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15/08/2026

एडीएम जबलपुर केस (1976): जब सुप्रीम कोर्ट ने सरेंडर कर दिया था और कहा था—'इमरजेंसी में सरकार को आपकी जान लेने का भी हक है!'
भारतीय लोकतंत्र और हमारी न्यायपालिका का इतिहास हमेशा जीत की कहानियों से भरा नहीं रहा है। एक दौर ऐसा भी आया था जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने सत्ता की तानाशाही के सामने पूरी तरह घुटने टेक दिए थे और नागरिकों को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया था। यह दौर था जून 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया 'आपातकाल' (Emergency)।
🔹 एडीएम जबलपुर केस (1976) – न्यायपालिका का सबसे काला अध्याय:आपातकाल के दौरान सरकार ने मीसा (MISA - Maintenance of Internal Security Act) जैसे सख्त कानूनों के तहत विपक्ष के हजारों नेताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना किसी कारण और बिना ट्रायल के जेलों में ठूंस दिया था। इसके खिलाफ देश के विभिन्न हाईकोर्ट्स ने नागरिकों को राहत दी, तो मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इस केस को एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) या 'हेबियस कॉर्पस केस' (Habeas Corpus Case) कहा जाता है।सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा और सीधा सवाल यह था: क्या आपातकाल के दौरान सरकार किसी भी नागरिक को बिना कारण बताए अनिश्चितकाल के लिए जेल में रख सकती है? क्या आपातकाल में नागरिकों से उनका 'जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार' (Article 21) भी छीन लिया जाता है?सुप्रीम कोर्ट के 5 सबसे वरिष्ठ जजों की बेंच ने 4-1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में एक बेहद चौंकाने वाला और शर्मनाक फैसला सुनाया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे सहित चार जजों ने कहा कि जब आपातकाल लागू हो, तो सरकार के पास किसी भी व्यक्ति की जान लेने या उसे कैद करने की असीमित शक्ति होती है और नागरिक राहत के लिए अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकता।लेकिन इस घने अंधेरे में केवल एक जज ने न्याय का दीया जलाए रखा। वो थे जस्टिस एच.आर. खन्ना (H.R. Khanna)। उन्होंने अकेले बहुमत के खिलाफ जाते हुए अपनी ऐतिहासिक असहमति (Dissent Note) दर्ज की। जस्टिस खन्ना ने लिखा: “जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार कानून की देन नहीं है, यह प्रकृति की देन है। कोई भी सरकार आपातकाल की आड़ में अपने ही नागरिकों को इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकती।”जस्टिस खन्ना जानते थे कि इस सच को बोलने की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। जनवरी 1977 में जब नए CJI की नियुक्ति का समय आया, तो सबसे वरिष्ठ होने के बावजूद सरकार ने उनकी वरिष्ठता को लांघकर जस्टिस एम.एच. बेग को मुख्य न्यायाधीश बना दिया। जस्टिस खन्ना ने बिना एक क्षण गंवाए उसी दिन अपने पद से इस्तीफा दे दिया। (दशकों बाद, साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेसी के फैसले के दौरान आधिकारिक तौर पर माना कि एडीएम जबलपुर का वह पुराना फैसला बेहद गलत था और कोर्ट ने उसे इतिहास के कूड़ेदान में फेंकते हुए पलट दिया)।
1973 में केशवानंद भारती केस से निकला 'मूल ढांचे' का सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है और वर्तमान समय में भी कार्यपालिका (정부) और न्यायपालिका (Judiciary) के बीच सबसे बड़े वैचारिक टकराव की वजह बना हुआ है। हाल के वर्षों में संसद और न्यायपालिका के बीच इसे लेकर कई तीखे बयान सामने आए हैं:सरकार का तर्क (संसद की संप्रभुता सर्वोच्च है): सरकार और संसद के कई प्रतिनिधियों (जिनमें उपराष्ट्रपति और कानून मंत्री शामिल रहे हैं) का तर्क है कि 'मूल ढांचे' का सिद्धांत अस्पष्ट है और इसकी आड़ में न्यायपालिका संसद की कानून बनाने की संप्रभु शक्ति को कमजोर करती है। उनका सीधा तर्क है कि भारतीय लोकतंत्र में जनता सांसदों और सरकार को चुनकर भेजती है, जजों को कोई नहीं चुनता। इसलिए जनता की इच्छा (संसद) सर्वोच्च होनी चाहिए, जजों की राय नहीं।इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2015 का एनजेएसी (NJAC - राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) कानून था। इसे जजों की नियुक्ति की पुरानी कॉलेजियम प्रणाली को बदलने और उसमें पारदर्शिता लाने के लिए संसद के दोनों सदनों ने लगभग सर्वसम्मति से पास किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 'न्यायपालिका की स्वतंत्रता' को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा बताते हुए इस पूरे कानून को ही असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया। सरकार आज भी इसे संसद के अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका का एक बड़ा दखल मानती है।न्यायपालिका का तर्क (संविधान की सर्वोच्चता अनिवार्य है): दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट का रुख बेहद कड़ा और स्पष्ट है। विभिन्न मुख्य न्यायाधीशों ने सार्वजनिक मंचों से स्पष्ट किया है कि 'मूल ढांचा' कोई अड़चन या रुकावट नहीं है, बल्कि यह हमारे संविधान का 'उत्तरध्रुव तारा' (North Star) है। यह वह ध्रुवतारा है जो भारतीय लोकतंत्र के जहाज को भटकने नहीं देता। न्यायपालिका का मानना है कि यदि 'मूल ढांचे' की यह लक्ष्मण रेखा हटा दी गई, तो भविष्य में पूर्ण बहुमत वाली कोई भी सरकार संविधान को बदलकर देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने, संघीय ढांचे या स्वतंत्र चुनाव प्रणाली को अपनी राजनीतिक सहूलियत के हिसाब से खत्म कर सकती है।
हाल ही में मई 2026 के अपने ताजा फैसलों में भी सुप्रीम कोर्ट ने प्रिवी पर्स से जुड़े एक लंबित मामले की समीक्षा के दौरान एक बार फिर स्पष्ट किया है कि 'मूल ढांचा' का सिद्धांत केवल सरकार की निरंकुश या तानाशाही प्रवृत्तियों पर लगाम लगाने के लिए है। कोर्ट ने दोहराया कि जो संशोधन लोकतांत्रिक मूल्यों और समानता को मजबूत करते हैं (जैसे प्रिवी पर्स का अंत), उन्हें कोर्ट कभी नहीं रोकता, लेकिन संविधान की बुनियादी आत्मा से खिलवाड़ की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।संसद और अदालत के बीच का यह वैचारिक शीतयुद्ध ही दरअसल भारतीय लोकतंत्र का संतुलन चक्र (Balance of Power) है। कानून बनाने की शक्ति भले ही जनता के प्रतिनिधियों के पास हो, लेकिन उस कानून की मर्यादा की रक्षा करने की जिम्मेदारी हमेशा संविधान की अदालत के पास रहेगी।

15/08/2026

जमीन के एक टुकड़े से शुरू हुआ वो मुकदमा, जिसने तय की देश की किस्मत: केशवानंद भारती केस
क्या देश की संसद के पास, जिसे जनता चुनती है, इतनी असीमित शक्ति है कि वह जब चाहे संविधान के किसी भी हिस्से को बदल दे? क्या पूर्ण बहुमत वाली सरकार संविधान को इस हद तक बदल सकती है कि देश का लोकतंत्र ही खत्म हो जाए और वहां तानाशाही स्थापित हो जाए? इस बुनियादी और सबसे गंभीर सवाल का फैसला आज से 53 साल पहले 24 अप्रैल 1973 को सुप्रीम कोर्ट ने किया था। इस फैसले को हम केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के नाम से जानते हैं, जो भारतीय कानूनी इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है।यह कहानी किसी बड़े राजनेता या उद्योगपति की नहीं, बल्कि केरल के कासरगोड में स्थित इडनीर मठ के प्रमुख स्वामी केशवानंद भारती से शुरू हुई थी। केरल की तत्कालीन वामपंथी सरकार ने भूमि सुधार कानून (Land Reforms Act) पास किया था, जिसके तहत धार्मिक संस्थाओं और मठों की अतिरिक्त जमीन को सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया। स्वामी केशवानंद भारती ने अपनी मठ की संपत्ति को बचाने के लिए देश के महानतम न्यायविद और वकील नानी पालकीवाला की मदद ली। पालकीवाला ने इस केस को केवल जमीन के विवाद तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे संसद द्वारा नागरिकों के 'मौलिक अधिकारों' (Fundamental Rights) को लगातार कुचले जाने के खिलाफ एक बड़े संवैधानिक आंदोलन में बदल दिया।उस दौर में इंदिरा गांधी सरकार ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को पलटने के लिए 24वें, 25वें और 29वें संविधान संशोधन पास किए थे, जिससे संसद और न्यायपालिका के बीच सीधे वर्चस्व की जंग छिड़ गई थी।🔹 इतिहास की सबसे बड़ी संवैधानिक अदालत:इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी 13 जजों की संवैधानिक बेंच का गठन किया। इस केस की सुनवाई लगातार 68 दिनों तक चली, जिसमें दुनिया भर के संविधानों और कानूनों के उदाहरण दिए गए। 24 अप्रैल 1973 को, सुप्रीम कोर्ट के जजों ने 7 बनाम 6 के बेहद मामूली अंतर (बारीक बहुमत) से एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसने भारतीय लोकतंत्र को हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया।🔹 'मूल ढांचा' (Basic Structure Doctrine) का जन्म:सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में एक अद्भुत संतुलन बनाया। कोर्ट ने सरकार और संसद की इस बात को स्वीकार किया कि संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के किसी भी हिस्से (यहाँ तक कि मौलिक अधिकारों में भी) संशोधन करने का पूरा अधिकार है। लेकिन, इसके साथ ही कोर्ट ने एक ऐतिहासिक 'लक्ष्मण रेखा' खींच दी, जिसे 'मूल ढांचा' (Basic Structure) कहा गया।अदालत ने साफ कहा कि संसद संविधान की दीवारों और कमरों को बदल सकती है, लेकिन वह उस नींव या बुनियादी ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती जिस पर पूरा संविधान टिका हुआ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, कानून का शासन, संघवाद (Federalism) और स्वतंत्र चुनाव जैसी चीजें संविधान का मूल ढांचा हैं। संसद संशोधन करके भारत को तानाशाही देश या धार्मिक राष्ट्र घोषित नहीं कर सकती।🔹 सरकार का गुस्सा और जजों से 'बदला':इस फैसले ने संसद की असीमित शक्तियों पर लगाम लगा दी थी, जिससे इंदिरा गांधी सरकार बेहद नाराज हो गई। फैसले के ठीक अगले ही दिन (25 अप्रैल 1973) तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) एस.एम. सीकरी रिटायर हो रहे थे। देश में यह स्थापित परंपरा थी कि सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ जज को ही अगला CJI बनाया जाता था। वरिष्ठता के नियम के अनुसार अगले CJI जस्टिस जे.एम. शेलत होने चाहिए थे, और उनके बाद जस्टिस के.एस. हेगड़े और जस्टिस ए.एन. ग्रोवर का नंबर था।चूंकि इन तीनों जजों ने केशवानंद भारती केस में सरकार के खिलाफ (मूल ढांचे के पक्ष में) फैसला दिया था, इसलिए सरकार ने इन तीनों की वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए, चौथे नंबर के जज जस्टिस ए.एन. रे (A.N. Ray) को भारत का नया मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया, जिन्होंने केस में सरकार का समर्थन किया था। इस राजनीतिक हस्तक्षेप के विरोध में न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार तीनों वरिष्ठ जजों (शेलत, हेगड़े और ग्रोवर) ने एक साथ अपने पदों से सामूहिक इस्तीफा दे दिया। इसे न्यायपालिका के इतिहास का 'काला दिन' कहा जाता है।
इसी लंबी कानूनी और राजनीतिक खींचतान का अंतिम परिणाम यह हुआ कि आगे चलकर 1978 में जब मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार आई, तो उन्होंने भूमि सुधारों और विकास कार्यों में बार-बार आने वाली अड़चनों को हमेशा के लिए समाप्त करने का फैसला किया। संसद ने 44वां संविधान संशोधन (1978) पास किया, जिसके तहत 'संपत्ति के अधिकार' को मौलिक अधिकारों (भाग 3, अनुच्छेद 31) की सूची से पूरी तरह हटा दिया गया। इसे संविधान के भाग 12 में एक नए अनुच्छेद 300A के तहत केवल एक कानूनी/संवैधानिक अधिकार (Legal Right) बनाया गया। इसका मतलब यह है कि आज सरकार कानून बनाकर और उचित मुआवजा देकर जनहित (जैसे एक्सप्रेसवे या रेलवे लाइन) के लिए आपकी जमीन ले सकती है, लेकिन वह आपके अन्य मौलिक अधिकारों (जैसे बोलने की आजादी या जीने का अधिकार) को बिना वजह नहीं छीन सकती।यदि स्वामी केशवानंद भारती और नानी पालकीवाला ने वह कानूनी लड़ाई न लड़ी होती, तो आज हमारी संसद के पास हमारे सभी अधिकार छीनने की निरंकुश शक्ति होती। यह केस हमारे लोकतंत्र का असली रक्षक है।

15/08/2026

हुजूर' से 'माननीय' बनने का सफर
1947 में जब अंग्रेज भारत छोड़ रहे थे, तब उन्होंने केवल ब्रिटिश भारत को आजाद नहीं किया, बल्कि भारत के भीतर मौजूद 565 'देसी रियासतों' (Princely States) पर से भी ब्रिटिश संप्रभुता हटा ली। तकनीकी रूप से, अंग्रेजों ने इन राजाओं को खुली छूट दे दी थी कि वे चाहें तो भारत में मिलें, पाकिस्तान में जाएं या खुद को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दें। यदि ऐसा हो जाता, तो भारत का नक्शा एक बिखरे हुए महाद्वीप जैसा होता। इस संभावित बिखराव से देश को बचाने का असंभव जिम्मा उठाया देश के पहले गृह मंत्री, लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और उनके कुशल प्रशासनिक सहयोगी वी.पी. मेनन ने।
🔹 साम, दाम, दंड, भेद और सरदार की कूटनीति:सरदार पटेल ने अधिकांश राजाओं को देशभक्ति और व्यावहारिक समझदारी का वास्ता देकर भारत में शामिल होने के लिए राजी कर लिया। लेकिन तीन रियासतों ने भारत की अखंडता को चुनौती दी:जूनागढ़: यहां का मुस्लिम नवाब जनता की इच्छा के खिलाफ पाकिस्तान में मिलना चाहता था। जब जनता ने विद्रोह किया तो नवाब कराची भाग गया। भारत ने वहां सेना भेजी और फरवरी 1948 में जनमत संग्रह (Plebiscite) कराया, जिसमें 99% से अधिक जनता ने भारत को चुना।हैदराबाद: यहां का निजाम उस्मान अली खान दुनिया के सबसे अमीर आदमियों में से था और अपनी स्वतंत्र रियासत चाहता था। उसकी निजी सेना 'रजाकारों' ने स्थानीय जनता पर भीषण अत्याचार शुरू कर दिए। स्थिति को नियंत्रण में लेने के लिए भारत सरकार ने सितंबर 1948 में 'ऑपरेशन पोलो' (Operation Polo) नाम से सैन्य कार्रवाई की और मात्र 5 दिनों में हैदराबाद का भारत में विलय करा लिया।जम्मू और कश्मीर: यहां के हिंदू राजा हरि सिंह अपनी रियासत को स्वतंत्र (बफर स्टेट) रखना चाहते थे। लेकिन जब अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबाइलियों और सेना ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, तो राजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी। उन्होंने 26 अक्टूबर 1947 को 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सीलेंस' (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद भारतीय सेना ने दुश्मनों को खदेड़ा।
🔹 क्या था प्रिवी पर्स (Privy Purse) और शाही विशेषाधिकार?राजाओं को अपनी सेना, शाही खजाना, कर वसूलने का अधिकार और सदियों पुरानी संप्रभुता को स्वेच्छा से भारत सरकार को सौंपने के लिए तैयार करना आसान नहीं था। इसके लिए सरदार पटेल ने उन्हें 'प्रिवी पर्स' का प्रस्ताव दिया। यह एक सालाना, पूरी तरह टैक्स-फ्री शाही भत्ता (पेंशन) था, जो रियासत के आकार और राजस्व के आधार पर तय किया गया था (मैसूर या बड़ौदा जैसे राज्यों को लाखों रुपये मिलते थे, तो छोटों को कुछ हजार)। इसके साथ ही राजाओं को उनके भव्य महल, निजी संपत्ति, शाही खिताब (महाराजा, नवाब) बनाए रखने और गाड़ियों पर विशेष नंबर प्लेट व लाल बत्ती जैसे विशेषाधिकार दिए गए। संविधान के अनुच्छेद 291 और 362 में इसे बाकायदा संवैधानिक गारंटी दी गई थी।
🔹 इंदिरा गांधी का समाजवादी प्रहार और सुप्रीम कोर्ट का झटका:आजादी के दो दशक बाद, भारत की राजनीति बदल चुकी थी। 1960 के दशक के अंत में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' और समाजवाद का नारा बुलंद किया। उन्होंने प्रिवी पर्स को "राजशाही का अवशेष", लोकतंत्र की समानता के खिलाफ और देश के खजाने पर अनावश्यक बोझ बताया। 1970 में सरकार ने इसे खत्म करने के लिए संसद में बिल पेश किया। लोकसभा में तो यह पास हो गया, लेकिन राज्यसभा में यह बिल मात्र 1 वोट से गिर गया।
हार न मानते हुए इंदिरा गांधी सरकार ने एक कार्यकारी रास्ता चुना और राष्ट्रपति से एक विशेष अध्यादेश (Presidential Order) जारी करवाकर राजाओं की मान्यता और प्रिवी पर्स को तुरंत रोक दिया। इसके खिलाफ ग्वालियर के महाराजा माधवराव सिंधिया समेत कई पूर्व राजा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। दिसंबर 1970 में सुप्रीम कोर्ट की 11 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सरकार के इस अध्यादेश को पूरी तरह असंवैधानिक और अवैध घोषित कर दिया। कोर्ट का तर्क था कि सरकार एक प्रशासनिक आदेश से उन अधिकारों को नहीं छीन सकती जिनकी गारंटी संविधान ने दी है।
🔹 26वां संविधान संशोधन और राजशाही का अंतिम अंत:सुप्रीम कोर्ट से मिले इस बड़े झटके को इंदिरा गांधी ने राजनीतिक अवसर में बदल दिया। उन्होंने संसद भंग कर दी और 1971 के मध्यावधि चुनावों में 'गरीबी हटाओ' के नारे पर प्रचंड दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। सत्ता में लौटते ही उन्होंने 26वां संविधान संशोधन अधिनियम (1971) पास कर दिया। इस संशोधन के जरिए संविधान से सीधे अनुच्छेद 291 और 362 को हटा दिया गया और एक नया अनुच्छेद 363A जोड़ा गया, जिसने राजाओं के प्रिवी पर्स, खिताब और सभी विशेषाधिकारों को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। बाद में 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस संशोधन को पूरी तरह वैध माना।लोकतांत्रिक बदलाव का अनोखा मोड़:प्रिवी पर्स छिनने के बाद राजाओं के महल हेरिटेज होटलों में बदलने लगे, लेकिन उनका सामाजिक प्रभाव खत्म नहीं हुआ। कई राजघरानों ने लोकतंत्र की ताकत को समझा और चुनावी राजनीति में उतर गए। जयपुर की महारानी गायत्री देवी ने स्वतंत्र पार्टी से चुनाव लड़कर गिनीज बुक में दर्ज होने वाली सबसे बड़ी जीत हासिल की। ग्वालियर का सिंधिया परिवार (राजमाता विजयाराजे सिंधिया, माधवराव सिंधिया और वर्तमान में ज्योतिरादित्य सिंधिया) भारतीय राजनीति के शीर्ष पर बना रहा। जिस जनता के पूर्वज कभी इन राजाओं के सामने सिर झुकाते थे, उसी जनता ने लोकतंत्र में इन्हें अपना प्रतिनिधि चुनकर सत्ता की चाबी सौंप दी।

15/08/2026

अखंड भारत का विभाजन
18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद ने 'भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947' (Indian Independence Act 1947) को शाही मंजूरी दी। यह ब्रिटिश राज का भारत के लिए आखिरी आधिकारिक फरमान था। ऊपरी तौर पर देखने वाले इसे सिर्फ सत्ता के हस्तांतरण (Transfer of Power) का एक कानूनी दस्तावेज मान सकते हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह इतिहास के सबसे बड़े, सबसे वीभत्स और रक्तरंजित मानवीय विस्थापन का ब्लूप्रिंट साबित हुआ।इस कानून ने न केवल ब्रिटिश भारत को दो स्वतंत्र डोमिनियन—भारत और पाकिस्तान—में बांट दिया, बल्कि बंगाल और पंजाब जैसे विशाल प्रांतों के सीने पर एक ऐसी लकीर खींच दी जिसके जख्म आज भी हरे हैं।इस विभाजन को इतनी त्रासदीपूर्ण बनाने के पीछे तीन मुख्य कारण थे:
🔹 माउंटबैटन की हड़बड़ी और '3 जून योजना':-ब्रिटिश सरकार ने शुरू में भारत को आजाद करने के लिए जून 1948 की समयसीमा तय की थी। लेकिन भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबैटन ने देश में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव और अपनी राजनीतिक सहूलियत को देखते हुए एक खतरनाक फैसला लिया। '3 जून योजना' (Mountbatten Plan) के तहत उन्होंने आजादी और विभाजन की तारीख को करीब एक साल पहले—15 अगस्त 1947 पर शिफ्ट कर दिया। मात्र कुछ महीनों के भीतर इतनी बड़ी आबादी के प्रशासनिक, सैन्य, वित्तीय और भौगोलिक बंटवारे को अंजाम देना पूरी तरह असंभव था, लेकिन ब्रिटिश सरकार को जल्द से जल्द भारत से अपना पल्ला झाड़ना था।
🔹 सर सिरिल रैडक्लिफ: -एक अनजान वकील की जानलेवा पेंसिल:-पंजाब और बंगाल के बंटवारे के लिए एक 'सीमा आयोग' (Boundary Commission) बनाया गया, जिसके अध्यक्ष ब्रिटिश वकील सर सिरिल रैडक्लिफ थे। विडंबना देखिए कि रैडक्लिफ इससे पहले कभी भारत नहीं आए थे। उन्हें यहाँ की संस्कृति, भूगोल, सामाजिक ताने-बाने और जनसांख्यिकी (Demography) का रत्ती भर भी ज्ञान नहीं था। उन्हें बंद कमरों में बैठकर, केवल पुराने नक्शों और अधूरी जनगणना के आंकड़ों के आधार पर नई सीमाएं तय करने के लिए मात्र 5 हफ्तों का समय दिया गया। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने बिना किसी जमीनी सर्वे के केवल कागज पर पेंसिल चला दी। कई जगह यह लकीर लोगों के आंगन, खेतों, धार्मिक स्थलों और गांवों के बीच से होकर गुजरी—आंगन भारत में रह गया और रसोई पाकिस्तान में!
🔹 आजादी के दो दिन बाद पता चला अपना मुल्क:-इस विभाजन की सबसे बड़ी और क्रूर त्रासदी यह थी कि भारत और पाकिस्तान की इस नई अंतरराष्ट्रीय सीमा (Radcliffe Line) की आधिकारिक घोषणा 15 अगस्त को नहीं, बल्कि 17 अगस्त 1947 को की गई। यानी जब 15 अगस्त की आधी रात को लोग आजादी का जश्न मना रहे थे, तब पंजाब और बंगाल के करोड़ों लोगों को यह पता ही नहीं था कि वे भारत के नागरिक हैं या पाकिस्तान के। जब 17 अगस्त को सीमाएं सार्वजनिक हुईं, तो चारों तरफ अराजकता फैल गई। रातों-रात लोग अपने ही घरों में विदेशी बन गए।इसके बाद इतिहास का सबसे बड़ा मानवीय पलायन शुरू हुआ। करीब 1.5 करोड़ लोगों को अपनी जमीनों से उखड़कर सीमाओं के पार भागना पड़ा। रास्ते में भड़की सांप्रदायिक हिंसा, लूटपाट और दंगों में अनुमानतः 5 लाख से 10 लाख बेगुनाह लोग मारे गए। यह आज़ादी केवल एक राजनीतिक बदलाव नहीं थी, बल्कि हमारे इतिहास का वो सबसे गहरा घाव थी जिसकी कीमत आम जनता ने अपने खून से चुकाई थी।

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