Advocate Premchandra Gautam

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अपराध के 49 मामले दर्ज हुए : रिपोर्टनेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्‍यूरो की 'भारत में अपराध- 2021' रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 202...
13/10/2023

अपराध के 49 मामले दर्ज हुए : रिपोर्ट

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्‍यूरो की 'भारत में अपराध- 2021' रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 में देश में दर्ज रेप केसों की संख्‍या 28,046 थी जबकि 2019 में 32,033 रेप केस दर्ज हुए थे. एनसीआरबी, केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है.

भारत में वर्ष 2021 में रेप के 31,677 केस दर्ज किए गए है. इस लिहाज से देश में रोजाना औसतन 86 रेप केस दर्ज हुए. देश में अपराधों को लेकर सरकार की नई रिपोर्ट के अनुसार, देश में हर घंटे में महिलाओं के खिलाफ अपराध के करीब 49 मामले दर्ज हुए. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्‍यूरो की 'भारत में अपराध- 2021' रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 में देश में दर्ज रेप केसों की संख्‍या 28,046 थी जबकि 2019 में 32,033 रेप केस दर्ज हुए थे. एनसीआरबी, केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है.

राज्‍यवार बात करें तो राजस्‍थान (6,337) इस मामले में पहले स्‍थान पर रहा. इसके बाद मध्‍य प्रदेश (2,947), उत्‍तर प्रदेश (2,845)और महाराष्‍ट्र (2,496) का स्‍थान रहा. देश की राजधानी दिल्‍ली में 2021 में रेप के 1250 केस दर्ज किए गए. एनसीआरबी के अनुसार, रेप के अपराध की दर (प्रति लाख जनसंख्या) राजस्थान (16.4) में सबसे अधिक थी, इसके बाद चंडीगढ़ (13.3), दिल्ली (12.9), हरियाणा (12.3) और अरुणाचल प्रदेश (11.1) का स्थान रहा. अखिल भारतीय औसत दर 4.8 रही.

वर्ष 2021 में देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 4,28,278 मामले दर्ज किए गए, अपराध की दर (प्रति एक लाख का आबादी पर) 64.5 रही. आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि ऐसे अपराधों में अपराधों में चार्जशीटिंग दर (charge-sheeting rate)77.1 रही. बता दें, वर्ष 2020 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्‍या 3,71,503 और 2019 में 4,05,326 थी. महिला वर्ग के खिलाफ अपराधों में रेप, रेप और हत्‍या, दहेज, एसिड अटैक, खुदकुशी के लिए उकसाना, अपहरण, जबरन शादी, ह्युमन ट्रैफिकिंग (मानव तस्करी) और ऑनलाइन उत्‍पीड़न आदि शामिल हैं. एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 में, महिलाओं के खिलाफ अपराधों के सबसे अधिक मामले यूपी (56,083) में दर्ज किए गए, इसके बाद राजस्थान (40,738), महाराष्ट्र (39,526), ​​पश्चिम बंगाल (35,884) और ओडिशा (31,352) का स्‍थान रहा.

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रूस के लूना-25 में आई गड़बड़ी, चंद्रयान-3 के लिए भी इम्तिहान की रात;ISRO तैयार रूसी एजेंसी रोस्कोमोस ने बताया कि स्थानीय...
20/08/2023

रूस के लूना-25 में आई गड़बड़ी, चंद्रयान-3 के लिए भी इम्तिहान की रात;
ISRO तैयार

रूसी एजेंसी रोस्कोमोस ने बताया कि स्थानीय समय के मुताबिक, दोपहर 2.10 बजे लूना को प्री- लैंडिंग ऑर्बिट में भेजने के लिए प्रयास किया गया। इस दौरान ऑटोमैटिक स्टेशन पर इमरजेंसी हालात पैदा हुए।चंद्रमा पर उतरने से पहले रूस के लूना-25 को एक "आपातकालीन स्थिति" से गुजरना पड़ा है। रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस ने शनिवार को यह जानकारी दी। रोस्कोस्मोस ने कहा है कि टीमें समस्या का विश्लेषण कर रही हैं। बता दें कि ये समस्या ऐसे समय में पता चली है जब लूना-25 के लिए लैंडिंग की तारीख 21 से 23 अगस्त तय की गई है।रूसी एजेंसी रोस्कोमोस ने बताया कि स्थानीय समय के मुताबिक, दोपहर 2.10 बजे लूना को प्री लैंडिंग ऑर्बिट में भेजने के लिए प्रयास किया गया। इस दौरान ऑटोमैटिक स्टेशन पर इमरजेंसी हालात पैदा हुए। इस वजह से मिशन का मैन्यूवर नहीं हो पाया। बता दें कि चंद्रमा को एक्सप्लोर करने के लिए रूस महत्वपूर्ण वापसी कर रहा है। 1976 में सोवियत युग के लूना-24 मिशन के बाद लगभग पांच दशकों में पहली बार, 10 अगस्त को लूना 25 अंतरिक्ष में भेजा गया।भेजा गया। इसने चंद्रमा के लिए अधिक सीधे रास्ते को हमें फॉलो करें अपनाया है। संभावित रूप से यह लगभग 11 दिन में 21 अगस्त तक लैंडिंग का प्रयास करने में सफल हो जाएगा। लैंडर को बुधवार को सफलतापूर्वक चंद्रमा की कक्षा में स्थापित किया गया था। रोस्कोस्मोस ने यह नहीं बताया कि क्या इस घटना से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर बोस्लाव्स्की क्रेटर के उत्तर में सोमवार को होने वाली लैंडिंग में देरी होगी या नहीं। जून में, रोस्कोस्मोस प्रमुख यूरी बोरिसोव ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से कहा था ऐसे मिशन "जोखिम भरे" हैं, जिनकी सफलता की संभावना लगभग 70 प्रतिशत है। अगर रूस का लूना-25 लैंड कर लेता है तो इसके चंद्रमा पर एक वर्ष तक रहने की उम्मीद है, जहां इसे सैंपल कलेक्ट करने और मिट्टा की एनालाइज करने का काम सौंपा गया है। लैंडर पर लगे कैमरे पहले ही अंतरिक्ष से पृथ्वी और चंद्रमा की दूर तस्वीरें ले चुके हैं। अगला लेख पढ़ने के लिए हमें फॉलो कीजिए। चंद्रयान-3 का क्या है हाल? चंद्रयान-3 मिशन मिशन अपने अंतिम पड़ाव में पहुंच गया में है। लेकिन आज की रात चंद्रयान-3 के लिए इम्तिहान की रात है। दरअसल लैंडर मॉड्यूल आज रात दूसरी 'डिबूस्टिंग' से गुजरेगा। यह गति कम करने की प्रक्रिया है। इसरो के मुताबिक, लैंडर मॉड्यूल लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) से युक्त है। इसे एक कक्षा में उतारा जाएगा जो इसे चांद की सतह के बहुत करीब पहुंचा देगा। यानी गति धीमी रही और सबकुछ सही रहा तो यह 23 अगस्त को चंदा मामा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग कर सकेगा। पिछले दिनों लैंडर मॉड्यूल ने सफलतापूर्वक एक डिबूस्टिंग प्रक्रिया को पूरा किया था। इससे इसकी कक्षा घटकर 96 किलोमीटर x 110 किलोमीटर रह गई थी। दूसरी डिबूस्टिंग प्रक्रिया आज रात में होनी है। इसरो ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, "लैंडर मॉड्यूल की स्थिति सामान्य है। एलएम ने सफलतापूर्वक एक डिबूस्टिंग प्रक्रिया को पूरा किया जिससे अब इसकी कक्षा घटकर 96 किलोमीटर x 110 किलोमीटर रह गई है। दूसरी डिबूस्टिंग प्रक्रिया 20 अगस्त, 2023 को भारतीय समयानुसार देर रात दो बजे की जानी है।" वैसे जानकर खुशी होगी कि भारत का चंद्रयान-3 धीरे-धीरे लेकिन सफलतापूर्वक अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा है।
एड० प्रेमचंद्र गौतम
Aditya Singh Premchandra Gautam

माननीय. गृह मंत्री अमित शाह ने क्रिमिनल मेजर एक्ट संशोधन बिल पेश किया.. अब पुराने कानूनों की तुलना में नए कानूनों की संर...
12/08/2023

माननीय. गृह मंत्री अमित शाह ने क्रिमिनल मेजर एक्ट संशोधन बिल पेश किया.. अब पुराने कानूनों की तुलना में नए कानूनों की संरचना इस प्रकार होगी:-पुरानी आईपीसी-511 धाराएं नई आईपीसी-356 धाराएंपुरानी सीआरपीसी-484 धाराएँनई सीआरपीसी-533 धाराएंपुराना साक्ष्य अधिनियम - 167 धाराएं नया साक्ष्य अधिनियम - 170 धाराएं
Advocate Premchandra Gautam Adv Pranesh Sharma

चंद्रयान-3 के बारे में 10 प्वाइंट जो आपको जरूर जानने चाहिएभारत के तीसरे चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-3’ (Chandrayaan-3) को लॉन्च...
16/07/2023

चंद्रयान-3 के बारे में 10 प्वाइंट जो आपको जरूर जानने चाहिए

भारत के तीसरे चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-3’ (Chandrayaan-3) को लॉन्च कर दिया गया है। चंद्रयान-3 ने दोपहर 2:35 बजे चंद्रमा की ओर उड़ान भरा। इसे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से छोड़ा गया है। 615 करोड़ की लागत से तैयार हुआ यह मिशन करीब 50 दिन की यात्रा के बाद चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंड करेगा। ‘चंद्रयान-3’ को भेजने के लिए LVM-3 लॉन्चर का इस्तेमाल किया गया है। अगर दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर की सॉफ्ट लैंडिग होती है, तो भारत दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला विश्व का पहला देश बन जाएगा। चंद्रयान-3 एक लैंडर, एक रोवर और एक प्रोपल्शन मॉड्यूल से लैस है। इसका वजन करीब 3,900 किलोग्राम है।

चंद्रयान-3 के बारे में 10 रोचक तथ्य:

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की तरफ से इस लॉन्चिंग को लेकर बताया गया कि तीसरा चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-3’ साल 2019 के ‘चंद्रयान-2’ का अनुवर्ती मिशन है। भारत के इस तीसरे चंद्र मिशन में भी अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का लक्ष्य चंद्रमा की सतह पर लैंडर की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ का है।

‘चंद्रयान-2’ मिशन के दौरान अंतिम पलों में लैंडर ‘विक्रम’ पथ विचलन के चलते ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करने में सफल नहीं हुआ था। इसका उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग और भारत की क्षमता का प्रदर्शन करना है। उन्होंने कहा कि चंद्रयान-3 उच्च स्तर पर काम करेगा।

चंद्रयान-3 अंतरिक्ष यान ISRO द्वारा नियोजित तीसरा चंद्र अन्वेषण मिशन (lunar exploration mission) है। यह चंद्रयान-2 मिशन की निरंतरता (continuation of the Chandrayaan-2 ) के रूप में कार्य करता है और इसका उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग और घूमने की पूरी क्षमता का प्रदर्शन करना है।

चंद्रयान -3 में एक लैंडर और रोवर कॉन्फिगरेशन शामिल है और इसे श्रीहरिकोटा में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC) SHAR से LVM3 (लॉन्च व्हीकल मार्क 3) द्वारा लॉन्च कर दिया गया है।

चंद्रयान-3 में चंद्रयान-2 की तरह ऑर्बिटर के बिना एक रोवर और लैंडर शामिल है। मिशन का लक्ष्य चंद्रमा की सतह का पता लगाना है। खास कर उन क्षेत्रों का पता लगाना जहां अरबों वर्षों से सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंच पाया है। वैज्ञानिकों और खगोलविदों (Scientists and astronomers) को इन अंधेरे क्षेत्रों में बर्फ और मूल्यवान खनिज संसाधनों की उपस्थिति पर संदेह है।

चंद्रयान-3 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतारा जाएगा। इस मिशन को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए इसमें कई अतिरिक्त सेंसर को जोड़ा गया है। इसकी गति को मापने के लिए इसमें एक ‘लेजर डॉपलर वेलोसीमीटर’ सिस्टम लगाया है।

चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग भारत की तकनीकी कौशल और अंतरिक्ष अन्वेषण की महत्वाकांक्षी खोज को प्रदर्शित करेगी। चंद्रयान-3 पृथ्वी से परे मानव उपस्थिति का विस्तार करने और भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए रास्ता साफ करने के बड़े लक्ष्यों में योगदान देता है।

चंद्रयान-3 द्वारा दक्षिणी ध्रुव की खोज अमेरिका के आर्टेमिस-III मिशन के उद्देश्यों के अनुरूप है। जिसका उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर मनुष्यों को उतारना है। चंद्रयान-3 द्वारा जुटाया गया डेटा भविष्य के आर्टेमिस मिशनों के लिए मूल्यवान जानकारी और समर्थन प्रदान करेगा।

चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला मिशन होगा। यह इलाका अपने स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्रों के कारण विशेष रुचि रखता है, जहां पानी की बर्फ के मौजूद होने का अनुमान है। मिशन का लक्ष्य इस अज्ञात क्षेत्र की अद्वितीय भूविज्ञान और संरचना का अध्ययन करना है।

चंद्रयान-3 को दूसरे ग्रहों के मिशनों के लिए जरूरी नई तकनीकों को विकसित करने और प्रदर्शित करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह अंतरिक्ष यान इंजीनियरिंग, लैंडिंग सिस्टम और आकाशीय पिंडों पर गतिशीलता क्षमताओं में प्रगति में योगदान देगा।

Premchandra Gautam
( Advocate)

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला:कहा-गिरफ्तारी से पहले तक दी जा सकती है अग्रिम जमानत; निचली अदालत का फैसला रद्दइलाहाबाद हा...
25/06/2023

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला:कहा-गिरफ्तारी से पहले तक दी जा सकती है अग्रिम जमानत; निचली अदालत का फैसला रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाया। कहा,"आरोप पत्र दाखिल होने या अदालत द्वारा आरोप पत्र पर संज्ञान लेने के आधार पर अग्रिम जमानत अर्जी खारिज नहीं की जा सकती।गिरफ्तारी होने से पहले तक अग्रिम जमानत दी जा सकती है। इसी के साथ कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही नहीं माना और रद्द कर दिया।"

कानूनी स्थिति को किसी भी तरह से तोड़-मरोड़ कर पेश करने की अनुमति नहीं

यह आदेश जस्टिस नलिन कुमार श्रीवास्तव ने अलीगढ़ के डॉ. कार्तिकेय शर्मा व दो अन्य की अग्रिम जमानत अर्जी को स्वीकार करते हुए दिया है। माम कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा चार्जशीट दाखिल होने के कारण अग्रिम जमानत निरस्त किए जाने के आदेश को सही नहीं माना। कहा कि कानूनी स्थिति को किसी भी तरह से तोड़-मरोड़ कर पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

याची और उसके माता-पिता के खिलाफ उसकी पत्नी डॉ. पल्लवी शर्मा ने अलीगढ़ के क्वारसी थाने में दहेज उत्पीड़न के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है कि जिससे ऐसा लगे कि याची ने जांच में सहयोग नहीं किया है।

सरकार का कहना था कि याचियों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा-82 के तहत कुर्की कार्रवाई शुरू हो चुकी है। याचियों की ओर से कहा गया कि 82 की कार्रवाई होने से पहले ही उनकी ओर से अर्जी दाखिल कर दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि पहले से ही व्यवस्था है कि कोई भी आरोपी गिरफ्तारी से पहले अग्रिम जमानत अर्जी दाखिल कर सकता है और कोर्ट उसे अग्रिम जमानत दे सकती है।

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प्रेमचन्द्र गौतम एडवोकेट

यूपी के बरेली की एक PCS  अधिकारी है  ज्योति मौर्या जिनका पति एक सफाई कर्मचारी है शादी से पहले ये ये कुछ नहीं थी पति गरीब...
24/06/2023

यूपी के बरेली की एक PCS अधिकारी है ज्योति मौर्या जिनका पति एक सफाई कर्मचारी है शादी से पहले ये ये कुछ नहीं थी पति गरीबी मे भी पढ़ा लिखा कर इन्हे PCS बना दिया कुछ दिन पहले मैडम का नाम मिडिया मे जोरो शोरो से उछलने लगा था इनका अफेयर चल रहा था एक PPS कमानडेंट मनीष दुबे के साथ लव यु लव यु खेल रही थी.

तभी सफाई कर्मचारी पति आरोप लगाता है अपने बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर मैडम ह्त्या की साजिश रह रही है मिडिया मे रायता फ़ैल गया तो मैडम कह रही मै तलाक चाहती हुँ इसने मेरा व्हाट्सअप हैक किया है मुझसे 50 लाख रूपये और घर मांग रहा है. उसपर मैडम प्रयागराज मे FIR भी करवा दी है.

कभी कभी आचार्य चाणक्य की बात सही ही लगती है अपनी माँ के अलावा किसी औरत पर भरोसा मत करो जो आज मजबूर दिख रही कल वो मजबूत होते ही लात मार देंगी आपको.
चाँद के पार चलो वालो से भी दर्दनाक वास्तविक कहानी है.

चाणक्य नीति सही कहती स्त्री शौर्य को पुजती है जिधर धारा का प्रवाह देखेगी उधर बह जाएगी, कभी बॉडी कभी धन कभी रुतबा उससे वो आकर्षित हो जाती है प्रेम कीजिये अपने परिवार से बाकी एक दिन दुनियादारी निभाना ही पड़ेगा शादी करना पड़ेगा बच्चा पैदा करना पड़ेगा लेकिन कभी किसी पर भरोसा ना करना और याद रखना आपकी मोहब्बत सिर्फ आपकी माँ है खुद को मजबूत रखो कभी मजबूर नहीं होंगे अगर यह बेचारा आज सफाईकर्मी की जगह कोई अधिकारी होता तो शायद ये नौबत नहीं आती।

मुसलमान पर्सनल लॉ के तहत बच्चे को गोद नहीं ले सकते, किशोर न्याय अधिनियम के तहत कड़ी प्रक्रिया का पालन करने की आवश्यकता: ...
05/06/2023

मुसलमान पर्सनल लॉ के तहत बच्चे को गोद नहीं ले सकते, किशोर न्याय अधिनियम के तहत कड़ी प्रक्रिया का पालन करने की आवश्यकता: उड़ीसा हाईकोर्ट

उड़ीसा हाईकोर्ट ने कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुसलमान बच्चे को गोद नहीं ले सकते। इसमें कहा गया है कि वे किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम यानी जेजे अधिनियम के तहत एक कड़ी प्रक्रिया का पालन करके गोद ले सकते हैं।

न्यायमूर्ति एस तालापात्रा और न्यायमूर्ति सावित्री राठो की खंडपीठ ने कहा, “यह सच है कि एक मुसलमान एक आत्मसमर्पण बच्चे को गोद ले सकता है, लेकिन उन्हें जेजे अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों के तहत निर्धारित कठोर प्रक्रिया का पालन करना होगा, लेकिन नहीं उनकी सनक। इसलिए आमतौर पर इस्लामिक देशों में गोद लेने के बजाय एक नाबालिग को संरक्षकता प्रदान की जाती है जिसे देखभाल और सुरक्षा की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, हम मानते हैं कि गोद लेने का दावा कानून में टिकाऊ नहीं है।”

खंडपीठ ने आगे कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी करने के लिए पैरेंस पैट्रिया क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते समय, क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से संबंधित आपत्तियों का गंभीर प्रभाव नहीं हो सकता है, क्योंकि नाबालिग के सर्वोत्तम हित को अदालत द्वारा संरक्षित किया जाना चाहिए और उसे तकनीकी आपत्ति द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट एस साहू पेश हुए जबकि विपक्षी की ओर से एजीए जे कटिकिया और एडवोकेट अंशुमान रे पेश हुए।

संक्षिप्त तथ्य –

याचिकाकर्ता ने न्यायालय के समक्ष अपनी दलील के माध्यम से 12 वर्ष की आयु के एक नाबालिग बच्चे की कस्टडी उसके पक्ष में बहाल करने की मांग की थी जो कि नाबालिग का पिता होने के नाते प्राकृतिक अभिभावक था। उन्होंने तर्क दिया कि उक्त बच्चे को वर्ष 2015 से विरोधी पक्षों द्वारा जबरन कैद और अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था, जो उसकी बहन, बेटी और दामाद थे।

याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया कि उसके द्वारा किए गए प्रयासों की एक श्रृंखला के बावजूद उसे अपनी बेटी से मिलने से मना कर दिया गया था और बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के साथ संबंधित पुलिस स्टेशन को भी मामले की सूचना दी थी लेकिन अधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई थी।

इसलिए, उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी करने का अनुरोध किया जाए, जिसमें विपरीत पक्षों को नाबालिग को अदालत में पेश करने और उसकी हिरासत बहाल करने का निर्देश दिया गया हो। उपरोक्त संदर्भ में उच्च न्यायालय ने कहा, “पक्षों द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि रोमन और हिंदू प्रणाली द्वारा मान्यता प्राप्त गोद लेने के समान मुस्लिम कानून में कोई प्रथा नहीं है।

विरोधी पक्ष संख्या 6 से 11 ने कहा है कि किशोर न्याय देखभाल और बाल संरक्षण अधिनियम, 2000 की धारा 47 (संक्षेप में “जेजे अधिनियम”) में गोद लेने का प्रावधान है। यह एक धर्मनिरपेक्ष प्रावधान है। जेजे अधिनियम की धारा 41 गोद लेने की विस्तृत प्रक्रिया प्रदान करती है।

जेजे अधिनियम के अनुसार, गोद लेने का प्राथमिक उद्देश्य उन बच्चों का पुनर्वास है जो अनाथ, परित्यक्त या निर्धारित नुस्खे के अनुसार आत्मसमर्पण कर चुके हैं। इसके अलावा, गोद लेने के लिए कड़े दिशानिर्देश तैयार किए गए हैं। धारा 41 की उप-धारा 5 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन एजेंसी (संक्षेप में CARA) के माध्यम से दत्तक ग्रहण किया जाता है।

अदालत ने आगे कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि याचिकाकर्ता के बच्चे को उसकी हिरासत से ले लिया गया था और नाबालिग बच्चे को दूसरे अधिकार क्षेत्र में ले जाया गया था।

कोर्ट ने कहा –

“जैसा कि हम पाते हैं कि याचिकाकर्ता की नाबालिग बेटी को राउरकेला, ओडिशा से ले जाया गया था और याचिकाकर्ता की बार-बार मांग के बावजूद वापस नहीं किया गया था, मामले की परिस्थितियों में हिरासत पूरी तरह से अवैध हो गई है। इस प्रकार, हम आसानी से यह मान सकते हैं कि कार्रवाई के कारण का एक हिस्सा इस न्यायालय की क्षेत्रीय सीमा के भीतर उत्पन्न हुआ। इसके अलावा, जैसा कि हम पहले ही नोट कर चुके हैं कि जब बच्चे के हित का संबंध होता है, तो अदालत अपने माता-पिता के क्षेत्राधिकार का भी प्रयोग कर सकती है, क्योंकि बच्चा खुद का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है”।

न्यायालय ने पाया कि गोद न लेने की स्थिति में, नाबालिग बच्चे की हिरासत को अवैध हिरासत के रूप में माना जा सकता है और यहां तक कि रिश्तेदारी संबंध भी माता-पिता को अपने बच्चे की हिरासत से वंचित करने के लिए पर्याप्त नहीं है और बच्चे की हिरासत की मांग की गई थी। दत्तक ग्रहण के बहाने न्यायोचित ठहराया जाना जो वास्तव में या कानून में मौजूद नहीं है।

अदालत ने कहा-

“इस निर्देश को पारित करते समय, हम जानते हैं कि बच्चे को विरोधी पक्ष संख्या 9 और 11 या विरोधी पक्ष संख्या 6 से 11 की हिरासत से बाहर ले जाने से नाबालिग को भावनात्मक संकट हो सकता है, लेकिन यह है समय बीतने के साथ निष्प्रभावी होना तय है।… केवल इसलिए कि विरोधी पक्ष संख्या 6 से 11 ने कुछ समय के लिए या लंबे समय तक बच्चे की देखभाल की, वे बच्चे की हिरासत को बरकरार नहीं रख सकते। अगर याचिकाकर्ता को कस्टडी बहाल नहीं की जाती है, तो अदालत बच्चे और माता-पिता दोनों को वंचित कर देगी”।

तदनुसार, अदालत ने याचिका को स्वीकार कर लिया और विपरीत पक्षों को याचिकाकर्ता को बच्चे की हिरासत सौंपने का निर्देश दिया।

केस टाइटल – नेसार अहमद खान बनाम उड़ीसा राज्य और अन्य

Property Rights: क्या पिता प्रॉपर्टी में बेटा और बेटी को बराबर का हिस्सा, जानिए क्या है नियममां-बाप अपने के लिए प्रॉपर्ट...
04/06/2023

Property Rights: क्या पिता प्रॉपर्टी में बेटा और बेटी को बराबर का हिस्सा, जानिए क्या है नियम
मां-बाप अपने के लिए प्रॉपर्टी बनाते है। लेकिन इस प्रॉपर्टी पर असली अधिकार किस का होता है। ज्यादातर आपने देखा होगा कि पिता की जायदाद पर बेटे का हक होता है। अब आपको ये भी पता होना चाहिए कि पिता की प्रॉपर्टी पर बेटी का कितना हक होता है।

नई पीढ़ी के साथ ही लोगों की सोच भी नई हो गई है. बदलते परिवेश ने लोगों का नजरिया भी बदल दिया है. जहां पहले बेटियों का माता की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता था,

वहीं आज बेटी बराबर की हकदार बन चुकी है. हिंदू सक्सेशन ऐक्ट, 1956 में साल 2005 में संशोधन कर बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान हिस्सा पाने का कानूनी अधिकार दिया गया है.

लेकिन इसके बावजूद भी आज कई लोग ऐसे हैं जो बेटा और बेटी में फर्क करते हैं. बेटी को संपत्ति में हक देने से मना करते हैं. अगर आप अपने परिवार को बाद में परेशान नहीं करना चाहते हैं

तो संपत्ति वसीयत (Property Will) लिखना सबसे जरुरी है. महिला को माता-पिता की प्रॉपर्टी और अपने पिता या माता के स्वामित्व वाली प्रॉपर्टी में अपने

अधिकारों के बारे में जानना जरूरी है. इसी कड़ी में आज हम आपको बताएंगे कि क्या पिता बेटी को प्रॉपर्टी में हिस्सा देने से मना कर सकता है.

क्या कहता है भारत का कानून

भारत में बेटियों का संपत्ति में कितना अधिकार है और कब बेटियों को पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता है इसके संबंध में स्पष्ट कानून है.

हिंदू सक्सेशन ऐक्ट, 1956 में साल 2005 में संशोधन कर बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान हिस्सा पाने का कानूनी अधिकार दिया गया है.

संपत्ति पर दावे और अधिकारों के प्रावधानों के लिए इस कानून को 1956 में बनाया गया था. इसके मुताबिक पिता की संपत्ति पर बेटी का उतना ही अधिकार है जितना कि बेटे का.

बेटियों के अधिकारों को पुख्ता करते हुए इस उत्तराधिकार कानून में 2005 में हुए संशोधन ने पिता की संपत्ति पर बेटी के अधिकारों को लेकर किसी भी तरह के संशय को समाप्त कर दिया.

किस प्रॉपर्टी पर जन्म से होता है अधिकार

हिंदू कानून के तहत, प्रॉपर्टी को दो हिस्सों में बाता गया है. पहली पैतृक और दूसरी स्व-अर्जित. माता-पिता की प्रॉपर्टी को ऐसी प्रॉपर्टी के रुप में परिभाषित किया गया है

जो पुरुष की चार पीढ़ियों तक विरासत में मिला है और इस दौरान अविभाजित रही है. चाहे वह बेटी हो या बेटा, ऐसी प्रॉपर्टी में बराबर का हिस्सा जन्म से ही मिलता है. 2005 से पहले ऐसी प्रॉपर्टी में सिर्फ बेटों को हिस्सा मिलता था.

किस स्थिति में कर सकता है मना

स्व-अर्जित प्रॉपर्टी के मामले में, जहां पिता ने अपने पैसे से जमीन या घर खरीदा है उस पर बेटी का अधिकार नहीं होता है. इस मामले में, पिता को यह अधिकार है कि वह किसी को भी प्रॉपर्टी की वसीयत लिख सकता है,

और बेटी आपत्ति नहीं कर पाएगी. स्वअर्जित संपत्ति के मामले में बेटी का पक्ष कमजोर होता है. यानी, अगर पिता ने बेटी को खुद की संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार कर दिया तो बेटी कुछ नहीं कर सकती है.

बुरा लगे तो माफ करना ये पोस्ट बहुत जरूरी थी अपलोड करनी #लड़कियों_को_आदर_सहित_समर्पितलड़के ने नम्बर मांगा आप ने दे दिया......
04/06/2023

बुरा लगे तो माफ करना
ये पोस्ट बहुत जरूरी थी अपलोड करनी
#लड़कियों_को_आदर_सहित_समर्पित

लड़के ने नम्बर मांगा आप ने दे दिया...
लड़के ने तस्वीर मांगी आप ने दे दी...
लड़के ने वीडियो कॉल के लिए कहा आप ने कर ली...
लड़के ने दुपट्टा हटाने को कहा आप ने हटा दिया...
लड़के ने कुछ देखने की ख्वाहिश की आप ने पूरी कर दी...
लड़के ने मिलने को कहा आप माँ बाप को धोखा देकर आशिक़ से मिलने पहुंच गयीं...
लड़के ने बाग में बैठ कर आप की तारीफ़ करते हुए आपको सरसब्ज़ बाग दिखाए आपने देख लिये...
फिर जूस कार्नर पर जूस पीते वक़्त लड़के ने हाथ लगाया, इशारे किये, मगर कोई बात नहीं अब नया ज़माना है यह सब तो चलता ही है...
फिर लड़के ने होटल में कमरा लेने की बात की, आप ने शर्माते हुए इंकार कर दिया, कि शादी से पहले यह सब अच्छा तो नहीं लगता न...
फिर दो तीन बार कहने पर आप तैयार हो गयीं होटल के कमरे में जाने के लिए...
आप दोनों ने मिल कर खूब एंजॉय किया...
अंडरस्टेंडिंग के नाम पर दुल्हा दुल्हन बन गए protection use ki बस बच्चा पैदा न हो इस पर ध्यान दिया...
फिर एक दिन झगड़ा हुआ और सब खत्म क्योंकि हराम रिश्तों का अंजाम कुछ ऐसा ही होता है...
लेकिन लेकिन...
यहां सरासर मर्द गलत नहीं है, वह भेड़िया है, वह मुजरिम है, वह सबकुछ है...
क्योंकि आप ने तो तस्वीर नहीं दी थी वह जबर्दस्ती आपके मोबाइल में घुस कर ले गया था...
आप ने तो अपना नम्बर नहीं दिया वह लड़का खुद आप के मोबाइल से नम्बर ले गया था...
आप ने तो वीडियो कॉल नहीं की वह लड़का खुद आप के घर पहुंच गया था आपको लाइव देखने...
जूस कार्नर पर भी जबरदस्ती ले गया था गन प्वाइंट पर...
होटल के कमरे तक भी वह आपको जबर्दस्ती आपके घर से ले गया था...
तो मुजरिम तो सिर्फ लड़का है आप तो बिल्कुल भी नहीं...
बच्ची हैं आप कोई चार साल की?
आपको समझ नहीं आती?
यह कचरे में पड़ी लाशें देख कर भी आपको अक़्ल नहीं आती?
यह बिना सर के मिलने वाले धड़ आपकी अक़्ल पर कोई चोट नहीं देते?
यह सोशल मीडिया पर आए दिन ज़्यादती के बढ़ती हुई घटना आपको कुछ नहीं बताती?
जूस कार्नर पर जाना,
आपको नहीं पता था कि एक होटल के ईकमरे में या चारदीवारी में जिस्मों की प्यास बुझाई जाती है,
सब पता था आपको, सब पता है आपको...
होटल के कमरे में मुहब्बत के अफसाने नहीं लिखे जाते,वहां कोई इबादत नही होती है
फिर शिकायत होती है के चार लड़कों ने ग्रुप रेप कर दिया...
क्या लगता है वह आपका जो आपकी इज्ज़त का ख्याल रखे जो खुद आपको इसी मकसद के लिए लेकर जा रहा है?
अपनी सीमा में रहेंगी तो आपको कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता...
जिस्म के भूखो से दूर ही रहे लड़का हो या लड़की प्यार जैसे पवित्र रिश्ते को बदनाम ना करे प्यार दिल देखकर करे ना कि जिस्म देखकर l❣ जब तक तुम साथ नही दोगी तब तक किसी लड़के की कोई औकात नही हैं कि वो तुम्हे किसी होटल के रूम तक ले जा सके।।।। गलत लगे तो मुझे माफ कीजिएगा!!!🙏
सत्य ✍️

जाने पार्क में बैठे कपल्स के कानूनी अधिकार August 29, 2019 प्रशन :- वकील साहब, पार्क में बेठे किसी कपल्स के क़ानूनी अधिका...
04/06/2023

जाने पार्क में बैठे कपल्स के कानूनी अधिकार August 29, 2019
प्रशन :- वकील साहब, पार्क में बेठे किसी कपल्स के क़ानूनी अधिकार क्या है क्या पुलिस उनको गले मिलते हुये गिरफ्तार कर सकती है या नही तथा इस पर कोर्ट क्या कहता है
उत्तर :- जैसे की हम देखते है की कई बार ऐसा होता है की कोई जोड़ा अगर पार्क में बैठा है | तो पुलिस वाले आकर उन्हें परेशान करने लगते है तथा बतमीजी के बाद पैसे की डिमांड करते है | वरना घर वालो को बुलाने की धमकी देते है | ऐसे में वो कपल / जोड़ा हजार या दो हजार दे कर देकर अपने आपको इस परेशानी से बचाता है | इसके अलावा आपने ये भी न्यूज पेपर में पढ़ा होगा की कोर्ट में इस तरह की शिकायत करने पर वे पुलिस वाले सस्पेंड भी हो गये है | आएये आज इस कपल्स राइट पर कुछ रोशनी डालते है |
इस बात के तीन पहलु है पहला कपल्स के अधिकार दूसरा पुलिस कार्यवाही के क़ानूनी अधिकार तथा तीसरा कोर्ट के आर्डर :-
पुलिस के क़ानूनी अधिकार :- आईपीसी की धारा-294 के तहत अगर कोई कपल पब्लिक प्लेस में कोई अश्लील हरकत करता है जिसे की कानून में डिफाइन किया गया है । या किसी व्यक्ति की फीलिंग उस हरकत के हर्ट हुई है और वो शिकायत करता है और पुलिस को भी लगता है की उस कपल्स की हरकत कानून में अश्लीनता के दायरे में आती है तो पुलिस उस कपल्स को आईपीसी की धारा-294 के तहत गिरफ्तार कर सकती है इसमें 3 महीने की सजा व जुर्माने का भी प्रावधान है | वैसे तो धारा 292 से 294क तक की धाराओं में अश्लीलता के बारे में ही प्रावधान है लेकिन इस टोपिक के अंतर्गत सिर्फ धारा 294 ही आती है |
जाने क्या है आईपीसी की धारा-294 का हिंदी रूपांतरण :-
अश्लील कार्य और गाने – जो कोई –
(क) किसी लोक स्थान में कोई अश्लील कार्य करेगा, अथवा
(ख) किसी स्थान में या उसके समीप कोई अश्लील गाने, पवाडे या शब्द गायेगा, सुनाएगा या उचारित करेगा जिससे दुसरो को शोभ होता हो,
वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि 3 मॉस तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा |

कपल्स और पुलिस
कपल्स के क़ानूनी अधिकार :- कानून में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है कि अगर कोई कपल पार्क या किसी पब्लिक पेलेस में साथ-साथ घूम रहे हों या फिर बैठे हों और एक-दूसरे से बातचीत में मशगूल है तो पुलिस यह आधार बनाकर कि वे गलत हरकत कर सकते है, सिर्फ इस आधार पर कोई कानूनी कार्यवाही नही कर सकती है |
भारत के हर नागरिक को सविधान के अंतर्गत लाइफ ऐंड लिबर्टी का अधिकार है। जो की संविधान के आर्टिकल-21 से मिलता है वैसे तो इसका दायरा बहुत ही बड़ा है पर मोटे तौर पर बात करे तो ये सभी नागरिको को समान रूप से जीने का व पब्लिक पेलेस में आने व जाने का अधिकार देता है इसका मतलब साफ है कि हर शख्स को यह अधिकार है कि वह अपनी मर्जी से जिंदगी गुज़ारे। कपल जो बालिग हैं, (मतलब 18 वर्ष या इससे उपर है) अपनी मर्जी से एक साथ घूम सकते हैं, रह सकते हैं और चाहें तो शादी कर सकते हैं । इस मामले में पुलिस को कोई अधिकार नहीं है की उनको परेशान करे । लेकिन पुलिस को यह अधिकार है कि अगर कोई शख्स गलत हरकत करता दिखे तो वह उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है |
कोर्ट के आर्डर :- पुलिस ने जब इस अधिकार का फायदा उठा कर कपल्स से पैसा लेना शुरू कर दिया | जिसका नतीजा ये हुआ की साधारण जनता भी पार्क में जाने से डरने लगी थी, तब कोर्ट में कुछ केस भी आये तो डेल्ही हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट और बाद में कई और स्टेटो के हाई कोर्ट ने भी ये निर्णय लिया की आईपीसी की धारा-294 के तहत पुलिस किसी भी प्रकार की क़ानूनी कार्यवाही कपल्स के खिलाफ, सिर्फ शिकायत मिलने पर ही करेगी अन्यथा नही | अगर कोई कपल्स पार्क में गले मिल रहा है और उससे किसी अन्य व्यक्तियों को कोई शिकायत नही है तो पुलिस को कार्यवाही करने की जरूरत नही है पुलिस सिर्फ किसी की शिकायत पर ही क़ानूनी कार्यवाही करे | इसके अलावा अगर कोई कपल्स किसी भी प्रकार की शिकायत करे तो पुलिस उस पर ध्यान दे |
कोर्ट के आदेश का परिणाम :- वैसे तो ये आर्डर कोर्ट ने इसलिए दिया था की पुलिस, पब्लिक को नही लुटे व परेशान करे | लेकिन इसका परिणाम ये हुआ की लोगो ने पार्को में अश्लीनता फेलानी शुरू कर दी अगर कोई व्यक्ति शिकायत करे तो लडकिया उस पर धारा 354 छेड़कानी का आरोप लगाने की धमकी देती है |
क्या किसी क्लब या पार्टी में गले मिलना या किस करना भी है अपराध :- जी नही कोई पार्टी , क्लब, रेस्टोरेंट या फिर कोई और ऐसी जगह जहा आप पैसे देकर कोई सुविधा लेते है या वो जगह सरकारी नही है ऐसी जगह पर आप अगर कपल्स गले मिलते है तो वो गलत बात नही है और ना ही आईपीसी की धारा-294 के अंतर्गत आती है |
अगर पुलिस कपल्स को परेशान करे तो क्या करे :- अगर कोई पुलिस ऑफिसर आपको पार्क में बेठे हुए बुना किसी व्यक्ति की शिकायत के गले मिलते हुए प्रेषण करे तो आप उसी समय 112 पर कॉल कर सकते हो या फिर उस के खिलाफ किसी दादे अधिकारी को शिकायत क्र सकते हो या फिर कोर्ट में केस डाल कर उस पुलिस ऑफिसर के खिलाफ क़ानूनी कारवाही के अलावा मुआवजे की भी मांग कर सकते हो |
अगर कोई कपल्स पार्क में गलत कार्यवाही करते हुए आपको मिले तो कैसे शिकायत करे :- अगर आप अपने परिवार के साथ किसी पार्क में गये है और वह आपको कोई कपल्स कोई गलत कार्य करता हुए मिले और आप और आपका परिवार इसके लिए कम्फर्ट फील नही कर रहा हो तो, आप 112 नंबर पर शिकायत करके पुलिस को बुला कर आईपीसी की धारा-294 के अंतर्गत FIR / अफ आई आर करवा सकते है |
जय हिन्द
एड० प्रेमचन्द्र गौतम

21 साल तक जमीन का कब्जा न देने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसलाUP News - इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 21 साल तक जमीन का ...
04/06/2023

21 साल तक जमीन का कब्जा न देने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

UP News - इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 21 साल तक जमीन का कब्जा न देने पर बड़ा फैसला सुनाया है। वहीं कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) पर पांच लाख रुपये हर्जाना लगाया है...आइए नीचे खबर में जाने इस मामले को विस्तार से।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जवाहर विद्या समिति के नाम आवंटित भूखंड का कब्जा न सौंपने और 21 सालों तक मुकदमेबाजी में उलझाकर परेशान करने पर कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) पर पांच लाख रुपये हर्जाना लगाया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि वह एक हफ्ते में हर्जाना राशि जवाहर विद्या समिति को बैंक ड्राफ्ट के जरिए सौंपे।

इस मामले में जिला उपभोक्ता संरक्षण फोरम की ओर से जारी गैर जमानती वारंट के खिलाफ केडीए ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी जिसे खारिज कर दिया गया। यह आदेश न्यायमूर्ति एस पी केशरवानी तथा न्यायमूर्ति अनीस कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने दिया है।
केडीए ने 19 जनवरी 1984 को जवाहर विद्या समिति के नाम जूही कॉलोनी कानपुर नगर में भूखंड संख्या 70 आवंटित किया था। 99 साल की लीज दी गई किंतु कब्जा नहीं सौंपा गया। समिति ने जिला उपभोक्ता संरक्षण फोरम में शिकायत की। फोरम ने जवाहर विद्या समिति को बकाया मय ब्याज एक माह में जमा करने का आदेश दिया और कहा इसके दो माह में लीज पंजीकृत की जाय।

इस आदेश के खिलाफ प्राधिकरण ने राज्य फोरम में अपील दाखिल की जो खारिज हो गई। इसके बाद राष्ट्रीय फोरम में पुनरीक्षण में चुनौती दी। जो कि खारिज हो गई। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। वह भी खारिज कर दी गई। इसके बाद भी प्राधिकरण ने समिति को कब्जा नहीं दिया गया।

कहा कि स्थानीय लोग उस जमीन को पार्क के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं तो जिला फोरम में निष्पादन वाद दायर किया गया, जो लंबित है।इधर, प्राधिकरण ने समिति का आवंटन निरस्त करने का प्रस्ताव किया। कहा नौ फीसदी ब्याज सहित जमा पैसा वापस करेंगे। समिति ने याचिका में चुनौती दी तो प्राधिकरण ने हाईकोर्ट में कहा कि जमीन पार्क घोषित हो गयी है। समिति को दूसरी जगह जमीन देंगे। इसका भी प्राधिकरण ने पालन नहीं किया। जिस पर जिला फोरम ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 72 के तहत प्राधिकरण से 10 दिन में सफाई मांगी है।

फोरम ने केडीए वीसी उपस्थित नहीं होने पर गैर जमानती वारंट जारी किया है। विपक्षी समिति के अधिवक्ता आशीष शुक्ला ने बताया कि फोरम ने थानाध्यक्ष स्वरूपनगर को वारंट तामील करने का आदेश दिया है। इस धारा में एक माह से एक साल की सजा व 25 हजार से एक लाख तक जुर्माने की सजा हो सकती है। इसे प्राधिकरण ने चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा पिछले 21 साल से याची विपक्षी समिति को परेशान कर रहा है और पट्टे के बावजूद प्लॉट पर कब्जा नहीं दिया। इस पर कोर्ट ने भारी हर्जाना लगाया है l

Senior Citizen: बुढ़ापे में संतान छोड़ दे बेसहारा तो काम आएगा ये अधिकार, अक्ल आ जाएगी ठिकानेसीनियर सिटीजन को कुछ प्रकार के...
02/06/2023

Senior Citizen: बुढ़ापे में संतान छोड़ दे बेसहारा तो काम आएगा ये अधिकार, अक्ल आ जाएगी ठिकाने

सीनियर सिटीजन को कुछ प्रकार के खास अधिकार दिए जाते है जो बुढ़ापे में उनको ताकतवर बनाने का काम करते है। आइए खबर में जानते है बुढ़ापे में ताकतवर बनाने वाले सीनियर सिटीजन के अधिकारों के बारे में

दिल्ली, कहा जाता है कि आप हर कर्ज उतार सकते हैं लेकिन माता-पिता का कर्ज कभी नहीं चुका सकते। हमारे समाज और हमारी परंपराओं में मां-बाप का दर्जा ईश्वर से कम नहीं। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? अफसोस की बात है कि अंधे और बुजुर्ग मां-बाप को कांवड़ पर बिठाकर तीर्थ कराने वाले श्रवण कुमार की धरती पर मां-बाप को बुढ़ापा में वृद्धाश्रमों में छोड़ा जाना हैरान नहीं करता।

बुढ़ापे में अपनी ही संतान घर से निकाल दे, इससे ज्यादा शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता। इस महीने की शुरुआत में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा कि अगर बेटा बुजुर्ग पिता की सेवा नहीं करता है तो उसके पिता के मकान पर उसका कोई हक नहीं है। 'हक की बात' (Haq Ki Baat) सीरीज के इस अंक में बात बुजुर्गों के अधिकारों की, आखिर कानून में उनके लिए क्या इंतजाम हैं? इस बारे में अदालतों ने कब-कब बड़े फैसले दिए जो नजीर बने?

मां-बाप की देखभाल नहीं की तो बेटे को मकान में रहने का हक नहीं: हाई कोर्ट
सबसे पहले बात छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के बीते दिनों आए फैसले की। रायपुर के कासिमपारा क्षेत्र के रहने वाले सेवालाल बघेल का आरोप था कि उनके बेटे और बहू रायपुर में उनके ही मकान में रहते हैं लेकिन उनकी देखभाल नहीं करते हैं। वह सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे। मकान को बुजुर्ग ने खुद खरीदा था लेकिन बेटे-बहू उन्हें अपने ही घर से निकालने के धमकी दिया करते थे। इस वजह से वह अपने बड़े बेटे के यहां रह रहने को मजबूर थे।

बेटे-बहू की प्रताड़ना से तंग आकर सेवालाल ने रायपुर कलेक्टर के यहां मैंटिनेंस ऐंड वेल्फेयर ऑफ पैरेंट्स ऐंड सीनियर सिटिजन ऐक्ट, 2007 के तहत शिकायत दर्ज कराई। कलेक्टर ने उन्हें राहत देते हुए बहू-बेटे को 7 दिनों के भीतर मकान खाली करने का आदेश दिया। साथ में बुजुर्ग को हर महीने 5 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। कलेक्टर के इस आदेश को बेटे नीरज बघेल ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में चुनौती दी लेकिन कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी। जस्टिस दीपक तिवारी की बेंच ने बेटे को 7 दिनों के भीतर मकान खाली करने के कलेक्टर के आदेश को सही ठहराया।

हालांकि, बुजुर्ग को हर महीने 5 हजार रुपये गुजारा भत्ता का आदेश निरस्त कर दिया क्योंकि पेंशन की वजह से उनके सामने गुजारे के संकट जैसी कोई समस्या नहीं थी। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अगर बुजुर्ग पिता की देखभाल नहीं करते हैं तो बेटे का मकान पर अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि परंपरा की अनदेखी, लोकाचार और नैतिकता में गिरावट की वजह से बुजुर्गों को नजरअंदाज करने की भावना बढ़ी है।

3-3 बेटे लेकिन बुढ़ापे में छोड़ दिया बेसहारा, बुजुर्ग ने की जान देने की कोशिश
पिछले साल यूपी के बस्ती में वंशराम नाम के एक 83 साल के बुजुर्ग ने नदी में कूदकर खुदकुशी की कोशिश की। उन्होंने अयोध्या में सरयू नदी में छलांग लगा दी लेकिन गनीमत रही कि समय रहते स्थानीय मल्लाहों और जल पुलिस उन्हें बचा लिया। वंशराम के एक-दो नहीं बल्कि 3 बेटे थे लेकिन बुढ़ापे में उन्होंने अपने पिता को ही बेसहारा छोड़ दिया। उन्होंने अपनी सारी जमीन-जायदाद बेटों के नाम कर दी थी लेकिन तीनों में से किसी के पास भी बुजुर्ग को रखने तक की जगह नहीं रही!

बुढ़ापे में मां-बाप की देखभाल बेटे का नैतिक फर्ज और कानूनी बाध्यता: सुप्रीम कोर्ट
नवंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग बाप को हर महीने 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने में आनाकानी करने वाले एक बेटे को कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा कि बुढ़ापे में मां-बाप की देखभाल करना न सिर्फ बेटे का नैतिक फर्ज है बल्कि कानूनी बाध्यता भी है। 72 साल के बुजुर्ग राजमिस्त्री थे। उनके 2 बेटे और 6 बेटियां थीं। बुजुर्ग दिल्ली के कृष्णानगर में 30 वर्गगज के मकान में अपने बड़े बेटे के परिवार के साथ रहते थे।

घर का पहले ही परिवार के सदस्यों के बीच बंटवारा हो चुका था। लेकिन शादीशुदा बेटियों ने अपनी हिस्सेदारी को पिता के लिए छोड़ रखा था जिस वजह से उन्हें घर के कोने में रहने के लिए एक बहुत ही छोटी सी जगह मिली थी। लेकिन बेटों ने उनके गुजारे और उनकी बुनियादी जरूरतों के लिए खर्च देना बंद कर दिया। 2015 में बुजुर्ग ने फैमिली कोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने उनके रियल एस्टेट डीलर बेटे को अपने पिता को गुजारे के लिए हर महीने 6 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया, वह भी 2015 की शुरुआत से। इस तरह बेटे को मासिक गुजारा भत्ता के अलावा एरियर के साथ एकमुश्त 1,68,000 रुपये अदा करने को कहा लेकिन उसने सिर्फ 50 हजार रुपये ही जमा किए।

बाद में ट्रायल कोर्ट ने गुजारा भत्ता की रकम को 6 हजार से बढ़ाकर 10 हजार रुपये महीना कर दिया और बकाया एरियर को नए रेट पर अदा करने को कहा। इसके बाद बेटा गुजारा भत्ता देने से बचने के लिए तमाम फोरमों में याचिकाएं दाखिल करने लगा। कभी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट तो कभी दिल्ली हाई कोर्ट और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में। शीर्ष अदालत में बेटे ने दलील दी कि उसकी आर्थिक स्थिति 10 हजार महीना गुजारा भत्ता देने की नहीं है। उसकी बहानेबाजियों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि बुजुर्ग मां-बाप की देखभाल करना बेटे का न सिर्फ नैतिक फर्ज है बल्कि कानूनी बाध्यता भी है।

संपत्ति पर बुजुर्ग मां-बाप का अधिकार, बहू-बेटे सिर्फ लाइसेंसी : कलकत्ता हाई कोर्ट
जुलाई 2021 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में अहम फैसला सुनाया कि संपत्ति पर बुजुर्ग मां-बाप का ही अधिकार है, उसके बेटे-बहू तो संपत्ति के सिर्फ लाइसेंसी मात्र हैं और उन्हें घर से बेदखल किया जा सकता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर कोई देश अपने बुजुर्गों और कमजोर नागरिकों की देखभाल नहीं कर सकता तो वह पूर्ण सभ्यता हासिल नहीं कर सकता।

बच्चों को मां-बाप की देखभाल करनी ही होगी: पंजाब ऐंड हरियाणा हाई कोर्ट

जुलाई 2021 में पंजाब ऐंड हरियाणा हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बच्चों को मां-बाप की देखभाल करनी ही होगी। मामला 76 साल की बुजुर्ग विधवा से जुड़ा था। महिला का आरोप था कि 2015 में उसके बेटे ने फर्जी तरीके से उसकी संपत्ति को अपने नाम करा लिया। इसके बाद वह उन्हें बात-बात पर पीटना शुरू कर दिया। सुलह के लिए 2-3 बार पंचायत भी हुई लेकिन बेटे के रवैये में कोई तब्दीली नहीं आई। आखिरकार महिला ने कानून का सहार लिया। जस्टिस एजी मसीह और अशोक कुमार वर्मा की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि बच्चों को अपने बुजुर्ग मां-बाप की देखभाल करनी ही होगी। इसके साथ ही अदालत ने बेटे के नाम महिला की संपत्ति के ट्रांसफर को भी रद्द कर दिया।

2011 की जनगणना के मुताबिक देश में तब सीनियर सिटिजन की तादाद 7.7 करोड़ थी जो कुल आबादी का करीब 7.5 फीसद थी। ये संख्या समय के साथ और बढ़ी है। मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस ऐंड एम्पावरमेंट की बुजुर्गों के लिए एनुअल ऐक्शन प्लान (2022-23) के अनुसार, 2021 में देश में बुजुर्गों की आबादी करीब 14 करोड़ थी यानी आबादी में उनकी हिस्सेदारी 10 फीसदी से ज्यादा है। बुजुर्गों के गरिमाभरे जीवन को सुनिश्चित करने के लिए तामाम कानूनी प्रावधान किए गए हैं। कभी कभार लोकलाज के भय और कभी जागरुकता की कमी की वजह से बुजुर्ग अपने ही संतान की प्रताड़ना सहने को मजबूर होते हैं। अगर आप बुजुर्ग हैं और आपकी संतान आपकी देखभाल नहीं कर रहे तो आपको कानून का सहारा लेना चाहिए। अगर आप अपने आसपास किसी बुजुर्ग को प्रताड़ित होते देख रहे हैं तो इन कानूनी रास्तों से उसे इंसाफ दिला सकते हैं।

मैंटिनेंस ऐंड वेल्फेयर ऑफ पैरेंट्स ऐंड सीनियर सिटिजंस ऐक्ट, 2007
इस कानून के जरिए बच्चों/रिश्तेदारों के लिए माता-पिता/वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल करना, उनकी सेहत, इलाज, रहने-खाने जैसी बुनियादी जरूरतों की व्यवस्था करना अनिवार्य किया गया है। कानून के मुताबिक बेटे-बेटी के साथ-साथ बालिग पोते-पोतियों की भी ये जिम्मेदारी है। भले ही ये बेटे-बेटी बुजुर्ग की जैविक संतान हों या फिर सौतेली या फिर गोद ली हुईं, उन सब पर ये कानून लागू होता है। उनकी जिम्मेदारी है कि वह माता-पिता के लिए रहने, खाने, कपड़े-लत्ते, इलाज जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करें। बहू, दामाद और बेटी के बच्चों को भी इस कानून के दायरे में लाने की तैयारी है। 2019 में इसे लेकर केंद्र सरकार ने एक संशोधन विधेयक भी लाया था जिसमें 2007 के कानून की खामियों को दूर करने की कोशिश की गई थी।

इस कानून के मुताबिक, बुजुर्ग के रिश्तेदारों में उसके सभी कानूनी वारिस (नाबालिग को छोड़कर) आएंगे जो उसके बाद उसकी संपत्ति के कानूनन हकदार हैं। अगर बच्चे या रिश्तेदार अपनी ये जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं तो उनके लिए सजा का भी प्रावधान है। दोषियों को 3 महीने की जेल या 5000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है।

बेटे-बेटी देखभाल न करें तो बुजुर्ग के पास उन्हें अपने घर से निकालने का भी हक
आमतौर पर देखा जाता है कि संपत्ति ट्रांसफर होते ही रिश्तेदारों का रवैया बदल जाता है। लेकिन अगर कोई बुजुर्ग अपनी संपत्ति बच्चों या रिश्तेदार के नाम ट्रांसफर कर चुका हो और वो अब उसकी देखभाल नहीं कर रहे तो प्रॉपर्टी का ट्रांसफर भी रद्द हो सकता है। यानी संपत्ति फिर से उसी बुजुर्ग के नाम हो जाएगी, जिसने उसे ट्रांसफर किया था। इसके बाद वह चाहे तो अपने बेटे, बेटियों को संपत्ति से बेदखल भी कर सकता है।

बच्चों, रिश्तेदारों के नाम कर दी हो प्रॉपर्टी तब भी उस पर बुजुर्ग का हक, पा सकता है वापस
मैंटिनेंस ऐंड वेल्फेयर ऑफ पैरेंट्स ऐंड सीनियर सिटिजंस ऐक्ट, 2007 कानून के लागू होने के बाद, अगर किसी बुजुर्ग ने अपनी जायदाद को बच्चों या रिश्तेदारों के नाम किया है, गिफ्ट के तौर पर या किसी भी अन्य वैध तरीके से तो जिनके नाम संपत्ति की गई है, उनकी जिम्मेदारी है कि वे बुजुर्ग की बुनियादी जरूरतों का खयाल रखें। उनकी देखभाल करें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो प्रॉपर्टी ट्रांसफर रद्द हो सकता है। बुजुर्गों के लिए कानून का ये प्रावधान बहुत ही राहत वाला है।

हर महीने 10 हजार रुपये तक गुजारा-भत्ता का अधिकार
वे बुजुर्ग माता-पिता जो अपनी आय या संपत्ति के जरिए अपना गुजारा करने में सक्षम नहीं हैं और उनके बच्चे या रिश्तेदार उनका ध्यान नहीं रख रहे तो वे भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं। ऐसे बुजुर्गों को प्रति महीने 10 हजार रुपये तक का गुजारा-भत्ता मिल सकता है। भरण-पोषण के आदेश का एक महीने के भीतर पालन करना अनिवार्य है। 60 वर्ष से ऊपर के ऐसे शख्स यानी सीयिर सिटिजन जिनकी कोई संतान न हो, वे भी अपने रिश्तेदारों/अपनी संपत्ति के उत्तराधिकारियों से भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं। कानून में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए मैंटिनेंस ट्राइब्यूनल और अपीलेट ट्राइब्यूनल का प्रावधान किया गया है। देश के ज्यादातर जिलों में ऐसे ट्राइब्यूनल हैं। बुजुर्ग से शिकायत मिलने के बाद ट्राइब्यूनल को 90 दिनों के भीतर उसका निपटारा करना होता है।

भरण-पोषण के लिए ऐसे कर सकते हैं दावा
इसके लिए ट्राइब्यूनल में आवेदन करना होगा। इसके लिए किसी वकील की भी जरूरत नहीं है। बुजुर्ग खुद अर्जी दे सकता है या किसी व्यक्ति या एनजीओ को भी इसके लिए अधिकृत कर सकता है। ट्राइब्यूनल खुद भी संज्ञान ले सकता है। अगर ट्राइब्यूनल संतुष्ट हो जाता है कि बच्चे या रिश्तेदार बुजुर्ग की देखभाल करने में लापरवाही बरत रहे हैं या इनकार कर रहे तो उन्हें हर महीने गुजारा भत्ता देने का आदेश दे सकता है जो अधिकतम 10 हजार रुपये प्रति महीने तक हो सकती है। हालांकि, अब सरकार इस अपर लिमिट को खत्म करने की तैयारी में है। ट्राइब्यूनल के फैसले से संतुष्ट नहीं होने पर बुजुर्ग उसे अपीलेट ट्राइब्यूनल में चुनौती भी दे सकता है।

CrPC में भी बुजुर्ग मां-बाप के लिए मासिक गुजारे-भत्ते का प्रावधान
'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक देखभाल एवं कल्याण कानून 2007' के अलावा सीआरपीसी में भी बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा के प्रावधान हैं। सीआरपीसी की धारा 125 (1) (डी) और हिंदू अडॉप्शन ऐंड मैंटिनेंस ऐक्ट 1956 की धारा 20 (1 और 3) के तहत भी मां-बाप अपनी संतान से भरण-पोषण के हकदार हैं। सीआरपीसी की धारा 125(1) के मुताबिक अगर संतानें अपने माता-पिता की देखभाल नहीं कर रहे हैं तो प्रथम श्रेणी का मैजिस्ट्रेट उन्हें भरण-पोषण देने का आदेश दे सकता है। हालांकि, यह राशि तय नहीं है और मैजिस्ट्रेट केस के आधार पर अपने विवेक के मुताबिक तय कर सकता है।

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