श्रीकृष्ण हमें सिखाते हैं कि कठिनाइयों से भागना समाधान नहीं है, सही मार्ग को पहचानकर साहस और धैर्य के साथ आगे बढ़ना ही जीवन का धर्म है।
श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में एक अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे बाल रूप में चंचल हैं, वृंदावन में प्रेम और भक्ति के आधार हैं, मथुरा में अन्याय के विरोधी हैं, द्वारका में कुशल शासक हैं और कुरुक्षेत्र में एक महान मार्गदर्शक हैं। यही उनके व्यक्तित्व की विशेषता है कि उन्होंने जीवन की हर परिस्थिति के अनुसार अपने कर्तव्य को समझा और धर्म का साथ दिया।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल एक देवता के जन्म का पर्व नहीं है। यह उस प्रकाश के जन्म का पर्व है, जो अज्ञान, अन्याय और निराशा के अंधकार को दूर करता है। जब हम जन्माष्टमी मनाते हैं, तो हमें केवल उपवास, पूजा और उत्सव तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें यह भी विचार करना चाहिए कि श्रीकृष्ण के जीवन से हमने क्या सीखा?
आज हमारे जीवन में भी अनेक प्रकार की परेशानियाँ, तनाव, मतभेद और चुनौतियाँ हैं। ऐसे समय में श्रीकृष्ण का संदेश हमें भीतर से मजबूत बनाता है। वे कहते हैं कि परिस्थितियों के कारण अपने कर्तव्य से पीछे मत हटो, अपने मन को संयमित रखो और सत्य के मार्ग पर विश्वास बनाए रखो। जीवन में सफलता मिले तो विनम्र रहो और असफलता मिले तो निराश मत हो l
इस जन्माष्टमी पर मेरी यही प्रार्थना है कि भगवान श्रीकृष्ण हमारे मन से अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष को दूर करें तथा हमारे भीतर प्रेम, करुणा, धैर्य और सच्चाई का प्रकाश जगाएँ। हम केवल श्रीकृष्ण की पूजा न करें, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास भी करें। किसी दुखी के चेहरे पर मुस्कान ला सकें, किसी जरूरतमंद की सहायता कर सकें और अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभा सकें, तो शायद यही श्रीकृष्ण के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा होगी।
आइए, इस जन्माष्टमी पर हम अपने भीतर भी एक नए कृष्ण रूप का जन्म होने दें ऐसा कृष्ण, जो हमारे विचारों में सत्य, हमारे व्यवहार में प्रेम और हमारे कर्मों में धर्म बनकर दिखाई दे।
आप सभी को एक बार फिर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई एवं मंगल कामनाएँ l

आज श्रावण मास की पूर्णिमा हैं l प्रत्येक मास की पूर्णिमा का दिन मास का सबसे पवित्र दिन माना जाता हैं l पूर्णिमा पर चंद्र...
28/08/2026

आज श्रावण मास की पूर्णिमा हैं l प्रत्येक मास की पूर्णिमा का दिन मास का सबसे पवित्र दिन माना जाता हैं l पूर्णिमा पर चंद्रमा अपने पूरे यौवन पर होता हैं l चण्द्रमा का बहुत गहरा प्रभाव हमारे मन मष्तिष्क पर पड़ता है l और आज की पूर्णिमा तो विशेष हैं, आज रक्षाबंधन हैं l
हमे गर्व होता हैं अपनी भारतीय सनातन संकृति पर l भारत त्योहारों और परंपराओं का देश है। यहाँ प्रत्येक त्योहार अपने साथ प्रेम, भाईचारे और संस्कारों का संदेश लेकर आता है। इन्हीं पवित्र त्योहारों में रक्षाबंधन का विशेष स्थान है। यह पर्व भाई बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक है।
रक्षाबंधन की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई इसका कोई निश्चित प्रमाण नहीं हैं l इस बारे में कई पौराणिक कथाएं हैं l परंतु जिसने भी इस परंपरा की शुरुआत की, उनका मन कितना निर्मल एवं पवित्र रहा होगा l परंपरा हैं कि आज के दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है और उसके सुखी एवं उज्ज्वल जीवन की कामना करती है। भाई अपनी बहन की रक्षा करने तथा हर परिस्थिति में उसका साथ देने का संकल्प लेता है।@
कई बार जीवन की व्यस्तता के कारण भाई बहन एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं, लेकिन रक्षाबंधन उन्हें फिर से प्रेम के बंधन में जोड़ने का अवसर देता है।
रक्षाबंधन हमें केवल भाई की बहन के प्रति जिम्मेदारी का ही संदेश नहीं देता, बल्कि यह हमें एक दूसरे के प्रति सम्मान, विश्वास और सहयोग की भावना भी सिखाता है।
आज के समय में हमें इस पर्व की भावना को और व्यापक बनाना चाहिए। बहन की रक्षा का अर्थ केवल उसकी सुरक्षा करना नहीं, बल्कि उसके सपनों, शिक्षा, सम्मान और स्वतंत्रता का भी सम्मान करना है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम रक्षाबंधन को केवल राखी और उपहार तक सीमित न रखें। इस दिन हम अपने भाई बहनों के साथ प्रेम और सम्मान का संबंध और मजबूत करें। साथ ही, समाज में महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी समझें।
आप सबको पवित्र त्यौहार रक्षाबंधन की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ

संसार के सबसे महत्वपूर्ण रिश्तों में से एक मित्रता का रिश्ता आजकल मंदी की मार झेल रहा है। आज कल लोग फ्रेंडशिप रिसेशन अर्...
28/07/2026

संसार के सबसे महत्वपूर्ण रिश्तों में से एक मित्रता का रिश्ता आजकल मंदी की मार झेल रहा है। आज कल लोग फ्रेंडशिप रिसेशन अर्थात मित्रता में मंदी की समस्या से जूझ रहे है। मित्रता के संबंध स्वार्थ और कार्यसिद्धि पर आधारित होकर स्वार्थ प्रथम के होते जा रहे हैं। यह एक सामाजिक संकट है। समस्या यह है कि आज के हालात में कोई सच्चा मित्र मानो है ही नहीं। मन की सुनने वाले, कष्ट में काम आने वाले और परिवार से भी बढक़र साथ देने वाले मित्रों की संख्या नगण्य होती जा रही है। इस कारण लोगों के सामने यह संकट खड़ा हो गया है कि वह अपनी अंदरूनी भावनाओं को किसके साथ साझा करे? उसके मन और मस्तिष्क का वेंटिलेशन, अर्थात वैचारिक विनिमय कैसे हो? यह सुनना कष्टप्रद है, लेकिन आज यदि कोई व्यक्ति अपने दस मित्रों की सूची बनाकर यह देखे कि क्या वे उससे निस्वार्थ भाव से जुड़े हैं, तो उत्तर बड़ा कठोर हो सकता है। इसके पीछे स्वार्थपरकता का बढऩा, अहंकार का अत्यधिक भाव और रिश्तों को निभाने के लिए आवश्यक प्रयास न करने की प्रवृत्ति प्रमुख कारण हैं।
परस्पर जुड़ाव बनाए रखने की सबसे बड़ी शर्त है, मित्रों के दोष खोजने की आदत का त्याग। दोषों को लगातार याद रखना व्यक्ति को नकारात्मकता की ओर ले जाता है। एक बुरी बात का अनावश्यक विश्लेषण अनेक नई नकारात्मक धारणाओं को जन्म देता है। इसके बाद व्यक्ति मनगढ़ंत बातें सोचकर स्वयं ही मित्रता को नष्ट करने लगता है। यदि पचास वर्ष का कोई व्यक्ति अपने पुराने मित्र की दस कमियां देखकर उससे रिश्ता तोडऩे की सोच रहा हो, तो उसे यह भी विचार करना चाहिए कि क्या उसके पास फिर से किसी नए मित्र को परखने के लिए अगले पचास वर्ष उपलब्ध हैं? शायद नहीं। इसलिए मित्रता निभाना और रिश्तों को बनाए रखना ही बुद्धिमानी है।

मारवाड़ में एक सुंदर शब्द प्रचलित है छौ। इसका अर्थ है कोई बात नहीं, जाने दो, क्षमा करो और भूल जाओ। यही जीवन दर्शन हमें क्षमा करना और रिश्तों को बचाए रखना सिखाता है। अंतत: केवल संपर्क बनाए रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि दिलों का जुड़ाव ही अच्छे रिश्तों का सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व है।

विश्वप्रसिद्ध भारतीय शूटर, शूटिंग कोच, 'पद्म श्री' जसपाल राणा जी का निधन अत्यंत दु:खद एवं भारतीय खेल जगत की अपूरणीय क्षत...
13/06/2026

विश्वप्रसिद्ध भारतीय शूटर, शूटिंग कोच, 'पद्म श्री' जसपाल राणा जी का निधन अत्यंत दु:खद एवं भारतीय खेल जगत की अपूरणीय क्षति है। विनम्र श्रद्धांजलि।

वैश्विक पटल पर भारत को गौरवभूषित करने वाली उनकी असाधारण उपलब्धियां तथा युवा खिलाड़ियों के मार्गदर्शन में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।

प्रभु से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान तथा शोकाकुल परिजनों एवं उनके प्रशंसकों को यह अथाह दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें।

ॐ शांति ॐ शांति ॐ शांति...

गांव, गरीब और किसानों के मसीहा, भारतरत्न पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को शत् शत् नमन।वे न केवल राजनेता थे वरन् एक व...
29/05/2026

गांव, गरीब और किसानों के मसीहा, भारतरत्न पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को शत् शत् नमन।
वे न केवल राजनेता थे वरन् एक विचारक, लेखक और ग्रामीण अर्थनीति के महान विद्वान् थे। वे अपनी सरलता, ईमानदारी, प्रशासनिक क्षमता, न्यायप्रियता तथा श्रेष्ठ जीवन मूल्यों के लिए जाने जाते थे।

01/05/2026

आज का दिन विशेष है वैसे तो परमात्मा का बनाया प्रत्येक दिवस विशेष ही है लेकिन आज वैशाख पूर्णिमा का दिन वास्तव में विशेष ही है।
महाराजा सिद्धोधन और महारानी महामाया के संयोग से एक विलक्षण बालक का जन्म हुआ जिसका नाम सिद्धार्थ रखा गया। राजकुमार सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बनने की कहानी सभी ने बार बार पढ़ रखी है।
अगर आप गौतम बुद्ध और बौद्ध समुदाय के बारे में कुछ जानना चाहते है तो सबसे पहले त्रिपिटक को पढ़िए, जो मूल रूप से तो पाली भाषा में लिखी गई है लेकिन अब हिंदी सहित अनेकों भाषाओं में उपलब्ध है। यह बौद्ध समुदाय का मुख्य ग्रन्थ है, जिसमें बुध के प्रवचन, शिक्षाएं एवं बौद्ध समुदाय के नियम दिए गए है।
"अप दीपों भव" महात्मा बुध का मुख्य संदेश है।जिसका अर्थ है अपना दीपक स्वयं बनो। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बुद्ध का जन्म अर्थात पृथ्वी पर अवतरण, ज्ञान अर्थात बुद्धत्व और मृत्यु अर्थात परिनिर्वाण तीनों एक ही दिन पूर्णिमा को हुए थे।
बुद्ध ने सबसे अधिक जोर ध्यान पर दिया। उनका सबसे प्रसिद्ध ध्यान सांसों के ऊपर है जिसे विपयसना के नाम से जाना जाता है।
मैने आज से करीब 20 वर्ष पूर्व सन् 2006 में पहली बार विपयसना का एक सप्ताह का ध्यान सत्र किया था। इस सत्र में एक बिल्डिंग में एक सप्ताह मौन रहना था। ध्यान के लिए बने हाल में पद्मासन अथवा सुखासन में सुबह से शाम तक मौन बैठना था। सहायक हमारे लिए पानी वगैरह जो चाहिए हमारे पास रख देते थे। उठने से लेकर सोने तक किसी से कोई बात नहीं, केवल मौन और लगातार सांसों पर ध्यान, उन्हें अंदर जाते और बाहर आते अनुभव करना। आप करके देखिए ये कार्य मुश्किल है या आसान? अभ्यास से आसान लगने लगता है।
बुद्ध के प्रवचनों के बारे इतनी बाते है खास तौर पर उनके परम शिष्य आनंद और बुद्ध के बीच वार्तालाप और शंका समाधान के बारे में हुई बाते कि शाम हो जाएगी, लेकिन बाते समाप्त नहीं होगी। परिनिर्वाण से पहले का संदेश जो उन्होंने बौद्ध समुदाय के अनुयायियों के लिए विशेषतौर पर दिया था, बड़ा महत्वपूर्ण है। उसके बारे में फिर कभी विस्तार से बात करेंगे॥

आज 01 मई को श्रमिक दिवस भी है। आज के दिन अर्थात एक मई को ही श्रमिक दिवस क्यों मनाया जाता है? सन् 1886 में अमेरिका के शहर शिकागो में फैक्ट्री श्रमिकों ने अपने अधिकारों के लिए हिंसक आंदोलन कर दिया था, जिसमें पुलिस द्वारा बल प्रयोग करने पर अनेक मजदूर मारे गए थे। उनकी याद में तीन साल बाद सन 1889 में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस ने एक सम्मेलन किया, जिसमें मांग रखी गईं कि श्रमिक से एक दिन में आठ घंटे से अधिक काम न लिया जाय और सफ्ताह में एक दिन का अवकाश रखा जाए। तब से मजदूरों को न्याय दिलाने और समानता के अधिकार के लिए 01 मई को श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। भारत में पहली बार 1923 में श्रमिक दिवस की शुरुआत हुई। आज हमारे काम के घंटे निश्चित है और साप्ताहिक अवकाश है आओ हम उन श्रमिकों की शहादत को याद करे, उन्हें नमन करे जिनके कारण आज हमारे लिए कार्य अवधि एवं कार्य दिवस निश्चित किए गए है।

अब जम्मू कश्मीर की और चलते है क्या आपने कश्मीरी पंडित सर्वानंद कौल का नाम सुना है? आओ सर्वानंद कौल के बारे मे जानते है। सर्वानंद कौल को घाटी में सभी ‘प्रेमी’ कहकर पुकारते थे।
66 साल के कौल को आतंकियों ने उनके 27 साल के बेटे के साथ मार डाला था। उनकी पेड़ से टँगी लाश मिली थी। तिलक करने की जगह को छील कर चमड़ी हटा दी गई थी।
पूरे शरीर पर सिगरेट से जलाने के निशान थे। हड्डियाँ तोड़ दी गई थी। पिता पुत्र की आँखें निकाल ली गई थी। दोनों को फँदे से लटकाने के बाद मृत्यु सुनिश्चित करने के लिए गोली भी मारी गई थी।पिता पुत्र की लाश आज ही के दिन अर्थात 01 मई 1990 को मिली थी। अब कश्मीरी पंडित इस तारीख को शहीदी दिवस या शहादत दिवस के रूप में मनाते हैं।
सर्वानंद कौल उन कश्मीरी हिंदुओं में से थे, जिन्हें 19 जनवरी 1990 की तारीख भी नहीं डरा पाई थी। जब सब हिंदू जान बचाकर भाग रहे थे, तब उन्होंने कश्मीर में ही रहने का फैसला किया।
परंतु उस दिन बाक़ी बचे कश्मीरी पंडितों ने भी घाटी को छोड़ दिया।
कश्मीरी शहीद दिवस पर सभी शहीदों को श्रद्धांजलि 🙏

29/04/2026
अहम से ॐ की यात्रा ही जीवन की सबसे कठिन यात्रा है। स्वयं को कर्ता मान बैठना ही जीवन का सबसे बड़ा वहम और अहम भी है। मैं स...
11/04/2026

अहम से ॐ की यात्रा ही जीवन की सबसे कठिन यात्रा है। स्वयं को कर्ता मान बैठना ही जीवन का सबसे बड़ा वहम और अहम भी है। मैं से मुक्त हो जाना जीवन में बहुत बड़ी अशांति एवं कष्टों से मुक्त हो जाना भी है। मैं के कारण ही जीवन में बहुत सारी समस्याएं जन्म लेती हैं एवं जीवन अशांत हो जाता है।

समस्त हिंसा और अशांति के मूल में भी मैं का ही भाव छुपा है। जीवन में जहाँ जहाँ मैं भाव आपके आगे आयेगा वहाँ वहाँ आप पाओगे कि प्रसन्नता आपके जीवन से धीरे धीरे पीछे हट रही है। यदि मन में अहमता की दीवार न हो तो जीवन स्वतः आनंदपूर्ण बन जाता है। मैं का भाव हृदय की उदारता को नष्ट कर देता है।

जहाँ मैं है वहीं से अहम की यात्रा का प्रारंभ भी है। जीवन का वास्तविक सौंदर्य तो उदारता, विनम्रता, प्रेम और संवेदनशीलता में ही खिलता है। मैं अर्थात स्वयं में सिमट कर रह जाना, असीमता, अनंतता के आकाश से वंचित रह जाना। एक बात सदैव याद रखें कि मैं की मुक्ति में ही जीवन की अधिकतर समस्याओं की मुक्ति है। मैं नहीं, वह महान प्रभु सब कर रहे हैं, यही कृतज्ञता ही जीवन का अहोभाव है। इसी अहोभाव में जीने वाला व्यक्ति ही एक दिन प्रभु के श्रीचरणों का अधिकारी बन जाता है।

अहमता रहित जीवन का अगर कोई उदाहरण है तो नारी है। वह वास्तविक सृजनकर्ता है। नवजीवन को धारण करती है, उसको जन्म देती है, पालन पोषण करती है। लेकिन समाज उसी संतान को पिता की पहचान दे देता है, वो खुशी खुशी इसे स्वीकार भी कर लेती है। आज राष्ट्रीय मातृत्व सुरक्षित दिवस है। सुरक्षित मातृत्व महिला का अधिकार है और उससे संबंधित व्यक्तियों का कर्तव्य। हर जच्चा बच्चा सुरक्षित रहे, उसकी उचित देखभाल हो, उचित पोषण मिले, ये परिवार एवं शासन का कर्तव्य है।

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