Law Adda 2023

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"Turning legal complexities into clear solutions."

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नाबालिग लड़की को सात महीने से अधिक की गर्भावस्था का चिकित्सीय समापन कराने की अनुमति देते हु...
30/04/2026

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नाबालिग लड़की को सात महीने से अधिक की गर्भावस्था का चिकित्सीय समापन कराने की अनुमति देते हुए कहा कि कोई भी अदालत किसी महिला, विशेषकर नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था पूरी अवधि तक जारी रखने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि जन्म लेने वाले बच्चे की अपेक्षा गर्भवती महिला की इच्छा अधिक महत्त्वपूर्ण है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि ऐसी गर्भावस्था जारी रहने से नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा की संभावनाओं, सामाजिक स्थिति और समग्र विकास पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला की प्रजनन संबंधी स्वायत्तता को सर्वोच्च महत्त्व दिया जाना चाहिए। यदि किसी महिला को अवांछित गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा पीठ ने कहा, 'अपने शरीर से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार विशेषकर प्रजनन के मामलों में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा है। यह अधिकार अव्यावहारिक प्रतिबंध लगाकर निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता, खासकर नाबालिगों और अवांछित गर्भावस्था जैसे मामलों में।'

न्यायालय ने कहा, 'किसी भी अदालत को किसी महिला और विशेष रूप से नाबालिग बच्ची को उसकी स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था पूरी अवधि तक ढोने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। ऐसा करना न केवल उसकी निर्णय लेने की स्वतंत्रता की अनदेखी होगी, बल्कि यदि उसे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया जाए तो उसे गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात भी पहुंचेगा।'

The Allahabad High Court has directed admission of a student in Class VI in Navodaya Vidyalaya holding that a birth cert...
29/04/2026

The Allahabad High Court has directed admission of a student in Class VI in Navodaya Vidyalaya holding that a birth certificate issued under a statutory provision carries a presumption of validity and cannot be doubted on the basis of medical opinion alone. The petitioner sought a mandamus directing admission in Class VI and to keep a seat reserved, relying on the birth certificate issued by the Gram Panchayat showing date of birth as July 01, 2013 and the eligibility criteria under the Navodaya Vidyalaya prospectus.

A Bench of Justice Siddharth Nandan held, “unless and until, a document which has been issued under a statutory provision, is either cancelled or an element of forgery is proved, it shall have a binding effect on the authorities; and it is not within the domain of the authorities concerned, to doubt the certificate issued under a statutory provision, on its own whims and fancies.”

The Court held that once a document is issued under a statutory provision, it shall have the presumption of its validity under law and cannot be doubted on its own whims and fancies unless cancelled or proved forged. It further observed that ossification tests are not accurate and have a variation of ± 2 years, as held by the Supreme Court in Jaya Mala v. Home Secretary, Government of J&K and Vishnu Alias Undrya v. State of Maharashtra.
The Court also referred to Jarnail Singh vs. State of Haryana, observing that statutory documents like matriculation or birth certificates take precedence over medical opinion in age determination. Finding that the birth certificate had not been controverted or cancelled, the Court held that denial of admission was not in consonance with the Right to Education Act, 2009. Accordingly, the Court directed the respondent authority to admit the petitioner in Class VI for the academic session 2026–27. Further, the Court issued directions to Navodaya Vidyalaya authorities to rely on statutory documents such as matriculation certificates, school records, or birth certificates, and seek medical opinion only in their absence, with a mechanism for verification from issuing authorities.

सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय किसी आरोपी को ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्दे...
28/04/2026

सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय किसी आरोपी को ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश देने का अधिकार कोर्ट के पास नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की, "अगर कोर्ट अग्रिम ज़मानत खारिज करना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है, लेकिन कोर्ट के पास यह कहने का अधिकार नहीं है कि याचिकाकर्ता को अब सरेंडर कर देना चाहिए।" जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ऐसे व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिस पर धोखाधड़ी और जालसाज़ी का आरोप है। यह याचिका झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई, जिसमें उसकी अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की थी और उसे सरेंडर करके नियमित ज़मानत मांगने के लिए कहा गया था।
शिकायतकर्ता ने 2021 में मजिस्ट्रेट के सामने निजी शिकायत दायर की, जिसमें ज़मीन विवाद के सिलसिले में IPC की धारा 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाना), 420 (धोखाधड़ी), 467 (कीमती दस्तावेज़ की जालसाज़ी), 468 (धोखाधड़ी के मकसद से जालसाज़ी), 471 (जाली दस्तावेज़ का इस्तेमाल करना), और 120B (धारा 34 के साथ पठित) के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दूसरी अग्रिम ज़मानत याचिका इस आधार पर खारिज की कि कोई नई परिस्थितियां सामने नहीं आई थीं। कोर्ट ने अपने पिछले आदेश पर भरोसा किया, जिसमें उसने याचिकाकर्ता की पहली अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की थी और याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करे और 'सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI' मामले में दिए गए फैसले के अनुसार नियमित ज़मानत मांगे।

कोर्ट ने पाया कि इस कानूनी स्थिति के बावजूद, अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ियाँ नियमित रूप से दायर की जा रही हैं और उन पर सुनवाई हो रही है - खासकर बिहार और झारखंड में - जिसके चलते बेवजह के मुक़दमे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच रहे हैं। कोर्ट ने कहा, "बेवजह अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ियों पर सुनवाई की जाती है, और जब वे खारिज हो जाती हैं तो मुक़दमा लड़ने वालों को इस देश की सबसे बड़ी अदालत तक का सफ़र तय करना पड़ता है। हम हाईकोर्ट को यह भी याद दिलाते हैं कि याचिकाकर्ता को कोर्ट के सामने सरेंडर करके नियमित ज़मानत माँगने का जो निर्देश दिया गया, वह भी पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर है।"


The Patna High Court has upheld the termination of a probationary Indian Revenue Service officer, holding that a probati...
27/04/2026

The Patna High Court has upheld the termination of a probationary Indian Revenue Service officer, holding that a probationer has no indefeasible right to continue in service and that termination during the period of probation, if found unsuitable, does not require a full-fledged departmental inquiry or prior notice, provided the order is not punitive or stigmatic in nature.

A division bench of Justice Mohit Kumar Shah and Justice Alok Kumar Pandey dismissed the writ petitions challenging the Central Administrative Tribunal’s order and affirmed the termination of the petitioner’s services under Rule 5(1) of the Central Civil Services (Temporary Service) Rules, 1965.

The Court held that the petitioner continued to be a probationer at the time of termination and that the order of discharge was simpliciter, passed in accordance with applicable service rules, without attracting the safeguards of Article 311 of the Constitution.

The case arose from the petitioner’s appointment to the Indian Revenue Service (Customs and Central Excise), Group ‘A’, pursuant to the Civil Services Examination, 2015.

बॉम्बे हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि यदि कोई किरायेदार बाद में संपत्ति का सह-मालिक बन जाता है तो उसके खिलाफ ब...
21/04/2026

बॉम्बे हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि यदि कोई किरायेदार बाद में संपत्ति का सह-मालिक बन जाता है तो उसके खिलाफ बेदखली की कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वामित्व का अधिकार मिलने के बाद किरायेदार की स्थिति बदल जाती है। जस्टिस राजेश एस. पाटिल इस मामले की सुनवाई कर रहे थे। मामला एक बेदखली वाद से जुड़ा था, जिसमें अवैध निर्माण, उप-किरायेदारी, उपयोग में बदलाव, वास्तविक आवश्यकता और किराया बकाया जैसे आधारों पर कार्रवाई की गई।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि कार्यवाही लंबित रहते हुए किरायेदार ने 22 अप्रैल, 2016 को संपत्ति के एक सह-मालिक के उत्तराधिकारियों से 50 प्रतिशत हिस्सा खरीद लिया। इसके बाद उसने तर्क दिया कि अब वह सह-मालिक बन चुका है, इसलिए उसके खिलाफ बेदखली की कार्यवाही जारी नहीं रह सकती। हाईकोर्ट ने मोहींदर प्रसाद जैन बनाम मनोहर लाल जैन (2006) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भले ही कोई एक सह-मालिक बेदखली की कार्यवाही शुरू कर सकता है, लेकिन यदि परिस्थितियों में बदलाव हो जाए या अन्य सह-मालिक आपत्ति करें, तो ऐसी कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।

अदालत ने कहा कि जब किरायेदार संपत्ति में हिस्सा खरीद लेता है तो उसकी दोहरी स्थिति बन जाती है, वह एक ओर किरायेदार रहता है और दूसरी ओर सह-मालिक भी बन जाता है। ऐसे में उसके खिलाफ बेदखली की कार्रवाई जारी रखना कानूनी रूप से उचित नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि इस तरह की स्थिति में स्वामित्व का अधिकार अधिक प्रभावी हो जाता है और बेदखली का आधार समाप्त हो जाता है। मामले के तथ्यों में यह भी सामने आया कि किरायेदार ने संपत्ति के बंटवारे के लिए अलग से कार्यवाही भी शुरू की थी। साथ ही एक सह-मालिक ने भी बेदखली कार्यवाही जारी रखने में असहमति जताई थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत का फैसला रद्द किया और ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें बेदखली का दावा खारिज किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला आंशिक रूप से रद्द किया। इस फैसले में हरियाणा सरकार की उन...
20/04/2026

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला आंशिक रूप से रद्द किया। इस फैसले में हरियाणा सरकार की उन नीतियों के एक समूह को रद्द कर दिया गया था, जिनका मकसद कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले एड-हॉक और दिहाड़ी मज़दूरी वाले कर्मचारियों को पक्का करना था। कोर्ट ने 16 जून, 2014 और 18 जून, 2014 को जारी दो नोटिफिकेशन की वैधता को बरकरार रखा, लेकिन 7 जुलाई, 2014 को जारी दो नोटिफिकेशन रद्द किए।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने पाया कि जुलाई 2014 के नोटिफिकेशन उन एड-हॉक कर्मचारियों को पक्का करने की कोशिश कर रहे थे, जिनकी नियुक्ति किसी सार्वजनिक विज्ञापन के ज़रिए शुरू की गई उचित भर्ती प्रक्रिया के तहत नहीं हुई। इस तरह ये नोटिफिकेशन 'सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ़ कर्नाटक बनाम उमादेवी (2006)' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहे थे।

उमादेवी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकारी नौकरियों में भर्ती आम तौर पर उचित भर्ती प्रक्रिया के ज़रिए ही होनी चाहिए, और कॉन्ट्रैक्ट पर या एड-हॉक काम करने वाले कर्मचारियों को अपने आप ही पक्का नहीं किया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने एक सीमित "एक-बारगी उपाय" के तौर पर उन कर्मचारियों को पक्का करने की अनुमति दी, जिन्होंने 10 अप्रैल, 2006 तक बिना किसी कोर्ट सुरक्षा के दस साल से ज़्यादा समय तक काम किया।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"इसका मकसद उन एड-हॉक कर्मचारियों को समायोजित करना था, जिन्हें किसी सार्वजनिक विज्ञापन या इंटरव्यू के अभाव में भले ही अस्थायी तौर पर काम पर रखा गया। हमें 07.07.2014 के दो नोटिफिकेशन की वैधता को बरकरार रखने का कोई उचित कारण नज़र नहीं आता, क्योंकि इनका मकसद उन एड-हॉक कर्मचारियों की सेवाओं को पक्का करना है, जिन्हें बिना किसी विज्ञापन और बिना इंटरव्यू के काम पर रखा गया। इस हद तक हाईकोर्ट का वह फैसला, जिसमें 07.07.2014 के नोटिफिकेशन को मनमाना और गैर-कानूनी बताया गया, उसमें दखल देने की कोई ज़रूरत नहीं है।"

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बॉम्बे हाई कोर्ट (औरंगाबाद बेंच) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पारिवारिक अदालतें वैवाहिक विवादों में मनमाने ढंग स...
19/04/2026

बॉम्बे हाई कोर्ट (औरंगाबाद बेंच) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पारिवारिक अदालतें वैवाहिक विवादों में मनमाने ढंग से या यांत्रिक रूप से पति/पत्नी को मानसिक स्वास्थ्य की जांच (मनोचिकित्सीय मूल्यांकन) के लिए नहीं भेज सकती हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी जांच का आदेश देने से पहले प्रथम दृष्टया (prima facie) ठोस सबूत और उचित कारण होना आवश्यक है। 

निर्णय के मुख्य बिंदु:

बिना सबूत जांच अनुचित: न्यायमूर्ति एस.जी. चपलगांवकर ने कहा कि केवल एक पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों के आधार पर दूसरे पक्ष का मेडिकल टेस्ट नहीं कराया जा सकता।

निचली अदालत का आदेश रद्द: कोर्ट ने धुले के एक पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को मनोचिकित्सीय मूल्यांकन के लिए भेजा गया था।

कानूनी आधार आवश्यक: हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(iii) के तहत तलाक के लिए, पति या पत्नी को यह साबित करना होगा कि दूसरा पक्ष असाध्य मानसिक अस्वस्थता या गंभीर विकार से ग्रस्त है।

निजता का अधिकार: अदालत ने जोर देकर कहा कि ऐसी जांच किसी व्यक्ति की निजता और गरिमा को प्रभावित करती है, इसलिए इसे 'कैजुअल' (लापरवाही) तरीके से नहीं किया जा सकता। 

यह फैसला वैवाहिक मामलों में जीवनसाथी के खिलाफ बिना किसी ठोस आधार के मानसिक बीमारी के आरोप लगाकर उन्हें प्रताड़ित करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाता है।



18/04/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 375 के तहत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने...
17/04/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 375 के तहत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने के लिए ज़मानत की शर्त हर मामले में बिना सोचे-समझे नहीं लगाई जा सकती। कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में केवल एक ही वारिस हो, या किसी एक वारिस को प्रमाण पत्र जारी करने पर कोई आपत्ति न हो, वहां ऐसी शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 उन आवेदनों के बारे में बताती है, जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए ज़िला जज के समक्ष किए जा सकते हैं। धारा 373 ऐसे आवेदनों की प्रक्रिया बताती है और धारा 374 आवेदन की सामग्री बताती है।
अधिनियम की धारा 375 ज़िला जज को यह अधिकार देती है कि वह ऐसे मामलों में, जिन्हें वह उचित समझे, प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाले व्यक्ति पर बॉन्ड के रूप में सुरक्षा संबंधी शर्तें लगा सके। अधिनियम की धारा 375 का हवाला देते हुए जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा, “कोई शर्त तब लगाई जाती है, जब कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि यह किसी भी उद्देश्य के लिए आवश्यक है, जिसमें किसी ऋण का भुगतान, कोई अन्य दावेदार, वैधानिक अधिकारियों को कोई बकाया आदि शामिल हैं। हालांकि, किसी शर्त को लगाने पर विचार प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। किसी शर्त पर बिना सोचे-समझे ज़ोर नहीं दिया जा सकता, विशेष रूप से ऐसी स्थितियों में जहाँ लाभार्थी एकमात्र लाभार्थी हो, या अन्य उपयुक्त मामलों में, यदि लाभार्थी मृतक का स्वाभाविक वारिस हो और अन्य दावेदारों की ओर से कोई आपत्ति न हो।”

अदालत ने टिप्पणी की, “ISA की धारा 375 को देखने से यह साफ़ पता चलता है कि सिक्योरिटी/ज़मानत/क्षतिपूर्ति बॉन्ड की शर्त लगाने का मकसद उन लोगों को क्षतिपूर्ति देना या उनके हितों की रक्षा करना है, जो कर्ज़ और सिक्योरिटी के पूरे या किसी हिस्से के हकदार हो सकते हैं।” यह मानते हुए कि यह शर्त सभी मामलों में बिना सोचे-समझे लागू नहीं की जा सकती, अदालत ने फ़ैसला दिया कि चूंकि सर्टिफ़िकेट लेने वाला केवल एक ही वारिस था और दूसरी बेटी ने याचिकाकर्ता के पक्ष में अपनी सहमति दी थी, इसलिए बॉन्ड की शर्त लगाने का कोई औचित्य नहीं था।

याचिकाकर्ता को बिना ज़मानत के उत्तराधिकार सर्टिफ़िकेट जारी करने का निर्देश देते हुए अदालत ने रिट याचिका स्वीकार की।

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16/04/2026

Section 144 of BNSS.

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अप्रैल) को फैसला सुनाया कि जहां अभियोजन पक्ष ऐसे विश्वसनीय और अकाट्य सबूतों का खंडन करने में ...
15/04/2026

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अप्रैल) को फैसला सुनाया कि जहां अभियोजन पक्ष ऐसे विश्वसनीय और अकाट्य सबूतों का खंडन करने में विफल रहता है, जो शिकायत के तथ्यात्मक आधार को प्रभावी ढंग से कमजोर करते हैं, वहां कोर्ट के लिए कार्यवाही रद्द करने की अपनी शक्ति का प्रयोग करना उचित होगा। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने उन अपीलकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जिन पर एक बुजुर्ग व्यक्ति पर हमला करने का आरोप था। कोर्ट ने पाया कि CCTV फुटेज काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ, क्योंकि यह शिकायतकर्ता के उस बयान के विपरीत था, जिसका अभियोजन पक्ष ने कोई खंडन नहीं किया था।

कोर्ट ने टिप्पणी की, "जहां विश्वसनीय और अकाट्य सबूत स्पष्ट रूप से आरोपों के तथ्यात्मक आधार को गलत साबित कर देते हैं और अभियोजन पक्ष प्रभावी ढंग से उनका खंडन करने में असमर्थ रहता है, वहां अन्याय को रोकने के लिए कोर्ट अपनी अंतर्निहित अधिकारिता का प्रयोग करने में उचित होगा। ऐसा दृष्टिकोण न केवल आरोपी को न्याय दिलाता है, बल्कि उन कार्यवाहियों पर कीमती न्यायिक समय की बर्बादी को भी रोकता है, जिनका उपलब्ध सबूतों के आधार पर, दोषसिद्धि में परिणत होने का कोई उचित अवसर नहीं होता।"

अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में CCTV फुटेज की बारीकी से जांच की गई। यह फुटेज अभियोजन पक्ष की अपनी चार्जशीट का ही हिस्सा था। कोर्ट ने पाया कि फुटेज अपीलकर्ताओं के खिलाफ अभियोजन पक्ष के आरोपों का समर्थन नहीं करता। इसके विपरीत, फुटेज से यह साबित हुआ कि अपीलकर्ता हिंसा में शामिल होने के बजाय स्थिति को शांत करने का प्रयास कर रहे थे। अदालत ने टिप्पणी की, “वह फुटेज, जिस पर बहस के दौरान दोनों पक्षकारों ने काफी भरोसा किया, बारीकी से जांच करने पर यह नहीं दिखाता कि अपीलकर्ता किसी भी तरह के हमले या खुले तौर पर आक्रामकता वाले काम में शामिल थे। इस तरह उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की तथ्यात्मक बुनियाद काफी हद तक कमज़ोर हो जाती है। यह सामग्री किसी भी सार्थक तरीके से गलत साबित नहीं हुई। इसका स्वरूप ऐसा है कि इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता, यहां तक कि उस चरण में भी जब अदालत किसी आपराधिक मामले की कार्यवाही को शुरू में ही रद्द करने की याचिका पर विचार कर रही हो।”

14/04/2026

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