Lawyer's Chamber

Lawyer's Chamber Most Senior Advocate Mr. Rangbali Singh ( Ex. ADGC Criminal, Ballia)& Bhanu Prakash Singh Adv .Best Known For His Excellence.

🏠 जब घर ही असुरक्षित हो जाए: घरेलू हिंसा पर कानून और न्यायपालिका की आवाजघरेलू हिंसा को अक्सर “परिवार का निजी मामला” कहकर...
25/02/2026

🏠 जब घर ही असुरक्षित हो जाए: घरेलू हिंसा पर कानून और न्यायपालिका की आवाज
घरेलू हिंसा को अक्सर “परिवार का निजी मामला” कहकर दबा दिया जाता है।
पर सच यह है — चुप्पी ही हिंसा की सबसे बड़ी साथी है।
भारत में हर वर्ग, हर शहर, हर गाँव में महिलाएँ शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और यौन उत्पीड़न का सामना करती हैं। इसी पृष्ठभूमि में बना था एक महत्वपूर्ण कानून —

⚖️ Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005
यह कानून केवल मारपीट तक सीमित नहीं है। यह मानता है कि —
✔ अपमान भी हिंसा है
✔ आर्थिक नियंत्रण भी हिंसा है
✔ मानसिक प्रताड़ना भी हिंसा है

लेकिन सवाल यह है —
क्या यह कानून ज़मीन पर उतना ही प्रभावी है जितना कागज़ पर?

🏛️ सुप्रीम कोर्ट की हालिया चिंता
📌 We the Women of India v. Union of India
(W.P. (C) No. 1156/2021)
Supreme Court of India ने पाया कि कई राज्यों में:
पर्याप्त Protection Officers नियुक्त नहीं
Shelter Homes अधिसूचित नहीं
पीड़ितों को कानूनी सहायता की जानकारी नहीं

🔎 कोर्ट ने स्पष्ट कहा:
“कानून तभी जीवित है जब वह पीड़ित तक पहुँचे।”
यह आदेश नए अधिकार बनाने का नहीं,
बल्कि मौजूदा अधिकारों को लागू कराने का था।

🌿 न्यायिक व्याख्या ने बढ़ाया संरक्षण

1️⃣ 💛 Live-In संबंधों को मान्यता
Lalita Toppo v. State of Jharkhand (2018)
(Lalita Toppo v. State of Jharkhand)
निर्णय:
यदि संबंध “विवाह की प्रकृति” जैसा है,
तो महिला को संरक्षण और भरण-पोषण मिलेगा।
👉 विवाह का प्रमाण नहीं,
संबंध की वास्तविकता महत्वपूर्ण है।

2️⃣ ⚖️ उत्तरदायित्व का विस्तार
Hiralal P. Harsora v. Kusum Narottamdas Harsora (2016)
(Hiralal P. Harsora v. Kusum Narottamdas Harsora)
पहले केवल “वयस्क पुरुष” ही उत्तरदायी था।
सुप्रीम कोर्ट ने यह सीमा हटाई।
अब —
✔ किसी भी वयस्क सदस्य के विरुद्ध शिकायत संभव
👉 कानून को लिंग-तटस्थ (gender neutral respondent) बनाया गया।

📊 घरेलू हिंसा कानून: एक सरल संरचना

घरेलू हिंसा

─────────────┼─────────────

PWDVA, 2005 (सिविल कानून)

┌──────────────┼──────────────┐
│ │ │
संरक्षण आदेश निवास अधिकार आर्थिक राहत
(Sec 18) (Sec 19) (Sec 20)

─────────────┼─────────────

समानांतर कार्यवाही
(BNS, BNSS, तलाक, संपत्ति विवाद)

🛡️ PWDVA क्यों अलग है?
✔ यह केवल सज़ा पर आधारित नहीं
✔ यह तत्काल संरक्षण देता है
✔ महिला को साझा घर में रहने का अधिकार सुनिश्चित करता है
✔ स्वामित्व (ownership) पर निर्भर नहीं
यह कानून कहता है —
घर से बेदखली भी हिंसा का हथियार नहीं बन सकती।

🚨 असली चुनौती: प्रशासनिक कमजोरी
समस्या कानून की भाषा में नहीं,
बल्कि उसके क्रियान्वयन में है।
अधिकारियों की कमी
समन्वय का अभाव
जागरूकता की कमी
यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा।

🔮 आगे का रास्ता
✔ Protection Officers की नियमित नियुक्ति
✔ पुलिस व मजिस्ट्रेट का विशेष प्रशिक्षण
✔ जिला प्रशासन और विधिक सेवा प्राधिकरण का बेहतर समन्वय

✨ निष्कर्ष
घरेलू हिंसा कोई निजी विवाद नहीं —
यह संवैधानिक गरिमा और मानव अधिकार का प्रश्न है।
न्यायपालिका ने स्पष्ट कर दिया है:
अधिकार मौजूद हैं।
व्याख्या व्यापक है।
जवाबदेही तय है।
अब आवश्यकता है —
क्रियान्वयन की प्रतिबद्धता।
क्योंकि संरक्षण से जुड़ा कानून
केवल प्रावधान नहीं,
सम्मान और सुरक्षा का वचन है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने बुधवार को National Council of Educational Research and Training (NCERT) की नई कक्ष...
25/02/2026

भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने बुधवार को National Council of Educational Research and Training (NCERT) की नई कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” संबंधी सामग्री पर कड़ा आपत्ति जताई:---
📰 The Indian Express की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि इस नई पुस्तक में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” और “भारी लंबित मामले (backlog)” को प्रमुख चुनौतियों के रूप में दर्शाया गया है।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट में उठा मुद्दा
वरिष्ठ अधिवक्ता Kapil Sibal तथा Abhishek Manu Singhvi ने इस विषय को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उठाया।
🔹 कपिल सिब्बल ने कहा:
“हम इस संस्था के सदस्य होने के नाते अत्यंत व्यथित हैं कि कक्षा 8 के बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जा रहा है। यह अत्यंत चिंताजनक और निंदनीय है।”
🏛️ CJI की सख्त प्रतिक्रिया
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें इस विषय की पूरी जानकारी है और उन्हें इस संबंध में कई कॉल और संदेश प्राप्त हुए हैं।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“मैं किसी को भी इस संस्था की गरिमा को ठेस पहुँचाने या इसे बदनाम करने की अनुमति नहीं दूँगा। चाहे वह कितना भी ऊँचा व्यक्ति क्यों न हो, कानून अपना काम करेगा।”
उन्होंने यह भी बताया कि वे इस मामले में स्वतः संज्ञान (Suo Motu) ले चुके हैं और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
⚠️ अन्य टिप्पणियाँ
🔹 अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि पुस्तक में केवल न्यायपालिका को निशाना बनाया गया है, जबकि नौकरशाही, राजनीति या अन्य संस्थानों में भ्रष्टाचार का उल्लेख नहीं है — यह चयनात्मक (selective) दृष्टिकोण चिंताजनक है।
🔹 न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi ने टिप्पणी की:
“पुस्तक की संरचना में संवैधानिक मूल संरचना की अखंडता का अभाव दिखता है।”
🔎 निष्कर्ष
यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान में है और न्यायपालिका की गरिमा व विश्वसनीयता की रक्षा को लेकर शीर्ष स्तर पर गंभीरता दिखाई गई है।
✨ न्यायपालिका और बार—दोनों ही इस विषय पर चिंतित हैं, और आने वाले दिनों में इस पर महत्वपूर्ण कानूनी कार्रवाई देखने को मिल सकती है।

25/02/2026

15/01/2026
15/01/2026

Big shout out to my newest top fans! अधिवक्ता आशुतोष सिंह

01/01/2026

01/01/2026

Happy New Year 2026

यह मामला क़ानूनी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पहली बार सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह प्रश्न आया है कि — क्या...
25/10/2025

यह मामला क़ानूनी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पहली बार सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह प्रश्न आया है कि — क्या "Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act, 2012" के प्रावधान किसी महिला आरोपी पर भी लागू हो सकते हैं या नहीं, जबकि अधिनियम की भाषा में “he”, “his” जैसे पुरुषवाचक सर्वनाम प्रयुक्त किए गए हैं।

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🔹 मामले का सारांश (Case Summary in Hindi):

मामला: Archana Patil v. State of Karnataka & Anr.
याचिका संख्या: Special Leave Petition (Criminal) No. 15777/2025
पीठ: न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरैश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा

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🔹 मामले के तथ्य (Facts of the Case):

याचिकाकर्ता अर्चना पाटिल, उम्र 48 वर्ष, पर आरोप है कि उन्होंने अपने पड़ोसी के 13 वर्षीय बेटे के साथ यौन उत्पीड़न (sexual assault) किया।

यह घटना फरवरी 2020 से जून 2020 के बीच की बताई गई है, जब वह बच्चा उनके घर आर्ट क्लास के लिए जाता था।

पुलिस जांच के बाद उन पर POCSO Act की धारा 4 और 6 के अंतर्गत आरोपपत्र (chargesheet) दायर किया गया।

धारा 4: penetrative sexual assault के लिए दंड

धारा 6: aggravated penetrative sexual assault के लिए कठोर दंड

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🔹 याचिकाकर्ता का तर्क (Petitioner’s Argument):

वरिष्ठ अधिवक्ता हाशमत पाशा ने अर्चना पाटिल की ओर से यह दलील दी कि –

POCSO Act की धारा 3(1)(a) से 3(1)(c) में स्पष्ट रूप से “he” और “his” शब्द प्रयुक्त हैं, जो पुरुष को संदर्भित करते हैं।

इसलिए, जब विधि स्वयं gender-specific है, तो किसी महिला पर यह धारा लागू नहीं की जा सकती।

अतः महिला आरोपी के विरुद्ध penetrative sexual assault के आरोप विधिक दृष्टि से टिक नहीं सकते।

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🔹 कर्नाटक उच्च न्यायालय का निर्णय (High Court’s View):

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 18 अगस्त 2025 को दिया अपना आदेश, जिसमें उसने यह कहा कि:

POCSO Act एक gender-neutral कानून है, जिसका उद्देश्य है सभी बच्चों की सुरक्षा, चाहे बच्चा लड़का हो या लड़की।

यद्यपि अधिनियम की भाषा में कुछ स्थानों पर “he” शब्द आया है, परंतु कानून की मंशा (legislative intent) और प्रीएम्बल (preamble) इसे लिंग-निरपेक्ष (inclusive and gender-neutral) बनाते हैं।

अतः महिला आरोपी पर भी यह अधिनियम लागू होगा।

> "यह अधिनियम बचपन की पवित्रता की रक्षा के लिए बनाया गया है। यह एक प्रगतिशील कानून है जो सभी बच्चों की सुरक्षा करता है — लिंग की परवाह किए बिना।" — कर्नाटक उच्च न्यायालय

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🔹 सुप्रीम कोर्ट में स्थिति (Supreme Court Proceedings):

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने याचिकाकर्ता के तर्क को सुनने के बाद कहा:

> “Issue notice. In the meantime, further proceedings before the Trial Court shall remain stayed.”
यानी, ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर अस्थायी रोक (stay) लगा दी गई है, और राज्य सरकार से जवाब मांगा गया है।

इसका अर्थ है कि सुप्रीम कोर्ट इस प्रश्न पर विचार करने के लिए तैयार है कि क्या POCSO Act के तहत महिला को भी "penetrative sexual assault" का आरोपी ठहराया जा सकता है या नहीं।

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🔹 कानूनी प्रश्न (Key Legal Issue):

> क्या “Penetrative Sexual Assault” (POCSO Act की धारा 3) केवल पुरुष द्वारा किए गए अपराध तक सीमित है, या महिला द्वारा किए गए कार्यों पर भी लागू होती है?

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🔹 महत्त्व (Legal Significance):

1. यह मामला POCSO Act की व्याख्या (interpretation) को लेकर पहला बड़ा परीक्षण है, जहाँ लिंग-निरपेक्षता (gender neutrality) पर न्यायिक स्पष्टता मिलेगी।

2. यदि सुप्रीम कोर्ट यह मानता है कि “he” को केवल पुरुष तक सीमित नहीं किया जा सकता, तो यह अधिनियम सभी अपराधियों — पुरुष, महिला या किसी अन्य लिंग के व्यक्ति — पर समान रूप से लागू होगा।

3. लेकिन यदि कोर्ट यह मानता है कि कानून की भाषा (textual interpretation) ही निर्णायक है, तो महिला आरोपी को इस अधिनियम से मुक्ति मिल सकती है, और सरकार को विधायी संशोधन करना पड़ सकता है।

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🔹 संक्षेप में निष्कर्ष (In Summary):

पक्ष तर्क

अर्चना पाटिल (याचिकाकर्ता) “he/his” शब्द से यह धारा केवल पुरुष अपराधियों पर लागू होती है। महिला पर नहीं।
राज्य / अभियोजन पक्ष अधिनियम का उद्देश्य सभी बच्चों की रक्षा है, अतः यह gender-neutral है।
सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान आदेश नोटिस जारी किया गया है और ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही स्थगित (stay) कर दी गई है।
आगामी चरण सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि क्या महिला को “penetrative sexual assault” का आरोपी बनाया जा सकता है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय “Nawang & Anr. vs Bahadur & Ors.” का सारांश —👇---🌿 🔹 सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा निर्णय :सुप्र...
23/10/2025

सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय “Nawang & Anr. vs Bahadur & Ors.” का सारांश —
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🌿 🔹 सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा निर्णय :
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act - HSA) अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) के सदस्यों पर लागू नहीं होता।

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⚖️ 🔹 पीठ (Bench):
न्यायमूर्ति संजय करोल (Justice Sanjay Karol)
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा (Justice Prashant Kumar Mishra)

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📜 🔹 मामला:
Nawang and Another v. Bahadur and Others

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🏛️ 🔹 पृष्ठभूमि (Background):

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय (Himachal Pradesh High Court) ने 2015 में निर्णय दिया था कि
👉 “राज्य के जनजातीय क्षेत्रों में बेटियाँ भी हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार संपत्ति में अधिकार पाएंगी।”

उच्च न्यायालय ने यह कहा था कि यह “सामाजिक न्याय और शोषण रोकने” के लिए आवश्यक है।

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🚫 🔹 सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष:

यह निर्देश HSA की धारा 2(2) के विपरीत है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय ऐसा निर्देश नहीं दे सकता था, क्योंकि
➤ यह मुद्दे (issues) का हिस्सा नहीं था,
➤ पक्षकारों द्वारा बहस में यह बात उठाई ही नहीं गई थी।

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📘 🔹 धारा 2(2) — Hindu Succession Act, 1956 के अनुसार :

> “इस अधिनियम के प्रावधान किसी भी अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) के सदस्य पर लागू नहीं होंगे,
जब तक कि केंद्र सरकार राजपत्र (Official Gazette) में अधिसूचना जारी कर इसे लागू न कर दे।”

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⚖️ 🔹 सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन (Observation):

> “धारा 2 के अनुसार, उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया जा सकता था,
विशेष रूप से तब जब वह मामला उन मुद्दों से संबंधित नहीं था जो पक्षकारों ने उठाए थे।”

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📚 🔹 पूर्व निर्णयों पर भरोसा (Precedents):
1️⃣ Tirith Kumar & Ors. v. Daduram & Ors. (2024):

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुसूचित जनजातियाँ HSA के दायरे से बाहर हैं।

साथ ही संसद से आग्रह किया गया था कि वह इस विषय पर विचार करे।

2️⃣ Kamla Neti v. LAO (2023):

कोर्ट ने कहा था कि अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार HSA में संशोधन करे ताकि यह अनुसूचित जनजातियों पर भी लागू हो सके।

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👩‍⚖️ 🔹 पैरवी (Appearances):

एडवोकेट रेबेका मिश्रा (Amicus Curiae)

एडवोकेट राजेश गुप्ता (For Appellant)

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💡 🔹 निष्कर्ष (Conclusion):
👉 सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल हाईकोर्ट का निर्देश रद्द (Set Aside) कर दिया।
👉 दोहराया कि जब तक केंद्र सरकार अधिसूचना जारी नहीं करती, HSA अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं हो सकता।

22/10/2025

Art of Cross Examination used by Ram Jethmalani



Art of Cross Examination used by Ram Jethmalani

“The issue of a cause rarely depends upon a speech and is but seldom even affected by it. But there is never a cause contested, the result of which is not mainly dependent upon the skill with which the advocate conducts his cross-examination.”- Francis L. Wellman

When asked, the undisputed champion of cross-examination, Mr. Ram Jethmalani described the Art of cross examination as the most effective weapon for the discovery of truth, provided the objective is not to confound a truthful witness but to extract truth from an unwilling witness.
The search for truth is the ultimate and idealistic end of all litigated matter in a court trial, and that truth is obtained due to the process of cross-examination in the conduct of litigation.

Mr Jethmalani understands that in India where a large number of complaints and cases are filed in civil and criminal courts every day, delay in justice is common due to the rapidly growing pendency of cases in courts. Examination of witnesses plays an important role in the presentation of the evidence in a court of law in both civil and criminal case and admissibility of that evidence is an important aspect which has to be decided by the judges only. Due to this procedure of examination, each case is looked upon clearly and it takes a long time to pass the judgment by the court.

Purpose of Cross examination

Cross Examination is one of the most important facets of our legal system. To understand the role and importance of cross-examination, let us take an example. If a man reports to a court that he has seen A shooting B with a revolver on a particular date, in the evening, and thus killed him. Then how will the court know whether or not to believe the version of the so­ called eyewitness? There are equal chances of the testimony of witness being true or false. A witness may have several reasons to say falsehood or even to say the truth. A witness may give false information due to enmity, greed or to implicate somebody with ulterior motives. So, a witness can be believed only if he/she passes the examination of truth through the process cross­ examination.

This process is done by giving an opportunity to the opposite party to ask such questions which challenges the veracity of the information given by the witness of the opposite party. Questions about previous statements and conduct before, during and after the incident happened may be framed and put forth. These questions should not be absurd, scandalous or arbitrary. If the witness replies satisfactorily then the court may declare them as a reliable witness, but he/she fails the cross-examination, then the testimony is of no consequence.

Cross examination varies from case to case and man to man. The age, position, status, expression in court, experience, qualification and expertise etc., are all subjects of cross-examination. It is dynamic in nature as the questions change on the spot according to the response of the witness. In the case where the testimony is of a child witness, normally it is to be corroborated as such a testimony can be easily tutored, as children are vulnerable. But the testimony of an adult, if reliable, is sufficient to convict an accused.

Cross Examination under Indian Legal System

Right to cross examination flows from the principle of Natural Justice that evidence may not be read against a party until the same has been subjected to cross-examination or at least an opportunity is given to cross-examine. This right is one of the most powerful instrumentalities provided to lawyers in the conduct of litigation. The most important purpose of this right is to attempt to destroy the credibility of the opponent’s witness.

Chapter X of Evidence Act 1872, deals with examination and cross-examination of witnesses before a court of law. The relevant sections are section 136 to Section 166 of The Evidence Act. Section 137 tells about examination in ­chief and cross-examination of witnesses. According to this Section 137, the examination of a witness by the adverse party shall be called his cross-examination. Section 138 provides the Order of Examination, it may be a technical rule but it flows from the essential rules of justice. It says that there must be first an Examination in Chief, then the opposite party cross-examines the witness and if the party calling the witness so desires, there may be a re-examination.

Basics of Examination of a witness in court:

The examination of a witness who calls him is called as ‘Examination in chief’. After Examination ­in ­chief, the examination of the witness by an opposite party is called ‘Cross-examination’. The examination of a witness subsequent to Cross ­examination is called Re-examination. The Re­-examination can be made to explain a matter stated in Examination ­in chief and if some new matter is narrated in Re­-examination the adverse party can again cross-examine about new

The Art of Cross Examination plays an important role in the trial of each and every case whenever the talent and hard work of the lawyer are involved to secure justice for their clients. To learn and perfect the Art of cross examination in India a lawyer must observe others, read trial and deposition transcripts and by conducting the examination personally. A trial lawyer must adapt well to particular witnesses and different cases.

As already discussed the main object of cross examination in India is to find out whether the testimony is truthful or to detect the falsehood in it. It is done to either destroy or weaken the force of evidence given by a witness. Cross-examination of a witness is the duty of every lawyer towards his client. It is the most efficacious test to discover the truth and to detect false statements made by the witnesses. Justice can be defeated if cross-examination is not done properly.

Often, however, one needs to spend time with the witness to develop several critical points to counter the impact of the direct examination. Thus the preparation by a lawyer is very important before initiating a Cross Examination of any witness. The lawyer should clearly bear in mind those points he or she wishes to make with that witness and frame them beforehand. These points should also be discussed with those who are assisting at trial. Patience is the virtue in Cross-Examination and judges must give chance to every party to Cross-Examine the other party’s witness.

A lawyer should use leading questions (Section 141) i.e. “is that correct?” and “isn’t it a fact” etc. at the time of Cross-Examining of the witness because asking leading questions is perhaps the oldest rule of Cross-Examination. Leading questions are effective because they essentially allow the Cross-Examiner to testify and the witness to ratify. The technological advances one of the important dynamics of the courtroom is controlled. Asking leading questions allows the Cross-Examiner to be forceful, fearless, knowledgeable and informative.

The lawyer must also keep in mind while framing the questions that the questions asked during the Cross Examination must be relevant to the issue related to the facts of the case. Indecent & scandalous questions can also be asked by the advocate at the time of Cross-Examination if they relate to the fact in issue. Most importantly questions intended to insult or annoy should be forbidden by the court even though the question may seem to be proper.

The court which has authoritative power to decide the case can recall the witness for the Cross-Examination based on the facts and circumstances of that particular case. A summary procedure does not take away the rights of the parties to Cross-Examine as every party has to be given fair deal in the matter of Cross Examination.

Conclusion

Thus we can conclude with certain points to be considered by lawyers in case of cross-examination, and for honing their Art of cross examination. The purpose of cross-examination is to question the testimony of the witness before the judge, in favour of the client. But the reason why cross-examination evolved as the most important part of litigation was that justice is based on truth and cross-examination helps the court, judges, and jury reach that truth. If the lawyer does the cross-examination with these principles in mind, the case will be presented to the utmost satisfaction of the judge, client and most importantly oneself, and that show Art of cross-examination is understood and perfection is achieved.

12/10/2025

*Indian Evidence Act* *[ Section 11]*
*PLEA OF ALI-BI*

यह लेख 1872 के भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत अन्यत्र रहने की दलील (प्ली ऑफ़ एलिबी) का एक विस्तृत विवरण देता है। यह लेख अन्यत्र रहने की दलील की अनिवार्यताओं, कौन न्यायालय के समक्ष इसका लाभ उठा सकता है, न्यायालय के समक्ष अन्यत्र रहने की दलील साबित नहीं करने के परिणाम, और प्रासंगिक मामलो के साथ इसके अन्य दायरे से संबंधित है।

*Table of Contents* --------

अन्यत्र रहना क्या है?
कानून के प्रावधान जो अन्यत्र रहने की दलील से संबंधित हैं
धारा 11(1) और अन्यत्र रहने की दलील
धारा 103 और अन्यत्र रहने की दलील
अन्यत्र रहने की दलील कौन ले सकता है?
अन्यत्र रहने की दलील को साबित करने के लिए सबूत का भार
अन्यत्र रहने की दलील कब विफल होती है
अन्यत्र रहने की दलील देने के लिए आवश्यक मानदंडों को पूरा किया जाना चाहिए
अपराध होना चाहिए
अन्यत्र रहने की दलील लेने वाले व्यक्ति को उक्त अपराध का अभियुक्त बनाया जाना चाहिए
अभियुक्त को अपराध स्थल पर उपस्थित नहीं होना चाहिए
अभियुक्त को बिना किसी उचित संदेह के याचिका साबित करनी होगी
अन्यत्र रहने की झूठी दलील के परिणाम
अन्यत्र रहने की दलील की सीमाएँ और चुनौतियां

*

*अन्यत्र रहना क्या है?*
अन्यत्र रहना जिसे अंग्रेजी में एलिबी कहते है एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है “कहीं और”, ‘एलिबी’ शब्द आपराधिक और साक्ष्य कानून के अध्ययन में प्रासंगिक है। साक्ष्य कानून में, यह एक बचाव या एक बहाना है जिसका इस्तेमाल आमतौर पर अभियुक्त लगाए गए दोष या सजा को टालने के लिए किया जाता है।

किसी अपराध में, अभियुक्त का अपराध साबित करने का सबसे आवश्यक हिस्सा यह साबित करना है कि अभियुक्त ही वह व्यक्ति था जिसने अपराध किया था, और अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष को यह साबित करना होगा कि अभियुक्त उस स्थान पर मौजूद था जहां अपराध हुआ था और उसने अपराध किया है। यदि अभियुक्त यह बचाव कर सकता है कि वह उस स्थान से ‘कहीं और’ था जहां अपराध हुआ था, तो कहा जाता है कि उसके पास अन्यत्र रहने की दलील का बचाव है।

अन्यत्र रहना, एक दावा या सबूत का एक टुकड़ा है जो साबित करता है कि अभियुक्त उस स्थान पर नहीं था जहां अपराध हुआ था। अधिक सटीक रूप से, अभियुक्त का उस स्थान पर होना जहां अपराध हुआ है, विचित्र नहीं तो, असंभव जरूर हो सकता है।

कानून के प्रावधान जो अन्यत्र रहने की दलील से संबंधित हैं
यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 11 द्वारा मान्यता प्राप्त साक्ष्य का एक नियम है। यह धारा बताती है कि जो तथ्य अन्यथा प्रासंगिक नहीं हैं वे निम्नलिखित शर्तों के तहत प्रासंगिक हो जाते हैं:

यदि ऐसे तथ्य मुद्दे के किसी भी तथ्य या मामले के प्रासंगिक तथ्यों से असंगत हैं।
यदि ऐसे तथ्य स्वयं या किसी अन्य तथ्य के संबंध में किसी अन्य मुद्दे या प्रासंगिक तथ्य के अस्तित्व या गैर-अस्तित्व को अत्यधिक संभावित या अत्यधिक असंभव बना सकते हैं।
*धारा 11(1)* और अन्यत्र रहने की दलील
*धारा 11(1)* परिभाषित करती है कि कोई भी तथ्य जो अन्यथा अप्रासंगिक होगा, प्रासंगिक हो जाएगा यदि वे किसी भी मुद्दे या प्रासंगिक तथ्यों के साथ असंगत हों। ऐसे मामले में जहां कोई अपराध हुआ है, अन्यत्र रहने की दलील देने से अभियुक्त द्वारा अपराध करने के मामले में तथ्यों के साथ असंगति पैदा होगी।

*उदाहरण* :

सवाल यह है कि क्या चेन्नई में अपराध A द्वारा एक निश्चित दिन पर किया गया था। यहां, आम तौर पर उस दिन, A के बंबई में होने का तथ्य प्रासंगिक है। यह प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि अपराध घटित होने के समय A जहां था, वह उस स्थान से असंगत है जहां अपराध घटित हुआ था। चेन्नई में घटित अपराध को करने में A की असंभवता, क्योंकि अपराध घटित होने के समय वह बंबई में था, धारा 11(1) में परिभाषित असंगतता है।

इसलिए, अभियुक्त की अन्यत्र उपस्थिति अनिवार्य रूप से अपराध के स्थान पर अभियुक्त की कथित उपस्थिति से असंगत है। उपरोक्त उदाहरण से, यह स्पष्ट है कि बॉम्बे में A की उपस्थिति इस आरोप से असंगत है कि उसने अपराध किया है क्योंकि अपराध को पूरा करने के लिए, अपराध के समय A की उपस्थिति आवश्यक है।

धारा 103 और अन्यत्र रहने की दलील
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 103 में कहा गया है कि जो कोई चाहता है कि न्यायालय किसी तथ्य के अस्तित्व पर विश्वास करे, उस पर ऐसे तथ्य को साबित करने का दायित्व है। अन्यत्र रहने की दलील में, अभियुक्त चाहता है कि न्यायालय इस तथ्य पर विश्वास करे कि वह अपराध स्थल से कहीं और था। इसलिए, *धारा 103* के तहत, इस तथ्य को साबित करना अभियुक्त का दायित्व है कि वह अपराध स्थल से कहीं और था।

*अन्यत्र रहने की दलील कौन ले सकता है?*
अभियुक्त एकमात्र व्यक्ति है जो अन्यत्र रहने की दलील कर सकता है। यदि अभियुक्त अभियोजन के शुरुआती चरण में ही अन्यत्र रहने की दलील देता है, तो यह उसके पक्ष में होगा क्योंकि ऐसा करने से उसकी विश्वसनीयता बढ़ जाती है।

हालाँकि अधिकांश मामलों में जल्द से जल्द अन्यत्र रहने की दलील पेश न करना न्यायालय के लिए असंबद्ध (अन्कन्विन्सिंग) हो सकता है, लेकिन *सहदेव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2010)* के मामले में, यह माना गया कि न्यायालय के पास अभियोजन के दौरान किसी भी समय अन्यत्र सबूत के लिए उसके समक्ष दायर सार्वजनिक दस्तावेज़ को उचित महत्व नहीं देने की कोई शक्ति नहीं होगी।

अन्यत्र रहने की दलील को साबित करने के लिए सबूत का भार
सबूत का भार भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 101 में दिया गया है। यह धारा परिभाषित करती है कि जो कोई भी दिए गए तथ्यों के आधार पर अपने पक्ष में निर्णय देने के लिए न्यायालय से अनुरोध करता है, उस पर उन तथ्यों के अस्तित्व को साबित करने का भार है।

*धारा 101*- यह भी परिभाषित करती है कि यदि कोई व्यक्ति किसी तथ्य के अस्तित्व का साक्ष्य देने के लिए बाध्य है, तो सबूत का भार उस व्यक्ति पर है। चूंकि भारतीय आपराधिक कानून व्यवस्था में अभियुक्त, दोषी साबित होने तक निर्दोष होता है, इसलिए वह किसी भी तथ्य के अस्तित्व को साबित करने के लिए बाध्य है जो उसे बरी कर देगा।

अन्यत्र रहने को साबित करने का भार अभियुक्त पर है। यह साबित करना उसका दायित्व है कि अपराध के समय वह कहीं और था। अभियुक्त को यह साबित करना होगा कि वह अपराध करने के स्थान से बहुत दूर था, और इसलिए वह उस विशेष समय पर अपराध स्थल पर नहीं हो सकता है।

किसी भी परिस्थितिजन्य तथ्यों का उपयोग करके और गवाहों को इकट्ठा करके यह साबित करने का पूरा दायित्व केवल अभियुक्त पर है कि अभियुक्त कहीं और था और यह कि असंभवता के कारण अभियुक्त के लिए ऐसा अपराध करना असंभव होगा।

अन्यत्र रहने की दलील कब विफल होती है
कुछ मामलों के माध्यम से यह निहित है कि यदि न्यायालय द्वारा अन्यत्र रहने की याचिका खारिज करने के दौरान विफल हो जाती है, तो पूरी संभावना है कि अभियुक्त वहीं था जहां अपराध हुआ था। ऐसे मामले में जहां अभियुक्त द्वारा अन्यत्र रहने की दलील साबित नहीं की जा सकती है, यह माना जाना चाहिए कि अभियुक्त वास्तव में अपराध करने के स्थान पर था। लेकिन ऐसे फैसले हमेशा एक जैसे नहीं होते।

*अन्ना एवं अन्य बनाम हैदराबाद राज्य (1955)* के मामले में, न्यायालय ने कहा कि यह समझा जाना चाहिए कि अभियुक्त की ओर से अन्यत्र रहने की दलील स्थापित करने में विफलता मात्र इस निष्कर्ष को जन्म नहीं देगी और न ही दे सकती है कि अभियुक्त उस स्थान पर था जहां अपराध किया गया बताया गया है।

अन्यत्र रहने की दलील देने के लिए आवश्यक मानदंडों को पूरा किया जाना चाहिए
*न्यायालय के समक्ष अन्यत्र रहने की दलील देने के लिए आवश्यक शर्तों की निम्नलिखित सूची होनी चाहिए:*

अपराध होना चाहिए।
अन्यत्र रहने की दलील लेने वाले व्यक्ति को उक्त अपराध का अभियुक्त बनाया जाना चाहिए।
अभियुक्त को अपराध स्थल पर उपस्थित नहीं होना चाहिए।
अभियुक्त को बिना किसी उचित संदेह के याचिका साबित करनी होगी।
अपराध होना चाहिए
अन्यत्र रहने की दलील देने के लिए, ऐसा अपराध होना चाहिए जो कानून के प्रावधानों के तहत दंडनीय हो। किसी अपराध की उपस्थिति के बिना, अन्यत्र रहने की दलील नहीं दी जा सकती। अन्यत्र रहने की दलील दीवानी मामलों के लिए लागू नहीं है; अपराध का अस्तित्व अन्यत्र रहने की दलील के आवेदन के लिए सबसे आवश्यक घटक है।

अन्यत्र रहने की दलील लेने वाले व्यक्ति को उक्त अपराध का अभियुक्त बनाया जाना चाहिए
जैसा कि हमने ऊपर उल्लेख किया है कि अन्यत्र रहने की दलील कौन दे सकता है, अभियुक्त एकमात्र व्यक्ति है जो बचाव के रूप में अन्यत्र रहने की दलील दे सकता है। इसलिए, जिस व्यक्ति पर अकेले एक निश्चित अपराध करने का आरोप लगाया गया है, वह अन्यत्र रहने की दलील कर सकता है। चूँकि अपराध के लिए हमेशा मनःस्थिति के कारण मनुष्य के कार्य की आवश्यकता होती है, इसलिए अन्यत्र रहने की दलील पेश करने के लिए एक व्यक्ति की आवश्यकता होती है, और उस पर अपराध का आरोप लगाया जाना चाहिए।

अभियुक्त को अपराध स्थल पर उपस्थित नहीं होना चाहिए
अन्यत्र रहने की दलील का मुख्य उद्देश्य यह साबित करना है कि अभियुक्त उस स्थान के बजाय कहीं और था जहां वास्तव में अपराध हुआ था। जिस व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है और जो अपने बचाव के रूप में अन्यत्र होने की दलील करता है, उसे अपराध घटित होने के समय अपराध स्थल पर मौजूद नहीं होना चाहिए। वह उस स्थान से बहुत दूर होना चाहिए जहां अपराध वास्तव में हुआ था, या उसके लिए अपराध स्थल पर जाना और उक्त अपराध को अंजाम देना असंभव होना चाहिए।

अभियुक्त को बिना किसी उचित संदेह के याचिका साबित करनी होगी
यदि अन्यत्र रहने की दलील के संबंध में अभियुक्त के बयानों में कोई विसंगतियां हैं और यदि न्यायालय को लगता है कि वे बयान अनुचित और संदिग्ध हैं, तो न्यायालय के पास ऐसी याचिका को खारिज करने की शक्ति है।

अभियुक्त की ओर से अन्यत्र रहने की दलील को साबित करने के लिए ठोस सबूत होने चाहिए, जिसके बिना न्यायालय यह मान लेगी कि अभियुक्त उस स्थान पर था जहां अपराध हुआ था। धनंजय चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1994) के मामले में, न्यायालय ने अन्यत्र रहने की दलील को साबित करने के लिए संतोषजनक सबूत मांगे।

एक अपार्टमेंट के चौकीदार पर 18 साल की स्कूली छात्रा से बलात्कार और हत्या का आरोप लगा था। वारदात को अंजाम देने के बाद उसका कहीं पता नहीं चला। जब उससे उसके फरार होने की परिस्थितियों के बारे में पूछताछ की गई, तो संतोषजनक स्पष्टीकरण देने के बजाय, वह अन्यत्र रहने की दलील लेकर सामने आया। चूँकि अभियुक्त द्वारा अन्यत्र रहने की दलील के समर्थन में कोई सबूत उपलब्ध नहीं कराया गया था, इसलिए इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं था कि अपराध के समय वह कहीं और था।

*न्यायालय ने माना कि:*

“यह अच्छी तरह से स्थापित है कि यदि किसी अभियुक्त द्वारा अन्यत्र रहने की दलील दी जाती है, तो उसे ठोस और संतोषजनक साक्ष्य द्वारा साबित करना आवश्यक है ताकि प्रासंगिक समय पर घटना के स्थान पर अभियुक्त की उपस्थिति की संभावना को पूरी तरह से बाहर किया जा सके…”

*अन्यत्र रहने की झूठी दलील के परिणाम*
किसी अभियुक्त द्वारा न्यायालय के समक्ष बचाव के रूप में अन्यत्र रहने की झूठी दलील उन परिस्थितियों की श्रृंखला में एक कड़ी हो सकती है जो उसके आचरण के लिए प्रासंगिक होगी, लेकिन याचिका एकमात्र कड़ी नहीं हो सकती है जिसके आधार पर दोषसिद्धि की जा सके। भले ही अभियुक्त झूठी अन्यत्र रहने की दलील लेकर आया हो, इससे उसे सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराया जा सकेगा; अभियुक्त को दोषी ठहराने का भार अभी भी अभियोजन पक्ष पर है।

*सर्वोच्च न्यायालय ने गयादीन बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2005)* के मामले में कहा कि, यद्यपि अभियुक्त ने अन्यत्र रहने की झूठी दलील का सहारा लिया, लेकिन किसी भी न्यायालय को यह अधिकार नहीं है कि वह अन्यत्र रहने की ऐसी झूठी दलील को सकारात्मक साक्ष्य के रूप में इंगित कर सके कि वह अपराध के लिए उत्तरदायी था।

अन्यत्र रहने की दलील की सीमाएँ और चुनौतियाँ
अभियुक्त के लिए न्यायालय के समक्ष अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए यह दलील देना आसान नहीं है कि वह उस स्थान से कहीं और था जहां अपराध हुआ था। याचिका में कुछ चुनौतियाँ हैं, और वे नीचे सूचीबद्ध हैं:

यह साबित करने का भार पूरी तरह से अभियुक्त पर है कि वह निर्दोष है और वह उस स्थान से कहीं और था जहाँ वास्तव में अपराध हुआ था।
न्यायालय यह मान लेगी कि अभियुक्त अपराध स्थल पर था और उसने ही अपराध किया है। अभियुक्त को यह साबित करना होगा कि धारणा गलत है।
अन्यत्र रहने की दलील उचित संदेह से परे साबित किया जाना चाहिए; अपराध स्थल पर अभियुक्त की मौजूदगी के बारे में थोड़ा सा भी संदेह याचिका को खारिज कर सकता है।
अन्यत्र रहने की दलील की विफलता
यदि अभियुक्त न्यायालय के समक्ष अन्यत्र रहने की दलील साबित करने में विफल रहता है, तो न्यायालय यह मान लेगी कि वह वास्तव में उस स्थान पर था जहां अपराध हुआ था। चूँकि यह अभियुक्त पर अपनी अन्यत्र रहने की दलील को साबित करने का दायित्व है, यदि वह अपनी दलील को साबित करने में विफल रहता है कि वह कहीं और था, तो अभियोजन पक्ष को अपराध स्थल पर उसकी उपस्थिति को साबित करने की आवश्यकता नहीं है।

मामले
*मुंशी प्रसाद बनाम बिहार राज्य (2001)* :------

मामले के तथ्य
इस मामले में अभियुक्त ने लोगों के एक समूह के साथ मिलकर मृतक और उसके भाई (वह व्यक्ति जिसने अभियुक्त समूह के लोगों द्वारा उसके भाई को खतरनाक हथियारों से मारने की घटना की सूचना दी थी) को घेर लिया, जो अपना व्यवसाय समाप्त करने के बाद बाजार से आ रहे थे। मृतक और उसका भाई जब घर जा रहे थे तो अभियुक्त समूह के दो लोगों ने उनका पीछा किया और अचानक समूह के चार और लोग, जो झाड़ियों में छिपे हुए थे, ने अभियुक्त समूह के साथ उन्हें घेर लिया। सूचक अपने भाई को अकेला छोड़कर वहां से भाग गया, लेकिन उसने देखा कि अभियुक्त समूह अपने गंभीर हथियारों से उसके भाई पर हमला कर रहा था। भाई ने घटना की जानकारी पुलिस को दी और एफआईआर दर्ज कराई। अभियुक्तों ने न्यायालय के समक्ष अपने बहाने का बचाव करते हुए तर्क दिया कि उनके पास एक गवाह था जिसने उन्हें अपराध स्थल से 400-500 गज की दूरी पर देखा था।

मामले के मुद्दे
क्या अभियुक्त द्वारा अन्यत्र रहने का बचाव न्यायालय के समक्ष लागू होता है?
क्या अपराध स्थल से 400-500 गज की दूरी पर अभियुक्त द्वारा अपराध करना असंभव हो सकता है?
मामले का फैसला
न्यायालय ने माना कि जिस स्थान पर अपराध हुआ था, वहां से 400-500 गज की दूरी अभियुक्त द्वारा अपराध करने की असंभवता नहीं होगी। अन्यत्र रहने की दलील के लिए अभियुक्त की अनुपस्थिति के कारण अपराध करने की असंभवता की आवश्यकता होती है। अभियुक्त अपनी अन्यत्र रहने की दलील में अपना बचाव साबित नहीं कर सके, और इसलिए उन पर मुकदमा चलाया गया और अपराध के लिए दोषी ठहराया गया और 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

*गुरप्रीत सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2002)* :--------

मामले के तथ्य
इस मामले में अपीलकर्ता पर अपनी मृत पत्नी की हत्या का आरोप लगाया गया और उसे दोषी ठहराया गया। मृतिका को उसके अपीलकर्ता पति ने जिंदा जला दिया था, क्योंकि उनकी शादी में रिश्ते ख़राब थे। अपराध स्थल के निरीक्षण के समय पुलिस ने पाया कि मृतक एक कमरे में जली हुई अवस्था में पड़ा हुआ था, और अपीलकर्ता दूसरे कमरे में बैठा था। अपीलकर्ता को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और उस पर अपनी पत्नी की हत्या का आरोप लगाया। अपीलकर्ता ने न्यायालय के समक्ष यह दलील दी कि वह जिमखाना क्लब में था, और उसने आगे तर्क दिया कि क्लब में ही उसे अपने घर में आग लगने के बारे में पता चला।

मामले का मुद्दा
क्या अभियुक्त और उसके भाई की अन्यत्र रहने की दलील स्वीकार की जा सकती है?

मामले का फैसला
न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष द्वारा उसके सामने पेश किए गए तथ्य और सबूत साबित करते हैं कि अपीलकर्ता ने अपनी पत्नी की हत्या का अपराध किया है, और वह उसी स्थान पर मौजूद था जहां अपराध हुआ था। न्यायालय ने आगे कहा कि अपीलकर्ता के शरीर पर मौजूद जले के निशान उसकी पत्नी के जलते शरीर के कारण बने थे, और इससे साबित होता है कि वह अपराध स्थल पर मौजूद था। इस प्रकार, न्यायालय ने अपीलकर्ता की अन्यत्र रहने की याचिका खारिज कर दी।

*लाखन सिंह @ पप्पू बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य (2011)* :-----

मामले के तथ्य
इस मामले में अपीलकर्ता पर मृतक की हत्या का आरोप लगाया गया और उसे दोषी ठहराया गया। मृतक अपने ससुराल आया था, जहां उसकी पत्नी अपने परिवार से मिलने गई थी। मृतक उसे वापस अपने घर ले जाने के लिए आया था। पत्नी अपनी मौसी के घर पति को खाना खिलाने के बाद अपनी दूसरी मौसी से मिलने चली गई। अपीलकर्ता मृतक की पत्नी की चाची का पड़ोसी था। मृतक की पत्नी के अपनी दूसरी मौसी के घर चले जाने के बाद अपीलकर्ता ने मृतक को चाय के लिए आने के लिए कहा। मृतक घर से निकला लेकिन वापस नहीं लौटा। मृतक के रिश्तेदारों ने उसकी तलाश की और अपीलकर्ता से मृतक के ठिकाने के बारे में पूछा क्योंकि वह वही व्यक्ति था जिसके साथ मृतक आखिरी बार मिला था। अपीलकर्ता द्वारा दिए गए उत्तर स्पष्ट नहीं थे और संदिग्ध थे। दूसरे पड़ोसी को पता चला कि झाड़ियों में एक शव पड़ा है। परिजनों से शव की पहचान करने को कहा गया तो वह मृतक का शव था। मृतक की सास ने अपीलकर्ता के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई, जिसमें उसके आचरण पर पहले से संदेह था और जब उसे पता चला कि शव मिला है तो वह भी वहां से फरार हो गया। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और मुकदमा शुरू हो गया। हालाँकि, अपीलकर्ता ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत अपने बयान में अन्यत्र रूप धारण करने की दलील नहीं दी, लेकिन मुकदमे के दौरान उसने अन्यत्र रूप धारण करने की दलील पर भरोसा किया।

मामले के मुद्दे
क्या अन्यत्र रहने की दलील को आत्मरक्षा की दलील माना जा सकता है जैसा कि इस मामले में कहा गया है?
क्या आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 313 अन्यत्र रहने की दलील पर प्रतिबंधात्मक है?
मामले का फैसला
आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 313 निचली अदालत को अभियुक्त से पूछताछ करने की शक्ति प्रदान करती है, और यह किसी भी तरह से अभियुक्त की अन्यत्र रहने की दलील को प्रतिबंधित नहीं करती है। याचिका की विश्वसनीयता के बावजूद, इसे मुकदमे के दौरान किसी भी समय अभियुक्त द्वारा लिया जा सकता है। हालाँकि, अन्यत्र रहने की दलील आत्मरक्षा की दलील नहीं है, लेकिन इसमें अभियुक्त को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए दी गई अपनी सुरक्षा है। इस मामले में, चूंकि अभियुक्त बहाना साबित नहीं कर सका और अन्य ठोस गवाह उसके खिलाफ थे, इसलिए उसे हत्या का दोषी ठहराया गया।

*शहाबुद्दीन और अन्य बनाम असम राज्य (2012)*

मामले के तथ्य
इस मामले में मृतक एक विवाहित महिला थी जिसने अपनी मृत्यु से चार महीने पहले अभियुक्त से शादी की थी। मृतिका को उसके पति और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा घरेलू उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा था, जो उसके परिवार से दहेज की मांग करते थे। अभियुक्त और उसके परिवार से उसे बहुत दुख सहना पड़ा। वह अपने पिता के घर गई और अपने पति के घर वापस जाने से इनकार कर दिया, क्योंकि उसे लगा कि वे उसे मार डालेंगे। उसके अनुरोध के बावजूद, उसकी माँ ने उसे उसके पति के घर वापस भेज दिया। एक दिन मृतिका की मां व रिश्तेदारों को फोन कर बताया गया कि मृतिका को चक्कर आ रहा था और वह रसोई में गिर गयी, जिससे उसकी मौत हो गयी। जब मृतिका की मां ने अपनी बेटी को देखा तो उसके शरीर में कई चोट के निशान थे और उसके मुंह से झाग निकल रहा था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह भी पता चला कि उस पर शारीरिक हमला किया गया था, क्योंकि उसके शरीर पर कई चोट के निशान पाए गए थे। मृतका की मां ने पति और उसके भाई के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। दोनों आरोपियों ने दलील दी कि वे उस दिन उस घर में नहीं थे जहां मृतक की मृत्यु हुई थी।

मामले के मुद्दे
क्या अभियुक्त और उसके भाई की अन्यत्र रहने की दलील स्वीकार की जा सकती है?

मामले का फैसला
दोनों आरोपियों ने दलील दी कि मृतिका की मौत उसकी बीमारी के कारण हुई और उस दिन उसे चक्कर आ रहा था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जब मृतक की मौत हुई तो वे पूरे दिन घर पर भी नहीं थे। अभियोजन पक्ष ने आरोपियों से सवाल किया कि अगर मृतक की तबीयत ठीक नहीं थी, तो उन्हें कोई चिकित्सा उपचार क्यों नहीं दिया गया। आरोपियों ने तर्क दिया कि मृतक घर पर अकेला था और वे घर पर नहीं थे। अभियोजन पक्ष ने सवाल उठाया कि अगर वे पूरे दिन घर में नहीं होते तो वे मृतक के संपर्क में कैसे आते और उन्हें कैसे पता चलता कि वह किसी बीमारी से पीड़ित है? अभियुक्त वारदात वाली जगह से कहीं और होने की दलील साबित नहीं कर सके। साथ ही, चोट के निशानों और आरोपियों द्वारा मृतक पर पहले किए गए शारीरिक हमलों के परिस्थितिजन्य साक्ष्य ने न्यायालय को आश्वस्त किया कि वे वही व्यक्ति थे जिनके कारण अभियुक्त की मौत हुई थी। इसलिए, उन्हें न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया गया क्योंकि वे अपनी अन्यत्र रहने की दलील साबित नहीं कर सके।

*मुकेश बनाम राज्य एनसीटी दिल्ली (2017)*

मामले के तथ्य
यह 2012 का दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामला है, जिसमें दिल्ली में चलती बस में एक नाबालिग समेत छह लोगों ने इस अपराध को अंजाम दिया था। एक 23 वर्षीय साइकोथेरेपी इंटर्न और उसका पुरुष मित्र एक थिएटर में फिल्म देखने के बाद बस का इंतजार कर रहे थे। जब वे बस का इंतजार कर रहे थे, वे बस के पास पहुंचे, जहां वे चढ़े और यात्रा के लिए अपनी टिकट ली। तभी अचानक दो अभियुक्त व्यक्ति उनके पास आए और मृतक के साथ मारपीट करने लगे, जिस पर पुरुष मित्र ने विद्रोह कर दिया। उस पर आरोपियों ने हमला किया और बस में मौजूद सभी आरोपियों ने एक के बाद एक मृतक के साथ बलात्कार किया। आरोपियों ने उसके शरीर पर गंभीर चोटें पहुंचाईं, जिससे कुछ दिनों बाद उसकी मौत हो गई। फिर उन्हें बस से बाहर फेंक दिया गया। मृतक के परिजनों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और आरोपियों को पुलिस ने पकड़ लिया। अभियुक्तों में से एक ने अभियोजन के दौरान न्यायालय के समक्ष अन्यत्र रहने का बचाव किया।

मामले के मुद्दे
क्या इस मामले में अन्यत्र रहने की दलील लागू की जा सकती है?

मामले का फैसला
आरोपियों में से एक ने न्यायालय के समक्ष यह कहते हुए अपनी जमानत की गुहार लगाई कि वह उस शाम बस में अन्य आरोपियों के साथ नहीं था, इस प्रकार उसके लिए ऐसा जघन्य अपराध जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया है, करना असंभव हो गया। उन्होंने तर्क दिया कि वह उस शाम नशे में थे और एक संगीत कार्यक्रम में गए थे, जिसका वह कोई ठोस सबूत नहीं दे सके। उन्होंने यह भी कहा कि वह इस मामले में शामिल एक अन्य अभियुक्त और अभियुक्त के परिवार के साथ संगीत कार्यक्रम में गए थे। न्यायालय ने इस आधार पर अन्यत्र रहने की याचिका खारिज कर दी कि यह मामले में पहले अभियुक्त द्वारा दिए गए बयानों से असंगत है। पहले, उन्होंने कहा कि वह उस दिन एक विशेष समय तक उस अन्य अभियुक्त से नहीं मिले थे, लेकिन याचिका में उन्होंने कहा कि वह उस अन्य अभियुक्त और उसके परिवार के साथ थे। न्यायालय ने माना कि अन्यत्र रहने की दलील को साबित करते समय कोई उचित संदेह नहीं होना चाहिए; सारा भार अभियुक्त पर है, जो इसे बचाव के रूप में यह साबित करने के लिए उपयोग कर रहा है कि वह उस स्थान से कहीं और था जहां वास्तव में अपराध हुआ था।

*निष्कर्ष* :--------
अन्यत्र रहने की दलील का दायरा अभियुक्त के हाथ में है, जिसे न्यायालय को यह साबित करके अपनी बेगुनाही साबित करनी होती है कि अपराध के समय वह कहीं और था, जिसका उस पर आरोप लगाया गया है। यदि अन्यत्र रहने की दलील स्वीकार कर ली जाती है और साबित हो जाती है, तो न्यायालय भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 11(1) के अनुसार अभियुक्त को बरी कर देगा, क्योंकि एक स्थान पर उसकी उपस्थिति उस स्थान से असंगत है जहां अपराध हुआ है। याचिका में अभियुक्त को अपराध स्थल पर उसकी अनुपस्थिति के कारण अपराध करने में असमर्थता का हवाला देकर बचाव दिया गया है (हालाँकि यह भारतीय दंड संहिता, 1860 के सामान्य अपवादों में शामिल नहीं है)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 11(1) के लिए अन्यत्र रहने की दलील के अलावा कोई गुंजाइश है?
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 11(1) में अन्य गुंजाइश भी है, जो कि अन्यत्र रहने की दलील के अलावा है। धारा 11(1) के अन्य दायरे नीचे सूचीबद्ध हैं।

मुद्दे की अवैधता दिखाने के लिए पति की पहुंच न होना: यदि गर्भधारण अवधि से अधिक समय तक पति की पत्नी तक पहुंच नहीं है, तो यह तथ्य कि गर्भधारण अवधि के बाद पैदा हुआ बच्चा एक नाजायज बच्चा है, धारा 11(1) के तहत एक प्रासंगिक तथ्य है। यह तथ्य कि पति की पहुंच नहीं है, इस तथ्य से असंगत है कि बच्चा बिना जन्म के पैदा हुआ है।

कथित मृत्यु से बचना: यदि कोई आरोप है कि A ने 01-01-2023 को B की हत्या कर दी। तथ्य यह है कि B 01-02-2023 तक जीवित था, धारा 11(1) के तहत प्रासंगिक है, क्योंकि जिस तारीख तक B जीवित था वह A द्वारा B की हत्या की कथित तारीख से असंगत है।

तीसरे व्यक्ति द्वारा अपराध करना: A पर B की हत्या का आरोप लगाया जाता है, यदि A यह साबित कर सके कि यह C ही था जिसने वास्तव में B को मारा था। तथ्य यह है कि C ने वास्तव में । को मार डाला, धारा 11(1) के तहत एक प्रासंगिक तथ्य है, क्योंकि यह इस तथ्य से असंगत है कि A ने B को मार डाला।

क्या अन्यत्र रहने की दलील के लिए दूरी प्रासंगिक है?
उस स्थान के बीच की दूरी जहां अभियुक्त वास्तव में था और जहां वास्तव में अपराध हुआ था, न्यायालय के लिए कोई मायने नहीं रखता। अन्यत्र रहने की दलील का मुख्य मानदंड अभियुक्त द्वारा अपराध करने की असंभवता को साबित करना है। यदि अभियुक्त यह साबित कर सके कि जिस समय अपराध किया गया था उस समय वह अपराध स्थल से बहुत दूर था, और इसलिए न्यायालय को यह विश्वास दिला सके कि उसके लिए अपराध करना असंभव होगा तो वह अकेले ही अन्यत्र रहने की दलील को साबित करने के लिए पर्याप्त है। इसलिए, अन्यत्र रहने की दलील में दूरी अप्रासंगिक है।

क्या अन्यत्र रहने की दलील साबित करने में विफलता से अभियोजन पर बोझ कम हो जाता है?
यहां तक कि ऐसे मामलों में जहां अभियुक्त अन्यत्र रहने की दलील साबित नहीं कर सका, वहां भी अभियुक्त को अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जाएगा। भले ही अभियुक्त उस स्थान पर था जहां अपराध हुआ था, फिर भी उसने ऐसा नहीं किया होगा। अभियोजन पक्ष का यह कर्तव्य है कि वह न्यायालय के आगे यह साबित करे कि अभियुक्त ही वह व्यक्ति था जिसने अपराध किया था। अभियोजन का कर्तव्य केवल यह साबित करने तक ही सीमित नहीं है कि अपराध घटित होने के समय अभियुक्त कहाँ था, बल्कि वास्तव में अभियुक्त का अपराध सिद्ध करना भी है.

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