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07/02/2026
Wishing you all a very Happy New Year.
31/12/2021

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Happy Advocates Day
03/12/2021

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17/11/2021

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम: नौ वकीलों समेत 14 को जज बनाने की सिफारिश, देश को मिल सकता है पहला समलैंगिक जज
चीफ जस्टिस एनवी रमण की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने 11 नवंबर को हुई बैठक में पांच वकीलों सौरभ कृपाल, तारा वितस्ता गंजू, अनीश दयाल, अमित शर्मा और मिनी पुष्करणा को दिल्ली हाईकोर्ट में जज नियुक्त करने की फिर से सिफारिश की है।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने नौ वकीलों व तीन न्यायिक अधिकारियों को विभिन्न हाईकोर्ट में जज नियुक्त करने की फिर से सिफारिश की है। कॉलेजियम ने अधिवक्ता सौरभ किरपाल को भी दिल्ली हाईकोर्ट का जज बनाने के लिए केंद्र सरकार से सिफारिश की है। उनके नाम पर अनुमति मिलती है तो किरपाल किसी भी हाईकोर्ट में जज नियुक्ति होने वाले पहले समलैंगिक होंगे।
किरपाल सार्वजनिक रूप से समलैंगिक होने की बात कुबूल चुके हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के कॉलेजियम ने 2017 में उनकी सिफारिश की थी। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम तीन बार उनके नाम की मंजूरी टाल चुका है। पर, 11 नवंबर को कॉलेजियम ने उनके नाम की सिफारिश केंद्र को भेज दी।

15/11/2021

SC-ST Act को उत्पीड़न के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, इलाहाबाद HC ने चार्जशीट रद्द की
एक महत्वपूर्ण फैसले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय लखनऊ ने धारा 504, 506 आईपीसी और एससी-एसटी अधिनियम के धारा 3 (1) (आर) ), 3(1)(एस), 3(2) (वीए) के साथ-साथ समन आदेश और चार्जशीट को रद्द करने के लिए आपराधिक अपील की अनुमति दी।
जस्टिस पंकज भाटिया ने यह फैसला निर्भय सिंह एवं अन्य बनाम स्टेट ऑफ यूपी एवं अन्य के मामले में सुनाया है।
अपीलकर्ता के लिए अधिवक्ता वैभव कालिया ने तर्क दिया कि पूरी कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण है और अपीलकर्ताओं के खिलाफ प्रतिशोध में दर्ज की गई है क्योंकि अपीलकर्ता निर्भय सिंह के पिता ने मई में ग्राम प्रधान पद के लिए चुने गए रमेश बहादुर सिंह के खिलाफ चुनाव जीता था।
अपीलकर्ताओं के लिए श्री कालिया ने आगे तर्क दिया कि एफआईआर में दिए गए बयानों के साथ-साथ अन्य बयानों से भी, भले ही उन्हें सत्य माना जाए तो भी एससी/एसटी अधिनियम के 3(1)(आर), 3(1)(एस), 3(2)(वीए) एवं धारा 504, 506 आईपीसी और धाराओं के तहत कोई मामला नहीं बनाया जा सकता है।।
उन्होंने हरियाणा राज्य और अन्य बनाम भजन लाल और अन्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा रखा; और साथ ही हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य का निर्णय, अपने तर्क के समर्थन में दिया कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के प्रावधानों के तहत कोई मामला नहीं बनाया जा सकता है क्योंकि कथित घटना शिकायतकर्ता के घर के भीतर हुई थी न कि किसी सार्वजनिक स्थान पर या सार्वजनिक दृश्य के भीतर।
निर्णय
लखनऊ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने कहा कि
प्राथमिकी के साथ–साथ बयानों से पता चलता है कि अपीलकर्ता मुखबिर के घर आए थे और उन्होंने उसकी पत्नी को मुखबिर के खिलाफ जाति संबंधी शब्द कहे थे। प्राथमिकी या बयानों में इस बात का कोई उल्लेख नहीं होने के कारण कि इस तरह के किसी भी दुर्व्यवहार को जनता के सामने या सार्वजनिक दृश्य में नहीं मज़ा का सकता, इसलिए स्पष्ट रूप से धारा 3 (1) (आर), 3 (1)(एस), 3(2)(वीए) SC-ST Act के तहत अपीलकर्ताओं के खिलाफ आरोप पत्र दायर नहीं किया जा सकता था।
एससी-एसटी अधिनियम के कथन और उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने कहा कि:
विचाराधीन अधिनियम, अर्थात् एससी / एसटी अधिनियम, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार के अपराधों को रोकने के लिए अधिनियमित किया गया था। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के तहत वंचित व्यक्तियों द्वारा सामना किए जाने वाले अपमान और उत्पीड़न को दूर करने के लिए, उक्त अधिनियम को किसी भी तरह से सजा के लिए उत्पीड़न के उपकरण के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, जो आम घटनाओं के परिणामस्वरूप कायम है।
अधिनियम के तहत अभियोजन को आकर्षित करने के आरोप वर्तमान मामले में स्पष्ट रूप से अनुपस्थित हैं, इसलिए मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि अपीलकर्ताओं पर धारा 3(1)(r), 3(1)(s), 3 (2) (वीए) के तहत आरोप नहीं लगाया जा सकता है।समन आदेश में अपीलकर्ताओं को सम्मन करने से पहले इन तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया गया है, इसलिए अपीलकर्ताओं को मुकदमे का सामना करने के लिए समन आदेश स्पष्ट रूप से गलत है”
नतीजतन, अदालत ने आपराधिक अपील की अनुमति देते हुए सम्मन आदेश और आरोप पत्र को रद्द कर दिया।

15/11/2021

चेक बाउंंस के केस की कार्रवाई को सिर्फ इस आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता कि नोटिस वैधानिक अवधि में नहीं दिया गया, पढ़िए SC का फैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ताज़ा फैसले में यह माना है कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत कार्रवाई को इस आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता है कि मांग नोटिस (demand notice) को वैधानिक अवधि के भीतर विधिवत रूप से तामील नहीं किया गया है।

न्यायालय ने दोहराया है कि आरोपी को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत नोटिस की तामील, एक ट्राइबल इश्यू है और आरोपी द्वारा धारा 482 सीआरपीसी के तहत दायर याचिका में इसे निर्विवाद पोजीशन के रूप में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है।

इस मामले में, उच्च न्यायालय ने आरोपी द्वारा Cr.P.C की धारा 482 के तहत दायर याचिका को इस आधार पर खारिज करने की अनुमति दी कि वैधानिक अवधि के भीतर अभियुक्त को कानूनी नोटिस नहीं दिया गया है और यह टिप्पणी चेक रिटर्न मेमो पर नोट की गई है। उच्च न्यायालय ने आगे कहा था कि नोटिस की तामील में निहित प्रावधान, जनरल क्लॉज़ एक्ट में सुपरसीड नहीं किये गए हैं और इसलिए, वर्तमान मामले में जनरल क्लॉज़ एक्ट की धारा 27 लागू नहीं हुई है।

मानवाधिकार का हनन सबसे अधिक थानों में, लोगों के साथ होता है थर्ड डिग्री टॉर्चर: चीफ जस्टिससुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाध...
11/08/2021

मानवाधिकार का हनन सबसे अधिक थानों में, लोगों के साथ होता है थर्ड डिग्री टॉर्चर: चीफ जस्टिस

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना ने देश में पुलिस स्टेशन के भीतर लोगों के साथ हो रहे बर्ताव और मानवाधिकारों के हनन पर चिंता जाहिर करते हुए सख्त टिप्पणी की है। जस्टिस रमन्ना ने कहा कि पुलिस स्टेशन में मानवीय सम्मान और मानवाधिकार को सबसे ज्यादा खतरा रहता है। अभी भी पुलिस हिरासत में लोगों के साथ उत्पीड़न, लोगों की मौत सबसे बड़ा खतरा है। चीफ जस्टिस ने कहा कि मानवाधिकार और लोगों का सम्मान पवित्र होते हैं, उनका सम्मान होना चाहिए।

लोगों को कानूनी प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता
जस्टिस रमन्ना ने कहा कि बावजूद इसके कि संविधान में इस बात की गारंटी दी गई है कि लोगों के मानवाधिकार की रक्षा होगी। फिर भी पुलिस स्टेशन के भीतर लोगों को कानूनी प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है और इसके अभाव में गिरफ्तार किए गए या फिर हिरासत में लिए गए लोगों बहुत ज्यादा खतरा पुलिस स्टेशन में होता है। ऐसे में आरोपियों को जितनी जल्दी कानूनी मदद मिले उससे वह खुद का बचाव कर सकते हैं। हाल की रिपोर्ट को माने तो संभ्रांत वर्ग के लोगों के साथ भी थानों में थर्ड डिग्री तक का टॉर्चर होता है।

पांच साल की सजा, 10 लाख तक का जुर्माना, वकीलों की सुरक्षा के लिए कानून का ड्राफ्ट तैयारदेश में वकीलों पर होने वाले हमलों...
07/07/2021

पांच साल की सजा, 10 लाख तक का जुर्माना, वकीलों की सुरक्षा के लिए कानून का ड्राफ्ट तैयार

देश में वकीलों पर होने वाले हमलों से उन्हें सुरक्षा देने के लिए कानूनी उपाय किए जा रहे हैं. इसी बाबत एक कानून लाया जा रहा है. वकीलों की सुरक्षा और संरक्षा के विधेयक के मसौदे को अब 'बार काउंसिल ऑफ इंडिया' ने सभी स्टेक होल्डर्स की राय के लिए सार्वजनिक कर दिया है. नौ जुलाई तक इस पर राय, सुझाव और प्रतिक्रिया दी जा सकती है.

मसौदे में पांच साल तक की सजा

बिल के मसौदे में न्यायिक प्रक्रिया के दौरान कोर्ट के अधिकारी के रूप में अपनी ड्यूटी निभाने के दौरान वकील पर हमले के दोषियों को छह महीने से लेकर पांच साल तक कैद की सजा का प्रावधान किया गया है.

दस लाख तक मुआवजे का प्रावधान

इसके अलावा वकील से बदला लेने के लिए, उसके खिलाफ झूठी शिकायत, मुकदमे या कार्रवाई के मामले में पीड़ित वकील को दो से दस लाख रुपए मुआवजा देने का भी प्रावधान है.

महामारी और प्राकृतिक आपदा में मदद की मांग

इसके अलावा केंद्र सरकार से नियम बनाने को भी कहा है कि जांच या अभियोजन एजेंसी के वकीलों पर दबाव न डाला जाय. साथ ही केंद्र और राज्य सरकारें सुनिश्चित करें कि वकीलों को महामारी और प्राकृतिक आपदा के दौरान सामाजिक सुरक्षा और संरक्षा भी मुहैया कराई जाय.

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