Rukmangal singh yadav Advocate

Rukmangal singh yadav Advocate Chairman at Varist nagrik kalyaan samiti. senior most lawyer of bareilly region . contact for free j

मेरे पति के साथ मेरा कोल्ड वार चल रहा था पूछिए क्यों ? दो महीने पहले मेरे ससुर की मृत्यु हृदयाघात से हो गई थी। वे गाँव क...
14/06/2025

मेरे पति के साथ मेरा कोल्ड वार चल रहा था पूछिए क्यों ? दो महीने पहले मेरे ससुर की मृत्यु हृदयाघात से हो गई थी। वे गाँव के सरकारी स्कूल में गणित के शिक्षक थे। वहीं गाँव में ही उन्होंने दोमंजिला घर बनवाया था और आराम से रह रहे थे।

उनके दो बेटे थे। मेरे पति विजय बडे बेटे हैं। हम हैदराबाद में रहते हैं। हमारी दो बेटियाँ हैं रंजना और शैलजा दोनों ही हाई स्कूल में पढती हैं। मेरे पति बैंक में काम करते हैं। मेरा देवर संजय पूने में चार्टड एकाउंटेंट हैं उनकी पत्नी प्रभा साफ्टवेयर इंजिनीयर है। उनका एक ही बेटा है जो अभी छोटी कक्षा में पढता है। यह है मेरा परिवार अब बात यहीं पर पूरी नहीं हो जाती है। मैंने आप लोगों को यह बताया था कि मेरे पति मुझसे नाराज हैं ससुर जी की मृत्यु के बाद वे सासुमाँ को हमारे पास रखना चाहते थे।

जब मेरे पति माँ से कह रहे थे कि माँ मेरे साथ चलो मेरा दिल धक से रह गया मैं नहीं चाहती थी कि वे मेरे घर में आकर मुझ पर राज करें। उसी समय सासु मां ने कहा कि यहाँ मुझे सब जानते हैं तुम्हारे पिताजी का अच्छा नाम है तो जरूरत पर सब मदद कर देंगे इसलिए मैं कुछ दिन यहीं रह जाऊँगी तुम्हारे पास फिर कभी आ जाऊँगी। यह सुनकर मुझे मेरी सासु माँ पर प्यार आ गया था। मैंने सोचा चलो उन्होंने खुद आने से साफ मना कर दिया है। हम सब वापस आ गए थे। अभी मैं सुकून की साँस भी नहीं ली थी

कि गाँव से खबर आई कि माँ थोडी सी बीमार है बस उस दिन से इन्होंने रट लगा रखी कि माँ को घर ले आएँगे। मैं सासु माँ को यहाँ लाने के खिलाफ थी। मैं कहती कि घर छोटा है उन्हें कहाँ रखेंगे। यह सुनकर कहने लगे कि चार कमरों का नया घर ले लेंगे परंतु माँ यहाँ जरूर आएगी। उसी बात को लेकर हम दोनों के बीच अनबन हो गई और वे मुझसे रूठ गए हैं।. मेरी सहेली का फोन आया तो बात करने लगी। उसी ने मुझे सलाह दिया था कि सास को अपने साथ मत रखो बाद में तुम्हें भुगतना पड़ेगा।

मेरे पति ने भी ऐसे ही सास को लाने की जिद की थी तो मैंने हंगामा कर दिया तब जाकर पति ने मेरी बात मानी थी। उसकी बातों को सुनकर मैं और भी उदास हो गई थी। सोचा बाद में इसके बारे में सोचती हूं अभी अपनी उदासी को दूर करने के लिए शापिंग के लिए निकल जाती हूँ। मैं ऐसी हूँ कि शापिंग के लिए भी किसी को नहीं लेकर जाती हूँ। मुझे अकेले सुकून से घूमना पसंद है। मैं तैयार होकर निकलने वाली ही थी कि पति देव का फोन आया सोचा कि अभी मुझपर मेहरबान क्यों हो रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी माँ को ला रहे हों हे भगवान अब मैं क्या करूँ? फोन उठाऊँ तो मालूम नहीं कौन सी खबर सुनने को मिलेगी ना उठाऊं तो उनका मुँह और फुल जाएगा। जो होगा देखा जाएगा सोचकर फोन उठाकर हेलो कहा वहाँ से पति देव ने कहा कि देखो शालू मेरे ख्याल से तुम शापिंग को जाने वाली हो पैसे तुम्हारे पर्स में रखा दिए हैं और बीच में रोड वाइडनिंग की वजह से ट्राफिक का रास्ता बदल दिया गया है । इसलिए मैं ड्राइवर को भेज रहा हूं तुम केब में मत जाना।

उनकी बातें सुनते ही मुझे उन पर प्यार आ गया था । एक बार को लगा कि उनकी बात मान लूँ क्या? परंतु दिल ने कहा अरे! ऐसी भूल मत करना । मैंने भी ठीक है थैंक्यू कहते हुए फोन रख दिया । मैं तैयार हुई भी कि नहीं ड्राइवर रतनलाल ने बाहर से आवाज दी जल्दी से मैंने डोर लॉक किया आकर कार में बैठ गई। मैं दो तीन दुकानों में घूमी और आगे थोड़ी दूर हम पहुँचे ही थे कि हमारी कार खराब हो गई थी ।

रामलाल ने उसे ठीक करने की कोशिश की थी परंतु उससे नहीं हो पाया था तो वह मेरे पास आकर कहने लगा कि मेम साहब मैं मेकेनिक को बुलाकर ठीक करवाता हूँ। आप बुरा न मानें तो मेरा घर पास ही है आप चलकर थोड़ी देर बैठ जाएँ । मेरा मूड. शापिंग करने का नहीं था इसलिए सोचा चलो एक बार घूम आती हूँ। इसी बहाने इन लोगों के घर कैसे होते हैं देख लुंगी। मैंने हामी भरी और उसके साथ उसके घर की तरफ चल पड़ी ।

उनका घर छोटा सा था। घर के सामने एक छोटा सा बरामदा था जहाँ एक बुजुर्ग आदमी बैठकर पेपर पढ़ रहे थे। उसी समय रामलाल की पत्नी अंदर से आई और मुझे अपने साथ अंदर ले गई। मैंने देखा अंदर एक छोटा सा कमरा है वहीं एक कोने में रसोई का सामान रखा हुआ था शायद वह रसोई है कोने में पलंग है पलंग के पास एक बुजुर्ग महिला चुपचाप बैठी हुई थी और पलंग पर तीन लडक़ियाँ बैठ कर पढ़ रही थी। मेरे लिए एक कुर्सी लाकर रामलाल ने मेरे लिए लाकर रखा और कहा मेम साहब बैठिए मैं अभी आता हूँ।

रामलाल की पत्नी सुशीला मेरे पास आई और कहा कि दीदी चाय बनाकर लाती हूँ। मैंने मना किया तो कहा कि दीदी मैं बहुत अच्छी चाय बनाती हूं मना मत कीजिए मैंने कहा ठीक है बना लो। वह चाय बनाने गई तो मैंने लडकियों से बात करना शुरू किया और उनसे पूछने लगी कि बेटे आप लोग इतने छोटे से कमरे में सोते कैसे हैं। उनसे पूछने के बाद मुझे लगा कि बच्चों से ऐसे प्रश्न नहीं पूछना चाहिए था।

बडी बेटी ने कहा कि आंटी दादा दादी बाहर बरामदे में सो जाते हैं और हम तीनों पलंग पर माँ पापा जमीन पर सो जाते हैं। हाँ अगर बारिश हो जाती है तो दादा दादी पलंग पर और हम सब जमीन पर सो जाते हैं। इतने में ही सुशीला चाय लेकर आ गई थी। मैंने जैसे ही चाय का एक घूँट पिया और सुशीला से कहा चाय सचमुच ही बहुत ही अच्छी बनी है। हम एक दूसरे से बातें करने लगे ये तब उसने बताया था कि राम लाल के दो भाई और हैं लेकिन वे दूसरे शहरों में रहते हैं और वे इन्हें अपने पास नहीं रखना चाहते हैं लेकिन दीदी अपने ही अपनों के काम नहीं आए तो क्या फायदा है कहिए कल को हमारी तो तीन हैं हमें भी किसी के सहारे की जरूरत पड़ेगी है ना। मैंने तो इनसे कह दिया कि माँ पापा हमारे साथ ही रहेंगे। हमारा घर छोटा है तो क्या हुआ दिल तो बड़ा है ना। मैंने पूछा कि सास बातें नहीं कहती हैं।

उसने हँसते हुए कहा कि जब मैं शादी करके आई थी तब सासु माँ दूसरों के घरों में काम करती थी। मैंने जैसे ही काम करना शुरू किया तो वे घर पर रहकर मेरे बच्चों को संभाल लेती हैं। हाँ कभी कभी बहुत गुस्सा होती हैं हम सबको बातें सुनाती हैं परंतु हम सब उनकी बातें दिल से नहीं लगाते हैं। देखिए ना दीदी जहाँ डाँट होती है वहाँ अपनापन होता है। मैं अभी कुछ कहता रामलाल आ गया कि चलिए मेम साहब गाड़ी ठीक हो गई है।

मैं सीधे घर चली गई थी दिलमें हलचल चल रही थी बार बार सुशीला के कहे हुए शब्द कानों में गूंज रहे थे कि अपने ही तो अपनों के काम आते हैं ना दीदी।

शाम को पति घर पहुचे तो मैं चाय का प्याला लेकर उनके पास गई और कहा कल हम माँ को लेने चलते हैं। यह सुनते ही मेरे पति आश्चर्य से मुझे देखने लगे और कहा सच? मैंने जैसे ही हाँ में अपना सर हिलाया तो मेरा नाराज पति अपनी नाराजगी को भूल कर मुझे थैंक्यू कहते हुए गले लगा लिया और मुझे अपने निर्णय पर गर्व हुआ। fans

04/04/2025
🤔जिब्रान की प्रसिद्ध कहानी है कि एक मछली बेचने वाली औरत गांव से शहर मछली बेचने आई। मछलियां बेच कर जब लौटती थी तो अचानक ब...
04/11/2024

🤔जिब्रान की प्रसिद्ध कहानी है कि एक मछली बेचने वाली औरत गांव से शहर मछली बेचने आई। मछलियां बेच कर जब लौटती थी तो अचानक बाजार में उसे बचपन की एक सहेली मिल गई। वह सहेली अब मालिन हो गई थी। उस मालिन ने कहा, आज रात मेरे घर रुको! कल सुबह होते ही चले जाना। कितने वर्षों बाद मिले, कितनी-कितनी बातें करने को हैं!

मछली बेचने वाली औरत मालिन के घर रुकी। मालिन का घर बगिया से घिरा हुआ। फिर पुरानी सहेली की सेवा मालिन ने खूब दिल भर कर की। और जब सोने का समय आया और मालिन सोई, तो इसके पहले कि वह सोती, बगिया में गई, चांद निकला था, बेले के फूल खिले थे, उसने बेलों की झोली भर ली और बैलों का ढेर अपनी सहेली उस मछली बेचने वाली औरत के पास आकर लगा दिया, कि रात भर बेलों की सुगंध! लेकिन थोड़ी देर बाद मालिन परेशान हुई, क्योंकि मछली बेचने वाली औरत सो ही नहीं रही, करवट बदलती है बार-बार। पूछा कि क्या नींद नहीं आ रही है?

उसने कहा, क्षमा करो, ये फूल यहां से हटा दो। और मेरी टोकरी, जिसमें मैं मछलियां लाई थी, उस पर जरा पानी छिड़क कर मेरे पास रख दो।
मालिन ने कहा, तू पागल हो गई है?

उसने कहा, मैं पागल नहीं हो गई। मैं तो एक ही सुगंध जानती हूं: मछलियों की। और बाकी सब दुर्गंध है।

भीड़ मछलियों की गंध को जानती है। उससे परिचित है। शास्त्रों के पिटे-पिटाए शब्द दोहराए जाएं तो भीड़ उनसे राजी होती है, क्योंकि बाप-दादों से वही सुने हैं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी वही सुने हैं। सुनते-सुनते उनके कान भी पक गए हैं। वे ठीक लगते हैं।

मैं उनसे वह कह रहा हूं जो मेरी प्रतीति है, मेरा अनुभव है। और मजा यह है कि मैं उनसे वह कह रहा हूं जो कि शास्त्रों की अंतर्निहित आत्मा है। मगर शास्त्रों के शब्द मैं उपयोग नहीं कर रहा हूं। शब्द तो पुराने पड़ गए। शब्द तो बदल दिए जाने चाहिए। अब तो हमें नये शब्द खोजने होंगे। हर सदी को अपने शब्द खोजने होते हैं। हर सदी को अपने धर्म के लिए पुनः-पुनः अवतार देना होता है। हर सदी को अपनी अभिव्यक्ति खोजनी होती है।

तो मैं वही कह रहा हूं जो बुद्ध ने कहा, कृष्ण ने कहा, मोहम्मद ने कहा, जीसस ने कहा; लेकिन अपने ढंग से कह रहा हूं। मैं बीसवीं सदी का आदमी हूं। मैं चाहूं भी तो कृष्ण की भाषा नहीं बोल सकता। कृष्ण की भाषा अब किसी अर्थ की भी नहीं है। सार्थक थी उस दिन जिस दिन अर्जुन से कृष्ण बोले थे। आज न तो अर्जुन है, न कुरुक्षेत्र है, न महाभारत हो रहा है। आज कृष्ण की गीता पर अगर कुछ कहना भी हो तो बीसवीं सदी की भाषा में कहना होगा। और तुम्हारी आदत शब्दों को पकड़ने की है, आत्मा को पहचानने की नहीं।

तो भीड़ मेरे नये शब्दों से परेशान है, मेरी नई दृष्टि से परेशान है। जो समझ सकते हैं, वे तो तत्क्षण पहचान लेते हैं कि मैं वही कह रहा हूं जो सदा कहा गया है। भाषा भिन्न है, भाव भिन्न नहीं है। अभिव्यंजना भिन्न है। शायद मेरा वाद्य भिन्न है, मगर जो गीत मैं गा रहा हूं वह शाश्वत का गीत है, सनातन गीत है। उसके अतिरिक्त कोई गीत ही नहीं है। मैं तो हूं भी नहीं, परमात्मा जो गा रहा है उसे ही बिना बाधा डाले तुम तक पहुंच जाने दे रहा हूं। मगर भीड़ की अपनी आदतें हैं।

जो कारागृहों में रहने के आदी हो गए हैं, उन्हें मुक्त करना आसान नहीं। जो अंधविश्वासों में जीने के आदी हो गए हैं, उनको उनके बाहर लाना आसान नहीं। जिन्होंने कुछ पक्षपात निर्मित कर लिए हैं, पक्षपात ही जिनके प्राण बन गए हैं, उनसे उनके पक्षपात छीनना आसान नहीं। मेरे हाथ लहूलुहान होंगे।

आइये नवरात्र में कुछ समझते और समझाते है...प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतु...
05/10/2024

आइये नवरात्र में कुछ समझते और समझाते है...

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।

नवदुर्गा का पाठ करने वाले भली भांति परिचित होंगे इस श्लोक से। मैं भी नवरुपों को याद करने के लिए इसी श्लोक का स्मरण करता हूँ।

माँ के सात रूपों को आप महसूस करते सकते है।

#शैलपुत्री- सम्पूर्ण जड़ पदार्थ भगवती का पहला स्वरूप हैं पत्थर मिट्टी जल वायु अग्नि आकाश सब शैल पुत्री का प्रथम रूप हैं। इस पूजन का अर्थ है प्रत्येक जड़ पदार्थ में परमात्मा को महसूस करना।
#ब्रह्मचारिणी- जड़ में ज्ञान का प्रस्फुरण, चेतना का संचार भगवती के दूसरे रूप है।
#चंद्रघंटा- तीसरा जीव में वाणी है।
#कुष्मांडा- अर्थात अंडे को धारण करने वाली; स्त्री और पुरुष की गर्भधारण, गर्भाधान शक्ति है।
#स्कन्दमाता- पुत्रवती माता-पिता का स्वरूप है। प्रत्येक माता पिता इनका ही स्वरूप है।
#कात्यायनी- के रूप में वही भगवती कन्या की माता-पिता हैं। देवी का छठा स्वरुप है।
#कालरात्रि- देवी भगवती सब जड़ चेतन मृत्यु को प्राप्त होते हैं ओर मृत्यु के समय सब प्राणियों को इस स्वरूप का अनुभव होता है।
8 और 9 ये स्वरूप #महागौरी और #सिद्धिदात्री इस स्वरूप का दर्शन, स्पर्श, अनुभव किसी को हासिल नही है। #महागौरी ज्ञान और बोध का प्रतीक है जो जन्मों के साधना से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसे प्राप्त करके साधक परम् सिद्ध हो जाता है तब #सिद्धिदात्री के स्वरूप से हो जाता है।

अब इन नवरुपों को आयुर्वेद के माध्यम से समझिये।

नवदुर्गा नौ विशिष्ट औषधियों में हैं।

#शैलपुत्री (हरड़) : कई प्रकार के रोगों में काम आने वाली यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। इसके 7 प्रकार है पथया, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी।
#ब्रह्मचारिणी (ब्राह्मी) : आयु व याददाश्त बढ़ाकर, रक्तविकारों को दूर कर स्वर को मधुर बनाती है। इसलिए इसे सरस्वती भी कहा जाता है।
#चंद्रघंटा (चंदुसूर) चर्महन्ती : यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है।
#कूष्मांडा (पेठा) : इस औषधि से पेठा मिठाई बनती इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो रक्त विकार दूर कर पेट को साफ करने में सहायक है तथा मानसिक रोगों में यह अमृत समान है।
#स्कंदमाता (अलसी) : देवी स्कंदमाता औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त व कफ रोगों की नाशक औषधि है।
#कात्यायनी (मोइया) : आयुर्वेद में इन्हें कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका व अम्बिका। यह औषधि कफ, पित्त व गले के रोगों का नाश करती है।
#कालरात्रि (नागदौन) : यह नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती हैं। यह सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी और मन एवं मस्तिष्क के विकारों को दूर करने वाली औषधि है।
#महागौरी (तुलसी) : सात प्रकार की होती है सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरूता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये रक्त को साफ कर ह्वदय रोगों का नाश करती है।
#सिद्धिदात्री (शतावरी) : जिसे नारायणी शतावरी कहते हैं। यह बल, बुद्धि एवं विवेक के लिए उपयोगी है।

कहने का तातपर्य बस इतना कि जब भी हम #नारी के किसी भी स्वरूप बहन, बेटी,माँ, पत्नी, बहु, मित्र या अन्य किसी स्वरूप को, #अपमानित, #प्रताड़ित, #तिरस्कृत करते है तो हम अपने जड़चेतन अग्नि,वायु, जल साथ ही साथ अपने जीवन मे काम आने वाले उन बहुमूल्य, जीवन रक्षक औषधियों का भी अपमान और तिरस्कार करते है जिनके बिना हमारा जीवन एक कदम और एक पल भी फलफूल नही सकता।

जब भी ऐसी बातें लिखता हूँ, या पढ़ता हूँ, तो बैठता हूँ अपना अवलोकन करने... की क्या मैं ऐसा हूँ.....?? और फिर यहीं से शुरू होती है। सुधार, आत्मचिंतन, आत्मावलोकन की प्रक्रिया। क्योंकि वो कहते है ना.....

"पर उपदेश, कुशल बहुतेरे"

साभार... दुर्गासप्तशती, चरक संहिता

*एक बार दशहरा बीत चुका था , दीपावली समीप थी , तभी एक दिन कुछ युवक - युवतियों की NGO टाइप टोली एक कॉलेज में आई !**उन्होंन...
03/10/2024

*एक बार दशहरा बीत चुका था , दीपावली समीप थी , तभी एक दिन कुछ युवक - युवतियों की NGO टाइप टोली एक कॉलेज में आई !*

*उन्होंने छात्रों से कुछ प्रश्न पूछे ; किन्तु एक प्रश्न पर कॉलेज में सन्नाटा छा गया !*

*उन्होंने पूछा , " जब दीपावली भगवान राम के 14 वर्षो के वनवास से अयोध्या लौटने के उत्साह में मनाई जाती है , तो दीपावली पर " लक्ष्मी पूजन " क्यों होता है ? श्री राम की पूजा क्यों नही ?"*

*प्रश्न पर सन्नाटा छा गया , क्यों कि उस समय कोई सोशल मीडिया तो था नहीं , स्मार्ट फोन भी नहीं थे ! किसी को कुछ नहीं पता ! तब , सन्नाटा चीरते हुए , हममें से ही एक हाथ , प्रश्न का उत्तर देने हेतु ऊपर उठा !*

*उसने बताया कि " दीपावली " उत्सव दो युग " सतयुग " और " त्रेता युग " से जुड़ा हुआ है !"*

*" सतयुग में समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी उस दिन प्रगट हुई थी !" इसलिए " लक्ष्मी पूजन " होता है !*

*भगवान श्री राम भी त्रेता युग मे इसी दिन अयोध्या लौटे थे ! तो अयोध्या वासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था ! इसलिए इसका नाम दीपावली है !*

*इसलिए इस पर्व के दो नाम हैं , " लक्ष्मी पूजन " जो सतयुग से जुड़ा है , और दूजा " दीपावली " जो त्रेता युग , प्रभु श्री राम और दीपो से जुड़ा है !*

*हमारे उत्तर के बाद थोड़ी देर तक सन्नाटा छाया रहा , क्यों कि किसी को भी उत्तर नहीं पता था ! यहां तक कि प्रश्न पूछ रही टोली को भी नहीं !*
*बाद में पता चला , कि वो टोली आज की शब्दावली अनुसार " लिबरर्ल्स " ( वामपंथियों ) की थी , जो हर कॉलेज में जाकर युवाओं के मस्तिष्क में यह बात डाल रही थी , कि " लक्ष्मी पूजन " का औचित्य क्या है , जब दीपावली श्री राम से जुड़ी है ?" कुल मिलाकर वह छात्रों का ब्रेनवॉश कर रही थी !*

*लेकिन हमारे उत्तर के बाद , वह टोली गायब हो गई !*

*एक और प्रश्न भी था , कि लक्ष्मी और श्री गणेश का आपस में क्या रिश्ता है ?*

*और दीपावली पर इन दोनों की पूजा क्यों होती है ?*

*सही उत्तर है :*

*लक्ष्मी जी जब सागर मन्थन में मिलीं , और भगवान विष्णु से विवाह किया , तो उन्हें धन और ऐश्वर्य की देवी बनाया गया, उन्होंने धन को बाँटने के लिए मैनेजर कुबेर को बनाया !*
*कुबेर कुछ कंजूस वृति के थे ! वे धन बाँटते नहीं थे , स्वयं धन के भंडारी बन कर बैठ गए !*

*माता लक्ष्मी परेशान हो गई ! उनकी सन्तान को कृपा नहीं मिल रही थी !*

*उन्होंने अपनी व्यथा भगवान विष्णु को बताई ! भगवान विष्णु ने उन्हें कहा , कि " तुम मैनेजर बदल लो !"*

*माँ लक्ष्मी बोली : " यक्षों के राजा कुबेर मेरे परम भक्त हैं ! उन्हें बुरा लगेगा !"*

*तब भगवान विष्णु ने उन्हें श्री गणेश जी की दीर्घ और विशाल बुद्धि को प्रयोग करने की सलाह दी !*

*माँ लक्ष्मी ने श्री गणेश जी को " धन का डिस्ट्रीब्यूटर " बनने को कहा !*

*श्री गणेश जी ठहरे महा बुद्धिमान, वे बोले : " माँ, मैं जिसका भी नाम बताऊंगा , उस पर आप कृपा कर देना ! कोई किंतु , परन्तु नहीं !" माँ लक्ष्मी ने हाँ कर दी !*

*अब श्री गणेश जी लोगों के सौभाग्य के विघ्न / रुकावट को दूर कर उनके लिए धनागमन के द्वार खोलने लगे !*

*कुबेर भंडारी ही बनकर रह गए ! श्री गणेश जी पैसा प्रदान करने वाले बन गए !*

*गणेश जी की दरियादिली देख , माँ लक्ष्मी ने अपने मानस पुत्र श्री गणेश को आशीर्वाद दिया , कि जहाँ वे अपने पति नारायण के सँग ना हों , वहाँ उनका पुत्रवत गणेश उनके साथ रहें !*

*दीपावली आती है कार्तिक अमावस्या को ! भगवान विष्णु उस समय योगनिद्रा में होते हैं ! वे जागते हैं ग्यारह दिन बाद , देव उठावनी एकादशी को !*

*माँ लक्ष्मी को पृथ्वी भ्रमण करने आना होता है , शरद पूर्णिमा से दीवाली के बीच के पन्द्रह दिनों में , तो वे सँग ले आती हैं श्री गणेश जी को ! इसलिए दीपावली को लक्ष्मी - गणेश की पूजा होती है !*
🙏🌹🙏
*( यह कैसी विडंबना है , कि देश और हिंदुओ के सबसे बड़े त्यौहार का पाठ्यक्रम में कोई विस्तृत वर्णन नहीं है ? औऱ जो वर्णन है , वह अधूरा है !)*

*इस लेख को पढ़ कर स्वयं भी लाभान्वित हों , अपनी अगली पीढी को बतायें और दूसरों के साथ साझा करना ना भूलें !*

एक गांव में एक बड़ा साहूकार रहता था। साहूकार बहुत पैसे वाला था। आसपास के कई गांव में उसका बड़ा नाम था। लेकिन इस साहूकार ...
30/09/2024

एक गांव में एक बड़ा साहूकार रहता था। साहूकार बहुत पैसे वाला था। आसपास के कई गांव में उसका बड़ा नाम था। लेकिन इस साहूकार को अपने पैसों का, अपने रुतबे का और अपने नाम का बड़ा ही घमंड था। वह अपने नाम को बनाए रखने के लिए बहुत ज्यादा सोचता था और बिना किसी के भावनाओं की कद्र किए, वो सब करता था जो उसे लगता था कि करना चाहिए।

साहूकार को कई सालों बाद एक संतान प्राप्ति हुई थी। साहूकार ने अपने इस खुशी को मनाने के लिए अपने घर पर एक बहुत बड़ा कार्यक्रम रखा, जिसमें उसने आसपास के गांव के सभी श्रीमंत लोगों को और सिर्फ ऐसे रिश्तेदारों को जो पैसे वाले थे बुलाया था।

पास के ही गांव में साहूकार की खुद की सगी बहन भी रहती थी क्योंकि इन दिनों उसकी आर्थिक परिस्थिति कुछ अच्छी नहीं थी इसलिए उसने अपनी बहन को तक इस कार्यक्रम के लिए नहीं बुलाया।

साहूकार ने जिस कार्यक्रम का आयोजन किया था वह इतना भव्य था और इसके अलावा उसमें इतने प्रसिद्ध और श्रीमंत लोग आने वाले थे कि इस कार्यक्रम की चर्चाएं हर गांव में होने लगी। यह खबर उस साहूकार की बहन तक भी पहुंच गई।

बहन को यह जानकर बहुत ज्यादा खुशी हुई कि इतने सालों बाद उसके भाई को आखिरकार संतान सुख प्राप्त हो ही गया। बहन ने सोचा की भाई गलती से उसे इस बारे में बताना भूल गया होगा और अपनों को भला कोई न्योता देता है? भोली बहनने अपने भाई के यहां उस कार्यक्रम में जाने की तैयारियां शुरू कर दी।

जिस दिन वह कार्यक्रम था उस दिन बहन सुबह सुबह ही अपने भाई के घर जाने के लिए निकल पड़ी। रास्ते में अपने पुराने मैले कपड़े देख उसे खयाल आया की अगर किसी और के घर जाना होता तो मैं ऐसे कपड़ों में जाने की सोचती भी नही लेकिन मैं तो मेरे अपने घर, मेरे मायके जा रही हूं वहां मुझे ये सब सोचने की कोई जरूरत नहीं है।

जैसे ही वह अपने मायके पहुंची वहां का भव्य आयोजन देखकर वह बहुत खुश हो गई और उसे अपने भाई पर बहुत गर्व हुआ।

वहां पर वह जल्दी से जल्दी अपने भाई को मिलकर उसकी खुशी में शामिल होना चाहती थी। वह तुरंत सीढ़ियां चढ़कर घर के अंदर प्रवेश कर गई। उसने देखा कि उसका भाई मेहमान के तौर पर आए सभी धनाढ्य और नामी लोगों का स्वागत करने में व्यस्त है।

बहन जैसे ही अपने भाई की तरफ उससे मिलने के लिए बढ़ी, उसके भाई की नजरें उस पर पड़ गई और अपनी बहन को ऐसे मैले पुराने कपड़ों में देखकर भाई ने उससे मिलना तो दूर बल्कि तुरंत बहाना बनाकर वहां से निकल गया।

बहन ने सोचा इतने लोगों में बेचारा अकेला भाई क्या क्या करें, जरूर उसे कुछ काम याद आया होगा इसलिए वहां से चला गया होगा!

बहन बाद में अपनी भाभी से मिलने गई। भाभी ने उसका स्वागत किया और उसे खाना खाने के लिए आग्रह किया। बहन ने सोचा, ठीक है पहले खाना खा लेती हूं फिर बाद में आराम से भाई से मिल लूंगी। बहन खाना खाने के लिए पंगत में बैठी।

साहूकार (भाई) ने देखा कि अपने सभी धनवान मेहमानों के बीच उसकी गरीब बहन बैठी हुई थी। सभी कीमती पोशाक पहने लोगों के बीच उसकी बहन जो पुराने मेले कपड़े पहन कर बैठी थी, यह साहूकार से देखा नहीं गया। उसने अपनी बहन को अपने पास बुलवाया, भला बुरा सुनाया और वहां से जाने के लिए कहा।

बहन ने अपने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसके साथ कभी ऐसा व्यवहार भी हो सकता है और वह भी उसके खुद के मायके में! अपना अपमान होने के बाद बहन तुरंत अपने घर ससुराल जाने के लिए चल पड़ी।

बहन इस बात को पचा ही नहीं पा रही थी कि उसके अपने भाई ने उसके साथ इतना बुरा व्यवहार किया। उसकी आंखों से आंसू नहीं थम रहे थे। रास्ते में उसे अपनी पुरानी दोस्त मिली। उस दोस्त ने उसे रोने का कारण पूछा। हाला कि बहन उसे कुछ भी नहीं बताना चाहती थी, लेकिन दोस्त के बार-बार पूछने पर उसने उसके साथ हुई सारी घटना उसे बता दी।

उसकी दोस्त एक समझदार महिला थी और काफी प्रैक्टिकल सोचने वाली थी। उसने कहा, "अगर तुम मेरी बात मानो तो 1 दिन तुम्हारा भाई खुद तुम्हें अपने यहां बुलायेगा और तुमसे माफी मांगेगा।"

बहन ने कहा, "मैं तुम्हारी हर बात मानूंगी, बताओ मुझे क्या करना होगा?" दोस्त ने कहा, "तुम इस अपमान को, इस दुख को एक दिशा दे दो और कोई गृह उद्योग शुरू कर दो, उसमें इतनी मेहनत करो कि उस काम में तुमसे अच्छा कोई भी ना हो।"

बहन को अपनी दोस्त की बात सही लगी। उसने घर पहुंच कर अपने आंसू पोंछ कर उसी दिन से एक गृह उद्योग शुरू किया। उसने दिन-रात मेहनत की, अपने साथ कई और गांव की महिलाओं को जोड़ा और देखते ही देखते उसका गृह उद्योग चल पड़ा। कुछ ही सालों में आसपास के 50 गांव में उसका नाम और रुतबा काफी बढ़ गया और अब वह पैसों के मामले में अपने भाई से भी ज्यादा बड़ी बन गई।

भाई को भी जब यह पता चला कि उसकी बहन इतनी श्रीमंत हो गई है तो उसने सोचा कि एक बार उससे मिल कर आया जाए। वह जब अपनी बहन को उसके घर मिलने पहुंचा, तो बहन ने उसका किसी राजा महाराजा की तरह स्वागत किया! उसके पसंद का खाना खिलाया। बहन का ऐसा व्यवहार देखकर भाई को अपनी पिछली गलती का एहसास हुआ, इसलिए उसने अपनी बहन को अपने घर होने वाली पूजा के लिए आमंत्रित किया।

कुछ ही दिनों बाद बहन अपने भाई के यहां उस पूजा के लिए पहुंच गई। जैसे ही बहन अपने भाई के घर पहुंची, उसका भाई उसके स्वागत के लिए दरवाजे पर ही खड़ा था। बहन अपने महंगी गाड़ी में आई थी, उसने बहुत कीमती साड़ी और उससे भी ज्यादा कीमती गहने पहन रखे थे। बहन का ऐसा ठाठ-बाट देख कर सिर्फ भाई ही नहीं, बल्कि पूरा गांव दंग रह गया।

भाई दौड़ कर आया और बहन की गाड़ी का दरवाजा खोलकर उसे बाहर आने के लिए कहा और बड़े प्यार से उसे पूजा का प्रसाद ग्रहण करने के लिए बुलाया।

बहन को इस बार 12 पकवान परोसे गए थे, चांदी की थाली में उसे खाना दिया गया था और साथ में एक सोने की चम्मच भी रखी गई थी। उसके बैठने के लिए बेशकीमती पाट रखा गया था। बहन को यह सब देखकर उसके वह पुराने दिन याद आ गए जब भाई ने उसे बिना खाना खिलाए ही भला बुरा कह कर वापस लौटा दिया था।

बहन खाना खाने के लिए तो नहीं बैठी, लेकिन उसने अपने सारे कीमती दाग-दागिने और जेवर उतारकर उस थाली के सामने रख दिए और खाने में से कुछ निवाले उन दाग-दागिनों पर रख दिए। बहन का ऐसा व्यवहार देखकर सभी हैरान थे, किसी को नहीं समझ में आ रहा था कि बहन ऐसा क्यों कर रही है, आखिर वह क्यों उन जेवरों को खाना खिला रही है?

जब सभी ने उससे पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रही है, तब बहन ने सबके सामने बताया कि आज जो उसका इतना मान-सम्मान हो रहा है वह दरअसल उसका नहीं, बल्कि उसके इन्हीं कीमती दाग-दागिनों और कपड़ों का हो रहा है। क्योंकि मैं तो अभी भी वही पुरानी साहूकार की बहन ही हूं, अगर कुछ बदला है तो वह मेरी परिस्थिति है। मेरे कपड़े और गहने हैं।

भाई को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने इस बार अपनी बहन के पैर पकड़कर माफी मांगी। बहन, जो पहले भी अपने भाई से निस्वार्थ प्रेम करती थी, उसने अपने भाई को माफ कर दिया और उसे गले से लगा लिया।

दोस्तों, पैसे सिर्फ हमारे जीवन को सरल बनाने के लिए हैं जबकि रिश्ते जीवन में मिले किसी वरदान की तरह हैं, अगर उन्हें सच्चे मन से और निस्वार्थ भाव से निभाए जाएं। पैसे खर्च हो जाएं तो आप बाद में भी कमा सकते हैं, मगर रिश्ते खर्च हो जाएं (टूट जाएं) तो दुनिया का सारा धन भी आपको उन्हें वापस नहीं दिला सकता।










* जिम्मेदारी जिसकी, हक भी उसी का*~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~वंदना रसोई का काम से फ्री होकर मम्मी जी के कमरे की तरफ जा रही ...
28/09/2024

* जिम्मेदारी जिसकी, हक भी उसी का*
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वंदना रसोई का काम से फ्री होकर मम्मी जी के कमरे की तरफ जा रही थी। सोने से पहले सुबह की तैयारी कर के रखना चाहती थी। सुबह तो खुद के लिए भी ढंग से वक्त नहीं मिलता। ऊपर से ननद अचानक से शाम को अपने ससुराल से आ गई तो काम वैसे भी बढ़ गया। स्कूल जाने से पहले सुबह ढंग से थोड़ा बहुत काम कर जाए इसके लिए पहले से तैयारी कर लेना बेहतर है। स्कूल में वार्षिक परीक्षा चल रही है तो छुट्टी लेना तो असंभव है।

यही सोचकर मम्मी जी के कमरे की तरफ जा रही थी, पर कमरे के दरवाजे पर पहुंचकर उसके पैर ठिठक गए। अंदर उसकी सास सुशीला जी, उसका पति मधुर, देवर अंशुल और ननद वनिता बैठ कर बात कर रहे थे। बार बार वंदना का नाम आ रहा था इसलिए वंदना ने बात सुनना ही उचित समझा।

" भैया मैंने सुना है कि भाभी के मायके में उनके पापा ने प्रॉपर्टी बेची है और उसका अच्छा खासा पैसा भी आया है। खुद उनके पापा मम्मी कितने अच्छे फ्लैट में रहने गए हैं। साथ ही अपने बड़े भाई के बेटे को भी रख रखा है। तो भाभी को भी तो पैसे मिले ही होंगे "

वनिता की बात सुनकर मधुर बोला,
" अरे मुझे क्या पता? ना तो पापा जी ने कुछ बताया और ना ही वंदना ने। दोनों की दोनों बाप बेटी अंदर के अंदर ही सब कुछ कर लेते हैं। पर यहां दामाद की कोई इज्जत नहीं है। मुझे तो बताना भी ठीक नहीं समझते"
" अरे भैया, तो पता करो ना। ऐसे थोड़ी ना काम चलेगा। आखिर कितने पैसे आए हैं, पता होगा तभी तो अपना बजट बना पाएंगे। और इस बार मुझे बाइक लेनी ही लेनी है। चाहे कुछ भी हो जाए"

अंशुल ने जिद करते हुए कहा तो वनिता कहां पीछे रहती। वह भी अपनी फरमाइश करते हुए बोली,
" हां भैया, पता कर ही लो। मुझे भी इस बार सोने के कड़े तो चाहिए ही चाहिए। आप लोगों से तो इतना भी नहीं हुआ कि मुझे सोने के कड़े शादी में ही दे देते। जब मेरी देवरानी अपने मायके से आए हुए सोने के कड़े पहनती हैं तो मुझे सही में बहुत बुरा लगता है। ऐसा लगता है कि जैसे मुझे ही दिखा रही हो"
तभी सुशीला जी भी बोली,
" तुम दोनों चुप करो। मुझे बात करने दो। देखो मधुर, पैसों की जरूरत इन दोनों को ही नहीं मुझे भी है। मैं भी सोच रही हूं कि इस मकान के ऊपर एक मंजिल और चढ़ा दूं, ताकि कल को अंशुल की भी शादी हो तो परेशानी ना हो। अब हम लोग तुमसे नहीं कहेंगे तो किससे कहेंगे? बहू के पास पैसा रखा है और हम लोग परेशान हो रहे हैं। ये कोई बात होती है क्या? उल्टा जब पैसा हमारे पास हो तो हमें तो हमारे स्टैंडर्ड बढ़ाना चाहिए।

तुम अपने ससुर जी से पूछोगे तो अच्छा नहीं लगेगा। पर तुम वंदना से तो बात कर ही सकते हो ना कि आखिर प्रॉपर्टी को बेचने पर कितना नफा हुआ है। आखिर वो अपने माता पिता की इकलौती बेटी है। आज नहीं तो कल सब कुछ तुम्हारा ही तो होना है। उनकी प्रॉपर्टी पर तुम्हारा भी पूरा अधिकार है। मुझे तो यकीन नहीं होता कि वंदना ने तुम्हें अभी तक कुछ नहीं बताया। और वंदना के ताऊ जी की बेटे को क्यों रख रखा है? मधुर सँभल जा, नहीं तो मालूम पड़े तेरा हिस्सा वो तेरा साला ले उड़े"
थोड़ी देर की खामोशी के बाद मधुर बोला,
" ठीक है मां, मैं वंदना से बात करता हूं। मैं भी सोच रहा हूं कि ये नौकरी वौकरी छोड़ कर खुद का बिजनेस ही शुरू कर लूँ। कब तक लोगों की जी हुजूरी करता रहूंगा। अब जरा बात करता हूं कि कितने पैसे आए हैं ताकि आगे की प्लानिंग कर सकूं"
वंदना ने उसके आगे कुछ नहीं सुना। वो उल्टे पैर वापस अपने कमरे में आ गई। उन लोगों की बातें याद कर उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था। कितने लालची हैं ये लोग? जब देखो बहाना बनाकर उसके मायके से पैसा निकालने के लिए मुंह खोले बैठे रहते हैं। जैसे ये लोग कमा कर उसके मायके रख कर आए हैं। जबकि उसके मायके वालों को जब उसकी जरूरत होती है तो ये लोग साथ भी नहीं खड़े होते।
पिछले साल वनिता की शादी में भी पापा ने अपनी एफ डी तुड़वा कर इन लोगों को कर्जा दिया था, जिसे तो ये लोग डकार गए। एक बार भी नहीं पूछा कि पापा जी आपको पैसों की जरूरत है या नहीं। लौटाने है या नहीं।

यही नहीं, अभी जब दो महीने पहले पापा को हार्ट अटैक आया था, तब तो इनमे से कोई सेवा करने नहीं गया था। उसकी मां की तो हिम्मत टूट चुकी थी। वंदना ही दौड़ भाग कर रही थी। बस उसके साथ उसके ताऊ जी का बेटा उदय ही खड़ा था।मधुर तो जब तक पापा हॉस्पिटल में रहे, तब तक रोज शाम थोड़ी सी देर आकर चले जाते थे। एक बार भी उसने ये पूछना मुनासिब नहीं समझा कि पैसों का बंदोबस्त कैसे हो पाया? जबकि वो अच्छी तरह जानता था कि उसके मायके वाले भी मध्यम वर्गीय परिवार के लोग हैं। और प्रॉपर्टी के नाम पर उनके पास सिर्फ उनका मकान है जिसमें वो रहते हैं।
उस समय तो वंदना और उदय ने उधार ले कर पापा का इलाज कराया था। लेकिन पापा के इलाज होने के बाद पैसों को चुकाने के लिए अभी कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपना मकान बेच दिया और बचे हुए पैसों में खुद के लिए फ्लैट लेकर उसमें रहने लगे।
अब उसी बेचे हुए मकान के पैसे इन लोगों को नजर आ रहे थे।
खैर, थोड़ी देर बाद अचानक सुशीला जी की आवाज आई,
" बहू जरा कमरे में आना तो"
वंदना समझ गई कि उससे पैसा निकालने की रूपरेखा तैयार कर ली गई है। अब उसे बुलाया जा रहा है। वो उठकर के सुशीला जी के कमरे में गई तो सुशीला जी की जगह मधुर ने कहा,
" वंदना मैंने सुना है कि तुम्हारे पापा ने अपना मकान बेच दिया है और वो फ्लैट लेकर रह रहे हैं। साथ ही उदय को भी अपने पास रख रखा है"

" हां, अभी कुछ दिन पहले ही बेचा है। आखिर कर्जा चुकाना था। उनका कौन सा बेटा बैठा हुआ है जो उनके कर्जे चुकाएगा या उनकी बीमारी का इलाज करवाएगा। और रही बात उदय की, तो अभी पापा को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता"
" हां, वो तो ठीक है लेकिन कितने में बेचा? आखिर मैं दामाद हूँ। इतना हक तो मेरा भी बनता है कि मैं भी जानूँ कि पापा जी प्रॉपर्टी बेच रहे हैं या कहीं फ्लैट ले रहे हैं। उनके पास कुछ बचा है या नहीं"

" अरे हां, आप तो दामाद है। आपका तो हक है सब कुछ जानने का। चलिए मैं बता देती हूं आपको। पापा के इलाज में काफी पैसा खर्च हो गया था, जो कर्जा लेकर के किया गया था। तो उस कर्जे को चुकाने के लिए उनके पास कुछ नहीं था। सिर्फ वो मकान था इसलिए उन्होंने उसे बेचा। पहले कर्जा चुकाया, बाद में खुद के रहने के लिए बंदोबस्त भी भी करना था इसलिए फ्लैट ले लिया। थोड़े बहुत पैसे बचे हैं जो मैंने उन्हीं के नाम से बैंक में डिपाॅजिट कर दिए हैं"
" तुम्हें कुछ नहीं दिया? मैंने तो सुना है काफी नफा हुआ था। तुम तो बेटी हो ना उनकी"
सुशीला जी ने बीच में ही कहा।
" अब क्या कर सकते हैं मम्मी जी। पैसा लेने का हक ही थोड़ी ना रखती है बेटियां। जिम्मेदारी भी कोई चीज होती हैं। अब जब जिम्मेदारी उदय निभा रहा है तो मैंने सोचा पैसे भी उसी को मिलने चाहिए। इसलिए मैंने हक छोड़ दिया। और पापा को कह दिया कि जो आपकी जिम्मेदारी निभाए ये फ्लैट भी उसी के नाम कर देना"

कहकर वो अपने कमरे में जाने लगी तो मधुर ने कहा,
" अरे तुम ऐसा कैसे कर सकती हो? तुम्हें पता भी है, वो उदय तुम्हारे बड़े पापा का बेटा, लालच में तुम्हारे मां-पापा की सेवा कर रहा है"
" लालच में ही सही, कम से कम मेरे मां और पापा की सेवा तो हो रही है। मुझे मेरे मां पापा से कुछ नहीं चाहिए क्योंकि मैं अपने दम पर कमाने का साहस रखती हूं"
कहकर वंदना अपने कमरे में चली गई और पीछे रह गए घर के बाकी सदस्य अपने टूटे हुए अरमानों के साथ।

एक वो दौर था जब जवांई/ दामाद/ कुँवर सा के आने का इतना बेसब्री से इंतजार होता था कि खुद का घर ही नहीं बल्कि आस पड़ोस के घर...
25/09/2024

एक वो दौर था जब जवांई/ दामाद/ कुँवर सा के आने का इतना बेसब्री से इंतजार होता था कि खुद का घर ही नहीं बल्कि आस पड़ोस के घर भी लिपाई ,पुताई और साज सज्जा से चमक जाता था......फक सफ़ेद चादर बिछी खटिया और कढ़ाई किया हुआ मेजपोश बिछा मेज और बीच मे रखा गुलदस्ता ............. ससुर जी दाढ़ी बनाकर और नए कपङे पहनकर स्वागत के लिए तैयार रहते थे और साले सालियाँ जीजा जी के स्वागत मे पलक पावड़े बिछाए पूरे मान सम्मान से घर मे दौड़ लगाते ......बीच बीच मे दरवाजे कि झिर्री से झाँकती शर्मायी सकुचाई दो आंखे ................लगातार अंदर से खुसुर पुसुर की आवाज आती रहती शायद बच्चो को दिशा निर्देश दिया जाता है जाओ बारी बारी से पैर छुओ बदमाशी नहीं करना ........बच्चे एक एक कर सकुचाये से आकर पैर छूते और उनमे से एक परिचय देता ये तीनों गुड्डू के है ये चारों पप्पू के है,ये बुआ का है,ये छतरपुर बाली मौसी के है,ये पडौस के शर्मा जी का है,ये तीन चंपू,पुल्लू,बिल्लू अपने बडे भैया के है।आटे के हलवे और पकौड़ियों कि खुशबू दूर दूर तक जाती पर इससे भी तसल्ली न मिलती तो पीछे के दरवाजे से बच्चो को दौड़ाया जाता कि फलाना हलवाई के यहाँ से गरम जलेवी, आठ समोसा चार कचोरी लेते और पीछे के दरबाजे से ही आना ।....बेटी से उनकी पसंद नापसंद पूंछ कर पकवान बनते........आस पड़ोस के घरो मे जरूर एक वक्त का भोजन या फिर चाय के लिए बुलावा होता कि फलनवा के दामाद आए ........ बाथरूम के बाहर तौलिया मंजन और ब्रश लेकर इंतजार करते साले और उनके हाथ सन्तूर साबुन से धुलवाते, भले खुद उजाला साबुन से नहाते थे ...जिनके घर कुआं या हैंड पाइप होता साले (आस पड़ोस के बच्चे भी शामिल रहते ) पानी भर भर कर नहलाते..नाऊ काका इंतजार करते थे कि दामाद जी जरा बैठे तो उनके हाथ पैर दबाकर थकान उतार दे ...गाँव भर कि हम उम्र शर्माती, सकुचाती झिझकती एक साथ नमस्ते बोल कर एक दूसरे के पीछे छिपने का प्रयास करती सालियाँ.............. एक त्योहार सा माहौल रहता गाँव मे ....शाम कि बैठकी लगती जिसमे गाँव के बड़े बुजुर्ग शामिल होते जो दामाद कि हाल खबर लेते और खेत खलिहान कि चर्चा ज़ोर शोर से होती ......
अब कहाँ ऐसी ससुराल और कहाँ ऐसा आवभगत
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