07/08/2026
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी-पर्व पर विशेष :
डॉ. हेडगेवार के प्रेरणा-स्रोत
संसार के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक (हिंदू) संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना तथा उसकी कार्यपद्धति के निर्माण हेतु डॉ. केशवराव बळिराम हेडगेवार (1889-1940) के प्रेरणा-स्रोत कौन-कौन से तत्त्व रहे हैं, इसका आकलन मैंने संघ से सम्बन्धित अपने अध्ययन और अनुभव से किया है।
1. महामना मालवीय जी के विचारों से प्रेरणा
भारतभूषण महामना पण्डित मदनमोहन मालवीय जी (1861-1946) ने अपने भाषणों में गाँव-गाँव में हिंदुओं को संगठित करने, अखाड़े बनाने और स्वयंसेवक दल खड़े करने की बात कही थी। महामना हिंदू संगठन का कार्य स्वयं नहीं कर सके, परन्तु यह कार्य अवश्य होना चाहिये, यह उन्होंने अपने भाषणों में प्रबलता से आग्रह किया था। दिनांक 19 अगस्त 1923 को बनारस में आयोजित अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए महामना ने कहा था : ‘‘आप गली-गली हिन्दू मन्दिरों की रखवाली नहीं कर सकते। आप को हिन्दू जाति की शक्ति को जगाना है कि जिससे कोई आप पर हाथ न उठावे, उस शक्ति को जगाना है कि जिस से आप पृथ्वी पर ऊँचा माथा करके इज्जत के साथ चल सकें। इसलिये हिन्दू-संगठन की आवश्यकता है।’’ ‘संघ शक्ति कलौयुगे’-यह ध्येयवाक्य भी महामना ने दिया था जिसे संघ ने ग्रहण किया। डॉ. हेडगेवार भी हिंदू महासभा और काँग्रेस दोनों से जुड़े थे और महामना के विचारों के अवश्य प्रेरित थे। हालांकि संघ की स्थापना के मुख्य प्रेरणा-स्रोत केवल महामना ही नहीं थे। सन् 1923 में नागपुर के मुस्लिम दंगे, खि़लाफ़त आंदोलन से हेडगेवार का काँग्रेस से मोहभंग तथा स्वराज्य-आन्दोलन से जुड़े दूसरे बहुत से खट्टे-मीठे अनुभव लेने के बाद डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना करने की दिशा में चिन्तन प्रारम्भ किया।
2. वीर सावरकर की पुस्तक ‘हिन्दुत्व : हु इज़ अ हिंदू?’
किसी साहित्य से डॉ. हेडगेवार सर्वाधिक प्रभावित हुए, वह पुस्तक थी स्वातन्त्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर (1883-1966) की ‘हिन्दुत्व : हु इज़ अ हिंदू?’ सन् 1923 में प्रकाशित वीर सावरकर की इस पुस्तक का ‘अकाट्य तर्क और स्पष्टता’ वाला विवेचन डॉ. हेडगेवार के हृदय को छू गया।
3. महाराष्ट्र के अखाड़ों/व्यायामशालाओं से दैनिक शाखा की प्रेरणा
व्यक्ति-निर्माण तथा क्रमशः हिंदू संगठन हेतु प्रतिदिन एक घण्टे की शाखा की अनूठी संरचना- यह डॉ. हेडगेवार का पूर्णतया मौलिक आविष्कार था। संघ की शुरुआत में स्वयंसेवक पहले स्थानीय व्यायामशालाओं (जैसे अन्ना खोटे की) में जाते थे। रविवार को इकट्ठा होते थे (एकत्रीकरण)। बाद में प्रतिस्पर्धा और असुविधा के कारण सन् 1926 में डॉ. हेडगेवार ने मोहिते का बाड़ा में दैनिक एक घण्टे की शाखा शुरू की जिसमें व्यायाम, खेल और बाद में बौद्धिक शामिल किए गये। अखाड़ों/व्यायामशालाओं के अतिरिक्त बैडेन-पॉवेल (1857-1941) के स्काउट आन्दोलन में दैनिक अनुशासन, टोली व्यवस्था, ध्वज, खेल, चरित्र-निर्माण आदि पर बल था। संघ की प्रारम्भिक कार्यपद्धति में स्काउट आन्दोलन की झलक दिखाई देती है। शाखा की सभी गतिविधियाँ डॉ. हेडगेवार के जीवन-काल में सुनिश्चित नहीं की गई थीं, इनमें बाद में भी परिष्कार सुधार हुए, परन्तु मूल स्वरूप वैसा ही रहा जैसा डॉ. हेडगेवार के समय में था।
4. भारतीय पारम्परिक शस्त्र-प्रशिक्षण एवं विशेषतः मराठा सैन्य परम्परा से प्रेरित शस्त्राभ्यास (भाला, तलवार, छुरिका, वेत्रचर्म)
शाखा और प्रारम्भिक ओ.टी.सी. (ऑफ़िसर्स ट्रेनिंग कैम्प, 1927-29, अब संघ शिक्षा वर्ग) में मराठा/पारम्परिक भारतीय मार्शल आर्ट्स (नियुद्ध, दण्डयुद्ध) के प्रभाववश भाला, दण्ड (लाठी), तलवार, छुरिका (छुरी) और वेत्रचर्म (बेंत और ढाल) का प्रशिक्षण शामिल था। अंग्रेज़ी शासनकाल में तथा स्वातन्त्र्योत्तर भारत में भाला, तलवार, छुरिका और वेत्रचर्म का प्रशिक्षण शासनादेश से क्रमशः समाप्त कर दिए गये। संघ के गणवेश में दण्ड प्रमुख रही जो आज भी है।
5. मिलिट्री आज्ञाओं, पदनाम, आदि शब्दावली का स्वदेशीकरण
संघ की शाखा में शुरुआती दिनों में कुछ आज्ञाएँ अंग्रेज़ी में दी जाती थीं। बाद में इन आज्ञाओं का स्वदेशीकरण हुआ तथा संस्कृत और कुछ मराठी में आज्ञाएँ दी जाने लगीं जो छत्रपति शिवाजी की मराठा सेना से प्रेरित थीं। मराठा राज संगठन के इतिहास में व्यवहृत शब्दों (‘सरसेनापति’, ‘सरकार्यवाह’, ‘सरसंघचालक’ इत्यादि) को संघ में स्थान देना डॉ. हेडगेवार की इतिहास-दृष्टि का अनुपमेय उदाहरण है।
6. मराठा-साम्राज्य का भगवा ध्वज
डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना (सन् 1925) के समय से ही भगवा ध्वज को संगठन का सर्वोच्च प्रतीक और गुरु स्वीकार किया। यह निर्णय प्रामाणिक रूप से उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज और मराठा साम्राज्य की परम्परा से लिया। भगवा (केसरिया) ध्वज छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना का प्रमुख ध्वज था। मराठा काल में यह शौर्य, त्याग, स्वराज्य और विदेशी शासन के विरुद्ध हिन्दू-प्रतिरोध का प्रतीक माना जाता था। नागपुर के भोसले शासक इसी ध्वज का प्रयोग करते थे, जिससे डॉ. हेडगेवार का परिचय बाल्यावस्था से ही था। भगवा ध्वज सदियों से भारतीय संस्कृति और राष्ट्रधर्म का श्रद्धेय प्रतीक रहा है; संघ ने इसे अपनाया, न कि स्वयं गढ़ा। सन् 1928 में प्रथम गुरुपूजनोत्सव में औपचारिक रूप से भगवा ध्वज का पूजन प्रारम्भ हुआ, जो अनवरत चला आ रहा है। स्वयंसेवक इसी ध्वज के समक्ष गुरुदक्षिणा अर्पित करते हैं। इस प्रकार डॉ. हेडगेवार का निर्णय ऐतिहासिक निरंतरता का था। उन्होंने शिवाजी महाराज द्वारा प्रयुक्त भगवा ध्वज को संघ का आदर्श, गुरु और राष्ट्रीय आदर्शों का प्रतीक स्वीकार कर संगठन को व्यक्ति-पूजा से मुक्त रखते हुए सांस्कृतिक-ऐतिहासिक परम्परा से जोड़ा।
7. डॉ. मुंजे का प्रभाव और श्री मार्तण्डराव जोग का निर्देशन
डॉ. हेडगेवार के गुरुतुल्य, अभिभावक, मार्गदर्शक, अनन्य सहयोगी और हिंदू महासभा के प्रमुख नेता और राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे (1872-1948) अपने देश में मिलिट्री-शिक्षण के सबसे प्रबल समर्थक थे। यहाँ तक कि डॉ. मुंजे ने मार्च 1931 में इटली का दौरा किया, मिलिट्री स्कूलों को देखा तथा प्रधानमंत्री मुसोलिनी से भी मुलाकात की। डॉ. मुंजे ने मुसोलिनी की व्यवस्था को हिंदू समाज के ‘सैन्य पुनरुत्थान’ के लिए एक महत्त्वपूर्ण मॉडल के रूप में देखा। भारत लौटकर उन्होंने नासिक में ‘भोंसला मिलिट्री स्कूल’ की स्थापना की। संघ यद्यपि सन् 1925 में ही स्थापित हो चुका था, तथापि संघ में दिए जानेवाले सैन्य प्रशिक्षण पर डॉ. मुंजे के विचारों का भारी प्रभाव पड़ा। डॉ. मुंजे के अतिरिक्त संघ में मिलिट्री शिक्षा को चरितार्थ करने का कार्य जिस महापुरुष ने किया वे थे संघ के प्रथम और अन्तिम सरसेनापति श्री मार्तण्डराव जोग (1899-1981)। प्रथम विश्वयुद्ध के अनुभवी सैनिक और अवकाशप्राप्त अधिकारी श्री जोग ने संघ के प्रारम्भिक वर्षों में स्वयंसेवकों के शारीरिक प्रशिक्षण, अनुशासन और परेड की व्यवस्था संभाली। डॉ. हेडगेवार के घनिष्ठ सहयोगी के रूप में वे घर-घर जाकर शाखाओं के लिए बालक और युवक जुटाते थे, संघ शिक्षा वर्गों की व्यवस्था में सक्रिय रहते थे। कांग्रेस सेवा दल के प्रमुख रहते हुए भी श्री जोग हिंदुत्व-प्रेमी स्वयंसेवक बने रहे, विजयदशमी पथ-संचलनों में तलवार और भगवा ध्वज लेकर घोड़े पर सवार होते थे तथा संघ के संगठनात्मक ढाँचे को मज़बूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।
8. कांग्रेस स्वयंसेवक दल की यूनिफॉर्म से प्रेरणा
सन् 1920 के नागपुर काँग्रेस अधिवेशन के लिए श्री लक्ष्मण वामन परांजपे के ’भारत स्वयंसेवक मंडल’ (जिसमं् हेडगेवार सक्रिय थे) ने स्वयंसेवकों को संगठित किया। उनकी यूनिफॉर्म (खैकी शर्ट, शॉर्ट्स, टोपी) को देखकर डॉ. हेडगेवार को प्रेरणा मिली। इसी प्रकार पुलिस, सेना, ब्वायज स्काउट तथा काँग्रेस स्वयंसेवक दल-सभी की यूनिफ़ॉर्म से संघ ने प्रेरणा ली। यह कहना उचित होगा कि समकालीन स्वयंसेवक संगठनों एवम् औपनिवेशिक सैन्य-पुलिस वेशभूषा से प्रेरित खाकी गणवेश को प्रारम्भ में संघ ने अंगीकार किया। बाद में (सन् 1930 के आसपास) काली टोपी आदि बदलाव हुए।
अन्त में यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि ऊपर प्रस्तुत विश्लेषण मेरे व्यक्तिगत अध्ययन, संघ-कार्य से जुड़े अनुभवों तथा उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर किया गया है। डॉ. हेडगेवार के प्रेरणा-स्रोतों की यह व्याख्या किसी एकमात्र या अन्तिम निष्कर्ष का दावा नहीं करती। इतिहास के कई पक्षों पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण विद्यमान हैं। उदाहरण के लिए, महामना मालवीय जी के हिंदू-संगठन संबंधी विचारों, वीर सावरकर की ‘हिन्दुत्व’ पुस्तक के प्रभाव, मराठा सैन्य परम्परा से लिए गए शस्त्राभ्यास तथा भगवा ध्वज की स्वीकृति, स्काउट आंदोलन एवं काँग्रेस स्वयंसेवक दलों की कार्यशैली से ली गई प्रेरणा आदि तथ्य ऐतिहासिक दस्तावेज़ों तथा समकालीन संस्मरणों के आधार पर निकाले गए मेरे निष्कर्ष हैं। तथापि इन सबके सापेक्षिक महत्त्व और प्रभाव की मात्रा को लेकर इतिहासकारों तथा संघ-विचारकों/पदाधिकारियों में मतभेद हो सकते हैं। मेरा प्रयास केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आलोक में उन तत्त्वों को रेखांकित करने का रहा है, जिन्होंने डॉ. हेडगेवार के चिन्तन और संघ की प्रारंभिक संरचना को आकार दिया। यह लेख रा.स्व. संघ का आधिकारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि मेरा व्यक्तिगत आकलनमात्र है। पाठक स्वतंत्र रूप से मूल स्रोतों का अध्ययन कर अपनी दृष्टि विकसित कर सकते हैं।
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