15/11/2020
गोवर्धन पूजा का भारतीय जन जीवन में बड़ा महत्व है। हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व रहता है। इस पर्व का सीधा संबंध प्रकृति और मानव से माना गया है और हम समस्त प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। गोवर्धन पूजा के दिन गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का विशेष महत्व है। गोवर्धन पर्वत उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित है। जहां हर साल देश और दुनिया से लाखों श्रद्धालु गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के लिए पहुंचते हैं। गोवर्धन पूजा के जरिए वेदों में इस दिन वरुण, इंद्र, अग्नि आदि देवताओं की पूजा का विधान है। इस दिन गोवर्धन पर्वत, गोधन यानि गाय और भगवान श्री कृष्ण की पूजा का विशेष महत्व है। गोवर्धन पूजा को अन्न कूट का त्यौहार भी कहा जाता है भारतवर्ष में यह त्यौहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को यानि दिवाली के अगले दिन मनाया जाता है। यह त्यौहार सम्पूर्ण भारतवर्ष में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है, खासकर उत्तर भारत में ब्रज भूमि के इलाके में इसकी महत्ता और बढ़ जाती है क्योंकि इसी क्षेत्र में स्वयं भगवान श्री कृष्ण दुवारा गोकुल के लोगों को गोवर्धन पूजा के लिए प्रेरित किया था और देवराज इंद्र के अहंकार को भी तोडा गया माना जाता है।
गोवर्धन पूजा का त्यौहार, मुहूर्त:- दिनांक 15 नवंबर 2020,
सायंकालीन मुहूर्त 15:18 से 17:28 तक
कब व कैसे मनाये
1. गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन मानना चाहिए परन्तु इस दिन संध्या के समय चंद्र दर्शन नहीं होने चाहिए।
2. यदि शाम को सूर्यास्त के समय कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन चंद्र दर्शन होने वाला हो तो गोवर्धन की पूजा पहले दिन करनी चाहिए।
3. यदि सूर्य उदय के समय प्रतिपदा तिथि लगती है और चंद्र दर्शन भी नहीं हो, तो उस दिन गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए। परन्तु अगर ऐसा संभव नहीं होता तो गोवर्धन पूजा पहले दिन ही करनी होती है।
गोवर्धन पूजा के दिन गोबर से गोवर्धन बनाकर उसे फूलों से सजाया जाता है। गोवर्धन पूजा सुबह या शाम के समय की जाती है। पूजन के दौरान गोवर्धन पर धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल आदि चढ़ाये जाने चाहिए। इसी दिन गाय-बैल और कृषि काम में आने वाले पशुओं की आकृति बना कर उनकी पूजा की जाती है। गोवर्धन जी की आकृति गोबर से लेटे हुए पुरुष के रूप में बनाई जाती हैं। नाभि के स्थान पर एक मिट्टी का दीपक रखा जाता है। इस दीपक में दूध, दही, गंगाजल, शहद, बताशे या कोई अन्य मिठाई आदि रख कर पूजा करते समय डाल लिए जाते हैं और बाद में प्रसाद के रूप में बाटे जाते हैं। पूजा के बाद गोवर्धन जी की सात परिक्रमाएं लगाते हुए उनका जयकारा बोलै जाता है। परिक्रमा के वक्त हाथ में रखे लोटे से जल और जौ बोते हुए परिक्रमा पूरी की जाती है। गोवर्धन गिरि भगवान के रूप में माने जाते रहे हैं इसी दिन उनकी पूजा घर में करने से धन, संतान और सभी पालतू गौरक्ष की वृद्धि होती है। इसी दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा भी की जाती है। इस मौके पर सभी कारखानों और उद्योगों में मशीनों की पूजा होती है और विशेष छूती का उत्स्व भी मनाया जाता है।गोवर्धन पूजा के दिन गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगाने का बड़ा महत्व है। मान्यता है कि परिक्रमा करने से भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
गोवर्धन पूजा से जुड़ी पौराणिक कथा
विष्णु पुराण में गोवर्धन पूजा के महत्व का वर्णन मिलता है। बताया जाता है कि देवराज इंद्र को अपनी शक्तियों पर अभिमान हो गया था और भगवान श्री कृष्ण इंद्र के अहंकार को तोड़ने के लिए एक लीला रची थी। इसी समय गोकुल में लोग तरह-तरह के पकवान बना रहे थे और हर्षोल्लास के साथ गीत गा रहे थे। यह सब देखकर बाल कृष्ण ने यशोदा माता से पूछा कि आप लोग किस उत्सव की तैयारी कर रहे हैं। कृष्ण से सवाल पर मां यशोदा ने कहा कि हम देवराज इंद्र की पूजा कर रहे हैं। माता यशोदा के जवाब पर कृष्ण ने फिर पूछा कि हम इंद्र की पूजा क्यों करते हैं। तब माता ने कहा कि, इंद्र देव की कृपा से अच्छी बारिश होती है और अन्न की पैदावार होती है जिस से हमारी गायों को चारा मिलता है। माता यशोदा की बात सुनकर कृष्ण ने कहा कि अगर ऐसा है तो हमें गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाय वहीं चरती है, वंही लगे पेड़-पौधों की वजह से ही बारिश होती है। कृष्ण की इतनी बात मानकर सभी गोकुल वासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू कर दी। यह सब देख इंद्र देव क्रोधित हो गए और अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने मूसलाधार बारिश की शुरुआत कर दी। ऐसी प्रलयकारी वर्षा को देखकर सभी गोकुल वासी घबरा गए। तुरंत भगवान श्री कृष्ण ने अपनी लीला दिखाई और गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाया और समस्त ग्राम वासियों को पर्वत के नीचे इकठा कर लिया। इतना देखते ही इंद्र देव ने बारिश और तेज कर दी लेकिन लगातार 7 दिन की मूसलाधार बारिश के बावजूद गोकुल वासियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। इसके बाद इंद्र देव को अहसास हुआ कि मुकाबला करने वाला कोई साधारण मनुष्य नहीं बल्कि कोई दैविक शक्ति हो सकता है। इंद्र जी को जब यह सब ज्ञान हुआ कि वह स्वयं भगवान श्री कृष्ण से ही मुकाबला कर रहा था तो इसके बाद इंद्र जी ने भगवान श्री कृष्ण जी से क्षमा याचना की और स्वयं श्री कृष्ण जी की पूजा कर उन्हें भोग लगाया। ऐसा माना जाता है की इस पौराणिक घटना के बाद से ही गोवर्धन पूजा की शुरुआत हुई थी।
गोवर्धन पूजा के मौके पर विभिन्न संस्थाओ व हिन्दू समाज दुवारा मंदिरों में व् सार्वजनिक स्थानों पर अन्न कूट का विशेष आयोजन किया जाता है। अन्न कूट कई प्रकार के अन्न का मिश्रण को कहा जाता है जिसे भोग के रूप में भगवान श्री कृष्ण को अर्पित किया जाता है। कुछ स्थानों पर विशेष रूप से बाजरे की खिचड़ी भी बनाई जाती है तथा साथ ही तेल की पूड़ी आदि बनाने की परंपरा भी है। अन्न कूट के साथ-साथ दूध से बनी मिठाईंया और कई अन्य स्वादिष्ट पकवान भी भोग में चढ़ाए जाते हैं। पूजन के बाद ही इन पकवानों को प्रसाद के रूप में वहां एकत्रित श्रद्धालुओं में बांटा जाता है।
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