04/06/2026
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: "15 साल की दूरी... अब सिर्फ कागज़ पर बची थी शादी"
सुप्रीम कोर्ट ने एक पति को दी गई तलाक की डिक्री (मंजूरी) को बरकरार रखते हुए कहा कि जब पति-पत्नी खुद अलग-अलग प्रोफेशनल और भौगोलिक रास्ते चुन लेते हैं, और सालों तक दूरी मिटाने का कोई प्रयास नहीं करते, तो शादी का बुनियादी ढांचा अपने आप खत्म (Abandoned) हो जाता है।
1. आपसी सहमति से 'अलगाव' भी एक तरह का त्याग है
कोर्ट ने कहा: "ऐसी स्थिति में अलग रहना (Desertion) किसी एक की दुर्भावना या गलती नहीं रह जाता, बल्कि यह दोनों तरफ से शादी के समझौते को व्यावहारिक रूप से छोड़ देना है। 15 साल तक पूरी तरह से अलग लाइफस्टाइल जीना, अलग घरों में रहना और कोई बातचीत न होना, यह दर्शाता है कि दोनों पक्षों ने शादी को खत्म मान लिया था।"
🧠 बिना कानूनी लेबल के भी 'मानसिक क्रूरता' (Mental Cruelty) माना जाएगा
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कानून की बारीकियों को दरकिनार करते हुए एक बहुत मानवीय बात कही:
लचीला रुख: भले ही याचिका में शुरुआती तौर पर 'Desertion' (त्याग) शब्द का इस्तेमाल न किया गया हो, लेकिन वैवाहिक विवादों को हमेशा सख्त कानूनी लेबलों में नहीं बांधा जा सकता।
अपीलीय अदालतों का अधिकार: कोर्ट मुकदमेबाजी के दौरान दोनों पक्षों के व्यवहार और बदली हुई परिस्थितियों को देख सकता है।
लंबे समय का अलगाव = मानसिक क्रूरता: बिना किसी सुलह के प्रयास के सालों तक अलग रहना और भावनात्मक रूप से दूर हो जाना, हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 13(1)(ia) के तहत 'मानसिक क्रूरता' के दायरे में आता है।
📜 केस का बैकग्राउंड (क्या था पूरा मामला?)
2009: पति ने 'क्रूरता' के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी।
फैमिली कोर्ट: याचिका को खारिज कर दिया था।
राजस्थान हाई कोर्ट: फैसले को पलटते हुए पति को तलाक दे दिया।
पत्नी की अपील: पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी। वह तलाक का विरोध कर रही थी और शादी बचाना चाहती थी।
मई 2025: सुप्रीम कोर्ट ने दोनों के बीच मध्यस्थता (Mediation) कराने की कोशिश की, लेकिन वह पूरी तरह फेल रही। दोनों पिछले 15 साल से अलग रह रहे थे।
🚫 वैवाहिक अधिकारों से इनकार करना भी 'क्रूरता' है
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस निष्कर्ष को भी सही ठहराया जिसमें पत्नी के व्यवहार को क्रूरता माना गया था:
शुरुआती दिनों का व्यवहार: कोर्ट ने नोट किया कि जब वे साथ रहते थे, तो पत्नी जल्दी सो जाती थी, कमरे को अंदर से लॉक कर लेती थी और खटखटाने पर भी दरवाजा नहीं खोलती थी। इस वजह से पति को दूसरे कमरे में सोना पड़ता था।
शारीरिक संबंधों से इनकार: कोर्ट ने 'समर घोष बनाम अन्य' मामलों का हवाला देते हुए दोहराया कि बिना किसी उचित कारण के शारीरिक संबंध (Conjugal Rights/Sexual In*******se) बनाने से लगातार इनकार करना मानसिक क्रूरता है और यह तलाक का एक वैध आधार है।
💥 "सड़ते हुए रिश्ते को खींचना दोनों के साथ क्रूरता है"
कोर्ट ने दोनों पक्षों की स्थिति को देखते हुए (दोनों सरकारी सेवा में आर्थिक रूप से स्वतंत्र डॉक्टर हैं और उनका कोई बच्चा नहीं है) कुछ बेहद गहरी टिप्पणियां कीं:
अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल: कोर्ट ने माना कि यह शादी पूरी तरह से टूट चुकी थी (Irretrievably Broken Down)। इसलिए कोर्ट ने अपनी असाधारण संवैधानिक शक्तियों (Article 142) का इस्तेमाल करते हुए न्याय के हित में शादी को भंग कर दिया।
फंसा कर रखना सही नहीं: कोर्ट ने कहा कि जो रिश्ता रोज थोड़ा-थोड़ा मर रहा हो, उसे खींचने से इंसान के जीवन में सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और मानसिक खालीपन आ जाता है। ऐसे में कानूनी रूप से अलग हो जाना ही दोनों पक्षों और समाज के हित में है।
📝 केस की मुख्य जानकारी:
केस नंबर: SLP (C) No. 10422 of 2025