Advocate Sanjay Sahu

Advocate Sanjay Sahu HIGH COURT OF CHHATISGARH
सत्र व जिला न्यायालय
CRIMINAL, CIVIL, Writ & REVENUE PRACTICER
कानून सलाह High Court at Bilaspur in CG

Anurag Soni vs. State of ChhattisgarhSupreme Court of India (9 April 2019)⚡ Key Ruling: "शादी के झूठे वादे पर सहमति, सहम...
28/04/2026

Anurag Soni vs. State of Chhattisgarh
Supreme Court of India (9 April 2019)

⚡ Key Ruling: "शादी के झूठे वादे पर सहमति, सहमति नहीं है!" (Consent obtained on a false promise of marriage is not consent).
📜 Legal Point (IPC 90): गलत तथ्य (Misconception of fact) पर आधारित सहमति धारा 376 (R**e) के तहत अपराध है.
Case Facts: आरोपी का इरादा शुरू से ही शादी का नहीं था और उसने वादे से मुकरकर यौन संबंध स्थापित किए.
Verdict: 10 साल की सजा को बरकरार रखा (बाद में 7 साल की गई), सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह समाज के खिलाफ अपराध है
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अलग-अलग आरोपियों के संयुक्त बयान तभी स्वीकार्य, जब उनसे अलग-अलग नई बातें सामने आती हों: सुप्रीम कोर्टसुप्रीम कोर्ट ने फै...
27/04/2026

अलग-अलग आरोपियों के संयुक्त बयान तभी स्वीकार्य, जब उनसे अलग-अलग नई बातें सामने आती हों: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अलग-अलग आरोपियों द्वारा दिए गए संयुक्त या एक साथ दिए गए खुलासे के बयान साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत तभी स्वीकार्य हैं, जब ऐसे बयानों से अपराध से जुड़े अलग और प्रासंगिक तथ्यों का पता चलता हो। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह फैसला कर्नाटक से जुड़े हत्या के मामले में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देने वाले दो दोषियों द्वारा दायर आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने अंततः अपीलकर्ताओं को बरी किया, लेकिन भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के तहत संयुक्त खुलासे के बयानों के साक्ष्य मूल्य पर कानूनी स्थिति स्पष्ट की।

मामले की पृष्ठभूमि यह मामला मार्च 2013 में कर्नाटक में महिला के लापता होने और उसकी हत्या से जुड़ा है। पीड़िता 23 मार्च को लापता हो गई और चार दिन बाद एक वन क्षेत्र में उसके जले हुए कंकाल के अवशेष मिले। अभियोजन पक्ष के अनुसार, उसके भाई ने उससे बड़ी रकम और सोना उधार लिया था। उसे चुकाने से बचने के लिए उसने तीन अन्य आरोपियों के साथ मिलकर साजिश रची। आरोप था कि आरोपियों ने उसका अपहरण किया, उसकी हत्या की और बाद में सबूत मिटाने के लिए शव को जला दिया।

ट्रायल कोर्ट ने चारों आरोपियों को दोषी ठहराया। हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि बरकरार रखी। हालांकि, केवल दो अपीलकर्ताओं ने ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मुद्दा यह था कि क्या कई आरोपियों द्वारा एक ही स्थान या वस्तु की ओर इशारा करने को—जिसका पता पहले ही किसी एक आरोपी के माध्यम से चल चुका हो—धारा 27 के तहत एक वैध 'खोज' (Discovery) माना जा सकता है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, चारों आरोपियों ने उस स्थान के बारे में एक संयुक्त बयान दिया, जहां महिला की हत्या की गई थी और जहां शव को जलाया गया था। पुलिस उन सभी को एक वाहन में ले गई। उनमें से एक वाहन से नीचे उतरा और वह स्थान दिखाया जहां पीड़िता की हत्या की गई थी। बाद में अन्य तीन को भी एक-एक करके वहां लाया गया; उन्होंने भी वही स्थान दिखाया और कहा कि शव को वहीं जलाया गया।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि 'पंच गवाह' (स्वतंत्र गवाह) ने अपीलकर्ताओं द्वारा दिए गए विशिष्ट बयान के बारे में कोई गवाही नहीं दी। संयुक्त बयान अपने आप में अस्वीकार्य नहीं होते; लेकिन इसमें स्पष्टता और विशिष्टता होनी चाहिए




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"जब वकील एक साथ खड़े होते हैं, तो न केवल न्याय जीतता है, बल्कि कानून की आत्मा भी जीवंत हो उठती है।" HighCourtOfchhattisga...
27/04/2026

"जब वकील एक साथ खड़े होते हैं, तो न केवल न्याय जीतता है, बल्कि कानून की आत्मा भी जीवंत हो उठती है।"




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सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि निजी शिकायत (Private Complaint) वाले...
26/04/2026

सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि निजी शिकायत (Private Complaint) वाले मामलों में पुलिस आरोपी को तब तक गिरफ्तार नहीं कर सकती, जब तक कि संबंधित अदालत द्वारा समन के साथ-साथ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी न किया गया हो। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने यह व्यवस्था दी कि एक बार जब मजिस्ट्रेट संज्ञान लेकर समन जारी कर देता है, तो आरोपी को केवल अदालत में उपस्थित होकर कार्यवाही में शामिल होना होता है।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
(दिनांक: 23 अप्रैल 2026)

"निजी शिकायत वाले मामलों में पुलिस आरोपी को तब तक गिरफ्तार नहीं कर सकती, जब तक समन के साथ-साथ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी न हो जाए।"
मुख्य बिंदु:
मजिस्ट्रेट द्वारा समन जारी होने पर आरोपी को केवल अदालत में पेश होना अनिवार्य है।
शिकायत मामलों में केवल समन के आधार पर गिरफ्तारी की आशंका गलत है।
पुलिस के पास जांच (धारा 202 CrPC/BNSS) के दौरान भी गिरफ्तारी की शक्ति नहीं है





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25/04/2026




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जल्द सुनवाई का अधिकार NDPS Act की धारा 37 के तहत ज़मानत की शर्तों की जगह नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्टसुप्रीम कोर्ट ने फैस...
25/04/2026

जल्द सुनवाई का अधिकार NDPS Act की धारा 37 के तहत ज़मानत की शर्तों की जगह नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 21 के तहत जल्द सुनवाई का अधिकार, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1987 (NDPS Act) के तहत ज़मानत देने के लिए तय सख्त कानूनी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा, "संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जल्द सुनवाई का अधिकार निस्संदेह एक कीमती संवैधानिक गारंटी है। हालांकि, NDPS Act जैसे खास कानून के संदर्भ में, जो कमर्शियल मात्रा से जुड़े मामलों से निपटता है, इस अधिकार को धारा 37 के आदेश के साथ-साथ पढ़ा जाना चाहिए, न कि उसकी जगह पर।"

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा दो आरोपियों को दी गई ज़मानत के आदेशों को रद्द किया। यह मामला हेरोइन की कमर्शियल मात्रा की बरामदगी से जुड़ा था। बेंच ने आरोपियों को निर्देश दिया कि वे एक हफ़्ते के अंदर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करें। मामले की पृष्ठभूमि यह मामला 10 जनवरी, 2024 को पंजाब के तरन तारन ज़िले के खालरा पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR से जुड़ा है। पुलिस बैरिकेड पर वाहनों की चेकिंग के दौरान, अधिकारियों ने एक कार को रोका और उसमें से हेरोइन के तीन पैकेट बरामद किए, जिनका कुल वज़न 1.465 किलोग्राम था। Act के तहत इसे कमर्शियल मात्रा माना जाता है।

NDPS Act की धारा 21(c) और 29 के तहत आरोप तय किए गए। हाईकोर्ट ने आरोपियों को मुख्य रूप से इस आधार पर नियमित ज़मानत दी थी कि वे दो साल से ज़्यादा समय से हिरासत में थे, अभियोजन पक्ष के चौबीस गवाहों में से केवल दो की ही गवाही हो पाई थी। हिरासत में बने रहने से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जल्द सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन होगा।









सुप्रीम कोर्ट का इलाहाबाद हाईकोर्ट चीफ जस्टिस से अनुरोध- लंबे समय से लंबित सर्विस विवादों का प्राथमिकता के आधार पर करें ...
24/04/2026

सुप्रीम कोर्ट का इलाहाबाद हाईकोर्ट चीफ जस्टिस से अनुरोध- लंबे समय से लंबित सर्विस विवादों का प्राथमिकता के आधार पर करें निपटारा

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट चीफ जस्टिस से अनुरोध किया कि वह लंबे समय से लंबित सेवा विवादों की पहचान करें और उनके शीघ्र निपटारे को सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएं। कोर्ट ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि कर्मचारी अक्सर दशकों तक सेवा मामलों को लेकर मुकदमा लड़ते रहते हैं। साथ ही कभी-कभी तो वे अपनी सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच जाते हैं।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने यह निर्देश तब जारी किया, जब वह एक सरकारी कर्मचारी द्वारा दायर उस अपील पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें 29 साल पुराने एक विवाद के संबंध में कैडर के पुनर्वितरण की मांग की गई।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि सेवा विवादों का लंबे समय तक लंबित रहना प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है और इससे कर्मचारियों तथा उनके परिवारों को लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

बेंच ने कहा,

"यह सोचना कठिन है कि ऐसे और भी कई मामले नहीं होंगे, जहां सेवा विवाद के लंबे समय तक लंबित रहने के कारण संबंधित पक्ष सेवानिवृत्ति की उम्र के करीब पहुंच रहा हो, जैसा कि इस मामले में भी हुआ है। अतः, हाईकोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस से यह अनुरोध किया जाता है कि वे ऐसे लंबे समय से लंबित मामलों की संख्या का पता लगाएं और उन्हें विभिन्न पीठों (Benches) के बीच वितरित करके शीघ्रता से निपटाने का प्रयास करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इन मामलों पर अपेक्षाकृत कम समय-सीमा के भीतर सुनवाई हो और उनका निपटारा किया जा सके।"

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए सरकारी कर्मचारी को उसके वैध सेवा लाभ प्रदान करने में हुई लगभग तीन दशक की देरी पर "गहरी पीड़ा" व्यक्त की।

यह अपील राज्य सरकार के कर्मचारी द्वारा दायर की गई। इस कर्मचारी का चयन 1997 में हो गया, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उसकी नियुक्ति 2011 में जाकर की गई। इसके बावजूद, उसे उसकी पसंद के उत्तराखंड कैडर से बाहर ही रखा गया, जबकि भर्ती प्रक्रिया के दौरान उसने अपने बेटे की संज्ञानात्मक दिव्यांगता (Cognitive Disability) को देखते हुए विशेष रूप से उत्तराखंड कैडर को अपनी प्राथमिकता के रूप में इंगित किया।

Cause Title: RAJENDRA SINGH BORA VERSUS UNION OF INDIA & ORS.

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22/04/2026
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