20/06/2024
:::::::बाबानामा (नॉट बाबरनामा) सीजन 01 एपिसोड 01::::::
हमेशा की तरह बाबाजी की सुबह बड़ी अलसाई हुई थी । आँखें खोलने को जरा दिल नहीं कर रहा था । बाबाजी ने ज़ोरदार अंगड़ाई ली और इस चक्कर में बाबाजी की टांग की नस खिंच गई और बाबाजी कराह उठे और टांग की मालिश करने लगे । अभी आराम मिलना शुरू ही हुआ था कि किचन से भाभी साहिबा की कड़कदार आवाज़ सुनाई दी कि अगर नाश्ता करना है तो फटाफट कनफेक्शनरी से सामान ले आओ । अब बेड पर और पड़े रहना मुमकिन नहीं था तो बाबाजी हड़बड़ा कर बाहर को भागे । इस हड़बड़ाहट में तिपाई से पैर टकराया और तिपाई और तिपाई के ऊपर रखा हुआ भाभी साहिबा का फेवरेट मग जमीन पर गिर गए। नतीजतन, मग शहीद हो गया ।
"क्या तोड़ा ?"
"तुम्हारा ग्वालियर वाला मग गलती से गिर कर टूट गया ।"
"हाँ, वो मग तो पता नहीं कब से आँखों में चुभ रहा था, मेरे माएके से जो आया था । आखिर तोड़ ही डाला ।"
इस से आगे सुनने की बाबाजी के अंदर हिम्मत न थी और बाबाजी छलांग लगा कर दरवाजे से बाहर गली में । कनफेक्शनरी जाते हुए रास्ते में 8-9 साल का एक लड़का आ टकराया, बाबाजी को देखते हुए बोला- "बँटी अंकल! सुबह सुबह किधर ??"
बाबाजी के तनबदन में आग लग गई । दांत पीसते हुए हो बोले- "अबे भाग जा । अभी पंख आए नहीं और बाज़ के साथ आसमान में उड़ने की कोशिश ।"
बच्चा भी अपने में एक नंबर का ढीट था । बोला- "कल जो पतंग आप की वजह से कटी थी उस के पाँच रुपये दे दो ।"
बाबाजी उसे घूरते हुए आगे बढ़ गए । पीछे से उस बच्चे की आवाज आई – "शाम तक पैसे दे देना वरना आंटी से शिकायत कर दूंगा ।"
आखिरकार बाबाजी कनफेक्शनरी पहुंचे । सामान निकलवाया और जब पेमेंट का नंबर आया तो बाबाजी को याद आया कि जल्दबाजी में पैसे तो लाए ही नहीं है । दुकानदार से बोले कि "paytm पर पैसे ले लो ।"
दुकानदार जलभुन गया कि सुबह सुबह सामान तो जा रहा है लेकिन पैसे हाथ में नहीं आ रहे । बैंक में आते हुए पैसे ऐसे लगते हैं जैसे पैसे आए ही न हों । बहरहाल, और कोई तरीका भी नहीं था । बाबाजी ने paytm पर पेमेंट किया और घर को वापस आए ।
आते ही भाभी साहिबा का फरमान आ गया कि "रात के बचे हुए बर्तन रखे हुए हैं उन को धो डालें और डस्ट्बिन साफ कर दें ।"
घर के काम निपटाने, नहाने धोने, नाश्ता करने के बाद साढ़े नौ बजे बाबाजी शर्ट के ऊपर के बटन खोल कर अपने एटेरनों के पास पहुंचे तो देखा कि उसका पहिया फ्लैट हुआ पड़ा है । फ्लैट टायर को बदलने और ऑफिस पहुँचने तक बाबाजी को ग्यारह बज चुके थे ।
ऑफिस पहुंचते ही पता चला कि गुप्ता जी (बॉस) बड़ी देर से इंतजार कर रहे हैं । बॉस ने जाते ही क्लास ले ली कि "अमुक क्लाइंट को क्वोटैशन अभी तक क्यूँ नहीं भेजी जा सकी है । एक घंटे के अंदर क्वोटैशन चली जानी चाहिए ।"
लंच का वक़्त हुआ तो याद आया कि लंच तो घर पर ही भूल आए हैं। बड़ी देर तक सिर पकड़े बैठे रहे । काफी देर बाद याद आया तो मुकीम बिरयानी वाले के यहाँ गए तो बिरयानी खत्म हो चुकी थी ।
लंच का टाइम खत्म हो रहा था । ऑफिस को वापस जा रहे थे कि रास्ते में एक भिखारी मिल गया, रास्ता रोक कर खड़ा हो गया । बाबाजी ने दायें बाएं से निकालने की कोशिश की तो वो भी दायें बाये हो गया । बाबाजी जी ने झल्लाते हुए पूछा – "क्या है बे ?"
आदमी बोला- "बाबा भूखा है, कुछ खिला दे बच्चा ।"
अब बाबाजी ने उसको गौर से देखा । प्रापर शेवड, ठोढ़ी से नीचे निकलती हुई लंबी लंबी मूँछें । बाल उलझे हुए, आँखों पर धूप का चश्मा, मुंह में गुटखा, उंगलियों के बीच फंसी हुई सिगरेट, फटा हुआ बोसीदा कुर्ता पहने हुए, एक अजीब सा प्राणी सामने खड़ा हुआ था ।
बाबाजी ने जलभुन कर उंगली अपने सीने पर रखते हुए कहा- "अबे ये बाबा खुद भूखा है ।"
"बच्चा ! तू भी बाबा है ??"
"हाँ । "
"कौन सा ?"
"एटेरनों वाला बाबा, और तुम ??"
"मेटाडोर वाला बाबा ।"
"अच्छा "
"चल, जॉइन्ट वेन्चर खोलें ?"
"कैसा जॉइन्ट वेन्चर ?"
"बाबागिरी का, मिल कर किसी जिन्न को क़ाबू करेंगे और दोनों के वारे न्यारे ।"
"घंटा.. भाग यहाँ से.." कहते हुए बाबाजी अपने ऑफिस की तरफ बढ़ गए ।
क्रमशः