RTI- एक अधिकार

RTI- एक अधिकार Help people by drafting and filling RTI.

07/04/2026

📞 कॉल डिटेल रिकॉर्ड कैसे पाएं 📞 # प्रश्न : सर जी, हम कॉल डिटेल कैसे ले सकते हैं ? इसके लिए आरटीआई कहां लगानी होगी ? Mera...
04/02/2026

📞 कॉल डिटेल रिकॉर्ड
कैसे पाएं 📞

# प्रश्न : सर जी, हम कॉल डिटेल कैसे ले सकते हैं ? इसके लिए आरटीआई कहां लगानी होगी ? Mera ek prashn Aur Hai
Jo ISI se sambandhit hai
अगर कोई व्यक्ति जैसे कि किसी का पति या पत्नी अपने पिता के नाम से सिम लेकर खुद इस्तेमाल कर रहा है और उसे सिम से व्यापारिक ट्रांजैक्शन कर रहा है तो क्या हम उसे सिम या उसे नंबर की कॉल डिटेल्स मांग सकते हैं ?
- टीना जी अग्रवाल

# उत्तर : CDR (Call Detail Record) के लिए RTI दाखिल करने से पहले आपको कुछ कानूनी नियमों को समझना होगा, क्योंकि यह जानकारी अत्यधिक गोपनीय मानी जाती है।
हम इसकी पूरी जानकारी दे रहे है -
1. किस विभाग को RTI भेजें ? :
चूंकि मोबाइल कंपनियां (जैसे Jio, Airtel) प्राइवेट होती हैं, इसलिए उन पर सीधे RTI लागू नहीं होती। आपको सरकारी विभागों के माध्यम से जानकारी मांगनी होगी।
• आप अपने क्षेत्र के 'Term Cell' या दूरसंचार विभाग के PIO को RTI भेज सकते हैं। ये विभाग सभी टेलीकॉम कंपनियों का रेगुलेटर होता है।

• यदि पुलिस ने किसी जांच के दौरान आपकी CDR निकाली है तो आप संबंधित जिले के SP ऑफिस या पुलिस कमिश्नर कार्यालय में RTI लगा सकते हैं।

2. अधिकतम कितने समय की CDR मांगी जा सकती है?
भारत सरकार के नियमों (DoT guidelines) के अनुसार -
2 साल का रिकॉर्ड :
दिसंबर 2021 के बाद से, सभी टेलीकॉम कंपनियों के लिए अब 2 साल तक का कॉल रिकॉर्ड सुरक्षित रखना अनिवार्य है। इससे पहले यह सीमा केवल 1 साल की थी।

• इंटरनेट लॉग्स :
इंटरनेट कॉलिंग या डेटा लॉग्स के लिए भी अब कंपनियों को 2 साल का डेटा रखना होता है।

3. क्या RTI से CDR आसानी से मिल जाती है ?:
RTI के माध्यम से CDR प्राप्त करने में कुछ बड़ी कानूनी बाधाएं हैं -
• निजता का अधिकार (Section 8(1)(j)) :
आप किसी दूसरे व्यक्ति की CDR नहीं मांग सकते।
RTI कानून की धारा 8(1)(j) के तहत इसे व्यक्तिगत जानकारी मान कर देने से मना किया जा सकता है।
• स्वयं की CDR :
यदि आप अपने स्वयं के नंबर की CDR मांग रहे हैं, तो भी विभाग अक्सर सुरक्षा कारणों का हवाला देकर मना कर देते हैं।

* बेहतर विकल्प क्या है ?
यदि आप किसी कोर्ट केस (जैसे वैवाहिक विवाद या आपराधिक मामला) के लिए CDR चाहते हैं तो RTI के बजाय कोर्ट के माध्यम से आवेदन करना सबसे सही तरीका है :
√ Section 91 CrPC (अब BNSS): इसके तहत आप कोर्ट में अर्जी दे सकते हैं कि संबंधित व्यक्ति या नंबर की CDR सुरक्षित रखी जाए और कोर्ट में पेश की जाए।
• कोर्ट का आदेश :
कोर्ट मोबाइल कंपनी को आदेश दे सकता है कि वह सीलबंद लिफाफे में काल रिकॉर्ड जमा करे।

01/11/2025

*⚖️ सूचना आयोग का दायित्व और सीमा:*

*जब आयुक्त विधि के बाहर जाकर आदेश दे तो पुनः सुनवाई का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?*

*भूमिका*

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act)
भारतीय नागरिकों को शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही का अधिकार प्रदान करता है।
यह अधिनियम लोकतंत्र की आत्मा है, क्योंकि —

> “सूचना ही सशक्तिकरण का प्रथम सोपान है।”

किन्तु जब स्वयं सूचना आयुक्त (Information Commissioner) अपने अधिकार क्षेत्र से परे जाकर विधि-विरुद्ध आदेश पारित करे, तब यह न केवल किसी आवेदक या कर्मचारी के साथ अन्याय है, बल्कि संविधान और लोकतंत्र की आत्मा पर भी आघात है।

*अधिकार क्षेत्र की सीमा (Jurisdictional Limitation)*

RTI अधिनियम की धारा 18, 19 और 20 सूचना आयुक्त के अधिकारों की स्पष्ट सीमा तय करती हैं —

धारा 18 : केवल शिकायतों की सुनवाई के लिए है।

धारा 19 : अपील प्रक्रिया का निर्धारण करती है।

धारा 20 : दंड लगाने की शक्ति प्रदान करती है।

इन धाराओं के अतिरिक्त सूचना आयुक्त को न्यायालय जैसी कोई शक्ति प्राप्त नहीं है।
वह किसी व्यक्ति की मंशा, आचरण या चरित्र पर टिप्पणी नहीं कर सकता।
उसका दायित्व मात्र इतना है —

> “क्या मांगी गई सूचना उपलब्ध है या नहीं, और यदि नहीं दी गई, तो क्यों नहीं?”

*जब आयुक्त विधि से परे चला जाए*

यदि कोई आयुक्त अपने आदेश में यह लिखता है कि —
“आवेदक RTI का दुरुपयोग कर रहा है” या “आवेदक की मंशा गलत है,”तो यह विधि से परे जाना है।

ऐसे आदेश को Ultra Vires (विधि-विरुद्ध) कहा जाता है,
क्योंकि RTI अधिनियम में आयुक्त को न तो चरित्र विश्लेषण का अधिकार है, न ही किसी नागरिक के इरादों की जांच करने का।

*संविधानिक दृष्टिकोण*

भारतीय संविधान के अनुसार प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांत हर प्रशासनिक और न्यायिक कार्यवाही में निहित हैं।

> “Nemo Judex in Causa Sua” — कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता।

यदि किसी सूचना आयुक्त के विरुद्ध पहले से पक्षपात या विधि-विरुद्ध आदेश की शिकायत लंबित है, तो उसे उसी व्यक्ति के किसी अन्य प्रकरण की सुनवाई नहीं करनी चाहिए।

यह न केवल संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार),बल्कि अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति और सूचना का अधिकार) तथा अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष प्रक्रिया व गरिमामय जीवन के अधिकार) का उल्लंघन है।

*प्रमुख न्यायिक निर्णय*

1️⃣ A.K. Kraipak vs Union of India (AIR 1970 SC 150)

> “जहाँ निर्णयकर्ता निष्पक्ष न हो, वहाँ पूरा निर्णय अवैध हो जाता है।”

2️⃣ Maneka Gandhi vs Union of India (AIR 1978 SC 597)

“निष्पक्षता, सुनवाई और न्याय का अधिकार संविधान का अभिन्न अंग है।”

3️⃣ State of Punjab vs Davinder Pal Singh Bhullar (2011) 14 SCC 770

“प्राकृतिक न्याय की अवहेलना से कोई भी आदेश अस्थिर और असंवैधानिक होता है।”

4️⃣ Rajasthan High Court – Rameshwar Lal Sharma vs CIC (2019)

“सूचना आयुक्त के अधिकार सीमित हैं;
वह केवल सूचना उपलब्धता पर निर्णय कर सकता है,
किसी व्यक्ति की मंशा या विचार पर नही

विधिक परिणाम (Legal Consequences)

यदि सूचना आयुक्त अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर विधि-विरुद्ध टिप्पणी करता है,
तो उसका आदेश —
असंवैधानिक (Unconstitutional) अधिकार क्षेत्र से बाहर (Beyond Jurisdiction) शून्य (Void ab initio) माना जाएगा। और यदि वही आयुक्त उसी नागरिक के किसी अगले मामले की सुनवाई करता है,
तो यह न्यायिक निष्पक्षता (Judicial Fairness) के सिद्धांत पर आघात है।

निष्कर्ष

सूचना आयोग एक अर्ध-न्यायिक संस्था (Quasi-Judicial Body) है —न कि न्यायालय।
उसका उद्देश्य सूचना का अधिकार सुनिश्चित करना है, निर्णय सुनाना नहीं।

यदि कोई आयुक्त बार-बार RTI की मूल भावना से हटकर आदेश पारित करता है,
तो यह केवल अधिनियम का नहीं, बल्कि
संविधान की आत्मा — “समानता और न्याय” का भी उल्लंघन है।

अतः —ऐसे सूचना आयुक्तों को किसी भी व्यक्ति के मामले में पुनः सुनवाई का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।

मुख्य सूचना आयुक्त को चाहिए कि वह
इस विषय पर बाध्यकारी दिशा-निर्देश (Binding Guidelines) जारी करे,
ताकि भविष्य में कोई भी आयुक्त विधि की सीमाओं से बाहर जाकर
लोकतंत्र की गरिमा को ठेस न पहुंचा सके।
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जिसके घर में काली, वहां रोज रहे दिवाली।आज घर में लक्ष्मी आई है।
19/07/2025

जिसके घर में काली, वहां रोज रहे दिवाली।
आज घर में लक्ष्मी आई है।

21/04/2025
21/07/2023

VLEs कृपया ध्यान दें!

सहारा समूह की सहकारी समितियों के जमाकर्ता नजदीकी सीएससी केंद्र जाकर दावे प्रस्तुत कर सकते हैं. https://cooperation.gov.in

किसी भी प्रश्न के लिए इस टोल फ्री नंबर पर कॉल करें: 1800 103 6891/1800 103 6893

10/02/2023

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