28/10/2025
🌅 छठ से लोकतंत्र तक: एक बिहारवासी की उलझन
छठ पूजा का महापर्व आज के सूर्योदय के साथ समाप्त हुआ। पर जैसे ही अरघ्य का जल उतरा, बिहार में एक और पर्व की शुरुआत हो चुकी है — लोकतंत्र का महापर्व, यानी चुनाव का मौसम।
हर तरफ चर्चा है — कौन किसके साथ जाएगा, कौन किसे छोड़ देगा, और किसे कितनी सीटें मिलेंगी।
मैं कोई राजनीतिक विश्लेषक नहीं हूँ, बस एक आम बिहारवासी और हमेशा से एनडीए समर्थक रहा हूँ। नीतीश कुमार जी के सुशासन, सड़क-बिजली और कानून व्यवस्था में सुधार का गवाह भी। पर आज जब 20 साल बाद बिहार को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मन में एक सवाल उठता है —
क्या हम वाकई वहां पहुँचे, जहाँ पहुँचने का सपना था?
🏛 2000 से 2015: उम्मीदों का सुनहरा दौर
नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में जब बिहार ने 2005 में नई शुरुआत की, तब सच में लगा था कि यह राज्य अब बदल रहा है।
जंगलराज से निकलकर बिहार ने सुशासन का चेहरा देखा।
अपराध पर लगाम लगी,
सड़कें और पुलों ने गांव-शहर की दूरी मिटाई,
गांव-गांव में बिजली पहुँची,
लड़कियों को साइकिल योजना और शिक्षा के अधिकार मिले,
लोग फिर से विश्वास करने लगे कि “बिहार भी तरक्की कर सकता है।”
वो वक्त था जब हमें अपने नेता पर गर्व था —
जब “सुशासन बाबू” सिर्फ एक उपनाम नहीं, बल्कि आशा और परिवर्तन का प्रतीक बन गए थे।
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⚖️ 2015 से 2025: उपलब्धियों के बीच सवालों का दौर
लेकिन वक्त बीतते-बीतते वही सुशासन सवालों के घेरे में आ गया।
मैं नीतीश जी का सम्मान करता हूँ, पर एक समर्थक के नाते कुछ कटु सच्चाइयों से आंख नहीं मूंद सकता।
1️⃣ गठबंधन की राजनीति —
2015 के बाद से बार-बार पक्ष बदलने की प्रक्रिया ने राजनीति को अस्थिर कर दिया।
जनता जिसने वोट विकास के नाम पर दिया, उसे लगा कि सत्ता बचाने की राजनीति ज़्यादा हावी हो गई है।
2️⃣ रोज़गार और पलायन —
बिजली, सड़क और स्कूल तो आए, पर रोज़गार नहीं आया।
आज भी लाखों युवा दिल्ली, मुंबई, सूरत में काम कर रहे हैं।
हमारे राज्य के शिक्षित नौजवान जब बसों और ट्रेनों में ठुंसे हुए जाते हैं, तब सवाल उठता है —
क्या यही “विकसित बिहार” का सपना था?
3️⃣ शराबबंदी का सच —
शराबबंदी की नीयत नेक थी, पर नतीजे उलटे निकले।
अवैध कारोबार बढ़ा, निर्दोष जेल गए, और असली माफिया बच निकले।
महिलाओं की सुरक्षा तो बढ़ी, पर घरों में नई परेशानियाँ भी जन्म लीं।
4️⃣ शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति —
सरकारी स्कूलों में शिक्षक हैं, पर पढ़ाई नहीं।
अस्पताल हैं, पर दवाइयाँ नहीं।
सरकार की मंशा भले ईमानदार रही हो, लेकिन व्यवस्था में जड़ता और भ्रष्टाचार ने जनता का भरोसा तोड़ा है।
5️⃣ उद्योग और निवेश का अभाव —
बिहार के पास संसाधन हैं, पर निवेशक नहीं।
नीतियों की कमी, राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर बुनियादी ढाँचा ने उद्योगपतियों को दूर रखा।
इसका सीधा असर युवाओं पर पड़ा।
6️⃣ युवाओं का मोहभंग —
आज बिहार का युवा सबसे ज़्यादा जागरूक और शिक्षित है, पर उतना ही निराश भी।
सरकारी नौकरियों में देरी, पारदर्शिता की कमी और बेरोज़गारी ने उसकी उम्मीद को चोट पहुँचाई है।
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🧭 समर्थक होने के बावजूद सवाल जरूरी हैं
मैं अब भी मानता हूँ कि नीतीश कुमार जी ने बिहार को खड़ा किया, यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं।
पर जो नेता जनता से जुड़कर निकला था, वह अब प्रशासनिक तंत्र में कहीं खोता जा रहा है।
हो सकता है यह थकान हो, हो सकता है हालात की मजबूरी — पर जनता अब “एक और बहाने” नहीं, एक नई दिशा चाहती है।
मैं आलोचना नहीं कर रहा, बस आत्ममंथन कर रहा हूँ —
क्योंकि सच्चा समर्थक वही होता है जो सत्य को स्वीकार करे और सुधार की बात करे।
🔍 आने वाले पोस्ट में...
यह पहला भाग है — एक समर्थक की उलझन का आरंभ।
अगले पोस्ट में मैं देखूंगा कि क्या मुख्य विपक्ष — महागठबंधन — वाकई कोई ठोस विकल्प बन सकता है,
या फिर वह भी उसी चक्रव्यूह में फँसा है जिससे जनता परेशान है।
और फिर तीसरे भाग में बात होगी जन सुराज पार्टी की —
क्या वह बिहार के लिए कोई नया विज़न लेकर आई है या सिर्फ एक नई उम्मीद का भ्रम है?
🇮🇳 “लोकतंत्र में सवाल ही सबसे बड़ी आस्था है।”