Adv. Aakash sahu

Adv. Aakash sahu advocate for criminal case, civil case, family matter, claim case, Bail application and all legal se

बीमा पॉलिसी के लाभार्थी भी 'उपभोक्ता', भले ही वो पार्टी न होंः सुप्रीम कोर्टसुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बीमाधारक द्वारा ल...
27/09/2020

बीमा पॉलिसी के लाभार्थी भी 'उपभोक्ता', भले ही वो पार्टी न होंः सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बीमाधारक द्वारा ली गई बीमा पॉलिसी के लाभार्थी भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत 'उपभोक्ता' हैं, भले ही वे बीमा अनुबंध के पक्षकार न हों। इस मामले में, किसानों ने श्रीदेवी कोल्ड स्टोरेज नामक एक साझेदारी फर्म के तहत संचालित कोल्ड स्टोर में अपनी उपज का भंडारण किया था। कोल्ड स्टोरेज फर्म का बीमा यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के साथ किया गया था। राज्य और राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम ने बीमा कंपनी द्वारा कोल्ड स्टोर के दावे को निरस्त करने के खिलाफ किसानों द्वारा दायर शिकायतों के मामले में राहत दी थी।
बीमा कंपनी द्वारा दायर अपील में तर्क दिया गया था कि किसानों और बीमा कंपनी के बीच अनुबंध का कोई संबध नहीं है क्योंकि पॉलिसी कोल्ड स्टोरेज फर्म द्वारा ली गई थी, न कि किसानों द्वारा नहीं, इसलिए उन्हें 'उपभोक्ता' नहीं कहा जा सकता है अधिनियम की धारा 2 (डी) के तहत 'उपभोक्ता' की परिभाषा का उल्लेख करते हुए, जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा कि अधिनियम के तहत उपभोक्ता की परिभाषा बहुत व्यापक है और इसमें केवल वह व्यक्ति ही शामिल नहीं है, जो सेवा खरीदता है या सेवाओं का लाभ उठाता है, बल्‍कि इसमें ऐसे लाभार्थी भी शामिल होते हैं, जो उस व्यक्ति, जिसने सेवाएं खरीदी हैं या प्राप्त की हैं, के अलावा अन्य व्यक्ति हो सकते हैं।
कोर्ट ने कहा- "धारा 2 (डी) के तहत उपभोक्ता की परिभाषा 2 भागों दी गई में है। धारा 2 (1)(d) का उपखंड (i) ऐसे व्यक्ति से संबंधित है, जो किसी सामान को खरीदता है, साथ ही वह व्यक्ति भी शामिल है, जो सामान का उपयोगकर्ता है, जब तक कि उस व्यक्ति ने, जिसने सामान खरीदा है, उसने सामान के उपयोग की स्व‌ीकृति दी हुई है। इसलिए, भाग 1 में भी उपभोक्ता की परिभाषा न केवल वह व्यक्ति शामिल है, जिसने सामान खरीदा है, बल्कि वह व्यक्ति भी शामिल है, जो उपयोगकर्ता है, जब तक कि उसे उपयोग की अनुमति प्राप्त है। जहां तक ​​सेवाओं को किराए पर लेने या प्राप्त करने के संबंध में उपभोक्ता की परिभाषा का संबंध है, हमारे विचार में यह बहुत व्यापक है। अनुभाग के इस भाग में उपभोक्ता न केवल वह व्यक्ति है, जिसने सेवाओं को किराए पर लिया है या उसका लाभ लिया है, बल्कि ऐसी सेवाओं का कोई भी लाभार्थी भी शामिल है।
इसलिए, एक बीमाधारक वह व्यक्ति तो हो ही सकता है, जो बीमा कंपनी की सेवाओं को किराए पर लेता है या प्राप्त करता है, बल्‍कि कई अन्य व्यक्ति भी हो सकते हैं, जो सेवाओं के लाभार्थी हो सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि वे लाभार्थी बीमा के अनुबंध के पक्षकार हों।" बेंच ने माना कि 'उपभोक्ता' की परिभाषा में लाभार्थी भी शामिल हैं, जो बीमाधारक द्वारा लिए गए बीमा का लाभ ले सकते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम स्पष्ट रूप करता है कि बीमित व्यक्ति के अलावा अन्य सेवाओं का लाभार्थी अधिनियम के तहत एक उपभोक्ता है।
बीमा कंपनी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि बीमा पॉलिसी के तहत बीमा कंपनी कोल्ड स्टोर की क्षतिपूर्ति करने के लिए उत्तरदायी है और चूंकि किसान बीमा के लाभार्थी हैं, इसलिए वे देय राशि पाने के हकदार हैं।
केस का नाम: कैनरा बैंक बनाम यूनाइटेड इंस्योरेंश बीमा कंपनी लिमिटेड
केस नं : CIVIL APPEAL NO 1042 OF 2020
कोरम: जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस दीपक गुप्ता
अपीलकर्ता के लिए वकील: सीनियर एडवोकेट पीपी मल्होत्रा
प्रतिवादी के लिए वकील: सीनियर एडवोकेट डॉ राजीव धवन, गोपाल शंकरनारायणन, सजन पूवैय्या और ध्रुव मेहता
जजमेंट को पढ़ने / डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें

pdf_upload-369894.pdf

COVID-19 मृतकों को अनुच्छेद 21 और 25 के तहत धर्म अनुसार अंतिम संस्‍कार का अधिकार, कलकत्ता हाईकोर्ट ने जारी किए दिशानिर्द...
24/09/2020

COVID-19 मृतकों को अनुच्छेद 21 और 25 के तहत धर्म अनुसार अंतिम संस्‍कार का अधिकार, कलकत्ता हाईकोर्ट ने जारी किए दिशानिर्देश
यह कहते हुए कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 में उचित अंतिम संस्कार के अधिकार ‌को ढूंढ़ा जा सकता है, कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार को फैसला सुनाया कि COVID-19 पीड़ितों के परिजनों को मृतक व्यक्ति के अंतिम संस्कार की अनुमति दी जाए। उन्हें घातक वायरस, जिससे दुनिया भर में अनगिनत लोगों की जान चली गई, से संक्रमित होने के जोखिम को खत्म करने/ कम करने के लिए कुछ एहतियाती दिशानिर्देशों का पालन करना चाहिए। न्यायालय का दृढ़ मत था कि मृत व्यक्ति के पर‌िजनों द्वारा उसके अंतिम संस्‍कार का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है। चीफ जस्टिस थोट्टाथिल बी राधाकृष्णन और जस्टिस अरिजीत बनर्जी ने एक जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसमें निम्न मुद्दे उठाए गए थे-
i) COVID-19 पीड़‌ित व्यक्ति के अवशेष/ शवों का ‌निस्‍तारण प्रशासन द्वारा अनौपचा‌रिक और असम्‍माननीय ढंग से किया जा रहा है, यहां तक ​​कि मृतक के अवशेषों का सम्मान भी नहीं नहीं किया जा रहा है।
ii) COVID-19 के कारण अस्पतालों में भर्ती व्यक्तियों के परिजनों और दोस्तों या जिन व्यक्तियों को अन्य बीमारियों के उपचार के लिए अस्पतालों में भर्ती कराया गया था, मगर वहां COVID-19 के संपर्क में आ गए और उनकी मृत्यु हो गई, ऐसे व्यक्तियों के शवों को अंतिम बार देखने की अनुमति नहीं दी जा रही है या मृत व्यक्ति के अवशेषों को अंतिम सम्मान देने और अंतिम संस्कार करने क अनुमति नहीं दी जा रही है।
डिवीजन बेंच ने कहा कि इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है कि अनुच्छेद 21 में निहित जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ जीवन का अधिकार शामिल है, याचिकाकर्ता की प्रस्तुत‌‌ियों के साथ सहमत‌ि है कि गरिमा के साथ रहना न केवल एक जीवित व्यक्ति का अधिकार है, बल्‍कि मृत्यु के बाद भी यह अधिकार लागू होता है। बेंच ने कहा, "अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा और उचित व्यवहार का अधिकार न केवल जीवित व्यक्ति के लिए उपलब्ध है, बल्कि यह मृत्यु के बाद भी बना रहता है। मानव शरीर का निस्तारण, चाहे वह COVID-19 से मरा हो या नहीं, चाहे दफन किया जाए या जलाया जाए, सम्मान और निष्ठा के साथ किया जाना चाहिए।" बेंच ने सहमति व्यक्त की कि मृतक के निकट और प्रिय व्यक्तियों को मृतक के अवशेषों पर अंतिम रूप से देखने का अवसर दिया जाना चाहिए था। उन्हें दिवंगत आत्मा को अंतिम सम्मान और श्रद्धांजलि अर्पित करने का अध‌िकार दिया जाना चाहिए था।"
पीठ ने कहा कि परंपराएं और सांस्कृतिक पक्ष किसी व्यक्ति के मृत शरीर के अंतिम संस्कार में अंतर्निहित हैं, और उच‌ित अंतिम संस्कार के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 25 में भी ढूंढ़ा जा जा सकता है। पीठ का विचार था कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार मृत्यु व गरिमापूर्ण प्रक्रिया सहित मृत्यु तक फैला हुआ है। "हम मृतक के अवशेषों के गरिमापूर्ण निस्तारण को शामिल करने के लिए "मौत की गरिमामयी प्रक्रिया" वाक्यांश को विस्तार से व्याख्या करने के इच्छुक हैं। हम बिना हिचक मानते हैं कि मृतक के अवशेषों के साथ सम्मानपूर्ण बर्ताव किया जाना चाहिए और धर्म के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए है....।
दूसरा मुद्दा, अर्थात्, COVID-19 पीड़ितों के रिश्तेदारों और दोस्तों को मृतक का अंतिम संस्कार करने या अंतिम बार देखने की अनुमति नहीं है; और, उसकी अनुमति दी जानी चाहिए, के सबंध में पीठ ने उल्लेख किया कि सरकार की 6 जून, 2020 को जारी अधिसूचना के तहत मृतक के परिजनों को शव को देखने और उन्हें अंतिम सम्मान देने का अवसर द‌िए जाने की अनुमति दी गई है। पीठ ने कहा, "हमारे विचार में, परिवार के सदस्यों को मृतक का अंतिम संस्कार करने की अनुमति दी जानी चाहिए, भले ही मृतक COVID-19 से संक्रमित रहा हो।" पीठ ने विचार किया समान्यतः आस्तिक हो या नास्तिक, विवेक और स्वतंत्र पेशे की स्वतंत्रता और धर्म का अभ्यास संविधान के अनुच्छेद 25 के खंड (1) के तहत संरक्षित है। उस खण्ड में "धर्म" शब्द को किसी विशेष धर्म से जोड़ने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसे धार्मिक संज्ञा के रूप में समझा जाता है। यह विश्वास और अपने विवेक का विषय है, जो किसी व्यक्ति विशेष के लिए धर्म विस्तृत अर्थों में हो पेशे और अभ्यास को बढ़ावा दे सकता है। इस अवधारणा को ध्यान में रखते हुए, पीठ ने कहा कि इस बात को चित्रित करने की आवश्यकता है कि यह विभिन्न धार्मिक संप्रदायों की धार्मिक प्रथाएं नहीं हैं जो इस प्रकार के मामलों में मायने रखती हैं। यह उस व्यक्ति के साथ संपर्क का विषय है, जिसकी मृत्यु हो चुकी है और निकट संबंधियों के संबंध में है, जिनका कोई भी स्तर हो सकता है। मूल रूप से, माता-पिता और बच्चे, पति और पत्नी, दादा-दादी और पोते, आदि के बीच मानवीय संबंध किसी भी सामान्य सिद्धांत पर आधारित नहीं है। यह प्रत्येक व्यक्ति के विश्वास और विवेक की बात है। पीठ ने कहा, "हमारे देश में पारंपरिक विश्वास यह है कि दफन/ दाह से पहले जब तक अंतिम संस्कार नहीं किया जाता है, तब तक मृतक की आत्मा को शांति नहीं मिलती। यह विश्वास हमारे देश में गहरा है। इसका भावनात्मक और भावुक पहलू भी है।" पीठ ने कहा कि परिजनों को मृतक के अंतिम संस्कार के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए...। सार्वजनिक आदेश, नैतिकता और स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न पहलुओं और COVID-19 या कोमोर्बिडिटी के दुर्भाग्यपूर्ण पीड़ितों के प्रिय और निकटवर्ती की आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्‍थाप‌ित करते हुए पीठ ने ‌निम्नलिख‌ित दिशानिर्देश जारी करने का प्रस्ताव दिया- i) जब मृत शरीर के पोस्टमार्टम की आवश्यकता न हो तो अस्पताल की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद, मृतक को बिल्कुल करीबी परिजन, माता-पिता/जीवित पति या पत्नी / बच्चों सौंप दिया जाए। शरीर को एक बॉडी बैग में सुरक्षित रखा जाए, जिसका चेहरा पारदर्शी हो और जिसके बाहरी हिस्से को उचित रूप से सैनेटाइज़ किया गया हो ताकि शव को ले जाने वाले लोगों के लिए जोखिम को कम किया जा सके। ii) मृत शरीर को संभालने वाले लोग मानक सावधानी बरतेंगे, जैसे, सर्जिकल मास्क, दस्ताने, आदि यदि उपलब्ध हो और संभव हो, तो पीपीई का उपयोग किया जाना चाहिए। iii) शव को श्मशान / कब्रिस्तान पर ले जाने वाले वाहन को उपयुक्त रूप से सैनैटाइज़ किया जाएगा। iv) श्मशान / कब्रिस्तान के कर्मचारियों को यह समझाना चाहिए कि COVID-19 अतिरिक्त जोखिम पैदा नहीं करता है। वे मानक सावधानी बरतेंगे। v) बॉडी बैग के चेहरे के छोर को कर्मचारियों द्वारा अंतिम समय तक शव को देखने की अनुमति देने के लिए श्मशान / कब्रिस्तान में उतार दिया जा सकता है। इस समय, धार्मिक अनुष्ठानों, जैसे धार्मिक लिपियों को पढ़ना, पवित्र जल छिड़कना, अनाज की पेशकश और ऐसे अन्य अंतिम संस्कार, जिन्हें शरीर को छूने की आवश्यकता नहीं है, की अनुमति दी जानी चाहिए। vi) श्मशान / अंत्येष्टि के बाद परिवार के सदस्यों और श्मशान / कब्रिस्तान के कर्मचारियों को उचित रूप से खुद की सफाई करनी चाहिए। vii) सामाजिक दूरी बरतते हुए, श्मशान/ कब्रिस्तान पर भीड़ से बचा जाना चाहिए। viii) शव को संभालने वाले व्यक्ति अस्पतालों से सीधे श्मशान / कब्रिस्तान पर जाएंगे, जैसा कि मामला हो सकता है, और मृतक के घर सहित कहीं और नहीं जहां वह अंतिम निवास करता था। ix) यदि एक COVID-19 संक्रमित मृतक का शरीर लावारिस है, तो राज्य के खर्च से अंतिम संस्कार किया जा सकता है।
जजमेंट डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें

pdf_upload-381610.pdf

अगर कोई सदस्य सम्मिलित परिवार को छोड़कर अपना अलग परिवार बसाता है तो घरेलू हिंसा का अधिनियम लागू नहीं होगा : कर्नाटक हाईक...
23/09/2020

अगर कोई सदस्य सम्मिलित परिवार को छोड़कर अपना अलग परिवार बसाता है तो घरेलू हिंसा का अधिनियम लागू नहीं होगा : कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने माना है कि अगर परिवार की कोई सदस्य साझा घर छोड़कर अपना घर बसाती है तो वह घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत मामला दायर नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति बीए पाटिल की पीठ ने एक मां और बेटे की याचिका स्वीकार कर लिया जिसमें निचली अदालत के फ़ैसले को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा, "हमारी राय में प्रतिवादी ने ऐसा कोई आधार नहीं बताया है कि उसे घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कोई राहत दी जाए। मैंने निचली अदालत के आदेश और फ़ैसले पर ग़ौर किया है। दोनों न्यायालय उक्त तथ्यों पर ग़ौर किए बिना गलत निष्कर्ष पर पहुंचे हैं और इस याचिका को सुनवाई कि लिए स्वीकार कर लिया।"
यह है मामला : मां एनएस लीलावती और उसके बेटे आर शिव प्रताप ने डॉक्टर आर शिल्पा ब्रुंडा जिसका नाम आयशा ज़ुबैर भी है, की याचिका पर दिए गए फ़ैसले को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि अक्टूबर, 2018 के पहले सप्ताह में प्रतिवादी याचिकाकर्ताओं के घर आई और संपत्ति उसे दे देने की मांग की। जब उसकी मांग को अस्वीकार कर दिया गया तो उसने झगड़ा किया और यहां तक कि अपने माता-पिता और भाई को चोट पहुंचाने की हद तक चली गई। इस संबंध में एक शिकायत भी दर्ज कराई गई थी।
प्रतिवाद के रूप में, प्रतिवादी ने भी याचिकाकर्ता और दूसरे याचिकाकर्ता की पत्नी के खिलाफ क्षेत्राधिकार पुलिस के समक्ष शिकायत दर्ज की। प्रतिवादी ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत शिकायत दर्ज कराई। याचिकाकर्ताओं ने इस शिकायत को चुनौती दी। दलील का मुख्य आधार यह था कि शिकायतकर्ता घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 2 (ए) के तहत उत्पीड़ित नहीं है। घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत इस याचिका को स्वीकार नहीं किया जा सकता। चूंकि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 2 (एफ) के तहत घरेलू संबंध होना ज़रूरी है। फिर, प्रतिवादी-शिकायतकर्ता एक साझा घर में नहीं रहते हैं। यदि इन सभी परिभाषाओं को मामले के तथ्यात्मक मैट्रिक्स के संदर्भ में एक साथ पढ़ा जाता है तो घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत किसी भी शिकायत पर विचार नहीं किया जा सकता है।
प्रतिवादी की 2002 में शादी हुई और उसके बाद उसने पहले पति को तलाक दे दिया और एक ऐसे व्यक्ति से शादी कर ली जो उसके धर्म से नहीं है और उसके बाद वह दुबई में स्थायी रूप से रह रही है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि प्रतिवादी बेटी के साझा घर से बाहर जाने और पति के साथ अपना घर स्थापित करने के बाद उसके घरेलू संबंध समाप्त हो जाते हैं। प्रतिवादी ने तर्क दिया कि "जब सभी पक्षकार एक संयुक्त परिवार में रहते हैं, तो ऐसी परिस्थितियों में, प्रतिवादी के टाइटल के बावजूद सीमित व्याख्या नहीं की जा सकती बनाया जा सकता है, घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 19 ( 1) (ए) के तहत एक सुरक्षा आदेश दिया जा सकता है।
यदि कोई महिला घरेलू संबंध में है और किसी समय साझा परिवार में एक साथ रही है, तो एक संयुक्त परिवार में सामगोत्रीय होने, शादी या संयुक्त परिवार में रिश्तेदारी के कारण रही है और उस स्थिति में अगर कोई घरेलू हिंसा हुई है तब कोर्ट राहत दे सकता है। कोर्ट ने कहा, "अगर एक पीड़ित व्यक्ति एक साझा घर में याचिकाकर्ताओं के साथ रहा है, तो एक पीड़ित व्यक्ति के घरेलू संबंध बन सकते हैं, लेकिन यह संबंध याचिका दायर करने से तुरंत पहले या किसी भी समय का हो सकता है। समस्या "किसी भी समय" वाक्यांश के अर्थ के साथ उत्पन्न होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि अतीत में किसी भी समय एक साथ रहने से कोई व्यक्ति घरेलू रिश्ते का दावा कर पीड़ित होने का अधिकार कर लेगा। 'किसी भी समय' यह इंगित करता है कि पीड़ित व्यक्ति साझा घर में लगातार साधिकार रह रहा था, लेकिन अगर किसी कारण से पीड़ित महिला को अस्थायी रूप से घर छोड़ना पड़ता है और जब वह वापस लौटती है तो उसे उस घर में उसके अधिकार के ख़िलाफ़ रहने नहीं दिया जाता है। अगर परिवार का कोई सदस्य साझा घर छोड़कर अपना अलग घर बसाता या बसाती है तो उस स्थिति में वह डीवी अधिनियम की धारा 12 के तहत एक आवेदन दायर नहीं कर सकता/सकती है।" अदालत ने आगे कहा कि "…यह एक ऐसा विशिष्ट मामला है कि उक्त संपत्ति प्रथम याचिकाकर्ता की दादी श्रीमती शविथम्मा अनन्य संपत्ति है और दूसरे याचिकाकर्ता को यह पंजीकृत उपहार के रूप द्वारा दूसरे याचिकाकर्ता को उपहार में दी गई है।" उपहार विलेख। ऐसी परिस्थितियों में, उक्त संपत्ति न तो संयुक्त परिवार की संपत्ति है और न ही श्रीमती शविथम्मा के पति की। फिर ऐसी परिस्थितियों में भी प्रतिवादी साझा घराने का हकदार नहीं है और वह डीवी अधिनियम की धारा 12 के तहत आवेदन दायर नहीं कर सकती है।" याचिकाकर्ताओं की पैरवी एडवोकेट राजशेखर एस ने की जबकि प्रतिवादी की ओर से एडवोकेट मोहम्मद ताहिर ने दलील पेश की।
आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहांं क्लिक करेंं

pdf_upload-368165.pdf

आरोपी और पीड़ित के बीच हुए समझौते के आधार पर बलात्कार केस को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के मा...
21/09/2020

आरोपी और पीड़ित के बीच हुए समझौते के आधार पर बलात्कार केस को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया
सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के मामले में संबंधित पक्षों को पूर्ण न्याय देने के लिए आरोपी और पीड़ित के बीच हुए समझौता के आधार पर बलात्कार का केस खारिज कर दिया। केरल हाईकोर्ट ने साजू पीआर के खिलाफ यह देखते हुए मामला खारिज करने से इनकार कर दिया था कि अदालत सहमति पर आईपीसी की धारा 376 के तहत दंडनीय अपराध के लिए कार्यवाही रद्द नहीं कर सकती। शीर्ष अदालत के समक्ष दायर अपील में सुप्रीम कोर्ट ने मामले के अजीबोगरीब तथ्यों पर ध्यान देते हुए शिकायतकर्ता और रिकॉर्ड पर अन्य सामग्रियों को और हलफनामा देखते हुए कहा, "हमारी राय में अपीलकर्ता ने खुद के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने का जो दावा किया है, वह मामले के संबंधित पक्षों को पूर्ण न्याय देने के लिए स्वीकार करने योग्य लगता है।" अपील की अनुमति देते हुए, पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को पलट दिया। बलात्कार के मामलों को समाप्त करना हालांकि मध्य प्रदेश राज्य बनाम वी मदन लाल के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह कहा गया था कि बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के मामले में किसी भी परिस्थिति में समझौता करने की अवधारणा के बारे में नहीं सोचा जा सकता। कुछ उच्च न्यायालयों ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग किया है। बलात्कार के मामलों में विशेष रूप से उन मामलों में जहां पीड़िता और आरोपी विवाह कर लेते हैं उदाहरण के लिए फ्रेडी @ एंटनी फ्रांसिस एंड अदर्स बनाम केरल राज्य में जहां आरोपियों ने शिकायतकर्ता से शादी की थी और उन्होंने अपने बेहतर भविष्य के को सुनिश्चित करने के लिए सभी विवादों को सुलझाया और शिकायतकर्ता / पीड़ित के कल्याण के प्रमुख उद्देश्य के लिए फैसला लिया। केरल उच्च न्यायालय ने माना कि दंड प्रक्रिया संहिता ‌(CrPC) की धारा 482 के तहत अतिरिक्त साधारण निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट मामलों में पक्षकारों के बीच समझौता के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर सकता है, जहां अभियुक्त ने शिकायतकर्ता से शादी की है और शिकायतकर्ता ने आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने पर ज़ोर दिया है। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को भी रद्द कर दिया था, जिसने बाद में 'पीड़िता' से शादी की थी। हाईकोर्ट ने यह देखा कि पार्टियों के बीच विवाह के समझौते के मद्देनजर मामले में दोषी ठहराए जाने की संभावना बहुत कम है। मद्रास उच्च न्यायालय के एक आदेश ( बाद में इसे शीर्ष अदालत के फैसले के अनुसार देखा गया) जिसमें बलात्कार के एक मामले में मध्यस्थता का सुझाव दिया गया था, जिसने पूरे देश में भारी आक्रोश पैदा किया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक आवेदन को खारिज कर दिया, जिसमें बलात्कार के एक मामले को समाप्त करने के लिए आईपीसी की धारा 376 के तहत मामला दर्ज किया गया था, जिसमें पीड़ित और अभियुक्त के बीच एक समझौता हुआ था।
आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहांं क्लिक करेंं

pdf_upload-367326.pdf

17/09/2020

अगर क़रार पर उचित स्टाम्प शुल्क नहीं चुकाया गया है तो उस पर अदालत कार्रवाई नहीं कर सकती : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी क़रार में मध्यस्थता क्लाज़ पर उचित स्टाम्प का होना अनिवार्य है और अगर ऐसा नहीं है तो अदालत उस पर कार्रवाई नहीं कर सकती। वर्तमान मामले में क़रार से जुड़े एक पक्ष ने मध्यस्थता अधिनियम की धारा 11(6) के तहत कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष एक याचिका दायर की। दूसरे पक्ष ने इसका प्रतिवाद यह कहते हुए किया लीज़ का जो क़रार तैयार किया गया है। वह उपयुक्त स्टाम्प वाले कागज पर नहीं है और कर्नाटक स्टाम्प अधिनियम, 1957 की धारा 33 के तहत इस प्रतिबंध लगा देना चाहिए और अगर उचित शुल्क और दंड का भुगतान नहीं किया गया है तो इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। हालांकि हाईकोर्ट ने अधिनियम की धारा 11(6) के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए पक्षकारों के बीच विवाद को हल करने के लिए मध्यस्थ की नियुक्ति कर दी। मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्य कांत की पीठ ने कहा कि लीज़ क़रार को न तो पंजीकृत किया गया है और न ही उस पर कर्नाटक स्टाम्प अधिनियम, 1957 के तहत उचित स्टाम्प लगा है। पीठ ने एसएमएस टी इस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम चांदमारी टी कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के फैसले का हवाला देते हुए कहा, "जब कोई लीज़ क़रार या कोई और इंस्ट्रूमेंट को मध्यस्थता क़रार के रूप में स्वीकार किया जाता है तो अदालत को सबसे पहले यह देखना होता है कि इस पर उपयुक्त स्टाम्प लगा है कि नहीं। यह पाया गया है कि अगर इस बारे में कोई आपत्ति नहीं की जाती है, तो भी यह अदालत का कर्तव्य है कि वह इस मामले पर ग़ौर करे। यह भी कहा गया कि अगर अदालत यह कहती है कि क़रार पर उचित स्टाम्प नहीं लगा है तो इस पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए और स्टाम्प अधिनियम, 1899 की धारा 38 के तहत इस पर कार्रवाई होनी चाहिए। यह कहा गया कि अदालत इस तरह के दस्तावेज़ या इसमें मध्यस्थता के क्लाज़ पर ग़ौर नहीं कर सकता। हालांकि, अगर शेष स्टाम्प की राशि और इस पर लगाने वाले जुर्माने की राशि स्टाम्प अधिनियम, 1899 की धारा 35और 40 के तहत चुका दी जाती है, तो इस दस्तावेज़ पर ग़ौर किया जा सकता है। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि अदालत जिस प्रावधान पर ग़ौर नहीं कर पायी है वह कर्नाटक स्टांप अधिनियम की धारा 33 और 34 के अनुरूप है। धारा 11 के तहत आवेदन को अस्वीकार करते हुए पीठ ने कहा, "…दस्तावेज़ पर उचित स्टाम्प नहीं लगा था और यद्यपि रजिस्टर (न्यायिक) ने प्रतिवादी नम्बर 1 और 2 को कहा था कि वह स्टांप शुल्क और इस पर ₹1,01,56,388/­ का जुर्माना चुकाए, पर प्रतिवादियों ने ऐसा नहीं किया और उक्त लीज़ क़रार पर विश्वास करके हाईकोर्ट ने ग़लती की है
Read full order click on instagram link
https://t.me/legalhelpbhopal/60

वयस्क अविवाहित बेटी, यदि किसी शारीरिक या मानसिक असमानता से पीड़ित नहीं है, तो धारा 125 सीआरपीसी के तहत पिता से भरण-पोषण ...
17/09/2020

वयस्क अविवाहित बेटी, यदि किसी शारीरिक या मानसिक असमानता से पीड़ित नहीं है, तो धारा 125 सीआरपीसी के तहत पिता से भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि वयस्क हो चुकी अव‌िवाहित बेटी, यदि वह किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता/चोट से पीड़ित नहीं है तो धारा 125 सीआरपीसी की कार्यवाही के तहत, अपने पिता से भरण-पोषण का दावा करने की हकदार नहीं है। तीन जजों की बेंच, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस अशोक भूषण ने की, ने कहा कि हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20 (3) पर भरोसा करें तो एक अविवाहित हिंदू बेटी अपने पिता से भरण-पोषण का दावा कर सकती है, बशर्ते कि वह यह साबित करे कि वह अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, जिस अधिकार के लिए उसका आवेदन/ वाद अधिनियम की धारा 20 के तहत होना चाहिए। बेंच में शामिल अन्य जज जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और एमआर शाह थे। बेंच ने कहा, विधायिका ने कभी भी धारा 125 सीआरपीसी के तहत क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने स्थिति में मजिस्ट्रेट पर जिम्‍मेदारी डालने का विचार नहीं किया कि वह हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत विचार किए गए दावों का निर्धारण किया। इस मामले में अपीलकर्ता की दलील यह थी कि हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20 के अनुसार, एक व्यक्ति का दायित्व है कि वह अपनी अव‌िवाहित बेटी का, जब तक कि वह विवाहित नहीं हो जाती, भरण-पोषण करे। अपीलकर्ता, जब नाबालिग थी, उसने धारा 125 सीआरपीसी के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, रेवाड़ी के समक्ष एक आवेदन दायर किया था। मजिस्ट्रेट ने अपीलकर्ता का दावा यह कहकर निस्तारित कर दिया कि जब तक वह वयस्क नहीं हो जाती भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती। हाईकोर्ट ने भी आदेश को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने इस मुद्दे पर विचार किया कि क्या एक हिंदू अविवाहित बेटी पिता से धारा 125 सीआरपीसी के तहत, केवल तब भरण-पोषण का दावा करने की हकदार है, जब तक वह वयस्‍क नहीं हो जाती या वह अविवाहित रहने तक भरण-पोषण का दावा कर सकती है? अपीलार्थी का तर्क यह था कि, भले ही वह अधिनियम, 1956 की धारा 20 की बिनाह पर किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या चोट से पीड़ित नहीं है, जब तक वह व‌िवाहित नहीं हो जाती है, भरण-पोषण का दावा करने की हकदार है। अपीलकर्ता ने जगदीश जुगतावत बनाम मंजू लता (2002) 5 एससीसी 422 के फैसले पर भरोसा किया। अदालत ने माना कि जगदीश जुगतावत (सुप्रा) के फैसले को धारा 125 सीआरपीसी के तहत पिता के खिलाफ बेटी द्वारा दायर कार्यवाही में अनुपात निर्धारित करने के लिए नहीं पढ़ा जा सकता है कि अधिनियम, 1956 की धारा 20 (3) के तहत पिता पर अव‌िवाहित बेटी के भरण-पोषण का दायित्व है और उसी के अनुसार बेटी भरण-पोषण की हकदार है। अधिनियम की धारा 20 (3) का संदर्भ देते हुए, बेंच ने कहा, "हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20 (3) बच्चों और वृद्ध माता-पिता के भरण-पोषण के संदर्भ में हिंदू कानून के सिद्धांतों की मान्यता है। धारा 20 (3) एक हिंदू के वैधानिक दायित्व का निर्धारण करती है कि वह अपनी अव‌िवाहित बेटी का, जो अपनी कमाई से या अन्य संपत्त‌ि से अपना भरण-पोषण करने में अक्षम है, का भरण-पोषण करे। हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20 यह निर्धारित करती है कि एक हिंदू का यह वैधानिक दाय‌ित्व है कि वह अपनी अव‌िवाहित बेटी का, जो अपनी कमाई से यह अन्य संपत्त‌ि से अपना भरण-पोषण करने में अक्षम है, का भरण-पोषण करे। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, अधिनियम 1956 को लागू करने से पहले हिंदू कानून में अविवाहित बेटी, जो अपना भरण-पोषण करने में अक्षम है, के भरण-पोषण का दायित्व एक हिंदू पर रहा है। अविवाहित बेटी के भरण-पोषण का पिता पर डाला गया दायित्व, बेटी द्वारा पिता पर लागू कराया जा सकता है, यदि वह धारा 20 के तहत खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ है। अधिनियम, 1956 की धारा 20 के प्रावधान के तहत एक हिंदू पर अपनी अविवाहित बेटी के भरण-पोषण, जो कि खुद का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है, का स्पष्ट वैधानिक दायित्व डाला है। धारा 20 के तहत पिता से भरण-पोषण का दावा करने का अविवाहित बेटी का अधिकार, यदि वह अपने भरण-पोषण में सक्षम नहीं है, निरपेक्ष है, और धारा 20 के तहत अविवाहित बेटी को दिया गया अधिकार व्यक्तिगत कानून के तहत दिया गया है, जिसे वह अपने अपने पिता के खिलाफ बखूबी लागू कर सकती है। जगदीश जुगतावत (सुप्रा) में इस अदालत के फैसले ने अधिनियम की धारा 20 (3), 1956 के तहत एक नाबालिग लड़की के अधिकार को मान्यता दी कि वह अपने पिता से, वयस्क होने के बाद ‌विवाहित होने तक तक, भरण-पोषण का दावा कर सकती है। अविवाहित बेटी स्पष्ट रूप से अपने पिता से भरण-पोषण की हकदार है, जब तक कि वह विवाहित न हो जाए, भले ही वह वयस्क हो गई हो, जो कि धारा 20 (3) द्वारा मान्यता प्राप्त वैधानिक अधिकार ह ै और कानून के अनुसार अविवाहित बेटी द्वारा लागू कराया जा सकता है।" पीठ ने नूर सबा खातून बनाम मोहम्मद क़ासिम, (1996) 6 एससीसी 233 को भी संदर्भित किया और देखा कि लाभकारी कानून का प्रभाव जैसे धारा 125 सीआरपीसी को किसी कानून के स्पष्ट प्रावधानों के अलावा, पराजित होने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह देखा कि जहां फेमिली कोर्ट को धारा 125 सीआरपीसी के तहत मामला तय करने का अधिकार क्षेत्र है, साथ ही अधिनियम, 1956 की धारा 20 के तहत मुकदमा तय करने का अधिकार क्षेत्र है, दोनों अधिनियमों के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर सकता है और एक उपयुक्त मामले में अविवाहित बेटी को भरण-पोषण प्रदान कर सकता है, भले ही वह वयस्क हो चुकी हो, अधिनियम की धारा 20 के तहत अपनी अधिकार लागू कर रही हो, ताकि कार्यवाही की बहुलता से बचें। लेकिन इस तथ्य पर ध्यान देते हुए कि धारा 125 सीआरपीसी को लागू करने मजिस्ट्रेट के समक्ष तत्काल आवेदन दायर किया गया था, अदालत ने कहा, धारा 125 सीआरपीसी का उद्देश्य और आशय, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, एक सारांश कार्यवाही में आवेदक को तत्काल राहत प्रदान करना है, जबकि धारा 20 के तहत, अधिनियम, 1956, धारा 3 (बी) के साथ पढ़ें, बड़ा अधिकार शामिल है, जिसे सिविल कोर्ट द्वारा निर्धारित करने की आवश्यकता है, इसलिए बड़े दावों के लिए, जैसा कि धारा 20 के तहत सुनिश्‍चित किया गया है, अधिनियम की धारा 20 के तहत कार्यवाही शुरू करने की आवश्यकता है और विधायिका ने धारा 125 सीआरपीसी के तहत क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए मजिस्ट्रेट पर जिम्‍मेदारी डालने के लिए कभी विचार नहीं किया। अपील को खारिज करते हुए, पीठ ने अपीलकर्ता को पिता के खिलाफ किसी भी भरण-पोषण का दावा करने के लिए अधिनियम की धारा 20 (3) का सहारा लेने की स्वतंत्रता दी। केस का नाम: अभिलाषा बनाम प्रकाश केस नं: CRIMINAL APPEAL NO 615 of । 2020। कोरम: जस्टिस अशोक भूषण, आर। सुभाष रेड्डी और एमआर शाह
जजमेंट पढ़ने / डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें

pdf_upload-381524.pdf

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हस्ताक्षर की गई कार्बन कॉपी जो मूल दस्तावेज़ की तरह उसी प्रक्रिया से बनाई गई है, उसे भारतीय सा...
13/07/2020

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हस्ताक्षर की गई कार्बन कॉपी जो मूल दस्तावेज़ की तरह उसी प्रक्रिया से बनाई गई है, उसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 62 के अनुसार मूल दस्तावेज की तरह साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य किया जाएगा। इस आधार पर न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और अनिरुद्ध बोस की पीठ ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक फैसले को पलट दिया, जिसमें हस्ताक्षरित कार्बन कॉपी को मूल दस्तावेज के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया गया था।
इस मामले पर नए सिरे से विचार करने के लिए हाईकोर्ट को भेजते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "हाईकोर्ट की यह धारणा बिलकुल गलत है और साक्ष्य अधिनियम की धारा 62 के प्रावधान के खिलाफ है। यह कार्बन कॉपी मूल दस्तावेज के रूप में उसी प्रक्रिया से तैयार की गई थी और एक बार दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के बाद, इसे मूल दस्तावेज़ की तरह मान लिया जाना चाहिए।" साक्ष्य का सामान्य नियम यह है कि दस्तावेज को स्वयं को साबित करने के लिए परीक्षण में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। धारा 62 के अनुसार, प्राथमिक साक्ष्य का मतलब है कि न्यायालय के निरीक्षण के लिए दस्तावेज खुद प्रस्तुत है।
साक्ष्य अधिनियम की धारा 62 में दिए गए स्पष्टीकरण 2 में कहा गया है: "जहां सभी दस्तावेजों को एक समान प्रक्रिया द्वारा बनाया गया है, जैसे कि मुद्रण, लिथोग्राफी, या फोटोग्राफी के मामले में, प्रत्येक अन्य शेष की सामग्री का प्राथमिक प्रमाण है, लेकिन, जहां वे सभी एक ही मूल दस्तावेज़ की प्रतियां हैं, वे मूल दस्तावेज़ की सामग्री का प्राथमिक प्रमाण नहीं हैं। " इस मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने धारा 62 के स्पष्टीकरण 2 पर भरोसा किया। चूंकि कार्बन कॉपी मूल दस्तावेज के रूप में एक ही प्रक्रिया में तैयार की गई थी और पार्टियों द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे, इसलिए अदालत ने माना कि इसे प्राथमिक सबूत के रूप में माना जा सकता है।
Read and download full judgement here on telegram..
Click here on telegram link for full judgement..

pdf_upload-366018.pdf

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि सभी स्कूल, चाहे वे लॉकडाउन अवधि के दौरान ऑनलाइन कक्षाओं की पेशकश करे...
03/07/2020

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि सभी स्कूल, चाहे वे लॉकडाउन अवधि के दौरान ऑनलाइन कक्षाओं की पेशकश करें या नहीं, ट्यूशन शुल्क लेने के हकदार हैं। न्यायमूर्ति निर्मलजीत कौर की एकल पीठ ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए: (क) स्कूलों को अपना प्रवेश शुल्क लेने की अनुमति है, इसलिए, चूंकि COVID-19 लॉकडाउन अब हटा दिया गया है (पहले महामारी सुधार के एक महीने बाद प्रवेश शुल्क का भुगतान करने की तिथि सरकार द्वारा स्थगित कर दी गई थी। " सभी भ्रमों को दूर करने के लिए स्कूलों को अब अपने प्रवेश शुल्क को वसूलने की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि लॉकडाउन स्टैंड 08.06.2020 पर काफी हद तक उठा लिया गया।") (ख) सभी विद्यालय, चाहे उन्होंने लॉकडाउन अवधि के दौरान ऑनलाइन कक्षाओं की पेशकश की हो या नहीं, ट्यूशन शुल्क लेने के हकदार हैं। (ग) प्रत्येक स्कूल का स्कूल प्रबंधन वार्षिक शुल्क के तहत किए गए अपने वास्तविक व्यय को स्कूल के बंद रहने की अवधि तक पूरा करेगा और उनके द्वारा वास्तविक परिवहन शुल्क और वास्तविक भवन शुल्क सहित केवल ऐसे वास्तविक व्यय की वसूली करेगा लेकिन इस अवधि के लिए किसी भी गतिविधि या सुविधा के लिए कोई शुल्क नहीं वसूल करेगा, जिसके लिए कोई खर्च नहीं किया गया। हालांकि, शेष अवधि के लिए वार्षिक शुल्क स्कूल द्वारा पहले से तय किए गए शुल्क के अनुसार वसूल किया जाएगा। (घ) वर्ष 2020-21 के लिए शुल्क बढ़ाने से और 2019 -20 के समान शुल्क संरचना को अपनाने से स्कूल उपरोक्त कारणों से खुद को रोकेंगे। (ण) कोई भी अभिभावक उपरोक्त शर्तों में स्कूल शुल्क का भुगतान करने में सक्षम नहीं है, वे अपने आवेदन को अपनी वित्तीय स्थिति के बारे में आवश्यक प्रमाण के साथ दाखिल कर सकते हैं, जिस पर स्कूल-प्राधिकरण द्वारा ध्यान दिया जाएगा और, इसे सहानुभूतिपूर्वक देखने के बाद, रियायत या संपूर्ण शुल्क छूट दें, जैसा भी मामला हो। यदि माता-पिता अभी भी दुखी हैं, तो वे नियामक निकाय से संपर्क कर सकते हैं, इसलिए पंजाब के गैर सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थान अधिनियम, 2016 की धारा 7 के तहत शुल्क का विनियमन कोई भी माता-पिता गलत दावा नहीं करके रियायत का दुरुपयोग नहीं करेंगे। (च) गैर-सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थान अधिनियम, 2016 के पंजाब विनियमन की धारा 7 (f),पहले से ही अभिभावकों की शिकायतों को देखने के लिए है, जो किसी भी अत्यधिक शुल्क या वित्तीय लाभ या लाभ देने के उद्देश्य की अन्य गतिविधि के संबंध में है। माता-पिता इसी के तहत सहारा लेने के लिए स्वतंत्र हैं और इसलिए, इस अदालत द्वारा अलग से कोई विशेष दिशा देने की आवश्यकता नहीं है। (छ) यदि किसी स्कूल को वर्ष 2020-21 के लिए बढ़ी हुई फीस का भुगतान नहीं करने पर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है, तो वह जिला शिक्षा अधिकारी के समक्ष अपना प्रतिनिधित्व प्रस्तुत कर सकता है, जो इस पर गौर करेगा और इस तरह के एक आवेदन की प्राप्ति के तीन सप्ताह के भीतर उचित आदेश पारित करेगा। हालांकि, यह केवल एक बहुत ही कठिन मामले में प्रयोग किया जा सकता है जहां स्कूल वित्तीय संकट का सामना कर रहा है और खर्चों को पूरा करने के लिए कोई आरक्षित संसाधन नहीं है। (ज) वर्ष 2020-21 में स्कूल की फीस में कोई वृद्धि करने के खिलाफ स्कूलों को सलाह देने वाले 14 मई के निर्देश; स्कूल के रोल से छात्रों के नाम को हटाने और उन्हें ऑनलाइन क्लास से रोकने के लिए नहीं है, भले ही उनके माता-पिता अपनी नौकरियों के नुकसान के कारण आनुपातिक ट्यूशन शुल्क का भुगतान करने की स्थिति में न हों; और किसी भी शिक्षक को हटाने या मासिक वेतन में कमी या शिक्षण / गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए भी नहीं है। (i) 14 मई के आदेश की दिशा में भी कोई संशोधन नहीं किया गया है कि कोई भी बच्चा स्कूलों और ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेने से वंचित नहीं रहेगा। अदालत फीस के चार्ज पर अंकुश लगाते हुए निदेशक, स्कूल शिक्षा द्वारा 14 मई को जारी अधिसूचना को चुनौती देते हुए बिना सहायता प्राप्त निजी स्कूलों और स्कूली छात्रों के अभिभावकों के संघों द्वारा दायर याचिकाओं के एक समूह पर विचार कर रही थी। स्कूली शिक्षा, निदेशक ने निर्देशित किया था: क) निजी अनएडेड एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस द्वारा फीस की पूर्ण छूट जो लॉकडाउन अवधि के दौरान ऑनलाइन कक्षाएं आयोजित नहीं कर रहे हैं; (ख) ऑनलाइन कक्षाएं देने वाले स्कूल लॉकडाउन अवधि के लिए केवल ट्यूशन शुल्क ले सकते हैं; (ग) स्कूलों को भवन शुल्क, परिवहन शुल्क, भोजन शुल्क वसूलने से रोक दिया गया, जिससे अभिभावकों पर ऐसी किसी भी सुविधा का बोझ नहीं पड़े। याचिकाकर्ताओं की दलीलों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रतिबंध मनमाने थे, "यह विवादित नहीं है कि अगर स्कूल ऑनलाइन शिक्षा प्रदान नहीं करते हैं, तो भी स्कूलों को खर्च पूरे करने हैं, अर्थात शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के पूर्ण वेतन के साथ-साथ भवन, बिजली के खर्च आदि। वे स्कूल जो ऑनलाइन क्लास नहीं ले रहे हैं उन्हें अपने शैक्षणिक स्टाफ के वेतन का भुगतान करने से छूट नहीं दी जा सकती। यह निष्कर्ष निकालते हुए कि इस तरह का वर्गीकरण तर्कसंगत नहीं है, खासकर जब सभी निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूल के दायित्वों और बुनियादी खर्च बने रहते हैं भले ही वे ऑनलाइन कक्षाओं का संचालन कर रहे हैं या नहीं। इन परिस्थितियों में, उन स्कूलों के लिए एक अलग दिशा निर्देश जारी नहीं हो सकते जो ऑनलाइन कक्षाएं नहीं दे रहे हैं। पीठ ने कहा कि गैर सहायता प्राप्त संस्थान जो ऑनलाइन कक्षाएं नहीं दे रहे हैं, उन्हें ऐसे दिशा-निर्देश देना कि संबंधित अवधि के लिए ट्यूशन शुल्क नहीं लिया जाए, भेदभावपूर्ण और मनमाना होगा। बेंच ने कहा, "माता-पिता की शिकायत है कि उन्हें उन सेवाओं के भुगतान के लिए नहीं कहा जाना चाहिए, जो उन्होंने प्राप्त ही नहीं की, खासकर जब या तो कुछ स्कूलों ने ऑनलाइन सेवाओं की पेशकश नहीं की या क्योंकि वे दूरस्थ क्षेत्रों में रहते हैं, जहां ऑनलाइन सुविधा उपलब्ध नहीं है, हो सकता है एक उचित शिकायत हो, लेकिन उक्त शिकायत करते समय, माता-पिता इस तथ्य को भूल गए हैं, जैसा कि पहले ही ऊपर उल्लेख किया गया है, कि इस लॉकडाउन अवधि के दौरान कर्मचारियों और शिक्षकों को लगातार वेतन का भुगतान करना पड़ता है।" निर्णय आगे बताता है कि इस अवधि के दौरान बुनियादी ढांचे को बनाए रखना होगा ताकि जब बच्चे स्कूलों में लौट आएं, तो योग्य और सक्षम शिक्षकों के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं के रूप में छात्रों को बुनियादी सुविधाएं बरकरार रहें। पीठ ने कहा, "स्कूलों को वित्तीय स्थिति और बुनियादी ढांचे की अपनी विभिन्न आवश्यकताओं को बनाए रखने और पूरा करने के लिए बुनियादी ट्यूशन फीस की आवश्यकता होती है, कहीं ऐसा न हो कि स्कूल बंद करने के लिए मजबूर हो जाएं जो न तो राज्य के हित में होगा, या अभिभावक या बच्चे के हित में। अन्यथा, इस न्यायालय को इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्कूल फिर से खुलने पर इस लॉकडाउन की अवधि के दौरान छात्रों की पढ़ाई के नुकसान का सामना करने का प्रयास करेंगे। एक ही वर्ग के बीच नियमों के दो सेट नहीं हो सकते।"
Read full judgement
Click on telegram link

Address

9630227770
Bhopal
630227

Telephone

09630227770

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Adv. Aakash sahu posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Practice

Send a message to Adv. Aakash sahu:

Share