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शादी समारोह।
11/03/2026

शादी समारोह।

"सिम कार्ड मेरा, मोबाइल मेरा, फिर'इनकमिंग' कॉल पर ताला क्यों?बैलेंस खत्म होने पर आउटगोइंग बंद होना समझ आता है,पर इनकमिंग...
21/02/2026

"सिम कार्ड मेरा, मोबाइल मेरा, फिर
'इनकमिंग' कॉल पर ताला क्यों?

बैलेंस खत्म होने पर आउटगोइंग बंद होना समझ आता है,
पर इनकमिंग बंद करके गरीबों से 'रेंट' वसूलना सरासर डकैती है।"

कुछ लोग यूँही शहर में हम से भी ख़फ़ा हैं हर एक से अपनी भी तबीअ'त नहीं मिलती
21/02/2026

कुछ लोग यूँही शहर में हम से भी ख़फ़ा हैं
हर एक से अपनी भी तबीअ'त नहीं मिलती

⚡बलात्कार की तैयारी और प्रयास में अंतर स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया हाई कोर्ट का वह विवादास्पद निर्णय, जिस...
21/02/2026

⚡बलात्कार की तैयारी और प्रयास में अंतर स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया हाई कोर्ट का वह विवादास्पद
निर्णय, जिसमें रेप के प्रयास को सिर्फ तैयारी मानते हुए सजा कम कर दी गई थी ⚡

सुप्रीम कोर्ट ने 18 फरवरी 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को पलटते हुए महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या दी है। यह मामला मुख्य रूप से 'अपराध की तैयारी' (Preparation) और 'अपराध के प्रयास' (Attempt) के बीच के बारीक अंतर पर केंद्रित था।
​इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में आरोपी की सजा को यह कहते हुए कम कर दिया था कि नाबालिग़ लड़की के स्तन पकड़ने और उसके पजामें का नाडा खोलने की कोशिश केवल 'बलात्कार की तैयारी' के दायरे में आती हैं, 'प्रयास' में नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया।

*​ कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और कानूनी बिंदु -
​1. तैयारी बनाम प्रयास (Preparation vs Attempt) :
​सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई व्यक्ति अपराध करने के इरादे से कदम आगे बढ़ाता है और ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है, जहां से पीछे हटना उसके नियंत्रण में नहीं रहता या वह कृत्य को अंजाम देने के बेहद करीब होता है तो उसे 'प्रयास' (IPC की धारा 511 के तहत) माना जाएगा।
​तैयारी का अर्थ है अपराध करने के लिए साधन जुटाना।
जबकि ​प्रयास का मतलब है अपराध को पूरा करने की दिशा में प्रत्यक्ष कदम उठाना।

​2. इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर सख्त आपत्ति -
​शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट का यह निष्कर्ष कि "कपड़े उतारना या शरीर पर लेटना केवल तैयारी है", पूरी तरह गलत और संवेदनहीन है। इस तरह के कृत्य पीड़ित की गरिमा पर सीधा हमला हैं और इन्हें केवल 'तैयारी' कह कर कमतर नहीं आंका जा सकता।

​3. सजा की बहाली :
​सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा 17 मार्च 2025 को पारित उस विवादित आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपियों पर रेप संबंधी धारा हटा दी गई थी।
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा तय किए गए रेप संबंधी आरोपों को बरकरार रखने का निर्देश दिया, यह कहते हुए कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायालयों को अधिक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
ऐसे मामलों में कानूनी तर्क और सहानुभूति दोनों की जरूरत होती है।
* सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया कि वह यौन अपराधों की सुनवाई करने वाले जजों के नजरिए को लेकर निर्देश तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाए और इस विषय पर व्यापक रिपोर्ट तैयार करे।

* मामले का विवरण -
​केस का नाम (Suo Moto): In Re: Order dated 17.03.2025 Passed by the High Court of Judicature at Allahabad In Criminal Revision No. 1449/2024 and Ancillary Issues.
• ​अपील केस : Criminal Appeal No. 784 of 2026 (State of Uttar Pradesh vs. Pawan and Another).
• ​पक्षकारों के नाम : सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया था। मुख्य प्रतिवादी आकाश और पवन (अभियुक्त) थे, जिन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रायल कोर्ट के निर्णय के खिलाफ याचिका दायर की थी।

• ​​इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने की।
​कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब अभियुक्त ने नाबालिग को सुनसान जगह पर घसीटा और उसके कपड़े फाड़ने या उतारने की कोशिश की तो यह केवल 'तैयारी' (Preparation) नहीं बल्कि 'बलात्कार का प्रयास' (Attempt to R**e) था। आरोपी तैयारी की सीमा पार कर चुके थे और अपराध के लिए सक्रिय कदम उठा चुके थे।
​ सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस तर्क को "अमानवीय" और "कानून के सिद्धांतों के विपरीत" बताया, जिसमें कहा गया था कि जब तक पूर्ण नग्नता या लिंग प्रवेश (Pe*******on) का स्पष्ट इरादा न दिखे, उसे प्रयास नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट के निर्णय के कुछ हिस्सों पर रोक लगा दी थी। उसने हाई कोर्ट की टिप्पणियों को चौंकाने वाला और संवेदनहीन बताया था।

*​ ट्रायल कोर्ट का आदेश जिसे संपूर्ण कोर्ट ने बहाल किया : कासगंज के विशेष पॉक्सो (POCSO) न्यायालय ने अपने आदेश में अभियुक्तों पर धारा 376 (बलात्कार) सहपठित धारा 511 (प्रयास) और पॉक्सो एक्ट की धारा 18 के तहत मुकदमा चलाने का निर्देश दिया था।
आरोपी पक्ष की याचिका पर इस आदेश को हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया था।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने कानून के स्थापित सिद्धांतों का गलत प्रयोग किया है।

* यह मामला नवंबर 2021 को नाबालिग़ लड़की की मां की शिकायत पर शुरू हुआ था। मां ने अपनी 11 साल की बच्ची के यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।
ट्रायल कोर्ट ने इसे दुष्कर्म के प्रयास का मामला माना और पोक्सो एक्ट के तहत आरोप तय करते हुए मुकदमा चलाने का निर्देश दिया था।

* यह फैसला महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में कानूनी स्पष्टता लाने के लिए नजीर (Precedent) माना जा रहा है, ताकि अपराधी 'तकनीकी परिभाषाओं' का फायदा उठा कर बच न सकें।

अब  हवाएँ ही  करेंगी  रोशनी का फैसला, जिस   #दीये  में   #जान  होगी वो दीया रह जाएगा (महशर बदायूंनी)
06/02/2026

अब हवाएँ ही करेंगी रोशनी का फैसला,
जिस #दीये में #जान होगी वो दीया रह जाएगा
(महशर बदायूंनी)

01/02/2026
01/02/2026
01/02/2026
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के हालिया (दिसंबर 2025) फैसले के अनुसार, केवल आर्य समाज मंदिर द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र को ह...
01/02/2026

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के हालिया (दिसंबर 2025) फैसले के अनुसार, केवल आर्य समाज मंदिर द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र को हिंदू विवाह का निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह को वैध साबित करने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत आवश्यक रस्मों, विशेषकर 'सप्तपदी' (सात फेरे) का प्रमाण होना अनिवार्य है, अन्यथा शादी को अमान्य माना जा सकता है।
हाईकोर्ट मध्यप्रदेश के फैसले के मुख्य बिंदु:
केवल प्रमाणपत्र काफी नहीं: सिर्फ आर्य समाज का प्रमाण पत्र और फोटोग्राफ विवाह की वैधता के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
सप्तपदी अनिवार्य: विवाह संपन्न होने के लिए अग्नि के चारों ओर सात फेरे (सप्तपदी) लेना कानूनी रूप से सिद्ध होना चाहिए।
निचली अदालत के फैसले को रद्द: यदि प्रमाण पत्र होने के बावजूद अनुष्ठान के साक्ष्य नहीं मिलते हैं, तो पारिवारिक न्यायालय के फैसले को भी रद्द किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के संदर्भ: न्यायालय ने डॉली रानी बनाम मनीष कुमार चंचल (2025) मामले का हवाला दिया, जिसमें विवाह अनुष्ठानों के स्वतंत्र प्रमाणीकरण पर जोर दिया गया है।
निष्कर्ष:
आर्य समाज विवाह वैध हैं, लेकिन यदि किसी मामले में विवाद उठता है, तो आर्य समाज प्रमाणपत्र के साथ-साथ यह साबित करना होगा कि शादी में हिंदू रीति-रिवाजों का पालन किया गया था।

16/01/2026

जहाँ धर्म के नाम पर बहुत शोर-शराबा और हल्ला-गुल्ला होता है, समझ लीजिए कि वहाँ असली धर्म कहीं नहीं होता।
वहाँ न तो कोई मानवीय संवेदना बची होती है, न ही सच्ची श्रद्धा।
वहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनीतिक स्वार्थ का खेल चल रहा होता है।
आजकल के ज़्यादातर राजनेता धर्म को बस एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं—अपने वोट बैंक को मजबूत करने, सत्ता हासिल करने या उसे बचाए रखने के लिए।
इसी तरह आज के कई बड़े-बड़े बाबा और संत भी धर्म के नाम पर कारोबार चलाते हैं। उनके लिए धर्म न तो आध्यात्मिक मार्ग है और न ही जीवन का सार। उनके लिए तो यह बस एक स्थायी कमाई का जरिया है या फिर राजनीतिक संरक्षण पाने का आसान रास्ता।
लेकिन असली धर्म का मतलब, उसका सच्चा रूप तो उस गाँव की साधारण, गरीब महिला में देखने को मिलता है।
सुबह-सुबह नहा-धोकर, वो अपने छोटे बच्चे का हाथ थामे घर के सामने वाले पीपल के पेड़ के पास जाती है।
पेड़ की जड़ों पर प्यार से एक लोटा पानी चढ़ाती है, थोड़ा चावल और गुड़ रखती है।
फिर हाथ जोड़कर, मन ही मन 'पीपल बाबा' से बस यही प्रार्थना करती है—
"बेटा स्वस्थ रहे, पढ़ाई में अच्छा करे, आगे बढ़े।"
फिर चुपचाप घर लौटती है और बिना किसी के धर्म-जाति के झगड़े में पड़े, अपने रोज़ के काम में जुट जाती है।
यही है सच्चा धर्म—सरल, निष्कपट, बिना दिखावे का, और सबसे बड़ी बात—पूरी तरह मानवीय।

नए साल 2026 की ढेर सारी शुभकामनाएं! 🎉✨यह नया साल आप सभी के जीवन में खुशियों की बौछार लाए, सफलता के नए कीर्तिमान गढ़े और ...
31/12/2025

नए साल 2026 की ढेर सारी शुभकामनाएं! 🎉✨
यह नया साल आप सभी के जीवन में खुशियों की बौछार लाए, सफलता के नए कीर्तिमान गढ़े और हर सपना पूरा हो। पुराने गमों को भूलकर नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ें।
रणजीत गिरि
अधिवक्ता

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