26/09/2026
आज चातुर्मास के द्वितीय माह का अंतिम दिन है और भाद्रपद की पूर्णिमा l आज से पितृपक्ष अर्थात श्राद्ध प्रारंभ हो रहे है l
आप सब जानते हैं कि श्राद्ध को लेकर समाज में अनेक प्रकार की धारणाएँ दिखाई देती हैं। कोई इसे केवल परंपरा मानता है, कोई केवल कर्मकाण्ड, तो कोई इसे केवल मृत व्यक्ति की स्मृति तक सीमित कर देता है।
किन्तु शास्त्रीय दृष्टि से श्राद्ध का मूल भाव इससे कहीं व्यापक है।
यह अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता है।
यह पितृऋण का स्मरण है।
यह अपने कुल, संस्कार और परंपरा के प्रति उत्तरदायित्व है।
पितृ पक्ष में दिखावा, अनावश्यक खर्च अथवा केवल सामाजिक प्रदर्शन के स्थान पर श्रद्धा, शुद्धता, सामर्थ्यानुसार दान, योग्य पात्रों का सत्कार और शास्त्रसम्मत विधि को महत्व देना चाहिए।
पितरों के प्रति हमारा कर्तव्य केवल वर्ष में कुछ दिनों का विषय नहीं है। जिस परिवार ने हमें जन्म, संस्कार, भाषा, परंपरा और जीवन का आधार दिया, उसके पूर्वजों का स्मरण हमारे जीवन में कृतज्ञता और धर्मबोध को जागृत करने वाला होना चाहिए।
श्राद्ध का अर्थ ही है श्रद्धापूर्वक किया गया कर्म। अतः यह केवल किसी मृत व्यक्ति के स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि धर्मशास्त्रों में निर्दिष्ट उस कर्तव्य का पालन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है।
गरुड़ पुराण में श्राद्ध, पिण्डदान, तर्पण तथा पितृकर्म का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। इसमें यह प्रश्न भी उठाया गया है कि जब श्राद्ध में अन्न ब्राह्मणों द्वारा ग्रहण किया जाता है अथवा अग्नि में आहुति दी जाती है, तब वह पितरों को किस प्रकार तृप्त करता हैं l
गरुड़ पुराण में श्राद्ध-विधि में ब्राह्मणों को आमंत्रित करने, पितरों का आवाहन, तर्पण, अर्घ्य, पिण्ड तथा दक्षिणा आदि का भी विधान मिलता है।
अर्थात् श्राद्ध केवल भोजन कराने का नाम नहीं है इसके पीछे विधि, मंत्र, संकल्प, पात्र, काल और श्रद्धा इन सभी का महत्व है।
विष्णु पुराण के तृतीय अंश में श्राद्ध के विषय में विस्तार से वर्णन मिलता है। वहाँ कहा गया है कि श्रद्धापूर्वक किया गया श्राद्ध अनेक देवताओं, पितृगणों तथा अन्य प्राणियों को प्रसन्न करने वाला होता है।
विष्णु पुराण में श्राद्ध के विभिन्न अवसरों का भी उल्लेख मिलता है। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि पितृकर्म किसी एक विशेष पखवाड़े तक सीमित नहीं है, बल्कि सनातन धर्म की व्यापक श्राद्ध परंपरा का एक अंग है।
इसलिए श्राद्ध का मूल आधार केवल तिथि नहीं, बल्कि शास्त्रविहित विधि के साथ श्रद्धापूर्वक किया गया पितृकर्म है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को श्राद्ध की महिमा और विधि का उपदेश दिया गया है।
अनुशासन पर्व में श्राद्ध के विभिन्न पदार्थों तथा उनके द्वारा पितरों की तृप्ति का वर्णन मिलता है। तिल, चावल, जौ, उड़द, जल, मूल और फल आदि से किए गए श्राद्ध के विभिन्न फल बताए गए हैं।
महाभारत में श्राद्ध के विभिन्न तिथियों पर किए जाने वाले कर्मों के अलग अलग फल भी बताए गए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि श्राद्ध विधान केवल एक सामान्य धार्मिक भावना नहीं, बल्कि काल, पात्र, पदार्थ और विधि से संबंधित विस्तृत धर्मशास्त्रीय व्यवस्था है।
मनुस्मृति में भी पितृकर्म और श्राद्ध का विस्तृत विधान मिलता है। वहाँ श्राद्ध में योग्य पात्रों, भोजन, तर्पण, पिण्ड तथा पितरों के प्रति किए जाने वाले कर्तव्यों का वर्णन किया गया है।
श्राद्ध का मूल भाव श्रद्धा है। इसलिए केवल बाहरी प्रदर्शन अथवा बहुत अधिक खर्च कर देना ही श्राद्ध की सार्थकता नहीं है। शास्त्रसम्मत विधि, शुद्ध आचरण, योग्य पात्र, श्रद्धा और सामर्थ्यानुसार दान इन सबका अपना महत्व है।
विभिन्न पुराणों में पितृकर्म, श्राद्ध, तर्पण, पिण्डदान, दान तथा ब्राह्मण सत्कार का वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में पितरों की तृप्ति के लिए अन्न, जल, तिल, फल, मूल आदि पदार्थों के प्रयोग तथा विभिन्न दानों की महिमा भी वर्णित है।
बहुत सारे लोग I हैं जो श्राद्धकर्म से सहमत नहीं हैं l लेकिन यहां इतना ही कहना चाहूँगा कि श्राद्धकर्म हमारी महान सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण भाग है l यह अपने पूर्वजों को स्मरण करने, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर हैं l श्राद्ध कर्म पितृऋण की स्मृति कराता हैं l नई पीढ़ी में अपने पूर्वजों के प्रति आदर सम्मान का भाव उत्पन्न होता हैं l अनेक भूखे लोगों को भोजन आदि प्राप्त होता हैं l सबसे बढ़कर अपने कुल और उसकी परंपरा के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन होता हैं l