17/03/2025
औरंगज़ेब की कब्र:-
मुगलों को सिर्फ मुसलमान होने के कारण उनपर आक्रमण किया जा रहा है जबकि वह आज के निज़ाम से बहुत बेहतर थे , निष्पक्ष थे और न्यायप्रिय थे।
मुग़ल बादशाह बाबर ने अपनी जीवनी "बाबरनामा" में गाय और हिंदुओं की आस्था का सम्मान करने के लिए अपने वंशजों को तमाम वसीयतनामे किए है।
मुगलों के दरबार में हिंदू अधिकारी बहुतायत में थे, अकबर के दरबार के 9 रत्नों में 4 हिंदू थे , तानसेन उर्फ़ राम तनु पांडेय , बीरबल उर्फ़ महेश दास भट्ट , राजा टोडरमल अग्रवाल और राजा मानसिंह ...
कोई राजा मानसिंह उनके सेनापति थे तो कोई राजा टोडरमल अग्रवाल उसके वित्त मंत्री... बीरबल तो बत्तीमीज़ी की हद तक उनसे बात करते थे।
इसी तरह शाहजहां तक उनके दरबार में राजा सवाई जयसिंह से लेकर जशवंत सिंह और पंडित जगन्नाथ, कविन्द्र सरस्वती से लेकर सुन्दर दास तक थे। यहां तक कि राजा रघुनाथ राय "शाही दीवान" अर्थात वित्त और राजस्व के महत्वपूर्ण पद थे।
यहां तक कि जिस औरंगजेब को आज सबसे बड़ा खलनायक और हिन्दू कुश बताया जा रहा है उसके दरबार में सबसे अधिक हिन्दू पदाधिकारी थे जो किसी भी मुग़ल बादशाहों के दरबार से अधिक थे।
राजस्थान की मौजूदा उपमुख्यमंत्री महारानी दिया कुमारी के परदादा कछवाहा राजपूत शासक राजा जयसिंह प्रथम जिनके नाम से "जयपुर" है वह औरंगज़ेब के सबसे प्रमुख सैन्य कमांडर और सूबेदार थे जिन्हें औरंगज़ेब ने "मिर्ज़ा राजा" का खिताब दिया था। यह औरंगज़ेब के दरबार का सबसे बड़ा सम्मान था..
राजा जयसिंह ने औरंगज़ेब के कई सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया जिसमें छत्रपति शिवाजी के खिलाफ पुरंदर की संधि थी तो दक्कन में बीजापुर और गोलकुंडा सल्तनतों के खिलाफ अभियान भी चलाया और जीत दर्ज की। वह बंगाल और दक्कन के सूबेदार भी रहे। उन्होंने ही औरंगज़ेब की तरफ़ से शिवाजी महाराज और छावा के खिलाफ युद्ध लड़ा और उन्हें पराजित किया।
जोधपुर के राठौड़ राजपूत शासक महाराजा जसवंत सिंह औरंगज़ेब के शासन में दूसरे सबसे विश्वसनीय हिंदू सरदार थे। औरंगज़ेब के शासन में वह अफगानिस्तान और दक्कन जैसे क्षेत्रों में सैन्य अभियानों की जिम्मेदारी संभालते थे। अर्थात यह दोनों राजपूत राजा औरंगज़ेब के शासन के गृहमंत्री थे,अमित शाह की तरह।
राजा राय रघुनाथ तो दीवान-ए-कुल अर्थात वित्त और राजस्व के प्रमुख थे जैसे आज निर्मला सीतारमण हैं।
आनंद राम मुखलिस तो औरंगज़ेब के निजी सचिव थे और उनके आदेश को लिख कर शासन के संबंधित अधिकारियों को भेजा करते थे।
इसके अतिरिक्त औरंगजेब ने कई अन्य छोटे राजपूत सरदारों को भी सैन्य और प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया था और विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ उनकी वफादारी और सैन्य शक्ति उपयोगी हो सकती थी।
बीकानेर में महाराजा अनूप सिंह तो कोटा में महाराजा भीम सिंह को , भीम सिंह को तो औरंगज़ेब ने "महाराव" की उपाधि दी थी और वह उनके दरबार के सबसे अधिक सम्मानित सरदार थे। बूंदी के हाड़ा राजपूत राव भाऊ सिंह औरंगज़ेब के दरबार में भी सबसे विश्वसनीय सैन्य सरदार थे।
राजा राम सिंह ने औरंगज़ेब के शासन में असम और बंगाल जैसे क्षेत्रों में सैन्य अभियानों की जिम्मेदारी थी।
दुर्गादास राठौड़, जो मारवाड़ के राठौड़ राजपूत थे, शुरुआत में औरंगज़ेब के दरबार के महत्वपूर्ण राजा थे।
कहने का मतलब यह कि औरंगज़ेब का सैन्य और वित्त सभी हिंदुओं के पास ही था, शिवाजी से लेकर छावा तक सारे युद्ध जयसिंह और जशवंत सिंह ने ही लड़ा और किसी को गिरफ्तार किया तो किसी की हत्या की...
वही हिन्दू राजा और सैन्य कमांडर औरंगज़ेब का हिंदू कुश अभियान भी चलाए होंगे? ब्राम्हणों की प्रतिदिन हत्या करके 1.5 मन जनेऊ रोज़ तौलते होंगे और औरंगज़ेब का सारा सैन्य और वित्त अपने हाथ में होने के बावजूद उन्होंने औरंगजेब के हिंदू कुश अभियान के खिलाफ विरोध और विद्रोह नहीं किया.....
सोचकर हंसी आती है...
किसी भी शासन के सबसे महत्वपूर्ण विभाग गृह और वित्त ही होता है और औरंगज़ेब ने यह दोनों विभाग हिंदुओं को दिया, मगर मौजूदा निज़ाम में मुसलमान कहां हैं? कौन सा विभाग देख रहे हैं?
इसीलिए कहा कि मौजूदा निज़ाम औरंगज़ेब के शासन के मुकाबले कहीं बदतर है और क्रूर भी।
औरंगज़ेब के शासन में 1947 नहीं हुआ, जालियांवाला बाग नहीं हुआ, मेरठ मलियाना मुरादाबाद हाशिमपुरा गुजरात मुज़फ्फरनगर भागलपुर किशनगंज दिल्ली नहीं हुआ, औरंगज़ेब ने किसी के गले में हांडी और पिछवाड़े झाड़ू नहीं बंधवाया, किसी के स्तन को नहीं नपवाया , इंच इंच स्तन नापकर उसपर "स्तन कर" नहीं लगाया तो औरंगज़ेब के शासन में भीमा कोरेगांव नहीं हुआ।
औरंगज़ेब ने किसी को बच्चा पैदा करने की मशीन नहीं कहा , किसी को डराया नहीं कि यह "मंगलसूत्र छीन लेंगे" , भैंस मकान और रोटी छीन लेंगे।
दरअसल यह अपने "राम" से भी नहीं सीखते जिन्होंने अपनी प्राण प्रिय पत्नी सीता के अपहरणकर्ता रावण को भी मरते समय सम्मान दिया था।
और राम के उस चरित्र के विपरित यह 500 साल पहले मर गए औरंगज़ेब की कब्र पर पेशाब करने का आह्वान कर रहे हैं, और एक बात समझ लीजिए कि वहां जाकर इनकी निकलेगी भी नहीं।
इतिहास अभी बाकी है, इतिहास किसी का निर्ममता से विश्लेषण तब करता है जब वह सत्ता में नहीं होता।
उसी दिन का इंतजार है , क्योंकि झूठ की ज़िंदगी लंबी नहीं होती।
Mohd Zahid ✍️✍️