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27/09/2021
31/05/2021

कई लोगों को लगता है कि हम जिसे नॉमिनी बनाते हैं, वही हमारा उत्तराधिकारी भी होता है। लेकिन ऐसा नहीं है। उत्तराधिकारी और नॉमिनी में बेहद अंतर है।

किसी व्यक्ति के जीवन का केंद्र बिंदु उसका परिवार ही होता है। उसकी हरेक गतिविधि परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए होती है। परिवार का भविष्य सुरक्षित हो, इसके लिए ही वह बैंक बैलेंस बनाता है, बीमा कराता है। जब भी आप प्रॉपर्टी, इंश्योरेंस, म्यूचुअल फंड्स, बैंक डिपॉजिट्स आदि में निवेश करते हैं, तो आपसे नॉमिनी का नाम पूछा जाता है। बैंक, बीमा समेत अन्य आवेदन करते वक्त आपको एक फॉर्म दिया जाता है, जहां आप अपने नॉमिनी के बारे में जानकारी दे सकते हैं। लेकिन क्या नॉमिनी आपकी संपत्ति का वारिस भी होता है? कई लोगों को लगता है कि हम जिसे नॉमिनी बनाते हैं, वही हमारा उत्तराधिकारी भी होता है। लेकिन ऐसा नहीं है। उत्तराधिकारी और नॉमिनी में बेहद अंतर है, जो आपके लिए जानना बेहद आवश्यक है।

कौन होता है नॉमिनी?
कानूनन नॉमिनी वह व्यक्ति है, जो आपकी मृत्यु के बाद बैंक, कंपनी से मिली रकम को आपके कानूनी वारिसों तक पहुंचाता है। वह कानूनन उस रकम का मालिक नहीं होता, सिर्फ एक ट्रस्ट होता है। नॉमिनी सिर्फ आपके पैसों का केयरटेकर होता है, न कि मालिक। ऐसे में जानना जरूरी है कि नॉमिनी और उसके अधिकार क्या हैं।

कौन होता है उत्तराधिकारी?

संपत्ति के मालिक की मृत्यु के बाद उसके संबंधियों को संपत्ति सौंप दी जाती है। जन्म ग्रहण करने के साथ-साथ पैतृक संपत्ति पर उत्तराधिकार प्राप्त होता है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार पुत्र, पुत्री, विधवा, मां क्लास-1 उत्तराधिकारी में आते हैं। वहीं पिता, पुत्र व पुत्री का बेटा व बेटी, भाई, बहन, भाई व बहन की संतान क्लास-2 में आते हैं।

नॉमिनी बनाना क्यों जरूरी?

संपत्ति के मालिक को किसी न किसी को नॉमिनी जरूर बनाना चाहिए। वरना अन्यथा मृत्यु होने के बाद कई तरह की दिक्कतें आ सकती हैं। अगर नॉमिनी का नाम न हो तो जमा राशि पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसके लिए कानूनी कार्रवाई काफी लंबी होती है। अक्सर कुछ हजार रुपयों के लिए लोग इस झंझट में पड़ते ही नहीं हैं। नियम के तहत नॉमिनी का मालिकाना अधिकार नहीं होता। नॉमिनी सिर्फ बैंक से पैसे निकाल सकता है और उसके लिए उसे अधिकृत किया गया है।

क्या है क्लास-1 और क्लास-2 उत्तराधिकारी में अंतर?
अगर किसी ने अपनी कमाई बैंक में जमा की हुई है और खाते में किसी को नॉमिनी बनाया है, लेकिन अपनी संपत्ति की वसीयत नहीं की है, तो ऐसी स्थिति में शख्स की मौत हो जाने पर नॉमिनी बैंक से पैसे निकालकर क्लास-1 उत्तराधिकारी को देता है। सभी क्लास-1 उत्तराधिकारियों का पैसे पर बराबर का हक होता है। लेकिन अगर क्लास-1 उत्तराधिकारियों में से कोई नहीं है, तो क्लास-2 उत्तराधिकारियों में बंटवारा किया जाता है।
धन्यवाद
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नियमित जमानत अर्जी सुनने से पहले हाईकोर्ट में आरोपी की अग्रिम जमानत अर्जी को वापस लेने की निचली अदालत की मांग अनुचित, बन सकता है अवमानना का मामला : पटना हाईकोर्ट

Home/मुख्य सुर्खियां/नियमित जमानत अर्जी... मुख्य सुर्खियां नियमित जमानत अर्जी सुनने से पहले हाईकोर्ट में आरोपी की अग्रिम जमानत अर्जी को वापस लेने की निचली अदालत की मांग अनुचित, बन सकता है अवमानना का मामला : पटना हाईकोर्ट SPARSH UPADHYAY29 July 2020 1:44 PM 750 SHARES पटना हाईकोर्ट ने एक हालिया मामले में यह टिप्पणी की कि निचली अदालत के न्यायिक अधिकारियों को न्यायालय की अवमानना के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, यदि एक आरोपी की गिरफ्तारी के बाद उसके जमानत आवेदन पर सुनवाई करने से पहले अदालत द्वारा यह कहा जाता है कि पहले वह हाईकोर्ट में अपनी अग्रिम जमानत की अर्जी को वापस ले। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद की सिंगल बेंच द्वारा यह टिप्पणी उस मामले में की गयी जहाँ अदालत याचिकाकर्ता राहुल कुमार की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। दरअसल, याचिकाकर्ता को हत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, हालाँकि उसकी गिरफ्तारी उस दौरान हुई जब 8 जून को उसके द्वारा हाईकोर्ट में दाखिल अग्रिम जमानत का आवेदन सुनवाई हेतु लंबित था।

गौरतलब है कि जब एक बार कोई व्यक्ति किसी मामले में गिरफ्तार हो जाता है, उसके बाद उसके द्वारा पूर्व में दाखिल अग्रिम जमानत के आवेदन का कोई मतलब नहीं रह जाता है। यह जाहिर है कि वह याचिका/आवेदन निष्प्रभावी हो जाता है। पिछले वर्ष, पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम के मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने इस बात को दोहराया था कि उनकी अग्रिम जमानत की याचिका निष्प्रभावी हो गई है, क्योंकि चिदंबरम को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है और उन्हें सीबीआई की हिरासत में भेज दिया गया है।

जस्टिस भानुमति और जस्टिस ए. एस. बोपन्ना की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले में यह कहा कि पी. चिदंबरम ट्रायल कोर्ट के समक्ष नियमित जमानत लेने के लिए स्वतंत्र हैं। पीठ ने कहा था कि ट्रायल कोर्ट को हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना नियमित जमानत आवेदन पर विचार करना चाहिए। यही बात, मौजूदा मामले में श्री अखिलेश्वर दयाल, राज्य के लिए पेश एपीपी ने मानते हुए कहा कि एक बार एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिए जाने के बाद, अग्रिम जमानत के रूप में सभी कार्यवाही समाप्त हो जाती हैं।

हालाँकि, मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता ने अदालत को यह बताया कि उसके द्वारा निचली अदालत में दाखिल नियमित जमानत अर्जी का उसका प्रयास इस अग्रिम आवेदन की पेंडेंसी (हाईकोर्ट में) के कारण सफल नहीं हो सका। अदालत ने अपने आदेश में इस बात को रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता द्वारा अदालत को यह सूचित किया गया है कि वास्तव में निचली अदालत, एक अभियुक्त की नियमित जमानत अर्जी पर विचार नहीं कर रही हैं, यदि उस व्यक्ति द्वारा अग्रिम जमानत अर्जी दायर की गयी है और वह उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है।

दरअसल, निचली अदालत द्वारा आरोपियों को अग्रिम जमानत अर्जी को वापस लेने के आदेश का उत्पादन करने के लिए कहा जाता है। याचिकाकर्ता के लिए पेश वकील ने अदालत के समक्ष यह प्रस्तुत किया है कि पटना उच्च न्यायालय के पूर्व निर्धारित आदेश के बावजूद (Cri. Misc. No. 21360 of 2015), निचली अदालतों द्वारा इसका पालन नहीं किया जा रहा है। दरअसल इस मामले (Cri. Misc. No. 21360 of 2015) में पटना हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि, "वह (आरोपी) कह रहा है कि निचली अदालत इस याचिकाकर्ता की नियमित जमानत अर्जी पर सुनवाई के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की अग्रिम जमानत की अर्जी लंबित है। मैंने अभी तक ऐसी बेतुकी प्रार्थना नहीं सुनी। एक व्यक्ति के गिरफ्तार हो जाने के पश्च्यात, अग्रिम जमानत के मामले में सभी कार्यवाही निरर्थक/निष्प्रभावी हो जाती हैं और कोई भी मजिस्ट्रेट कभी भी ऐसा अवलोकन नहीं कर सकता है।" अदालत का मौजूदा मामले में मत मौजूदा मामले में न्यायालय का विचार यह रहा है कि यदि न्यायालय में कोई भी न्यायिक अधिकारी, coordinate पीठ के उक्त आदेश (Cri. Misc. No. 21360 of 2015) और टिप्पणियों का पालन नहीं कर रहा है, तो उन्हें न्यायालय की अवमानना के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है और यदि एक विशिष्ट मामला सामने लाया जाता है तो इस न्यायालय द्वारा उसे बहुत गंभीरता से लिया जा सकता है। अदालत ने मुख्य रूप से कहा कि, "पूर्वोक्त कारण के लिए इस महामारी की अवधि के दौरान अगर जेल में पड़ा कोई व्यक्ति पीड़ित है, तो यह केवल किसी आरोपी की संवैधानिक और मानवाधिकारों का ही हनन नहीं है, यह न्यायिक अनुशासनहीनता का भी मामला है।" आगे अदालत ने यह भी कहा कि, "इसलिए, यह न्यायालय इस न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को यह निर्देशित करते हैं कि वे इस आदेश को सभी जिला और सत्र न्यायाधीशों को भेजकर सर्कुलेट करें, जो बदले में इसे संबंधित न्यायालय के सभी न्यायिक अधिकारीयों के संज्ञान में लाएंगे।" गौरतलब है कि गुरबक्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य (1980) 2 SCC 565 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह साफ़ किया था कि एक बार यदि व्यक्ति गिरफ्तार हो जाता है तो वह अग्रिम जमानत का आवेदन नहीं कर सकता है। हालाँकि, गिरफ्तारी के बाद अभियुक्त को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 437 या धारा 439 के तहत जमानत प्राप्त करने का अधिकार है यदि वह जमानत पर रिहा होना चाहता है तो। केस विवरण केस नंबर: CRIMINAL MISCELLANEOUS No. 19874 of 2020 केस शीर्षक: राहुल कुमार बनाम बिहार राज्य कोरम: न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद

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