Advocate jems

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04/11/2025

कोर्ट में बिचौलिए: न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा
✍️ न्यायालय का उद्देश्य है – “हर व्यक्ति को निष्पक्ष और समय पर न्याय मिले।” लेकिन अक्सर हम देखते हैं कि इस प्रक्रिया के बीच एक ऐसा वर्ग सक्रिय रहता है जो न तो वकील होता है, न पक्षकार — इन्हें आम भाषा में “बिचौलिए” कहा जाता है। ये वे लोग होते हैं जो न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करने, लाभ उठाने या दूसरों को भ्रमित करने का प्रयास करते हैं।
🧾 बिचौलियों की भूमिका और कार्यप्रणाली
1️⃣ अज्ञानता का फायदा उठाना: आम जनता को कोर्ट की प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती। बिचौलिए इसी का फायदा उठाकर लोगों से पैसे लेकर “काम कराने” का दावा करते हैं।
2️⃣ दस्तावेज़ों का गलत इस्तेमाल: कई बार ये लोग फर्जी दस्तावेज़, सिफ़ारिशें या झूठे बहाने बनाकर केस में दखल देते हैं।
3️⃣ अनुचित प्रभाव डालने की कोशिश: कुछ बिचौलिए पुलिस, वकील या कोर्ट स्टाफ से परिचय का हवाला देकर पक्षकारों से धन उगाही करते हैं।
4️⃣ विलंब और भ्रष्टाचार को बढ़ावा: बिचौलियों की वजह से न्यायिक प्रक्रिया लंबी हो जाती है और कई बार निर्दोष व्यक्ति परेशान होता है।
⚖️ कानूनी स्थिति और प्रावधान
भारत के दंड संहिता (IPC) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act, 1988) में ऐसे लोगों के खिलाफ कठोर प्रावधान हैं।
- जो व्यक्ति सरकारी पदाधिकारी के नाम पर अवैध लाभ प्राप्त करता है या धोखाधड़ी से पैसे लेता है, वह दंडनीय अपराध करता है।
- धारा 420 (धोखाधड़ी), 468 (फर्जी दस्तावेज़), 171B (भ्रष्ट आचरण) के तहत ऐसे व्यक्तियों पर मुकदमा चलाया जा सकता है।
🧠 जनता की जागरूकता ही समाधान
बिचौलियों से बचने का सबसे बड़ा उपाय है — जागरूकता।
- पक्षकारों को सीधे वकील या कोर्ट कार्यालय से संपर्क करना चाहिए।
- किसी भी व्यक्ति को “काम जल्दी कराने” या “अंदर से बात बनवाने” के झांसे में नहीं आना चाहिए।
- न्यायपालिका और प्रशासन को भी ऐसे तत्वों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए ताकि न्याय प्रणाली की साख बनी रहे।
📜 निष्कर्ष
कोर्ट में बिचौलिए न्याय व्यवस्था के लिए कैंसर की तरह हैं। जब तक जनता सतर्क नहीं होगी और प्रशासन इन पर सख्ती नहीं दिखाएगा, तब तक न्याय में देरी और भ्रष्टाचार की समस्या बनी रहेगी। इसलिए हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह बिचौलियों से दूर रहे, और कानून की सही प्रक्रिया पर भरोसा रखे।

✍️ एडवोकेट जेम्स, डी.बी.ए. बेगूसराय
(यह लेख केवल जन-जागरूकता हेतु है)

💻⚖️ साइबर क्राइम: डिजिटल युग का नया अपराध✍️ आज का युग डिजिटल क्रांति का है। इंटरनेट ने हमारी ज़िंदगी को आसान बना दिया है...
04/11/2025

💻⚖️ साइबर क्राइम: डिजिटल युग का नया अपराध
✍️ आज का युग डिजिटल क्रांति का है। इंटरनेट ने हमारी ज़िंदगी को आसान बना दिया है — बैंकिंग, खरीदारी, शिक्षा, न्याय, और शासन — सब कुछ अब ऑनलाइन हो गया है। लेकिन इसी डिजिटल सुविधा के साथ बढ़ा है एक नया खतरा — साइबर क्राइम। यह अपराध न तो बंदूक से होता है और न ही डकैती से, बल्कि यह अपराध आपके मोबाइल, लैपटॉप या ईमेल के ज़रिए चुपचाप हो जाता है।

🧠 साइबर क्राइम क्या है?
“साइबर क्राइम” वह अपराध है जो इंटरनेट या कंप्यूटर नेटवर्क के माध्यम से किया जाता है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की निजी जानकारी चुराना, ऑनलाइन धोखाधड़ी करना, किसी की छवि को नुकसान पहुँचाना, या आर्थिक हानि पहुँचाना होता है।

🔍 साइबर अपराध के प्रमुख प्रकार
1. फिशिंग (Phishing) – नकली ईमेल या वेबसाइट के ज़रिए पासवर्ड, बैंक डिटेल आदि चुराना।
2. हैकिंग (Hacking) – बिना अनुमति किसी के सिस्टम या अकाउंट में प्रवेश करना।
3. ऑनलाइन फ्रॉड – बैंकिंग, लॉटरी, इन्वेस्टमेंट या OTP धोखाधड़ी के ज़रिए पैसे ठगना।
4. साइबर बुलिंग और ट्रोलिंग – सोशल मीडिया पर धमकी या मानसिक उत्पीड़न करना।
5. रिवेंज पोर्न / मॉर्फिंग – किसी की तस्वीर का दुरुपयोग करके ब्लैकमेल करना।
6. आइडेंटिटी थेफ्ट (Identity Theft) – किसी की पहचान या डॉक्युमेंट का दुरुपयोग करना।
7. रैनसमवेयर अटैक – सिस्टम लॉक करके पैसे की मांग करना।

⚖️ साइबर क्राइम से संबंधित प्रमुख कानूनी प्रावधान
भारत में साइबर अपराधों से निपटने के लिए मुख्यतः “सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (Information Technology Act, 2000)” लागू है, जिसके अंतर्गत कुछ प्रमुख धाराएँ इस प्रकार हैं:
- धारा 43 – बिना अनुमति किसी कंप्यूटर या नेटवर्क को एक्सेस करने पर दंड।
- धारा 66 – कंप्यूटर हैकिंग और अनधिकृत एक्सेस पर सजा (3 वर्ष तक कारावास)।
- धारा 66C – पहचान की चोरी (Identity Theft) पर सजा।
- धारा 66D – ऑनलाइन धोखाधड़ी या फर्जीवाड़ा।
- धारा 67 – अश्लील सामग्री का ऑनलाइन प्रकाशन या प्रसारण।
- आईपीसी की धारा 420 – धोखाधड़ी से संबंधित अपराधों में भी लागू होती है।

⚔️ न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय
1. श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) – सुप्रीम कोर्ट ने IT Act की धारा 66A को असंवैधानिक ठहराया, क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती थी।
2. अमिताभ ठाकुर बनाम भारत संघ (2016) – अदालत ने कहा कि साइबर अपराध के मामलों में त्वरित जांच और डिजिटल सबूतों की सुरक्षा अनिवार्य है।
3. Google India Pvt. Ltd. बनाम विश्वभूषण हरिशंकर (2011) – यह मामला ऑनलाइन सामग्री की जिम्मेदारी पर महत्वपूर्ण फैसला है, जिसमें इंटरमीडियरी की जिम्मेदारी को सीमित किया गया।

🧩 साइबर अपराध से बचाव के उपाय
- अज्ञात लिंक या ईमेल पर क्लिक न करें।
- मजबूत पासवर्ड का उपयोग करें और समय-समय पर बदलें।
- अपने सोशल मीडिया अकाउंट को “टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन” से सुरक्षित करें।
- सार्वजनिक Wi-Fi पर बैंकिंग या संवेदनशील कार्य न करें।
- किसी भी ऑनलाइन धोखाधड़ी की तुरंत शिकायत करें।

📞 साइबर क्राइम की शिकायत कहाँ करें?
आप राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल (www.cybercrime.gov.in) पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते हैं या नजदीकी साइबर थाने में जाकर आवेदन दे सकते हैं। इसके अलावा डिजिटल सबूत (Screenshot, Message, Email, Bank Transaction) सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है।

🔔 निष्कर्ष
साइबर अपराध एक अदृश्य खतरा है जो किसी भी व्यक्ति या संस्था को कभी भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए “सावधानी ही सुरक्षा है” का सिद्धांत डिजिटल दुनिया में भी उतना ही जरूरी है। कानून आपके साथ है, बस ज़रूरत है जागरूक रहने की।

📜 एडवोकेट जेम्स, डी.बी.ए. बेगूसराय
📲7004362259

(केवल जन-जागरूकता हेतु लेख)

04/11/2025

भारत के शीर्ष 15 ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय (Landmark Judgements of Indian Courts)
✍️
भाग 1 (1950–1978): संविधान की नींव और मौलिक अधिकारों की व्याख्या
भारतीय न्यायपालिका ने अपने ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से संविधान की आत्मा को सदैव जीवित रखा है। नीचे दिए गए पाँच निर्णय (1950 से 1978 तक) भारतीय न्याय व्यवस्था के ऐसे मील के पत्थर हैं जिन्होंने देश की न्याय प्रणाली और मौलिक अधिकारों की दिशा निर्धारित की।

1️⃣ केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 – इस फैसले ने “मूल संरचना सिद्धांत” (Basic Structure Doctrine) स्थापित किया। न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान संशोधन कर सकती है, लेकिन उसकी मूल संरचना जैसे लोकतंत्र, न्यायिक समीक्षा, धर्मनिरपेक्षता और विधि का शासन नहीं बदल सकती।

2️⃣ मनेका गांधी बनाम भारत संघ, 1978 – इस केस ने अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” के अधिकार को व्यापक किया। न्यायालय ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या स्वतंत्रता से केवल न्यायसंगत, उचित और निष्पक्ष प्रक्रिया द्वारा ही वंचित किया जा सकता है।

3️⃣ ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला, 1976 – आपातकाल के दौरान दिया गया यह विवादास्पद निर्णय था जिसमें कहा गया कि आपातकाल के समय नागरिकों का जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार निलंबित किया जा सकता है। बाद में इस निर्णय की आलोचना हुई और इसे असंवैधानिक ठहराया गया।

4️⃣ ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य, 1950 – संविधान लागू होने के बाद का पहला बड़ा मामला, जिसमें न्यायालय ने अनुच्छेद 19 और 21 को अलग-अलग माना और निवारक निरोध अधिनियम को वैध ठहराया।

5️⃣ मद्रास राज्य बनाम चम्पकम दोरैराजन, 1951 – यह पहला केस था जिसमें न्यायालय ने कहा कि जाति आधारित शिक्षा आरक्षण मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। बाद में पहला संविधान संशोधन लाकर अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया।

निष्कर्ष: इन फैसलों ने संविधान की आत्मा, नागरिक स्वतंत्रता और न्यायपालिका की शक्ति को परिभाषित किया।
भाग 2 (1980–2015): सामाजिक न्याय और समानता की व्याख्या
6️⃣ मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम, 1985 – यह ऐतिहासिक फैसला मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा था। न्यायालय ने कहा कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को भरण-पोषण का अधिकार (Maintenance under Section 125 CrPC) है। इस फैसले ने लैंगिक समानता की दिशा में नया मार्ग प्रशस्त किया।

7️⃣ इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (मंडल आयोग केस), 1992 – इस निर्णय में न्यायालय ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27% आरक्षण को वैध ठहराया, पर कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता यह सीमा निर्धारित की।

8️⃣ विशाखा बनाम राजस्थान राज्य, 1997 – इस फैसले में न्यायालय ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के खिलाफ सुरक्षा हेतु “विशाखा दिशानिर्देश” जारी किए। बाद में यही कानून “कार्यस्थल पर महिला उत्पीड़न (निवारण) अधिनियम, 2013” का आधार बना।

9️⃣ टी.एन. गॉडावन बनाम तमिलनाडु राज्य, 1995 – इस केस में शराब और तंबाकू उत्पादों पर प्रतिबंध से जुड़ी राज्य नीति के अंतर्गत आर्थिक स्वतंत्रता और स्वास्थ्य सुरक्षा के बीच संतुलन पर जोर दिया गया।

🔟 नालसा बनाम भारत संघ, 2014 – यह फैसला ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण से जुड़ा था। न्यायालय ने उन्हें “तीसरा लिंग” (Third Gender) के रूप में मान्यता दी और समान अधिकारों की घोषणा की।

निष्कर्ष: इन फैसलों ने भारत में समानता, सामाजिक न्याय और मानव गरिमा की अवधारणा को नया बल दिया।
भाग 3 (2017–2022): आधुनिक भारत में संवैधानिक अधिकारों की नई परिभाषा
11️⃣ के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ, 2017 – इस केस में न्यायालय ने “गोपनीयता के अधिकार” (Right to Privacy) को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया। यह फैसला डिजिटल युग में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का आधार बना।

12️⃣ नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ, 2018 – इस ऐतिहासिक निर्णय में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को असंवैधानिक घोषित किया गया, जिससे समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया।

13️⃣ इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य (सबरीमला केस), 2018 – इस निर्णय में महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई और कहा गया कि धार्मिक प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकती।

14️⃣ अयोध्या भूमि विवाद केस, 2019 – यह भारत के सबसे बड़े संवैधानिक मामलों में से एक था। न्यायालय ने पूरे विवादित भूमि को रामलला विराजमान को देने का आदेश दिया और मुस्लिम पक्ष को पाँच एकड़ भूमि वैकल्पिक रूप से प्रदान करने का निर्देश दिया।

15️⃣ कौशाल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2022 – इस केस में न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) की सीमाओं पर विस्तार से चर्चा की और कहा कि यह अधिकार पूर्ण नहीं है, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं के अधीन है।

निष्कर्ष: इन हालिया फैसलों ने आधुनिक भारत में व्यक्तिगत अधिकारों, समानता और धर्मनिरपेक्षता की नई परिभाषा गढ़ी है।
अंतिम निष्कर्ष
इन 15 ऐतिहासिक निर्णयों ने भारतीय संविधान के हर पहलू — मौलिक अधिकार, समानता, सामाजिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गरिमा — को परिपूर्ण किया है। ये फैसले न केवल न्यायालय की शक्ति का प्रतीक हैं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा के रक्षक भी हैं।

“संविधान केवल कानून नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज है जो हर नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता और समानता की गारंटी देता है।”

📜 एडवोकेट जेम्स, डी.बी.ए. बेगूसराय
(केवल जन-जागरूकता और शैक्षणिक उद्देश्य हेतु)

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04/11/2025

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अब अदालत की जानकारी के लिए लंबी कतारों की ज़रूरत नहीं
“न्याय अब एक क्लिक की दूरी पर।”

17/10/2025

कानून और समाज – अपने अधिकार जानें, सुरक्षित रहें ⚖️

हम अक्सर अपने अधिकार और कानून की जानकारी के बिना ही जीवन बिताते हैं।
कानून सिर्फ नियम नहीं हैं, बल्कि हमारी सुरक्षा और न्याय की गारंटी हैं।

📌 जागरूकता क्यों जरूरी है:

बहुत से लोग अपने अधिकारों से अनजान रहते हैं।

अपराध, उत्पीड़न और धोखाधड़ी का शिकार बन जाते हैं।

महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों के हक़ों की अनदेखी होती है।

💡 महत्वपूर्ण बातें:

अपने अधिकार जानें: संविधान और कानून हर नागरिक को सुरक्षा देता है।

संदिग्ध गतिविधियों से सावधान रहें: किसी भी धोखाधड़ी या उत्पीड़न की सूचना तुरंत दें।धोखाधड़ी या उत्पीड़न की सूचना तुरंत दें।

कानूनी मदद लें: अगर कोई नुकसान या उत्पीड़न हो, तो वकील या पुलिस की मदद लें।

महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा: घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, यौन उत्पीड़न के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करें।

✨ याद रखें:
“कानून का ज्ञान ही सुरक्षा है, और जागरूक नागरिक ही समाज को मजबूत बनाते हैं।”

🚨 अपनी सुरक्षा और न्याय के लिए हमेशा सतर्क रहें।

17/10/2025

🌟 डिजिटल दुनिया में संतुलन – मोबाइल & सोशल मीडिया का प्रभाव 🌟

📱 आज का सच:

हम हर समय फोन और सोशल मीडिया में व्यस्त रहते हैं।

असली रिश्ते और बातचीत पीछे छूट रही है।

मानसिक स्वास्थ्य और नींद पर नकारात्मक असर।

⚠️ संकेत जो दिखाते हैं कि आप अधिक प्रभावित हैं:

पढ़ाई या काम में ध्यान कम होना

अकेलापन और उदासी महसूस होना

दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करना

परिवार और दोस्तों से दूरी बनाना

💡 समाधान – स्मार्ट तरीके से डिजिटल जीवन:
समय सीमित करें: फोन का इस्तेमाल सिर्फ ज़रूरी काम के लिए करें।

रिश्तों को महत्व दें: परिवार और दोस्तों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएँ।

ध्यान और खेल: योग, ध्यान और खेलों को दिनचर्या में शामिल करें।

सकारात्मक कंटेंट: सोशल मीडिया पर केवल सीखने और प्रेरित करने वाले कंटेंट देखें।

✨ याद रखें:
“सच्ची खुशियाँ स्क्रीन के बाहर हैं।”
रियल लाइफ में दोस्त, परिवार और अनुभव ही असली खुशी देते हैं।

🚀 चुनौती स्वीकार करें – बदलाव की शुरुआत खुद से करें।

17/10/2025

आधुनिक प्रेम— एक बदलती सोच

कभी प्रेम नज़रों में उतरता था,
तो कभी चिट्ठियों में धड़कता था...
आज वही प्रेम स्क्रीन पर टाइप होता है,
“Seen” में ठहर जाता है,
और “Last seen” में खो जाता है। 💬💔

समय बदला है — और साथ में प्रेम की परिभाषा भी।
अब प्यार सिर्फ़ मिलने-जुलने तक सीमित नहीं,
बल्कि इसमें स्पेस देना, समझना और एक-दूसरे के सपनों को स्वीकारना भी शामिल है।

आधुनिक प्रेम न तो खोखला है,
न ही नकली —
यह बस नए युग की भाषा में लिखा गया वही पुराना एहसास है।
लेकिन हाँ…
इस डिजिटल युग ने प्यार को “online status” में बदल दिया है,
जहाँ “love” अब feeling नहीं, बल्कि reaction बनता जा रहा है।

सच्चा आधुनिक प्रेम वही है —
जहाँ भरोसा हो,
जहाँ सम्मान हो,
और जहाँ सहमति को सबसे बड़ा स्थान मिले। ❤️

क्योंकि प्यार अब भी वही है,
बस उसकी अभिव्यक्ति के तरीके बदल गए हैं।
जरूरत बस इतनी है कि
हम “ट्रेंडिंग रिलेशनशिप” से ज़्यादा
सच्चे रिश्तों को जीना सीखें। 💫

जातियों का विभाजन :  राजनीति को अंग्रेज से मिले विरासत वरदान या अभिशाप या फिर भारत में मुस्लिम धर्मों के विकास का मुख्य ...
22/07/2025

जातियों का विभाजन : राजनीति को अंग्रेज से मिले विरासत वरदान या अभिशाप या फिर भारत में मुस्लिम धर्मों के विकास का मुख्य मार्ग

हिंदू जाति व्यवस्था में चार समूह थे: ब्राह्मण (पुरोहित), क्षत्रिय (योद्धा और राजकुमार), वैश्य (किसान और कारीगर), और शूद्र (काश्तकार और नौकर)। ये सभी सवर्ण कहलाते थे, जो वर्ण व्यवस्था का हिस्सा थे। दलित और आदिवासी भी इस व्यवस्था से बाहर थे। मूलतः अवर्ण।

पुराने ज़माने में, बीमारियों से निपटने के लिए निदान या उपचार के साधन सीमित थे। लोगों को साफ़-सफ़ाई की समझ कम थी। और बेबुनियाद धारणाएँ भी बहुत थीं। बीमारी फैलने पर, अस्वच्छ काम करने वालों को दोषी ठहराया जाता था और उनसे दूरी बना ली जाती थी। जिनके पास कमाई के कोई और साधन नहीं थे, उन्हें छोटे-मोटे काम करने पड़ते थे। गरीबों के घर अस्वच्छ इसलिए नहीं थे क्योंकि वे आलसी थे। यह उनकी एक कीमत थी जो उन्होंने चुकाई।उदाहरण के लिए, जब कुष्ठ रोग फैला, तो मरीज़ों को, चाहे उनकी जाति कुछ भी हो, अलग-थलग कर दिया गया। सभी बचाव उपायों की तरह, यह भी समस्या पैदा करने वाला था, लेकिन फिर भी यह एक बचाव उपाय था। क्षय रोग एक और संक्रामक बीमारी थी जिसने सामाजिक अलगाव को जन्म दिया, कोविड 19 करोना महावारी जो आधुनिक समय में भी देखा जा सकता है जिससे सभी कार्यों और समाज के बीच का उदाहरण हर किसी को याद व न भूलने का विषय है ! 22 मार्च को, भारतीय नागरिकों से "जनता कर्फ्यू" बनाए रखने के लिए कहा गया था और दो दिन बाद, कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने के लिए 21 दिनों का देशव्यापी तालाबंदी की घोषणा की गई थी। इस अवधि के दौरान, कई व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया द्वारा सम्मान और गर्व से "सामाजिक दूरी" को बढ़ावा देने और इसे राष्ट्रीय गौरव के साथ जोड़ने के लिए अलग अलग तरीके अपनाकर प्रचार प्रसार किया 22 मार्च से हुए छुआछूत का पर्व के आयोजन को सफल बनाने और सामाजिक दूरी का संदेश फैलाया परिवार से समाज के व्यक्ति से दूरी और स्पर्श से अलग होने में गर्व महसूस किया । ।
लेकिन जब वर्ण व्यवस्था की अवधारणा का उदय हुआ, तो यह सामाजिक रूप से गतिशील थी। उदाहरण के लिए, अगर ब्राह्मण जानवरों की खाल उतारते थे, तो उनका दर्जा भी छिन जाता था। वैदिक संदर्भों से पता चलता है कि वैश्य माता (जो आटा बेचती थी) और ब्राह्मण पिता (जो छात्रों को पढ़ाते थे) का पुत्र सैनिक के कर्तव्यों का पालन करके क्षत्रिय बन सकता था। वैदिक काल में, चर्मकार (जो चर्म संबंधी कार्य करते थे) को कारीगर माना जाता था।

यह तथ्य कि प्रत्येक मनुष्य अद्वितीय होता है और उसमें छिपी हुई प्रतिभाएँ होती हैं और जब ये प्रतिभाएँ प्रस्फुटित होती हैं, तो परस्पर निर्भरता और तालमेल के सिद्धांत पर आधारित समाज के लिए एक उत्कृष्ट वातावरण प्रदान करती हैं। सामाजिक चिंतक मनोज मिश्र कहते हैं, "तथाकथित जाति व्यवस्था, जिसे सत्ता के खेल, परायापन और शोषण के साधन के रूप में बहुत बदनाम और दुरुपयोग किया गया, शुरू में सामाजिक संगठन का एक बहुत ही परिवर्तनशील रूप थी, लेकिन इसका आधार परस्पर निर्भरता थी। समय के साथ, वस्तु विनिमय की जगह मुद्रा ने ले ली, सत्ता के खेल ने इसमें एक दुर्भाग्यपूर्ण कठोरता ला दी और साथ ही पक्षपात, परायापन और शोषण के अवसर भी पैदा कर दिए।"लेकिन व्यापक स्तर पर, कौन सा मानव समाज और राष्ट्र तथाकथित जाति व्यवस्था से मुक्त है? नाम अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन रूप तो मौजूद है। "यह परिवार जैसी छोटी सामाजिक इकाई में भी मौजूद है। चारों ओर देखिए और आप समझ जाएँगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ," मिसरा कहते हैं।
कवि-संत रविदास भी वाल्मीकि समुदाय से थे और एक गुरु, समाज सुधारक और आध्यात्मिक व्यक्ति के रूप में पूजनीय थे। रामायण महाकाव्य के रचयिता वाल्मीकि को संस्कृत में अग्रदूत-कवि के रूप में सम्मान दिया जाता है।

और छुआछूत सिर्फ़ हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं थी। उदाहरण के लिए, ग़यासुद्दीन बलबन तुर्की रक्त को श्रेष्ठ मानता था और दूसरे मुसलमानों को नीची नज़र से देखता था। आज भी पिछड़े मुसलमानों या पसमांदाओं के लिए एक आंदोलन चल रहा है। सरकार ने कुछ मुस्लिम समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी के तहत आरक्षण दिया है। भटियारा, जिसे अक्सर गाली के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, ऐसा ही एक समुदाय है।अंग्रेज़ भारत में जनगणना का अपना विचार लेकर आए और लोगों को अपनी जाति का नाम पदानुक्रमिक क्रम में बताने की अनिवार्यता ने इस खाई को और चौड़ा कर दिया। आने वाले वर्षों में, जाति संघ और जाति सम्मेलन तेज़ी से बढ़े।

अमेरिका जैसे देशों के विपरीत, भारत में हमेशा जनसंख्या का दबाव रहा और यह श्रम-प्रधान कृषि पर निर्भर रहा। फसल विफलता का मतलब था गरीबी का व्यापक प्रसार और सबसे ज़्यादा मार गरीबों पर पड़ी और उन्हें ज़्यादा तुच्छ काम करने पड़े। शिक्षा की कमी का मतलब था कि उनके ज़्यादा बच्चे हुए, जिससे उनकी निरक्षरता और शोषण बढ़ा। सबसे कमज़ोर होने के कारण, जब अंग्रेजों ने अपनी सेना या नीतियों के ज़रिए भारतीय लोगों पर अत्याचार किए, तो उन्हें सबसे ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ा। अगर देश में सभी के लिए बेहतर जीवन स्तर होता, तो लोग अपने तुच्छ काम खुद करते। और वे खुद के साथ भेदभाव नहीं करते।

1920 के दशक तक, चार-स्तरीय सामाजिक व्यवस्था से बाहर रह गए लोगों के लिए अछूत शब्द का व्यापक रूप से इस्तेमाल होने लगा था। महात्मा गांधी को यह पसंद नहीं आया और उन्होंने अस्पृश्यता को हिंदू धर्म पर एक भयानक और भयावह कलंक बताया।

'हरिजन', जिसका अर्थ है 'ईश्वर की संतान', गांधीजी द्वारा पहली बार 1932 में इस्तेमाल किया गया था, जाहिर तौर पर अछूत और भंगी या दलित वर्ग जैसे शब्दों से बचने के लिए, जो उन्हें गुलामी की प्रथा की याद दिलाते थे। हरिजन शब्द का इस्तेमाल करने के पीछे शायद व्यापक हिंदू समाज में अपने साथी हिंदुओं के लिए अधिक सम्मान सुनिश्चित करने का उद्देश्य रहा होगा। उन्होंने हरिजन सेवक संघ की स्थापना की और इसी नाम से अंग्रेजी, हिंदी और गुजराती में तीन पत्रिकाएँ शुरू कीं।
बी.आर. अंबेडकर को हरिजन शब्द अपमानजनक और रूढ़िवादी लगा और यह देश में दलितों की स्थिति जैसे असली मुद्दे से ध्यान भटकाने का एक प्रयास था। कुछ लोगों ने हरिजन शब्द को हिंदू एकीकरण की एक चाल भी माना। 1931 के पूना समझौते में, आम चुनाव की 148 सीटें दलित वर्गों के लिए आरक्षित थीं।सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' या तुलसीदास दलित नहीं थे, बल्कि उन्होंने गरीबी का जीवन जिया। पोरबंदर और राजकोट के दीवान के पुत्र महात्मा गांधी ने आश्रम में जीवन बिताया, जहाँ शौचालय साफ़ करना अनिवार्य था। दूसरी ओर, सरदार पटेल दलित नहीं थे, लेकिन उन्होंने भी संघर्ष किया। और डॉ. अंबेडकर भी दलित थे और भारत और उसके लोगों के लिए उनका योगदान अपार है, लेकिन उन्हें अवसर मिले।

क्या चिराग पासवान या मीरा कुमार दलित हैं? या तेजस्वी यादव ओबीसी हैं? भीख मांगने पर मजबूर ब्राह्मण को क्या कहेंगे? आज आप उस नौकरशाह को क्या कहेंगे जो दलित पहचान का इस्तेमाल करके अपने साथियों को परेशान करता है? या उस पुलिसवाले को जो अपनी पहचान का इस्तेमाल तबादले रुकवाने के लिए करता है और दशकों तक एक ही शहर में तैनात रहता है?

कुछ समय पहले, बिहार के एक पूर्व मुख्यमंत्री के एक करीबी सहयोगी ने एक आईएएस अधिकारी की पत्नी और उसके कई रिश्तेदारों व घरेलू नौकरों के साथ बलात्कार किया और दो साल तक परिवारों को धमकाया। नौकरशाह की पत्नी ने बताया कि बार-बार बलात्कार के कारण गर्भधारण से बचने के लिए उसे गर्भपात कराना पड़ा और नसबंदी भी करवानी पड़ी। आरोपी पिछड़ी जाति से था, जिससे उसने यह दुस्साहस किया।

और यह सिर्फ़ तथाकथित ऊँची और नीची जातियों के बीच ही नहीं है। आजकल यह आम बात है कि दलित छात्र, जिनके माता-पिता घर की सफाई छोड़कर ज़्यादा सम्मानजनक नौकरियों में चले गए हैं, अपने उन सहपाठियों को नीची नज़र से देखते हैं जिनके परिवार कुछ समय पहले तक मानव मल-मूत्र साफ़ करने और मरे हुए लोगों और जानवरों का अंतिम संस्कार करने का काम करते थे। सुलभ शौचालय, चर्म उद्योग, चतुर्थ श्रेणी व अन्य जगहों पर कार्यरत मजदूर जो ऊंची जाति से हैं अब तो उन कार्य जो सामाजिक दृष्टि से या राजनीतिक पहचान हेतु घृणित श्रेणी और दलितों के लिए कॉपी राइट किया गया और कुछ जातियों से विरोध कराकर उसके व्यवसायीकरण कर उस पर अन्य जातियों का प्रवेश कराया जो लाभ दंश झेल रहे जातियों का लाभ क्या छीना नहीं गया अब चर्म उद्योग से, इंजीनियर, प्रबंधन , फैशन, डिजाइन जैसे अन्य विषयों में बड़े पैमाने पर भारी खर्च के साथ बड़े शिक्षा संस्थान व्यवसाय कर रहे हैं जिनमें उत्तीर्ण और विशेषज्ञ क्या दलित कहलाने योग्य नहीं है या फिर दलित में स्नातक या मास्टर डिग्री का कोर्स उत्तीर्ण हुए है तो क्या उनको दलित होने पर प्राप्त अनुदान के लिए योग्य नहीं है अब तो मल प्रबंधन द्वारा गैस, बिजली या खाद वर्जित है नहीं तो उसका प्रयोग करने वाले दलित कहलाने योग्य हैं या नहीं । सुलभ शौचालय, साफ सफाई कर्मचारी, शहरों में सफाई कर्मचारी जिनका कमाई 20000 से लाखों में है सभी दलित है या ऊंची जाति के लोग दलित का हक ले रहे है तो इसका जिम्मेदारी किस पर तय किया जाय, अगर साफ सफाई करना अछूत है तो क्या इसे बंद कर दिया जाना चाहिए इसके प्रभाव से कौन बचेगा, क्या दुनिया के समक्ष चीखकर कहने वाले दलित जो दिन दिन रात चौगुना अमीर बनते जा रहे हैं दलित कहलाने योग्य हैं आप निर्णय लेंगे जो गरीबों के बच्चे को दलित कह आपस में फूट डलवा रहे हैं लड़ाई झगड़ा में शामिल कर नए अपराधी वर्ग अपने शासन हेतु निर्माण कर रहे हैं क्या सही है, आप कितना सहमत है ये विषय की बात है, दलितों को मुस्लिम के साथ जोड़कर हिन्दू समाज को कमजोर बनाने और मुस्लिम धर्मों को मजबूत करने का मार्ग प्रशस्त कर राजनीति करने वाले पर विचार आपको क्या अब भी नहीं करना चाहिए छुआ छूत के नाम पर मुस्लिम धर्मों का व्यावसायिक एकाधिकार के लिए व्यापक कार्यशैली चिंता जनक नहीं हैं जिसके राजनीति लाभ हेतु राजनीतिक दल भी इस कार्यों में सहयोग करते है

संध्या के 5 बज रहे थे एक संभ्रांत महिला कार से उतरकर रोड किनारे सब्जी बेचने वाले बूढ़े व्यक्ति से  हरी सब्जियां को इशारा ...
07/10/2024

संध्या के 5 बज रहे थे एक संभ्रांत महिला कार से उतरकर रोड किनारे सब्जी बेचने वाले बूढ़े व्यक्ति से हरी सब्जियां को इशारा कर कीमत पूछने पर सब्जी बेचने वाले बूढ़े व्यक्ति ने उत्तर दिया "मैडम 60 ₹ किलो......
महिला ने विक्रेता से कहा मैं तो ₹ 40 दूंगी वरना मैं जाती हूँ।
बूढ़े विक्रेता ने उत्तर दिया - आइये और जो कीमत आप बता रही हैं, उसी भाव में ले जाइए। शायद यह मेरी अच्छी बोहनी हो जाये । क्योंकि आज अभी तक मैं कुछ भी नहीं बेच पाया हूँ।
उस महिला ने सब्जी खरीदी और इस तरह चली गई, जैसे उसने बहुत बड़ी लड़ाई में जीत हासिल की हो। वह अपनी क़ीमती गाड़ी में बैठी और अपने मित्र के साथ एक महँगे रेस्टोरेंट में पहुंच गई ! वहां पर उसने और उसके मित्र ने अपनी पसन्दीदा चीजें मंगवाईं। उन्होंने अपने द्वारा दिये गए आर्डर के सामान में से कुछ कुछ खाया और बहुत सारा सामान छोड़ दिया।
तब वह महिला बिल का भुगतान करने के लिए गई। कुल ₹ 1400 का बिल बना। उसने रेस्टोरेंट के मालिक को ₹ 1500 दिए तथा उससे कहा कि बाकी के पैसे रख लो।
यह घटना रेस्टोरेंट के मालिक के लिए बेशक एक साधारण सी घटना रही होगी लेकिन उस बेचारे गरीब सब्जी बेचने वाले बूढ़े व्यक्ति के लिए बहुत ही पीड़ादायक थी। लेकिन आज के लिए ये आम बात हो गई कि जब हम एक अभावग्रस्त व्यक्ति से कुछ खरीददारी करते हैं तो हम यह दिखावा क्यो करते हैं कि हम शक्तिशाली हैं और सारे गरीब व्यापारी जिसे अपना शो रूम , वातानुकूलित या महंगे कुर्सी उपलब्ध नहीं है वो ठग बईमान है अगर दाम कम करदिया तो बईमान नही तो बोलने का तमीज नही । लेकिन हम जब किसी अमीर व्यक्ति से खरीददारी करते हैं तो हम खुद को उदारवादी दिखाना चाहते हैं, अपने मेट्रो लाइफ का पहचान भले ही उस व्यक्ति को हमारी उदारता की आवश्यकता ही न हो । अपने आस पास के गरीब उन्हें धरती का पाप लेकिन गरीबों के लिए एनजीओ मे दान जिसका कोई औचित्य नहीं है अपना शान समझते हैं । क्या आपके विचार से समाज मे परिवर्तन की जरूरत है अगर हां तो इस दुर्गा पूजा से सुरु कर अपने आस पास के किसी जरूरत मंद,आपके रिश्तेदार, समाज या परिवार यथायोग्य मदत और खुशी में सहयोग करे। जिम से व्यायाम से अच्छा है कि अपने परिवार, समाज, आस पास के लोगो को श्रमदान दे अपने स्टेटस को बीच से निकाल दे बुरे दिन में आपके परिवार समाज आस पास के लोगो द्वारा ही आपको सहयोग करते हैं और आपने दुख सुख में खरे रहते है।

आईवीएफ(I V F)भारत की पहली टेस्टट्यूब बेबी हर्षा चावड़ा मां बन गई हैं. सोमवार सुबह हर्षा चावड़ा ने मुंबई के जसलोक अस्पताल...
04/07/2023

आईवीएफ(I V F)
भारत की पहली टेस्टट्यूब बेबी हर्षा चावड़ा मां बन गई हैं. सोमवार सुबह हर्षा चावड़ा ने मुंबई के जसलोक अस्पताल में अपने बेटे को जन्म दिया.

6 अगस्त 1986 को आईवीएफ तकनीक से हर्षा चावड़ा का जन्म हुआ था. हर्षा इस समय 29 साल की हैं. हर्षा की डिलीवरी जसलोक अस्पताल की डॉक्टर इंदिरा हिंदूजा और डॉक्टर कुसुम झवेरी ने करवाया. डॉक्टर इंदिरा हिंदूजा ने ही साल 1986 में हर्षा का भी जन्म करवाया था.

डॉक्टर हिंदुजा के मुताबिक आईवीएफ तकनीक से जन्मीं हर्षा और उसका बच्चा दोनों ही सेहतमंद हैं. इतना ही नहीं डॉक्टर हिंदूजा के मुताबिक हर्षा ने एक 3.18 किलोग्राम के स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया है. डॉक्टर हिंदूजा ने हर्षा के बाद तकरीबन 15 हजार टेस्टट्यूब बच्चों को जन्म दिया है.
(IVF) का मतलब इन विट्रो फर्टिलाइजेशन होता है। जब शरीर अंडों को निषेचित करने में विफल रहता है, तो उन्हें प्रयोगशाला में निषेचित किया जाता है। इसलिए इसे आईवीएफ कहा जाता है। एक बार जब अंडे निषेचित हो जाते हैं, तो भ्रूण को मां के गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया जाता है।

आईवीएफ प्रक्रिया में शुक्राणु और अंडे का मिश्रण शामिल होता है। यह आमतौर पर एक डिश में तब तक होता है जब तक कि निषेचन नहीं हो जाता आजकल आईवीएफ प्रक्रिया का फैशन के आर में जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है जिसके लिए भविष्य मे परिवार के चेन सुख शांति का घोर अभाव हो रहा है पति समाज अपनो या रिश्तेदारों से काफी आलोचना का सामना कर मानसिक रूप से अवसाद से ग्रस्त हो रहा है इंडियन एक्सप्रेसकी रिपोर्ट के मुताबिक संशय होने पर दंपति ने साल 2008-2009 में बच्चों का DNA टेस्ट करवाया था. तब ये भी पता चला कि जुड़वा बच्चों में से एक का ब्लड ग्रुप AB पॉजिटिव था, जबकि माता का ब्लड ग्रुप B पॉजिटिव और पिता का ब्लड ग्रुप O नेगेटिव था. दंपत्ति DNA टेस्ट का रिजल्ट देखकर चौंक गए. जांच में पता चला कि महिला का पति उसके जुड़वा बच्चों का जैविक पिता नहीं है. जबकि महिला के मुताबिक IVF प्रोसीजर में उसके पति ने अपना सीमेन दिया था लेकिन डॉक्टर की लापरवाही के कारण सीमेन सैंपल मिक्स-अप हो गया. ये सब दिल्ली के भाटिया ग्लोबल हॉस्पिटल एंड एंडोसर्जरी इंस्टीट्यूट में हुआ।महाराष्ट्र के नांदेड़ की फैमिली कोर्ट में एक अनोखा मामला सामने आया है। यहां अपने पति से रहने वाली एक महिला ने उसके बच्चे की मां बनने के लिए अदालत में याचिका दायर की है। महिला का अपने पति के साथ तलाक का केस भी चल रहा है। महिला का पहले भी एक बच्चा है।

अब वह अपने पति के दूसरे बच्चे की मां बनना चाहती है। उसने दांपत्य संबंध या आईवीएफ के जरिये मां बनने के संबंध में अदालत में याचिका दायर की है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार कोर्ट ने कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वायत्तता पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संधियों का हवाला देते हुए उसके ‘बच्चा पैदा करने के अधिकार’ का समर्थन किया है। शोध डेनमार्क में किया गया और मेडिकल जर्नल एक्टा ऑब्स्टेट्रिकिया एट गाइनकोलोगिका स्कैंडिनेविका में प्रकाशित हुआ । काफी महिलाएं आईवीएफ के जरिये मां बनने के अपने पुराने साथी या दलालों के झूठे फरेब में नामी गिरामी सफल व्यक्ति के स्पर्म डोनर के नाम पर महिला को खूब ठका जा रहा है जिसके बाद उन्हें गोपनीयता भंग होने का डर से परिवार में अविश्वास चिरचिरापन आम हो जाती हैं जिससे परिवार सम्हालना मुस्किल हो जाता हैं इस तकनीक के कारण समलैंगिक विवाह का भी चलन बढ़ता जा रहा है और समलैंगिक जोड़े संतान के चाह में इस तकनीक का धड़ल्ले से दुरुपयोग कर रहे हैं जिसके रोकने या सुरक्षा हेतु कानून आवश्यक है ।आजतक न्यूज में एक लेख के अनुसार अटलांटिक के डियर थेरेपिस्ट कॉलम' में एक महिला ने अपनी पहचान छुपाते हुए बताया कि कैसे उससे मुलाकात से पहले उसके पति के एक अन्य महिला के साथ संबंध से उनके दो बच्चे (एक बेटा और एक बेटी) थे. शादी के बंधन में बंधने के बाद, जोड़े ने अपने बच्चे पैदा करने के बारे में सोचा. लेकिन यह संभव नहीं हो सका क्योंकि उसके पति की नसबंदी हो चुकी थी. अब ये कपल परेशान हो गया. द मिरर की खबर के अनुसार, महिला ने बताया कि ऐसी स्थिति में यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनका बच्चा उनके जैसा दिखे, उन्होंने एक अजीब समाधान निकाला. अटलांटिक को लिखे एक पत्र में, गुमनाम महिला ने लिखा- "हम स्पर्म बैंक का उपयोग नहीं करना चाहते थे, इसलिए हमने अपने पति के बेटे को डोनर बनने के लिए कहा महिला ने आगे लिखा "हमें लगा कि यह सबसे अच्छा फैसला था. इससे हमारे बच्चे में मेरे पति के ही जीन होंगे न कि किसी बाहरी इंसान के, और हम मेरे सौतेले बेटे के स्वास्थ्य, पर्सनालिटी और इंटेलिजेंस को जानते थे. वह मदद करने के लिए राजी भी हो गया था. उसने आगे बताया "अब हमारी बेटी 30 साल की है और हमने बेटी के जन्म के तीन दशक बाद तक इस सच्चाई को छुपाकर रखा है. अब हम उलझन में है कि हम उसे कैसे बताएं कि उसका "पिता" उसका दादा है, उसका "भाई" उसका पिता है, उसकी "बहन" उसकी 'बुआ' है, और उसका "भतीजा" उसका सौतेला भाई है?"

'सच जानकर पता नहीं कैसा रिएक्शन देगी'

उन्होंने बताया कि कैसे वह और उनके पति अपनी बेटी को यह बताने को लेकर चिंतित हैं कि पता नहीं वह इसपर क्या प्रतिक्रिया देगी. उन्होंने कहा, "यह मेरे पति के लिए भी कठिन है, क्योंकि वह चाहते हैं कि हमारी बेटी को पता चले कि वह ही उसके पिता है."। एक अध्ययन में 30 साल की 47,515 महिलाओं ने हिस्सा लिया, जिन्होंने 1990 से 2006 के बीच बांझपन का इलाज कराया था। उपचार शुरू करने के सात साल बाद भी करीब आधे (43 प्रतिशत) निःसंतान थे और इनमें से 27 प्रतिशत असफल आईवीएफ उपचार के बाद तलाक ले चुके थे या अलग हो गए थे, जो अन्य महिलाओं की तुलना में तीन गुना अधिक था।बांझपन से गुजर रहे जोड़ों को एक-दूसरे के प्रति गुस्सा और नाराजगी का अनुभव हो सकता है, कभी-कभी वे चाहते हैं कि गर्भधारण की प्रक्रिया अलग हो। कुछ साथी गर्भधारण करने में असमर्थता को लेकर शर्म और अपराधबोध महसूस कर सकते हैं। इन भावनाओं के कारण जोड़ों के बीच संचार टूट जाता है, जिसके परिणामस्वरूप बहस और टाल-मटोल होती है।

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