30/04/2026
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नाबालिग लड़की को सात महीने से अधिक की गर्भावस्था का चिकित्सीय समापन कराने की अनुमति देते हुए कहा कि कोई भी अदालत किसी महिला, विशेषकर नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था पूरी अवधि तक जारी रखने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि जन्म लेने वाले बच्चे की अपेक्षा गर्भवती महिला की इच्छा अधिक महत्त्वपूर्ण है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि ऐसी गर्भावस्था जारी रहने से नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा की संभावनाओं, सामाजिक स्थिति और समग्र विकास पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला की प्रजनन संबंधी स्वायत्तता को सर्वोच्च महत्त्व दिया जाना चाहिए। यदि किसी महिला को अवांछित गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा पीठ ने कहा, 'अपने शरीर से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार विशेषकर प्रजनन के मामलों में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा है। यह अधिकार अव्यावहारिक प्रतिबंध लगाकर निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता, खासकर नाबालिगों और अवांछित गर्भावस्था जैसे मामलों में।'
न्यायालय ने कहा, 'किसी भी अदालत को किसी महिला और विशेष रूप से नाबालिग बच्ची को उसकी स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था पूरी अवधि तक ढोने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। ऐसा करना न केवल उसकी निर्णय लेने की स्वतंत्रता की अनदेखी होगी, बल्कि यदि उसे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया जाए तो उसे गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात भी पहुंचेगा।'