30/09/2017
।माँ मुझे भी राम बनादो।
बात लगभग 30 बर्ष पहले की होगी, जब मेरी उम्र 10 वर्ष की थी। दशहरा का दिन था सुबह से सब रावण दहन देखने जाने की चर्चा कर रहे थे। में भी पास ही खड़ा होकर उनकी बाते सुन रहा था।
मुझे पिछले दशहरे की याद ताजा हो गई कि कैसे मैने राम जी की, रथ यात्रा को दशहरा मैदान की और जाते हुए देखा था । उस रथ में प्रभु श्री राम लखन ओर हनुमान जी विराजमान थे।
उन यादों को मन में रखे में माँ की पास दौड़ते हुए पहुँचा और माँ से कहा माँ ( मुझे भी राम बनादो ) आज दशहरा है और मुझे भी रथ में सवार होकर शाम को रावण का दहन करने दशहरा मैदान जाना है।
था तो में जिद्दी ही माँ के मना करने पर भी में कहा मानने वाला था । मेरे बहुत जिद करने पर माँ ने मुझे दोपहर में तैयार करने को बोल दिया। दोपहर हुई माँ ने मुझे पहले नहलाया फिर एक सफेद धोती,गले मे भगवा वस्त्र, एक जनेऊ, माथे पर तिलक , गले मे फूलो का हार, होठो और गालों पर लाली लगा कर तैयार कर एक धनुष और बाण दिया।
शाम होने को आई में भी बड़ी बेसब्री से रथ का इंतज़ार कर रहा था। रथ आया पर यह क्या उसमे पहले से ही राम जी विराजित थे। में भी कहॉ मानने वाला था । में रथ के आगे आगे दौड़ने लगा, यह देख कर मुझे भी रथ में बैठा दिया गया।
हम कुछ ही देर में दशहरा मैदान पहुँच गए मंच पर हमारा स्वागत हुआ । पूजा हुई। नेता जी के भाषण हुए, आतिश बाजी हुई मुख्य अतिथि आये। पर यह क्या रावण तो नेता जी ने ही जला दिया ।
मैने अपने घर पहुँचा तो माँ ने पूछा वहाँ क्या हुआ मैने कहा माँ आपने मुझे बड़ी महनत से राम बनाया पर रावण को तो नेता जी ने जला दिया। अब से में राम नहीं बनुगा।
।दशहरे की हार्दिक शुभकामनाये।
पीयूष भार्गव।