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22/06/2024

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12/06/2024

30/05/2024
तो क्या ईडी की ताकत पर सुप्रीम कोर्ट ने कस दिया शिकंजा, इस फैसले का मतलब समझिएEnforcement Directorate Power To Arrest: उ...
21/05/2024

तो क्या ईडी की ताकत पर सुप्रीम कोर्ट ने कस दिया शिकंजा, इस फैसले का मतलब समझिए

Enforcement Directorate Power To Arrest: उच्चतम न्यायालय ने कहा कि एक विशेष अदालत की ओर से मनी लॉन्ड्रिंग की शिकायत पर संज्ञान लेने के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 19 के तहत किसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकता है। न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि जब कोई आरोपी किसी समन के अनुपालन में अदालत के समक्ष पेश होता है तो एजेंसी को उसकी हिरासत पाने के लिए संबंधित अदालत में आवेदन करना होगा।

हाइलाइट्स

सुप्रीम कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में ईडी की गिरफ्तारी को लेकर अहम निर्देश दिया
विशेष कोर्ट के संज्ञान लेने के बाद जांच एजेंसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकती
आरोपी की हिरासत जरूरी है तो ईडी को इसके लिए विशेष अदालत में आवेदन देना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसले में कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में ईडी की शिकायत पर विशेष कोर्ट के संज्ञान लेने के बाद जांच एजेंसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति अभय एस. ओका की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में आगे जांच के लिए आरोपी की हिरासत जरूरी है तो ईडी को इसके लिए विशेष अदालत में आवेदन देना होगा। पीठ में उज्जल भुइयां भी शामिल थे।

शीर्ष अदालत ने कहा, 'आरोपी का पक्ष सुनने के बाद विशेष अदालत को संक्षेप में कारण बताते हुए आवेदन पर अनिवार्य रूप से फैसला सुनाना होगा। सुनवाई के बाद अदालत हिरासत की अनुमति तभी देगी जब वह इस बात से संतुष्ट हो कि हिरासत में रखकर पूछताछ जरूरी है।' सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायत में जिस व्यक्ति को आरोपी के रूप में नामित नहीं किया गया है उसे गिरफ्तार करने के लिए ईडी को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए), 2002 की धारा 19 की शर्तों को पूरा करना होगा।

धारा 45 के तहत जमानत के लिए दोहरी शर्त की अनिवार्यता
इसके अलावा, जिस व्यक्ति को मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया है, लेकिन वह मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत जारी समन पर विशेष अदालत के समक्ष उपस्थित होता है, उसकी जमानत के लिए कड़ी दोहरी शर्त की अनिवार्यता नहीं होगी। पीएमएलए की धारा 45 के तहत जमानत पाने के लिए दोहरी शर्त की अनिवार्यता है।

1 जुलाई से लागू होने वाले भारतीय न्याय संहिता में बदलाव पर विचार करे सरकारः सुप्रीम कोर्टदहेज उत्पीड़न के झूठे मुकदमों प...
15/05/2024

1 जुलाई से लागू होने वाले भारतीय न्याय संहिता में बदलाव पर विचार करे सरकारः सुप्रीम कोर्ट

दहेज उत्पीड़न के झूठे मुकदमों पर
केंद्र को दी संहिता की धारा 85
और 86 में बदलाव की सलाह

पीठ ने कहा कि उसने 14 साल पहले केंद्र से दहेज विरोधी कानून यानी IPC की धारा 498ए पर फिर से विचार करने के लिए कहा था

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार से कहा कि वह वास्तविकताओं पर विचार करके भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 और 86 में आवश्यक बदलाव करने पर विचार करे, ताकि झूठी या अतिरंजित शिकायतें दर्ज करने के लिए इसके दुरुपयोग को रोका जा सके। भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 में कहा गया है, “किसी महिला का पति या पति का रिश्तेदार महिला के साथ क्रूरता करेगा तो उसे तीन वर्ष तक की कैद की सजा दी जाएगी और उस पर जुर्माना भी लगाया जाएगा।” धारा 86 में क्रूरता की परिभाषा दी गई है, जिसमें महिला को मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार का नुकसान पहुंचाना शामिल है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि उसने 14 वर्ष पहले केंद्र सरकार से दहेज विरोधी कानून पर फिर से विचार करने को कहा था क्योंकि बड़ी संख्या में शिकायतों में घटना के अतिरंजित बयान होते हैं।

जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि उसने एक जुलाई से लागू होंगे नए कानून उल्लेखनीय है कि देश की आपराधिक न्याय प्रणाली को पूरी तरह से बदलने के लिए नए बने कानून- भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम एक जुलाई से लागू होंगे। तीनों कानूनों को पिछले वर्ष 21 दिसंबर को संसद की मंजूरी मिल गई और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी 25 दिसंबर को उन पर अपनी सहमति दे दी।

जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि उसने होने वाली भारतीय न्याय संहिता BMS 2023 की धारा 85 और 86 पर गौर किया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या संसद ने अदालत के

सुझावों पर गंभीरता से गौर किया है।
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पतंजलि पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, IMA चीफ की बढ़ सकती हैं मुश्किलें; सुनवाई आज Patanjali Supreme Court: जस्टिस हिमा कोहली और ...
10/05/2024

पतंजलि पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, IMA चीफ की बढ़ सकती हैं मुश्किलें; सुनवाई आज Patanjali Supreme Court: जस्टिस हिमा कोहली और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ के समक्ष दाखिल अपनी अर्जी में आचार्य बालकृष्ण ने कहा है कि डॉ. अशोकन ने अदालत की कार्यवाही को लेकर जानबूझकर टिप्पणी की है।

Patanjali Supreme Court News: भ्रामक विज्ञापन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही कार्यवाही को लेकर टिप्पणी करने को लेकर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) प्रमुख डॉ. आरवी अशोकन की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पतंजलि आयुर्वेद के प्रबंध निदेशक आचार्य बालकृष्ण ने शीर्ष अदालत में अर्जी दाखिल कर डॉ. अशोकन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

जस्टिस हिमा कोहली और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ के समक्ष दाखिल अपनी अर्जी में आचार्य बालकृष्ण ने कहा है कि डॉ. अशोकन ने अदालत की कार्यवाही को लेकर जानबूझकर टिप्पणी की है। अर्जी में यह भी कहा गया है कि उनका बयान शीर्ष अदालत की कार्यवाही और न्याय की प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप है। अर्जी में बालकृष्ण ने कहा है कि आईएमए प्रमुख द्वारा दिया गया बयान निंदनीय प्रकृति के हैं और जनता की नजर में शीर्ष अदालत की गरिमा और कानून की महिमा को कम करने का एक स्पष्ट कोशिश है।

पिछली सुनवाई पर भी पतंजलि की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने डॉ. अशोकन द्वारा की गई टिप्पणी का मामला उठाया था, तब पीठ ने अदालत की कार्यवाही को लेकर मीडिया में आईएमए अध्यक्ष द्वारा दिए गए साक्षात्कार को अदालत की रिकार्ड पर लाने को कहा था। बालकृष्ण की अर्जी पर मंगलवार को पीठ के समक्ष सुनवाई होगी।

पीठ के समक्ष पतंजलि की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने आईएमए प्रमुख डॉ. अशोकन द्वारा मीडिया में दिए गए साक्षात्कार का मुद्दा उठाया था। वरिष्ठ अधिवक्ता रोहतगी ने पीठ से कहा था कि आईएमए प्रमुख ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी की आलोचना की है, जिसमें कहा गया था कि आईएमए को डॉक्टरों द्वारा महंगी दवाइयां और इलाज लिखने वाले और अनैतिक आचरण में शामिल डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

10/05/2024

बांकेबिहारी मंदिर का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, प्रशासनिक हस्तक्षेप रोकने को याचिका दायर वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर क...
06/05/2024

बांकेबिहारी मंदिर का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, प्रशासनिक हस्तक्षेप रोकने को याचिका दायर वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मंदिर के राजभोग सेवा अधिकारी देवेंद्र गोस्वामी ने याचिका दायर कर प्रबंधन में प्रशासनिक हस्तक्षेप रोकने की मांग की है।

ठाकुर बांके बिहारी मंदिर का सरकार अधिग्रहण न करे और मंदिर प्रबंधन में प्रशासनिक हस्तक्षेप ना हो, इसे लेकर. मंदिर के एक सेवायत द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। जिसकी सुनवाई मंगलवार को डबल बेंच में होगी। अब सभी की निगाहें मंगलवार को होने वाली सुनवाई पर टिक गई है।

मंदिर के राजभोग सेवा अधिकारी देवेंद्र गोस्वामी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को न्यायाधीश संदीप खन्ना और दीपांकर दत्ता की डबल बेंच द्वारा सुनवाई की जाएगी। याचिका में उनकी ओर से विभिन्न तथ्य न्यायालय के समक्ष रखे जाएंगे।

उन्होंने बताया कि बांके बिहारी मंदिर के चढ़ावे एवं प्रबंधन में प्रशासनिक हस्तक्षेप को लेकर सुनवाई की मांग रखी गई है। उनके अनुसार उनकी ओर से दायर याचिका में उत्तर प्रदेश के धर्मार्थ मंत्रालय के प्रमुख सचिव, डीएम मथुरा, एसएसपी मथुरा के साथ अनंत शर्मा और मनोज कुमार पांडेय को प्रतिवादी बनाया गया है।

गौरतलब है कि ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में लगातार बढ़ रही भीड़ एवं अव्यवस्थाओं को लेकर 18 अगस्त 2022 को अनंत शर्मा द्वारा एक याचिका हाईकोर्ट में लगाते हुए कॉरिडोर की मांग रखी गई थी । जिसमें लंबी सुनवाई के बाद 19 नवंबर 2023 को कॉरिडोर बनाए जाने का रास्ता कोर्ट द्वारा साफ कर दिया गया। साथ ही हाईकोर्ट इलाहाबाद द्वारा सेवायत गोस्वामी समाज को सुनते हुए उनके अधिकार से छेड़छाड़ नहीं करने के निर्देश भी दिए गए थे।

इसी बीच मंदिर की सेवा अधिकारी देवेंद्र गोस्वामी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में मंदिर प्रबंधन में प्रशासनिक हस्तक्षेप को लेकर नई याचिका दायर करने से एक बार फिर से कॉरिडोर प्रकरण स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। मंगलवार को होने वाली सुनवाई से अब इस प्रकरण में क्या फैसला आएगा यह देखने वाली बात होगी।

अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा न देकर निजी हित को राष्ट्रहित से ऊपर रखा', दिल्ली हाईकोर्ट ने लगाई फटकारदिल्ली के स्कूलों में...
05/05/2024

अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा न देकर निजी हित को राष्ट्रहित से ऊपर रखा', दिल्ली हाईकोर्ट ने लगाई फटकार
दिल्ली के स्कूलों में छात्रों को किताबें नहीं मिलने के मामले को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार को जमकर फटकार लगाई। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि केजरीवाल ने इस्तीफा नहीं देकर निजी हित को राष्ट्रहित से ऊपर रखा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देने पर शुक्रवार को अरविंद केजरीवाल को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न देकर अरविंद केजरीवाल ने राष्ट्रहित से ऊपर निजी हित रखा हैं। अदालत ने दिल्ली में AAP के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि उसे केवल सत्ता में दिलचस्पी है। दिल्ली शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में पिछले महीने प्रवर्तन निदेशालय ने अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार किया था।

सिर्फ सत्ता में दिलचस्पी
दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकारी स्कूलों में के छात्रों के लिए किताब और ड्रेस की अनुपलब्धता पर दिल्ली सरकार की खिंचाई की। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली सरकार को छात्रों के पास किताबें नहीं होने की कोई चिंता नहीं है। कोर्ट ने दिल्ली सरकार के वकील से कहा, "आपके मुवक्किल को सिर्फ सत्ता में दिलचस्पी है। मुझे नहीं पता कि आप कितनी सत्ता चाहते हैं।"

एमसीडी कमिश्नर ने दी ये दलील
इससे पहले एमसीडी कमिश्नर ने बताया था कि नोटबुक, स्टेशनरी आइटम, यूनिफॉर्म और स्कूल बैग का वितरण न होने का एक बड़ा कारण स्थायी समितियों का गठन न होना है। उन्होंने कहा कि केवल स्थायी समिति के पास ही पांच करोड़ से अधिक के ठेके देने की शक्ति और अधिकार क्षेत्र है। तब हाईकोर्ट ने कहा कि किसी तरह की कोई रिक्तता नहीं होना चाहिए। अगर किसी वजह से स्थायी समिति का गठन नहीं हो सका है तो वित्तीय जीएनसीटीडी (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार) द्वारा एक उपयुक्त अथॉरिटी को तुरंत सौंपी जानी चाहिए।

घड़ियाली आंसू बहा रहे मंत्री
दिल्ली सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि उन्हें मंत्री सौरभ भारद्वाज से निर्देश मिले हैं कि इस तरह के प्रतिनिधिमंडल के लिए मुख्यमंत्री की सहमति की आवश्यकता होगी, जो हिरासत में है। इस पर कोर्ट ने कहा, 'यह आपकी पसंद है कि आपने कहा कि मुख्यमंत्री के हिरासत में होने के बावजूद सरकार चलती रहे

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