14/02/2026
छपरा विधि मंडल: लोकतंत्र या निजी जागीर? महामंत्री के 'चुनावी गणित' का पर्दाफाश!
साथियों, आगामी 13 मार्च के चुनाव के लिए प्रकाशित मतदाता सूची ने वर्तमान नेतृत्व की मंशा को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे संदेशों और आम अधिवक्ताओं की शिकायतों ने एक बेहद डरावनी तस्वीर पेश की है।
क्या यह महज इत्तेफाक है?
भोला बाबू, अवध बाबू, जीपी साहब, पुंडरीक सहाय जी और वर्तमान उपाध्यक्ष निर्मल श्रीवास्तव जी जैसे वरिष्ठ और नियमित अधिवक्ताओं का नाम सूची से बाहर है?
दूसरी ओर, कई अनियमित और बाहरी लोगों के नाम सूची में जोड़ दिए गए हैं?
साजिश की परतें:
सब्सक्रिप्शन का बहाना: नियमित अभ्यास करने वाले अधिवक्ताओं को 'मेंटेनेंस चार्ज' या 'सब्सक्रिप्शन' के छोटे-छोटे तकनीकी कारणों से 'डिफॉल्टर' बताकर उनका मताधिकार छीना जा रहा है।
दबंगई और दबाव: कार्यालय के लिपिकों पर दबाव बनाकर चुनावी सूची में हेरफेर करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।
वोट बैंक की राजनीति: आरोप है कि नियमित अधिवक्ताओं को हटाकर अपनी पसंद के 'अनियमित' लोगों को जोड़ा जा रहा है ताकि चुनाव के ठीक पहले 'लिफाफा राजनीति' के जरिए जीत हासिल की जा सके।
हमारा सवाल:
क्या विधि मंडल जैसे पवित्र संस्थान को 'जात-पात', 'लॉबी' और 'ठेकेदारी' का अड्डा बनने दिया जाएगा? क्या एक नियमित अधिवक्ता को अपनी पहचान और वोट के लिए महामंत्री के 'रहमो-करम' पर निर्भर रहना होगा?
जागिए युवा साथियों! यह चुनाव केवल एक पद का नहीं, बल्कि छपरा विधि मंडल की गरिमा को बचाने का है।
हमारी मांग:
चुनाव समिति इन विसंगतियों पर तुरंत स्पष्टीकरण दे।
वरिष्ठ और नियमित अधिवक्ताओं के सम्मान को बहाल करते हुए अविलंब संशोधित पूरक सूची जारी की जाए।
अधिवक्ता एकता जिंदाबाद! तानाशाही और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाएं।