26/05/2026
“आज के समय में हर बेटी को यही समझाया जाता है — ‘थोड़ा compromise कर लो…’ ‘लोग क्या कहेंगे…’ ‘रिश्तेदार क्या सोचेंगे…’
लेकिन कोई ये नहीं पूछता कि उस लड़की के दिल पर क्या गुजर रही है…
वो रोज़ थोड़ा-थोड़ा टूटती है, घुट-घुट कर जीती है, अपनी तकलीफ़ छुपाकर मुस्कुराना सीख जाती है।
कभी उसे पागल कहा जाता है, कभी बेवकूफ… कभी उसकी भावनाओं का मज़ाक बनाया जाता है, तो कभी उसके आत्मसम्मान को कुचल दिया जाता है।
सबको समाज की इज़्ज़त की चिंता होती है, पर उस बेटी की मानसिक शांति की नहीं…
और सबसे दर्दनाक बात ये है कि आज भी कई माँ-बाप अपनी ही बेटी से कहते हैं — ‘अब वही तुम्हारा घर है…’ चाहे वहाँ उसे रोज़ अपमान मिले, गालियाँ मिलें, जलील किया जाए, या अंदर ही अंदर मार दिया जाए।
सच्चाई ये है कि हर लड़की ज़िद्दी नहीं होती, कुछ लड़कियाँ बस टूट चुकी होती हैं… लेकिन फिर भी चुप रहती हैं, क्योंकि उन्हें बचपन से सिखाया जाता है — ‘सहन करना ही औरत की पहचान है।’
पर सहना कोई महानता नहीं,