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25/09/2025
शादी का वादा और सहमति से संबंध बनाना बलात्कार नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने POCSO मामला खारिज कियाएक सुंदर परिदृश्य05-08-2025भा...
10/08/2025

शादी का वादा और सहमति से संबंध बनाना बलात्कार नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने POCSO मामला खारिज किया
एक सुंदर परिदृश्य
05-08-2025

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 4 अगस्त, 2025 के अपने हालिया फैसले में दोहराया कि जब दो व्यक्ति शादी के सच्चे वादे के आधार पर सहमति से यौन संबंध बनाते हैं, तो यह भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत स्वतः ही बलात्कार नहीं माना जाता , जब तक कि यह साबित न हो जाए कि वादा शुरू से ही झूठा था। न्यायालय ने यह टिप्पणी कुणाल चटर्जी नाम के एक व्यक्ति के खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) सहित अन्य आपराधिक आरोपों को खारिज करते हुए की ।
मामले की पृष्ठभूमि और तथ्य

यह मामला तब सामने आया जब एक महिला ने 2022 में एक प्राथमिकी दर्ज कराई जिसमें आरोप लगाया गया कि कुणाल चटर्जी ने 15 साल की उम्र में शादी का वादा करके उसके साथ यौन संबंध बनाए । यह रिश्ता कई सालों तक चला, लेकिन महिला के बालिग होने के बाद, कुणाल कथित तौर पर शादी से मुकर गया। कथित घटना के तीन साल बाद प्राथमिकी दर्ज की गई, और इसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 417 (धोखाधड़ी), धारा 376 (बलात्कार), धारा 506 (आपराधिक धमकी) सहपठित धारा 34 , और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम की धारा 6 के तहत गंभीर आरोप शामिल थे ।

देरी और साक्ष्यों के अभाव पर सर्वोच्च न्यायालय का विश्लेषण

न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने पाया कि कथित कृत्य के तीन साल से भी ज़्यादा समय बाद प्राथमिकी दर्ज की गई थी । इस देरी का उचित कारण नहीं बताया गया और अभियोजन पक्ष ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत बलात्कार या गंभीर यौन उत्पीड़न के दावे के समर्थन में कोई फोरेंसिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया । न्यायालय ने पाया कि आरोप देर से लगाए गए प्रतीत होते हैं और लड़की के वयस्क होने के बाद रिश्ते बिगड़ने के बाद ही सामने आए।

शादी के वादे के तहत सहमति से संबंध बनाने पर अदालत का विचार

पृथ्वीराजन बनाम राज्य, 2025 एससीसी ऑनलाइन एससी 696 , प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2019) 9 एससीसी 608 , और महेश्वर तिग्गा बनाम झारखंड राज्य, (2020) 10 एससीसी 108 जैसे प्रमुख उदाहरणों का हवाला देते हुए , सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि शादी के वादे के आधार पर सहमति से बनाया गया यौन संबंध तब तक बलात्कार नहीं माना जाएगा जब तक यह साबित न हो जाए कि वादा शुरू से ही झूठा था । वर्तमान मामले में, महिला ने स्वयं स्वीकार किया कि उसने रिश्ते के लिए सहमति दी थी क्योंकि कुणाल चटर्जी ने उससे शादी करने का वादा किया था।

अदालत ने POCSO अधिनियम के तहत आरोपों पर संदेह जताया

न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यद्यपि तकनीकी रूप से, नाबालिग के साथ सहमति से यौन संबंध बनाना पॉक्सो अधिनियम के दायरे में आता है , फिर भी प्रत्येक मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए। यहाँ, ऐसा कोई चिकित्सीय या फोरेंसिक साक्ष्य नहीं था जो यह दर्शाता हो कि बलात्कार तब हुआ था जब अभियोक्ता नाबालिग थी। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि पॉक्सो के तहत आरोप पूर्वव्यापी रूप से लगाए गए थे , जो एक असफल रिश्ते को आपराधिक आयाम देने के लिए प्रतीत होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी आपराधिक आरोपों को खारिज कर दिया

यह मानते हुए कि ठोस सबूतों के अभाव में आपराधिक मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा , अदालत ने अपील स्वीकार कर ली। भारतीय दंड संहिता और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम सहित सभी लंबित आपराधिक कार्यवाहियाँ रद्द कर दी गईं । पीठ ने रेखांकित किया कि ऐसे मामलों का दुरुपयोग, पॉक्सो और बलात्कार कानूनों के तहत वास्तविक मामलों की गंभीरता को कम कर देता है ।

आपराधिक प्रावधानों के दुरुपयोग के खिलाफ अदालत की चेतावनी

इस फैसले में व्यक्तिगत विवादों को निपटाने के लिए आईपीसी की धारा 376 और पॉक्सो के प्रावधानों के दुरुपयोग के प्रति भी आगाह किया गया । अदालत ने आग्रह किया कि ऐसे मामलों की सावधानीपूर्वक जाँच की जानी चाहिए, खासकर जब शिकायत दर्ज करने में कोई स्पष्ट कारण न हो , और चिकित्सीय पुष्टि का अभाव हो या तथ्यात्मक विसंगतियाँ हों ।

अपीलकर्ता बनाम प्रतिवादी : कुणाल चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य।

झूठे विवाह वादे के आधार पर सहमति से बने संबंध को बलात्कार नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय – Amol B...
10/07/2025

झूठे विवाह वादे के आधार पर सहमति से बने संबंध को बलात्कार नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय – Amol Bhagwan Nehul बनाम महाराष्ट्र राज्य"

भूमिका:
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में "बलात्कार" जैसे गंभीर अपराध की व्याख्या समय-समय पर न्यायालयों द्वारा विकसित की जाती रही है, विशेषकर जब यह प्रश्न उठता है कि क्या झूठे विवाह के वादे पर आधारित सहमति से बना यौन संबंध बलात्कार की श्रेणी में आता है या नहीं। हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने Amol Bhagwan Nehul बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य वाद में यह स्पष्ट किया कि यदि यौन संबंध दोनों पक्षों की स्पष्ट सहमति से बने हों, और वादे में कोई प्रारंभिक धोखाधड़ी या कपट न हो, तो इसे बलात्कार नहीं कहा जा सकता।

प्रकरण की पृष्ठभूमि:

25 वर्षीय छात्र Amol Bhagwan Nehul पर यह आरोप था कि उसने एक महिला के साथ झूठे विवाह वादे के आधार पर यौन संबंध स्थापित किए।
पीड़िता का आरोप था कि आरोपी ने विवाह का झूठा वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी से इनकार कर दिया।
इसके आधार पर उसके विरुद्ध बलात्कार की धाराओं के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया।

सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन और निर्णय:
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गहराई से जांच की और निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया:

सहमति (Consent) की प्रकृति:
न्यायालय ने यह माना कि यौन संबंध आपसी सहमति से स्थापित हुआ था और इसमें तत्कालिक या प्रारंभिक धोखाधड़ी के प्रमाण नहीं हैं।
विवाह का वादा और मानसिकता:
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति ने ईमानदारी से विवाह करने का इरादा रखा हो, परंतु बाद में परिस्थितिवश वह विवाह नहीं कर पाया, तो उसे झूठा वादा नहीं कहा जा सकता।
सहमति को बलपूर्वक या धोखे से प्राप्त नहीं किया गया:
पीड़िता साक्षर, वयस्क, और समझदार महिला थी, जिसने स्वेच्छा से संबंध बनाए थे।
बलात्कार की धारा का दुरुपयोग:
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि IPC की धारा 376 (बलात्कार) का अंधाधुंध प्रयोग करना और हर रिश्ते को आपराधिक रूप देना न्यायोचित नहीं है।

फैसला:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में बलात्कार का कोई तत्व नहीं है, और यह केवल एक टूटे हुए प्रेम-संबंध का मामला है जिसमें सहमति से संबंध बनाए गए थे।
इसलिए, FIR और आपराधिक कार्यवाही को निरस्त (quash) कर दिया गया।

महत्वपूर्ण विधिक बिंदु:

धारा 376 IPC: बलात्कार की परिभाषा और दंड का प्रावधान।
धारा 482 CrPC: आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने की उच्च न्यायालय/सुप्रीम कोर्ट की शक्ति।

न्यायिक महत्त्व:
यह निर्णय उन मामलों में मार्गदर्शक सिद्धांत प्रदान करता है जहां बलात्कार के आरोप सहमति से बने संबंधों के बाद लगाए जाते हैं। यह न्यायिक संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि हर वैवाहिक वादा असफल होने की स्थिति में आपराधिक मामला न बन जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का दुरुपयोग रोकना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि पीड़ित को न्याय दिलाना।

निष्कर्ष:
Amol Bhagwan Nehul बनाम महाराष्ट्र राज्य वाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर विवाह-वादा असफल होने पर उसे बलात्कार करार नहीं दिया जा सकता, विशेषकर जब यौन संबंध स्पष्ट सहमति से बना हो और उसमें कोई कपट या धोखा प्रारंभ में न रहा हो। यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता, रिश्तों की स्वाभाविक जटिलताओं और आपराधिक कानून के संतुलित उपयोग की ओर एक महत्वपूर्ण संकेतक है।

09/07/2025

🏛️ "पिता की संपत्ति में बहनों का अधिकार: इनकार करना न केवल अन्याय, बल्कि अपराध भी है"

"भाई द्वारा बहनों को पिता की संपत्ति में से हिस्सा न देना, केवल नैतिक दोष नहीं, अब कानूनी अपराध की श्रेणी में आता है।"
यह बात सर्वोच्च न्यायालय ने अपने स्पष्ट और दृढ़ निर्णयों के माध्यम से स्थापित की है। भारतीय समाज में लंबे समय तक बेटियों को संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा गया, लेकिन अब कानून और न्यायालय दोनों इस असमानता के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े हैं।

⚖️ भारतीय कानून में बेटियों का संपत्ति में अधिकार

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में वर्ष 2005 के संशोधन के बाद बेटियों को भी पुत्रों के समान अधिकार दिए गए।
अब बेटी जन्म से ही अपने पिता की संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में बराबर की सह-उत्तराधिकारी (coparcener) होती है।

🔹 धारा 6 (Hindu Succession Act, Amendment 2005):

"यदि कोई हिंदू पुरुष अपनी संपत्ति के उत्तराधिकार के बिना मरता है, तो उसकी पुत्री को भी पुत्र के समान अधिकार और उत्तरदायित्व प्राप्त होंगे।"

👨‍⚖️ सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय:
🧾 Vineeta Sharma v. Rakesh Sharma, (2020) 9 SCC 1

सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट कहा:

"बेटी का अपने पिता की संपत्ति में जन्म से ही बराबरी का अधिकार है, चाहे पिता की मृत्यु 2005 संशोधन से पहले हुई हो या बाद में।"

यह निर्णय बेटियों के अधिकारों को ऐतिहासिक न्याय देता है और यह स्पष्ट करता है कि भाई द्वारा बहनों को संपत्ति में से हिस्सा न देना अब न्यायिक उल्लंघन माना जाएगा।

❌ यदि भाई संपत्ति में हिस्सा नहीं देता तो क्या यह अपराध है?

जी हां, यदि कोई भाई:

जानबूझकर बहनों से संपत्ति की जानकारी छुपाता है,
गलत दस्तावेज प्रस्तुत करता है,
दबाव डालकर उनके अधिकार का हनन करता है,
तो यह धोखाधड़ी (IPC धारा 420), जालसाजी (IPC धारा 468/471) और आपराधिक विश्वास भंग (IPC धारा 406) के अंतर्गत दंडनीय अपराध बन सकता है।
⚠️ कानूनी उपाय:
बहनें सिविल कोर्ट में बंटवारा (Partition Suit) का वाद दायर कर सकती हैं।
यदि धोखा हुआ है, तो FIR दर्ज कराई जा सकती है।
संपत्ति की बिक्री को अवैध घोषित करवाया जा सकता है।
👩‍⚖️ न्यायालय का रुख अब सख्त

सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने अब साफ कहा है कि:

"नारी को संपत्ति में वंचित करना केवल सामाजिक भेदभाव नहीं, बल्कि विधिक अन्याय है, जिसके विरुद्ध कड़ा कदम आवश्यक है।"

✅ निष्कर्ष

आज बेटियां सिर्फ परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि संपत्ति में बराबरी की हकदार भी हैं। भाई द्वारा उन्हें उनका हिस्सा न देना न केवल संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है, बल्कि भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध भी है।

इसलिए समाज को चाहिए कि वह बेटियों के अधिकारों को केवल सम्मान से न देखे, बल्कि व्यवहार में लागू करे — क्योंकि अब कानून उनके साथ है।
एडवोकेट चन्द्र भान कोटवाद
मो.9413471228

न्याय देने में मानवता को नहीं भूलना चाहिए:
08/06/2025

न्याय देने में मानवता को नहीं भूलना चाहिए:

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