01/11/2025
*⚖️ सूचना आयोग का दायित्व और सीमा:*
*जब आयुक्त विधि के बाहर जाकर आदेश दे तो पुनः सुनवाई का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?*
*भूमिका*
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act)
भारतीय नागरिकों को शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही का अधिकार प्रदान करता है।
यह अधिनियम लोकतंत्र की आत्मा है, क्योंकि —
> “सूचना ही सशक्तिकरण का प्रथम सोपान है।”
किन्तु जब स्वयं सूचना आयुक्त (Information Commissioner) अपने अधिकार क्षेत्र से परे जाकर विधि-विरुद्ध आदेश पारित करे, तब यह न केवल किसी आवेदक या कर्मचारी के साथ अन्याय है, बल्कि संविधान और लोकतंत्र की आत्मा पर भी आघात है।
*अधिकार क्षेत्र की सीमा (Jurisdictional Limitation)*
RTI अधिनियम की धारा 18, 19 और 20 सूचना आयुक्त के अधिकारों की स्पष्ट सीमा तय करती हैं —
धारा 18 : केवल शिकायतों की सुनवाई के लिए है।
धारा 19 : अपील प्रक्रिया का निर्धारण करती है।
धारा 20 : दंड लगाने की शक्ति प्रदान करती है।
इन धाराओं के अतिरिक्त सूचना आयुक्त को न्यायालय जैसी कोई शक्ति प्राप्त नहीं है।
वह किसी व्यक्ति की मंशा, आचरण या चरित्र पर टिप्पणी नहीं कर सकता।
उसका दायित्व मात्र इतना है —
> “क्या मांगी गई सूचना उपलब्ध है या नहीं, और यदि नहीं दी गई, तो क्यों नहीं?”
*जब आयुक्त विधि से परे चला जाए*
यदि कोई आयुक्त अपने आदेश में यह लिखता है कि —
“आवेदक RTI का दुरुपयोग कर रहा है” या “आवेदक की मंशा गलत है,”तो यह विधि से परे जाना है।
ऐसे आदेश को Ultra Vires (विधि-विरुद्ध) कहा जाता है,
क्योंकि RTI अधिनियम में आयुक्त को न तो चरित्र विश्लेषण का अधिकार है, न ही किसी नागरिक के इरादों की जांच करने का।
*संविधानिक दृष्टिकोण*
भारतीय संविधान के अनुसार प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांत हर प्रशासनिक और न्यायिक कार्यवाही में निहित हैं।
> “Nemo Judex in Causa Sua” — कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता।
यदि किसी सूचना आयुक्त के विरुद्ध पहले से पक्षपात या विधि-विरुद्ध आदेश की शिकायत लंबित है, तो उसे उसी व्यक्ति के किसी अन्य प्रकरण की सुनवाई नहीं करनी चाहिए।
यह न केवल संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार),बल्कि अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति और सूचना का अधिकार) तथा अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष प्रक्रिया व गरिमामय जीवन के अधिकार) का उल्लंघन है।
*प्रमुख न्यायिक निर्णय*
1️⃣ A.K. Kraipak vs Union of India (AIR 1970 SC 150)
> “जहाँ निर्णयकर्ता निष्पक्ष न हो, वहाँ पूरा निर्णय अवैध हो जाता है।”
2️⃣ Maneka Gandhi vs Union of India (AIR 1978 SC 597)
“निष्पक्षता, सुनवाई और न्याय का अधिकार संविधान का अभिन्न अंग है।”
3️⃣ State of Punjab vs Davinder Pal Singh Bhullar (2011) 14 SCC 770
“प्राकृतिक न्याय की अवहेलना से कोई भी आदेश अस्थिर और असंवैधानिक होता है।”
4️⃣ Rajasthan High Court – Rameshwar Lal Sharma vs CIC (2019)
“सूचना आयुक्त के अधिकार सीमित हैं;
वह केवल सूचना उपलब्धता पर निर्णय कर सकता है,
किसी व्यक्ति की मंशा या विचार पर नही
विधिक परिणाम (Legal Consequences)
यदि सूचना आयुक्त अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर विधि-विरुद्ध टिप्पणी करता है,
तो उसका आदेश —
असंवैधानिक (Unconstitutional) अधिकार क्षेत्र से बाहर (Beyond Jurisdiction) शून्य (Void ab initio) माना जाएगा। और यदि वही आयुक्त उसी नागरिक के किसी अगले मामले की सुनवाई करता है,
तो यह न्यायिक निष्पक्षता (Judicial Fairness) के सिद्धांत पर आघात है।
निष्कर्ष
सूचना आयोग एक अर्ध-न्यायिक संस्था (Quasi-Judicial Body) है —न कि न्यायालय।
उसका उद्देश्य सूचना का अधिकार सुनिश्चित करना है, निर्णय सुनाना नहीं।
यदि कोई आयुक्त बार-बार RTI की मूल भावना से हटकर आदेश पारित करता है,
तो यह केवल अधिनियम का नहीं, बल्कि
संविधान की आत्मा — “समानता और न्याय” का भी उल्लंघन है।
अतः —ऐसे सूचना आयुक्तों को किसी भी व्यक्ति के मामले में पुनः सुनवाई का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।
मुख्य सूचना आयुक्त को चाहिए कि वह
इस विषय पर बाध्यकारी दिशा-निर्देश (Binding Guidelines) जारी करे,
ताकि भविष्य में कोई भी आयुक्त विधि की सीमाओं से बाहर जाकर
लोकतंत्र की गरिमा को ठेस न पहुंचा सके।
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