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:::::::बाबानामा (नॉट बाबरनामा) सीजन 01 एपिसोड 01::::::हमेशा की तरह बाबाजी की सुबह बड़ी अलसाई हुई थी । आँखें खोलने को जरा ...
20/06/2024

:::::::बाबानामा (नॉट बाबरनामा) सीजन 01 एपिसोड 01::::::

हमेशा की तरह बाबाजी की सुबह बड़ी अलसाई हुई थी । आँखें खोलने को जरा दिल नहीं कर रहा था । बाबाजी ने ज़ोरदार अंगड़ाई ली और इस चक्कर में बाबाजी की टांग की नस खिंच गई और बाबाजी कराह उठे और टांग की मालिश करने लगे । अभी आराम मिलना शुरू ही हुआ था कि किचन से भाभी साहिबा की कड़कदार आवाज़ सुनाई दी कि अगर नाश्ता करना है तो फटाफट कनफेक्शनरी से सामान ले आओ । अब बेड पर और पड़े रहना मुमकिन नहीं था तो बाबाजी हड़बड़ा कर बाहर को भागे । इस हड़बड़ाहट में तिपाई से पैर टकराया और तिपाई और तिपाई के ऊपर रखा हुआ भाभी साहिबा का फेवरेट मग जमीन पर गिर गए। नतीजतन, मग शहीद हो गया ।
"क्या तोड़ा ?"
"तुम्हारा ग्वालियर वाला मग गलती से गिर कर टूट गया ।"
"हाँ, वो मग तो पता नहीं कब से आँखों में चुभ रहा था, मेरे माएके से जो आया था । आखिर तोड़ ही डाला ।"

इस से आगे सुनने की बाबाजी के अंदर हिम्मत न थी और बाबाजी छलांग लगा कर दरवाजे से बाहर गली में । कनफेक्शनरी जाते हुए रास्ते में 8-9 साल का एक लड़का आ टकराया, बाबाजी को देखते हुए बोला- "बँटी अंकल! सुबह सुबह किधर ??"
बाबाजी के तनबदन में आग लग गई । दांत पीसते हुए हो बोले- "अबे भाग जा । अभी पंख आए नहीं और बाज़ के साथ आसमान में उड़ने की कोशिश ।"
बच्चा भी अपने में एक नंबर का ढीट था । बोला- "कल जो पतंग आप की वजह से कटी थी उस के पाँच रुपये दे दो ।"
बाबाजी उसे घूरते हुए आगे बढ़ गए । पीछे से उस बच्चे की आवाज आई – "शाम तक पैसे दे देना वरना आंटी से शिकायत कर दूंगा ।"

आखिरकार बाबाजी कनफेक्शनरी पहुंचे । सामान निकलवाया और जब पेमेंट का नंबर आया तो बाबाजी को याद आया कि जल्दबाजी में पैसे तो लाए ही नहीं है । दुकानदार से बोले कि "paytm पर पैसे ले लो ।"
दुकानदार जलभुन गया कि सुबह सुबह सामान तो जा रहा है लेकिन पैसे हाथ में नहीं आ रहे । बैंक में आते हुए पैसे ऐसे लगते हैं जैसे पैसे आए ही न हों । बहरहाल, और कोई तरीका भी नहीं था । बाबाजी ने paytm पर पेमेंट किया और घर को वापस आए ।

आते ही भाभी साहिबा का फरमान आ गया कि "रात के बचे हुए बर्तन रखे हुए हैं उन को धो डालें और डस्ट्बिन साफ कर दें ।"
घर के काम निपटाने, नहाने धोने, नाश्ता करने के बाद साढ़े नौ बजे बाबाजी शर्ट के ऊपर के बटन खोल कर अपने एटेरनों के पास पहुंचे तो देखा कि उसका पहिया फ्लैट हुआ पड़ा है । फ्लैट टायर को बदलने और ऑफिस पहुँचने तक बाबाजी को ग्यारह बज चुके थे ।

ऑफिस पहुंचते ही पता चला कि गुप्ता जी (बॉस) बड़ी देर से इंतजार कर रहे हैं । बॉस ने जाते ही क्लास ले ली कि "अमुक क्लाइंट को क्वोटैशन अभी तक क्यूँ नहीं भेजी जा सकी है । एक घंटे के अंदर क्वोटैशन चली जानी चाहिए ।"
लंच का वक़्त हुआ तो याद आया कि लंच तो घर पर ही भूल आए हैं। बड़ी देर तक सिर पकड़े बैठे रहे । काफी देर बाद याद आया तो मुकीम बिरयानी वाले के यहाँ गए तो बिरयानी खत्म हो चुकी थी ।

लंच का टाइम खत्म हो रहा था । ऑफिस को वापस जा रहे थे कि रास्ते में एक भिखारी मिल गया, रास्ता रोक कर खड़ा हो गया । बाबाजी ने दायें बाएं से निकालने की कोशिश की तो वो भी दायें बाये हो गया । बाबाजी जी ने झल्लाते हुए पूछा – "क्या है बे ?"
आदमी बोला- "बाबा भूखा है, कुछ खिला दे बच्चा ।"
अब बाबाजी ने उसको गौर से देखा । प्रापर शेवड, ठोढ़ी से नीचे निकलती हुई लंबी लंबी मूँछें । बाल उलझे हुए, आँखों पर धूप का चश्मा, मुंह में गुटखा, उंगलियों के बीच फंसी हुई सिगरेट, फटा हुआ बोसीदा कुर्ता पहने हुए, एक अजीब सा प्राणी सामने खड़ा हुआ था ।
बाबाजी ने जलभुन कर उंगली अपने सीने पर रखते हुए कहा- "अबे ये बाबा खुद भूखा है ।"
"बच्चा ! तू भी बाबा है ??"
"हाँ । "
"कौन सा ?"
"एटेरनों वाला बाबा, और तुम ??"
"मेटाडोर वाला बाबा ।"
"अच्छा "
"चल, जॉइन्ट वेन्चर खोलें ?"
"कैसा जॉइन्ट वेन्चर ?"
"बाबागिरी का, मिल कर किसी जिन्न को क़ाबू करेंगे और दोनों के वारे न्यारे ।"
"घंटा.. भाग यहाँ से.." कहते हुए बाबाजी अपने ऑफिस की तरफ बढ़ गए ।

क्रमशः

बुलन्दशहर का इतिहास – 9:::::शिकारपुर:::::शिकारपुर को अब से क़रीब 500 साल पहले सिकंदर लोदी ने आबाद किया था । शिकारपुर का न...
29/02/2024

बुलन्दशहर का इतिहास – 9

:::::शिकारपुर:::::

शिकारपुर को अब से क़रीब 500 साल पहले सिकंदर लोदी ने आबाद किया था । शिकारपुर का नाम इस वजह से शिकारपुर पड़ा क्यूंकी इस के आस पास शिकार के लिए जंगल ही जंगल थे । उस वक़्त क़स्बे की आबादी, मोज़ा गोविन्दपुर की जमीन पर हुई । कहते हैं कि शिकारपुर के बिल्कुल करीब एक तलपट नगरी नाम का इलाक़ा है, जो कि वीरान जगह है और किसी समय की पलटी हुई आबादी है । कहते हैं कि इस जगह का राजा जालिम था इसी वजह से जमीन पलट गई । इस जगह का दूसरा नाम अन्यायी-खेड़ा भी बताया जाता है ।
सिकंदर लोदी ने यहाँ की जागीर सादात बिरादरी को बख्श दी । सल्तनत ए मुगलिया के दौर में भी क़स्बे में “सादात” बिरादरी हावी रही । लेकिन जिस वक़्त औरंगजेब और दारा शिकोंह के बीच तख्त को लेकर झगड़ा हुआ उस समय सय्यद मुहम्मद तैयब शिकारपुर का जागीरदार था और उसने दारा शिकोंह का पक्ष लिया जिस वजह से औरंगजेब ने जागीर छीन ली ।
सन 1857 की जंग ए आजादी में सादात बिरादरी के हिस्सा लेने की वजह से, अंग्रेजों ने उनसे ज्यादातर जमींदारी भी जब्त कर लीं और ब्राहमण चौधरियों को बख्श दी, जिन्होंने अंग्रेजों की हिमायत की थी ।
किसी जमाने में शिकारपुर में एक पुराना किला भी हुआ करता था । मालूम नहीं कि उसके खंडहर अभी बाक़ी है या मिट गए । क़स्बे में एक पुरानी इमारत “बारह खंबा” है । इसका नाम बारह (12) खंबा है लेकिन हक़ीक़त में यहाँ सोलह (16) खंबे हैं । ये इमारत दरअसल एक अधूरा मकबरा है । हालांकि लाल पत्थरों से बने हुए खंबे कोई अजीब ओ गरीब चीज नहीं है लेकिन ज्यादातर लोग उस को जिन्नों के द्वारा बनाए हुए समझते हैं । इस बारह खंबा के बारे में बड़ी अजीब तरह की अफवाहें फैली हुई हैं । यह मकबरा सय्यद फ़जलुललाह जो कि मुग़ल बादशाह फर्रूखसियर के दामाद थे, ने सन 1718 के आसपास तामीर कराया था, लेकिन पूरा होने से पहले ही सय्यद का इंतिक़ाल हो गया और कोई वारिस न होने की वजह से इमारत अधूरी रह गई ।

बुलन्दशहर का इतिहास – 8 :::::बुगरासी:::::बुगरासी, जिला बुलन्दशहर के अन्तर्गत आने वाला एक क़स्बा है । बुगरासी, स्याना से प...
23/02/2024

बुलन्दशहर का इतिहास – 8

:::::बुगरासी:::::

बुगरासी, जिला बुलन्दशहर के अन्तर्गत आने वाला एक क़स्बा है । बुगरासी, स्याना से पूर्व दिशा में करीब 8 किमी दूर स्थित है । बुगरासी के बारे में कहा जाता है कि इस को त्यागियों ने आबाद किया था । लोदी सल्तनत के दौर में यहाँ की जमींदारी त्यागियों के हाथ से निकल कर अफ़ग़ानों के हाथ आ गई जो कि आज भी कायम है । ये क़स्बा अफ़ग़ानों की बारह बस्ती का एक हिस्सा है । यहाँ मुखतलिफ़ बिरादरियों के पठान आबाद हैं । इनमे कुछ पठानों का ताल्लुक़ सूर (शेर शाह सूरी के वंशज) बिरादरी से है । इन पठानों में से कई लोग राष्ट्रीय/राज्यीय स्तर के नेता रहे हैं और दौर ए हाजिर में भी हैं । गंगा नदी बुगरासी से कोई 6-7 किमी दूर बहती है ।
गदर यानि 1857 की जंग ए आज़ादी में यहाँ के पठानों ने कोई हिस्सा नहीं लिया और अंग्रेजों से बना कर रखी । अंग्रेजों की हुकूमत में भी इन पर अंग्रेजों की खास इनायतें रहीं और ये अंग्रेजी सरकार में मौजज़ीज़ ओहदों पर रहे ।
बुगरासी क्षेत्र के बागात मशहूर हैं ।

बुलन्दशहर का इतिहास – 7::::: स्याना:::::यह क़स्बा जिला बुलन्दशहर की एक तहसील है । ये बुलन्दशहर के पूर्वोत्तर में गढ़मुक्ते...
21/02/2024

बुलन्दशहर का इतिहास – 7

::::: स्याना:::::

यह क़स्बा जिला बुलन्दशहर की एक तहसील है । ये बुलन्दशहर के पूर्वोत्तर में गढ़मुक्तेश्वर की सड़क पर बुलन्दशहर से करीब 33 किमी दूर स्थित है । किसी जमाने में स्याना सरकार कोल (अलीगढ़) सूबा आगरा के अन्तर्गत आता था । कुछ वक़्त तक मुरादाबाद ज़िले में रहा और सन 1844 में यह ज़िला बुलन्दशहर का हिस्सा बन गया । कहते हैं कि इस का पुराना नाम सीनबन यानि सोने की जगह था । ये भी बताया जाता है कि जब बलदेव जी मथुरा से हस्तिनापुर गए थे तो इसी जगह पर रात को रुके थे ।
महमूद गज़नवी के हमलों के जमाने में स्याना और आस पास के इलाकों पर डोर राजपूतों की जमींदारी थी लेकिन पृथ्वीराज चौहान के जमाने में पृथ्वीराज के इशारे पर त्यागी ब्राह्मणों ने डोरों को बेदखल कर अपना कब्जा कायम कर लिया । आज भी त्यागियों की जमींदारी चली आ रही है । त्यागी ब्राह्मणों में से बहुतों ने इस्लाम कुबूल कर लिया और अब मुसलमान हैं और काफी सारे हिन्दू धर्म में भी हैं ।

बुलन्दशहर का इतिहास – 6आज जिला बुलन्दशहर के अन्तर्गत आने वाले कस्बों के बारे में जानने की कोशिश करेंगे । हर किस्त में एक...
19/02/2024

बुलन्दशहर का इतिहास – 6

आज जिला बुलन्दशहर के अन्तर्गत आने वाले कस्बों के बारे में जानने की कोशिश करेंगे । हर किस्त में एक क़स्बे के बारे में जानेंगे ।

:::::: औरंगाबाद:::::

क़स्बा औरंगाबाद, जिला बुलन्दशहर के अन्तर्गत आता है। बुलन्दशहर से दक्षिण पूरब की सिम्त करीब 15 किमी दूर है । ये क़स्बा बुलन्दशहर से स्याना-गढ़ मुक्तेश्वर वाली सड़क पर स्थित है । इसका पुराना नाम दहरका था । दहरका राजपूतों की ज़मीदारी के तहत आता था । सन 1704 में सय्यद अब्दुल अज़ीज़ ने बादशाह औरंगजेब की इजाजत से राजपूतों को हटा कर खुद अपनी निगरानी में ले लिया । औरंगजेब के नाम पर ही सय्यद अब्दुल अज़ीज़ ने इस क़स्बे का नाम बदल कर औरंगाबाद कर दिया । बाक़ी और कोई अहवाल इस क़स्बे से मुतालिक नहीं मिलता बस ये जिक्र आता है कि अंग्रेजों के जमाने में इस क़स्बे में तीन बड़े तालाब थे और बारिश के मौसम से ये तीनों तालाब एक हो जाते थे । तालाबों की वजह से इस क़स्बे में बीमारियाँ भी बहुत फैलती थीं । क़स्बे से लगे हुए सय्यद अब्दुल अज़ीज़ के मज़ार पर पुराने वक़्तों से ही सालाना उर्स होता आया है ।

बुलन्दशहर का इतिहास – 51789 ई0 में अलीगढ़ (कोल) में ब्रिटिश जनरल m. du boigne (डुबाइन) तैनात हुआ | दोआब का पूरा इलाक़ा इसक...
08/02/2024

बुलन्दशहर का इतिहास – 5

1789 ई0 में अलीगढ़ (कोल) में ब्रिटिश जनरल m. du boigne (डुबाइन) तैनात हुआ | दोआब का पूरा इलाक़ा इसकी मातहती में आ गया | सन 1797 में डुबाइन की जगह जनरल perron (पेरॉन) इकतीदार में आ गया | उस के जमाने में बरन के इलाक़े में जमींदारों का ज़ुल्म ओ सितम इंतिहा को पहुँच गया था | वे जिस कदर चाहते उतना लगान वसूल करते, वसूलियाबी में जोर ओ सितम खूब इस्तेमाल किया जाता | जनरल पेरॉन ने सिकंदराबाद में फ़ौज का एक ब्रिगैड कायम किया जिसका मक़सद लगान और टैक्स वसूल करने का था | जिस गाँव या इलाक़े में मुखालफत का सामना होता वो गाँव या बस्ती जला दी जाती, लोगों को लूट लिया जाता । सन 1801 में अनूपशहर को नवाब वज़ीर ने अंग्रेजों को दे दिया और अनूपशहर को जिला मुरादाबाद में शामिल कर लिया गया । बाकी इलाक़ा जनरल पेरॉन के हाथों से निकल कर लॉर्ड lake (लेक) के कब्जे में आ गया |
सन 1824 को बरन, बाकायेदा जिला बुलन्दशहर में तब्दील हो गया । नए ज़िले में सिकंदराबाद, तिलबेगम पुर, आढ़ा, दनकौर, कासना, बरन, मालागढ़, अगौता, अहार, डिबाई, शिकारपुर, अनूपशहर, जहांगीराबाद, जेवर, खुर्जा, आधा पहासू, अहमदगढ़, शकरपुर, थाना फरीदा, और दादरी शामिल किये गए । सन 1844 में स्याना भी जिला बुलन्दशहर में शामिल हो गया | उस वक़्त की चंद शख्सियतों का जिक्र करना मेरे ख्याल में सही रहेगा, जिन्होंने अंग्रेजों से लोहा लिया । उनमे एक दूनदो खान और उस के चाचा नाहर अली खान सरे फहरिस्त हैं | ये पहासू (उस वक़्त के पीतमपुर) के रईस थे । इन दोनों ने अंग्रेज़ अफसरों और फौजों को बड़े नाकों चने चबवाए हैं । कई बार अंग्रेज हुकूमरानों ने इनसे दब कर संधियाँ की हैं ।
स्टॉक होम बुलन्दशहर ज़िले का पहला कलेक्टर बना ।
इस के बाद अंग्रेजों का शासन शुरू हो जाता है, 1957 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, आजादी के लिए जद्दोजहद, आजाद भारत के बाद के हालात बाद में जिक्र करेंगे | इस अध्याय को यहीं विराम देते हैं और बाद के हालात लिखने से पहले, बरन के अन्तर्गत आने वाले परगनों के इतिहास के बारे में बात करते हैं | आगे के लेखों में, परगनों के अध्याय लिखने की चेष्टा रहेगी और एक अध्याय में एक परगना कवर करने की कोशिश रहेगी |

क्रमशः
(चित्र में तहसील के सामने वाला चबूतरा है जो 1870 में अंग्रेज अफसर गुरुस ने बनवाया था । यहाँ साप्ताहिक बाज़ार लगता था ।)

बुलन्दशहर का इतिहास – 4सन 1488 में सिकंदर लोधी तख्त पर बैठा | ये बादशाह इंतजामी उमूर (Management Skills) में बड़ा निपुण थ...
08/01/2024

बुलन्दशहर का इतिहास – 4

सन 1488 में सिकंदर लोधी तख्त पर बैठा | ये बादशाह इंतजामी उमूर (Management Skills) में बड़ा निपुण था | बरन में सिकंदराबाद और शिकारपुर कस्बे सिकंदर लोधी ने ही बसाये |
लोधी वंश के बाद, बाबर और हुमायूँ के दौर में कोई क़ाबिल ए जिक्र वाक़या ज़िले में रोनुमा नहीं हुआ | बाबरनामा या हुमायूँनामा में बरन के बारे में कोई जिक्र नहीं है | अकबर के जमाने में कुछ काम अच्छे हुए जिन से रियाया को बड़े फायेदे हुए | अकबर ने शेरशाह सूरी के कानूनों को लागू किया, जज़िया और दूसरे तरह के कई टैक्स खत्म किये, ओहदों पर बिना धार्मिक भेदभाव के क़ाबिल लोगों को रखा गया, जमीन की पैमाइश करा कर और पैदावार का अंदाजा लगा कर लगान लगाया गया, मुल्क को सूबों, सरकारों, दस्तूरों, मुहल्लों और मोज़ों में बांटा गया | अदालतों में दीवानी मामलों में धर्म के अनुसार फैसले होते थे लेकिन फौजदारी मामलों में इस्लामी शरीयत के कानून लागू होते थे | उस वक़्त ज़िला बुलन्दशहर का कुछ हिस्सा सरकार कोल (अलीगढ़) के अन्तर्गत आता था जो कि सूबा आगरा के अधीन आता था और कुछ इलाक़े सरकार दिल्ली सूबा दिल्ली के अन्तर्गत आते थे |
जहांगीर बादशाह के दौर में अनूपशहर की स्थापना हुई | राजा अनूप राय ने शिकार के दौरान बादशाह जहांगीर की शेर से जान बचाने के एवज में बादशाह से 168 गांवों की जागीर हासिल की और अनूपशहर को बसाया | जहांगीर बादशाह ने बिना धार्मिक भेदभाव के सभी के साथ एक जैसा बर्ताव किया | उस के बाद उस के बेटे शाहजहाँ ने भी रिवायत कायम रखी और उस के अहद में भी आम जनता सुखी रही | औरंगजेब के काल में अहार के मुतालिक जिक्र मिलता है कि वहाँ चौधरियों की तादाद काफी बढ़ गई थी और बादशाह ने आदेश जारी करके दो चौधरियों, जो कि इस्लाम कुबूल कर चुके थे, को चौधरी मुक़र्र किये बाक़ियों की चौधराहट खत्म कर दी | औरंगजेब के बाद यानि 1707 ई0 से 1717 ई0 तक कोई क़ाबिल ए जिक्र वाकया नहीं हुआ | उसके बाद नादिर शाह दुर्रानी ने इस दोआबे, जिस में बुलन्दशहर भी शामिल था को तबाह ओ बर्बाद कर के रख दिया |
अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी) अपने आक्रमण में शहर को लूट कर अनूपशहर की तरफ़ चला गया | वहाँ के गांवों में खूब लूटमार की | मेरे ख्याल में, अहमद शाह दुर्रानी को अनूपशहर बहुत पसंद आया क्यूंकी उसके बाद भी वो कई बार अनूपशहर आया वहाँ क़याम किया, या शायद ये कारण हो कि अनूपशहर में एक तरफ़ गंगा होने की वजह से वो दुश्मनों के हमलों से एक तरफ़ से सुरक्षित रहता हो | अहमद शाह दुर्रानी के अफगानिस्तान वापस जाने के बाद मराठों ने दोआबे को अच्छी तरह लूटा | अब्दाली उर्फ दुर्रानी फिर से इस इलाक़े में आया और इस इलाक़े पर एक बार फिर आफत टूटी | पानीपत में हार के बाद मराठे इस इलाक़े को छोड़ कर चले गए | ये इलाक़ा नजीबुद्दौला के जेरे कमान आया |
नजीबुद्दौला के मरने के बाद, नजीबुद्दौला के बेटे ज़ाब्ता खान को नजफ खान (मुगल सेनापति) के इशारे पर मराठों ने इस इलाक़े से बेदखल कर दिया । जिस पर ज़ाब्ता खान जींद और पटियाला के सिक्खों को बुला लाया और वे लूटमार करते हुए खुर्जा तक आ गए |
बुलन्दशहर का इलाक़ा काश्तकारी का इलाक़ा है ऐसे ज़िले में इतने अरसे तक जंग और लूटमार जारी रहने की वजह से रियाया की जो तबाही हुई होगी उस का अंदाजा लगाना आसान है । बार बार फौज का आना और जान ओ माल का नुकसान झेलते हुए काश्तकारी का पेशा बर्बाद हो गया और लोग फौज में जाने को बेहतर समझने लगे ।
1783-84 में ज़िले की जागीर माधो जी सिंधिया को मिली । इस ही वक़्त इस इलाक़े में जबरदस्त सूखा पड़ा, जिसको चालीसा सूखा का नाम दिया गया । अभी सूखा खत्म भी न हुआ था कि ज़ाब्ता खान का बेटा गुलाम कादिर खान फौज चढ़ा लाया और फिर से गदर मचा दिया । बादशाह को मजबूर करके अलीगढ़ से लेकर सहारनपुर तक की जागीर अपने नाम लिखा ली । गुलाम कादिर खान, सिंधिया के हाथों मारा गया ।
1789 ई0 से लेकर अंग्रेजों की अमलदारी शुरू होने तक, ये पूरा इलाक़ा सिंधिया के पास रहा |
क्रमशः

(Photo courtesy from the book of Frederic Growse)

बुलन्दशहर का इतिहास - 3 मैं आपको एक बात साफ कर देना बेहतर समझता हूँ कि मेरे पास दसत्याब किताबों में से छाँट छाँट कर बरन ...
12/12/2023

बुलन्दशहर का इतिहास - 3

मैं आपको एक बात साफ कर देना बेहतर समझता हूँ कि मेरे पास दसत्याब किताबों में से छाँट छाँट कर बरन के अहवाल लिख रहा हूँ | कई बार ऐसे मौक़े आते हैं कि सौ डेढ़ सौ साल के वाक़ियात मेरे पास होते ही नहीं हैं | वजह ये भी है कि मुझे काफी किताबों का इल्म ही नहीं है बस जो मौजूद हैं उन्ही से तलाश करके संक्षेप में लिख रहा हूँ | जिन किताबों से संदर्भ लिए गए हैं या जिन में बरन या बुलन्दशहर का जिक्र है, उनकी लिस्ट बता देता हूँ –
• तारीख ए फ़रिश्ता (फ़रिश्ता)
• Historical and Statistical Memoir of Zila Bulandshhar (Lachman Singh)
• Bulandshahr: Or Sketches of an Indian District (Frederic Growse)
• खिलजी खानदान (के एस लाल)
• तारीख ए फिरोजशाही (जियाउद्दीन बर्नी)
• तारीख ए फिरोज़शाही (शम्स सिराज अफीफ)
• अहमद शाह अबदाली (गंडा सिंह )
• अवध के प्रथम दो नवाब (ए एल श्रीवास्तव )

तेरहवी सदी ईश्वी में सुल्तान गियासुद्दीन बलबन और सुल्तान कीक़बाद के जमाने में बरन में कुछ भी क़ाबिल ए जिक्र नहीं हुआ बस ये समझें कि इन के दौर में आम आदमी की कोई सुनवाई नहीं हुई | इन के बाद जब जलालउद्दीन खिलजी तख्त पर बैठा तब जाकर अवाम को इंसाफ नसीब हुआ | जलालउद्दीन एक इंसाफ़ पसंद और भेदभाव न करने वाला बादशाह साबित हुआ | उसके ज़माने में अवाम पर कोई अत्याचार नहीं हुआ बल्कि जो कानून उन पर जबरदस्ती थोपे गए थे उन को भी खत्म किया गया | दिल्ली के तख्त पर बैठने से पहले जलालउद्दीन खिलजी बरन का हाकिम था | यहाँ उस ने आम आदमी को काफी सारी राहतें पहुंचाईं |

जलालउद्दीन के बाद उसका भतीजा अलाउद्दीन खिलजी बादशाह बना | अलाउद्दीन था तो बड़ा जबरदस्त बादशाह, जिसने हिंदुस्तान को मँगोलों से महफूज रखा | जब सारा एशिया और रूस मँगोलों ने रौंद डाला था और वे किसी के रोके न रुकते थे, उस वक़्त अलाउद्दीन ने हर मँगोल हमले में मँगोलों को शिकस्त ए फ़ाश दी | अलाउद्दीन ने हर जिंस की कीमत तय कर दी थी बाज़ार को कंट्रोल में रखा लेकिन उसकी सख्ती से किसान लोग खास तौर पर दोआब (गंगा यमुना के बीच का हिस्सा) जिस में बरन भी शामिल था, के किसान बड़े ज़ुल्म का शिकार हुए | जियाउद्दीन बर्नी लिखता है कि अलाउद्दीन ने अपने कारिंदों को सख्त ताकीद कर राखी थी कि किसी भी किसान को मन भर गल्ला भी जमा न करने दिया जाए बल्कि किसान अपनी फसल को अपने घर तक भी न ला पाते थे, खेतों से ही गल्ले की बिक्री हो जाया करती थी | कानून इतने सख्त थे कि अलाउद्दीन के बेटे, मुबारक खिलजी, जो खुद बड़ा सख्त था, ने उन सभी कानूनों को निरस्त कर दिया | (तारीख ए मुबारकशाही, याहया बिन अहमद सरहिन्दी)
मुबारक खिलजी के बाद गियासुद्दीन तुग़लक बादशाह बना, उसके बाद मुहम्मद तुग़लक बादशाह हुआ जिस के बारे में जियाउद्दीन बर्नी लिखता है कि मुहम्मद तुग़लक ने बरन में आम कत्ले आम मचा दिया | सिर काट कर किले की दीवारों पर लटका दिए | रियाया अपने खेतों को आग के हवाले करके जंगलों में भाग गई | इस के बाद बरन और आस पास के इलाकों में जबरदस्त सूखा पड़ा और इस कदर भुखमरी फैली कि इंसानों ने इंसानों का गोश्त खाया | बादशाह ने बजाए मदद करने के, बरन के हाकिमों को वसूलियाबी न करने पर कत्ल करा दिए | लोगों में इतना डर बैठ गया कि घरबार छोड़ कर जंगलों और पहाड़ों में भाग गए |
मुहम्मद तुग़लक के बाद उसका भतीजा फिरोजशाह तुग़लक बादशाह हुआ और ये अपने चाचा के बिल्कुल बरअक्स निहायत रहमदिल और इंसाफ़पसंद बादशाह साबित हुआ | पुराने सारे कानून रद्द कर दिए और प्रजा को बहुत चैन ओ सुकून पहुंचाया | वह लोगों में कतई भेदभाव नहीं करता था | उसके अहद में बुलन्दशहर की जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई | फिरोजशाह ने खुर्जा के फिरोजगंज में एक शानदार इमारत का भी निर्माण कराया था | उसके करीब 37 साल के शासन में चहुं ओर विकास और शांति बनी रही |

फिरोजशाह तुग़लक के मरने के दस साल बाद एक ऐसा तूफान आया जिस का नाम तैमूर लँग था जिस ने दिल्ली मेरठ बुलन्दशहर के साथ साथ बहुत जगहों को उजाड़ कर रख दिया | शहरों को लूटा, जलाया और बेतहाशा खून बहाया | तैमूर के बाद 80-90 साल तक बरन का कोई वाकया मेरी नजर से नहीं गुज़रा |

क्रमशः

बुलन्दशहर का इतिहास- 2 तकरीबन 1000 ई0 में दिल्ली के महाराजा ने डोडिया राजपूतों को दोआब के पूर्वी हिस्से की रियासत सौंप द...
08/12/2023

बुलन्दशहर का इतिहास- 2

तकरीबन 1000 ई0 में दिल्ली के महाराजा ने डोडिया राजपूतों को दोआब के पूर्वी हिस्से की रियासत सौंप दी | मेरठ, बरन और कोल (अलीगढ़) तक का भाग डोडिया राजपूतों के जेरे हुकूमत आ गया | कुछ किताबों में डोडिया को डोर के नाम से भी संबोधित किया गया है | इन डोरों में से ही राजा हरदत्त ने इन तीनों जगहों की हुकूमत संभाल ली | हरदत्त ने बरन में एक किला तामीर कराया जिस को मौजूद समय में ऊपर कोट के नाम से जाना जाता है | इस के अलावा उस ने अपनी रियासत की सरहदों की हिफाजत के लिए एक किला कोल (अलीगढ़) में और दूसरा मेरठ में बनवाया |

फ़रिश्ता अपनी किताब ‘तारीख ए फ़रिश्ता’ में लिखता है कि सन 1014 ई0 में जब महमूद गजनवी ने अपने नौवें हमले के वक़्त मेरठ का घेराव किया तो राजा हरदत्त ने महमूद गजनवी को बहुत सी धन-दौलत दे कर शहर को बचाया | मेरठ के बाद बरन का मुहासिरा किया गया और यहाँ भी राजा हरदत्त ने उसी तरह बरन को भी बचाया | इस के करीब 176 सालों तक हरदत्त के वंशजों ने बरन पर राज किया | एक किताब में पढ़ा था था कि जिस वक़्त दिल्ली के तख्त पर राजा पृथ्वी राज चौहान था, उस वक़्त डोरों का शासन छिना रहा |
बहरहाल, सन 1193 ई0 कुतुबउद्दीन ऐबक, जो कि शाहबुद्दीन मुहम्मद ग़ौरी का सिपहसालार था और बाद में दिल्ली सलतनत का पहला मुस्लिम सुल्तान बना, ने मेरठ, बरन, कोल और बदायूँ पर कब्जा कर लिया | उस वक़्त बरन का शासक राजा चंद्रसेन डोर था | उसने बहुत बहादुरी से हमलों को रोका लेकिन उसके दो गद्दार नौकरों, अजयपाल डोर और हीरा सिंह ने किले का एक दरवाज़ा खोल दिया जिस कारण दुश्मन अंदर दाखिल हो गया और चंद्रसेन डोर, बरन की हिफाजत करते हुए मारा गया | लेकिन चंद्रसेन डोर लड़ते हुए मुहम्मद ग़ौरी का एक सरदार जिसका नाम ख्वाजा लाल अली था, भी काम आया | इन ख्वाजा लाल अली का मज़ार ऊपर कोट से पूरब की तरफ़, ख्वाजा लाल बर्नी के नाम से आज भी मौजूद है | जिस कब्रिस्तान में ये मज़ार है, वो भी इन्ही के नाम से “ख्वाजा लाल बर्नी कब्रिस्तान” के नाम मशहूर है | आज भी इनके बहुत से मानने वाले मज़ार पर हाजिरी देते हैं |
अजयपाल ने अपनी गद्दारी के सिले में दरबार ए गौरी में “चौधराहट कस्बा बरन” का ओहदा पाया लेकिन जैसी कि उसे उम्मीद थी बरन की रियासत उस को नहीं मिली | अजयपाल ने इस्लाम कुबूल किया और उसको “मलिक मुहम्मद दराज़क़द” का खिताब दिया गया | अजयपाल की नस्ल में काफी समय तक ज़मीदारी भी रही | अजयपाल के वंशजों को लोग अहतरामान चौधरी कह देते थे लेकिन इनकी गद्दारी की वजह इनको उरफ़ेआम में टंटे के नाम से पुकारा गया (जैसा कि किताबों में दर्ज है) | आज भी बुलन्दशहर में टंटे नाम की बिरादरी मौजूद है | ऊपर कोट से थोड़ा नीचे एक मुहल्ला टंटान भी मौजूद है |
बरन की हुकूमत मुहम्मद दराज़क़द को न मिल कर क़ाज़ी नुरूद्दीन के हिस्से में आई | इन्ही क़ाज़ी की औलादें आज भी बुलन्दशहर में रहती हैं और क़ाज़ी कहलाते हैं | एक मुहल्ला क़ाज़ीवाडा आज भी ऊपर कोट में मौजूद है |
क्रमशः

बुलन्दशहर, उत्तर प्रदेश राज्य का एक जिला है जो कि अक्षांश  28.4070° N, 77.8498° E पर स्थित है | समुन्द्र तल से इसकी ऊंचा...
07/12/2023

बुलन्दशहर, उत्तर प्रदेश राज्य का एक जिला है जो कि अक्षांश 28.4070° N, 77.8498° E पर स्थित है | समुन्द्र तल से इसकी ऊंचाई करीब 203 मीटर है | इसकी सीमाएं गाज़ियाबाद, अलीगढ़, नोएडा, हापुड़, बदायूँ जिलों से मिलती हैं | वर्तमान में इसके अन्तर्गत सात विधान सभा सीट आती हैं जिनमे, सदर बुलन्दशहर, सिकंदराबाद, स्याना, अनूपशहर, डिबाई, शिकारपुर और खुर्जा हैं | ज़िले में दो लोकसभा सीट, बुलन्दशहर और खुर्जा आती हैं | सेन्सस 2011 के मुताबिक बुलन्दशहर की कुल जनसंख्या 222519 थी | साक्षरता दर करीब 77% थी | लिंग-अनुपात लगभग 917 था | जिला हिन्दू बाहुल्य है जिसमे 63% हिन्दू, 35% मुस्लिम एवं बाकी धर्मों के मानने वाले 2% हैं |

बुलन्दशहर दोआब के बीच स्थित है | इसके पूरब दिशा में गंगा और पश्चिम में यमुना बहती है | काली नदी के किनारे बसा हुआ है | ‘ऊपरी गंग नहर’ शहर के बिल्कुल करीब से बहती है | मिट्टी ज़रखेज अर्थात उपजाऊ है | सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं | कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं | ज़िले में बागों का प्रसार भी अच्छा खासा है | गेहूं, गन्ना, आम, लीची आदि बहुतायत में पैदा होता है | कोई बड़ी रेलवे लाइन शहर से नहीं गुजरती, केवल एक सिंगल इलेक्ट्रिक लाइन जो कि सहारनपुर से अलीगढ़ तक जाती है, पर सिटी रेलवे स्टेशन स्थित है | सार्वजनिक यातायात के साधनों में उत्तर प्रदेश रोडवेज की बसें इस्तेमाल होती हैं |

अब बुलन्दशहर के इतिहास की जानिब आते हैं जो कि अहम मकसद भी है | एक बात का ध्यान रखें कि इतिहास सदैव गौरवमय नहीं होता, सच्चाई ज्यादातर कड़वी ही होती है | इस मौजूं में खट्टे, मीठे, कसैले हर तरह के वाक़ियात लिखने की कोशिश रहेगी | लिहाज़ा हाज़मा दुरुस्त रखें |

बुलन्दशहर, जो कालांतर में बरन के नाम से जाना जाता रहा है, की स्थापना लगभग 1200 से 1000 ईसा पूर्व की मानी जाती है | मान्यताओं के अनुसार, जब राजा परीक्षित की मृत्यु नाग के डसने से हो गई तो राजा का पुत्र जनमेजय नागजाति के संहार में मसरूफ़ हो गया | उस समय यह स्थान, यहाँ से पूरब दिशा की ओर स्थित अहार नामक स्थान के शासक के अधीन हुआ करता था | इस जगह को बनछटी के नाम से जाना जाता था जिस से जाहिर होता है कि उस समय इस क्षेत्र में हर ओर वन हुआ करते थे | जब जनमेजय अपने काम से फारिग हुआ तो जनमेजय ने अहार मय कुछ और गाँव देहात ब्राह्मणों को दान कर दिया | जिस कारण अहार के राजा ने बनछटी नाम का एक शहर आबाद किया | बनछटी के हाकिम जिस का नाम राजा परमाल था ने, जहां आजकल पुरानी जेल है, के करीब एक किला बनवाया था | राजा परमाल की कुछ पीढ़ियों के बाद राजा अहिबरन ने किले से थोड़े से फासले पर एक टीले पर शहर कायम किया जिस को राजा अहिबरन की निस्बत से बरन नाम दिया गया और आज तक सरकारी दफ्तरों में यही नाम बरन चला आ रहा है | आज भी भारत के विभिन्न स्थानों पर बसे हुए कुछ लोग अपने नाम के आगे बरनवाल लिखते हैं | ये उसी राजा अहिबरन के वंशज कहलाते हैं और इनका ताल्लुक बरन से ही माना जाता है | चूंकि ये इलाक़ा काली नदी के किनारे पर स्थित एक टीले पर बसा हुआ था तो इसका नाम ऊंचानगर भी मशहूर हुआ और जब ये नाम फ़ारसी में बदला गया तो ऊंचानगर की निस्बत से बुलन्दशहर हो गया |
क्रमशः

06/12/2023

बहुत बार सोच चुका हूँ कि ज़िला बुलंदशहर के इतिहास पर कुछ लिखूं । बुलंदशहर जो ऐतिहासिक तौर पर बड़ा सम्पन्न ज़िला है, जिसके बहुत सारे परगनों का अपना इतिहास रहा है । लोगों को बुलंदशहर के इतिहास की जानकारी भी न के बराबर है ।

कभी शुरू नहीं कर पाया, समझ मे नहीं आया कि कहां से और किस तरतीब से लिखूं ।

अब इंशा अल्लाह मुसम्म्म इरादा कर लिया है कि अपनी टूटी फूटी क़लम से कुछ लिखने की कोशिश जरूर करूँगा । दिसम्बर से ही कुछ पोस्ट्स लिखना शुरू कर रहा हूँ । अगर किसी साहब को कोई ग़लती नज़र आये तो बिला झिझक सही करा सकते हैं ।

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