Akhlendra Pratap Singh Advocate High Court Allahabad Contact No 9532112005

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Akhlendra Pratap Singh Advocate High Court Allahabad Contact No 9532112005 Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Akhlendra Pratap Singh Advocate High Court Allahabad Contact No 9532112005, Lawyer & Law Firm, Allahabad.

अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के लोगों को सरल और सुविधाजनक न्याय दिलाने के लिए है क्योंकि एससी एसटी कम्युनिटी के लोग पीड़ित गैर एससी एसटी कम्युनिटी से होते हैं और गैर एससी एसटी कम्युनिटी के अधिवक्ताओ से न्याय की उम्मीद रखना मात्र सिर्फ धोखा है और कुछ नहीं अखिलेंद्र प्रताप सिंह
एडवोकेट हाईकोर्ट इलाहाबाद
बहुजन समाज पार्टी पूर्व जिला सचिव इलाहाबाद
भारतीय महिला सुरक्षा संघ राष्ट्रीय कानूनी सलाहकार
जनत

ा देश संगठन राष्ट्रीय कानूनी सलाहकार
अंबेडकरवादी हितकारी सोसाइटी राष्ट्रीय कानूनी सलाहकार
बहुजन उत्थान सेवा समिति राष्ट्रीय कानूनी सलाहकार
आर एस न्यूज़ (जनता की आवाज) राष्ट्रीय कानूनी सलाहकार

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चैम्बर नंबर - एनेक्सी सी नियर गेट नंबर 5 हाईकोर्ट इलाहाबाद
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उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग नियम 1995 में आयोग कुल एक अध्यक्ष दो उपाध्यक्ष तथा 17 सदस्य का प्रावध...
31/01/2026

उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग नियम 1995 में आयोग कुल एक अध्यक्ष दो उपाध्यक्ष तथा 17 सदस्य का प्रावधान है लेकिन इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कितने सदस्य होंगे उनकी प्रतिशत कितनी होगी इसका कोई प्रावधान इस नियम में नहीं है ठीक उसी तरह वर्तमान समय में बीजेपी सरकार ने Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” (समता के संवर्द्धन से संबंधित विनियम, 2026) कानून लाया है इस कानून की धारा 5 में कितने सदस्य होंगे और उनके पद क्या होंगे इसको तो उपबंधित किया है लेकिन धारा -7 के अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तथा पिछले वर्ग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होगा लेकिन कितना प्रतिशत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व होगा इस बात पर यह विनियम मौन है

भारत का संविधान के निर्माता बी एन राव नहीं बल्कि बाबा साहब अंबेडकर हैं।हमारा आर्टिकल बोधिसत्व मिशन पत्रिका जोकि वाराणसी ...
22/11/2025

भारत का संविधान के निर्माता बी एन राव नहीं बल्कि बाबा साहब अंबेडकर हैं।
हमारा आर्टिकल बोधिसत्व मिशन पत्रिका जोकि वाराणसी उत्तर प्रदेश से प्रकाशित होती है इस महीने संविधान दिवस के उपलक्ष में हमारा आर्टिकल भारत का संविधान और डॉक्टर अंबेडकर का योगदान के नाम से प्रकाशित किया गया है इसमें हमने संविधान सभा में हुए सभी डिबेटों तथा संविधान सभा के सदस्यों के द्वारा दिए गए भाषणों का उल्लेख करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय को कुछ आदेश का साईटेशन भी शामिल किया है और यह बताया है कि भारत का संविधान के निर्माता बीएन राव नहीं है बल्कि भारतीय संविधान के निर्माता बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर है ।

संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर द्वारा वकालत के दौरान मुकदमों में किए गए बहस का आदेश तथा हिंदी अनुवाद न्यायालयीन ...
10/11/2025

संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर द्वारा वकालत के दौरान मुकदमों में किए गए बहस का आदेश तथा हिंदी अनुवाद

न्यायालयीन प्रकरण क्र. 2

मेकलिओड सी.जे. एवं कुम्प जे.

यशवंत सात्वा चौगुले आरोपी-अपीलकर्ता

बनाम

सम्राट-प्रतिपक्ष

पुनर्निरीक्षण प्रार्थना पत्र (अपराधिक) क्र. 74 वर्ष 1926, प्रथम श्रेणी दण्डनायक पण्डरपुर द्वारा निर्णय एवं सजा के विरुद्ध । 3 मार्च, 1926 को निर्णित ।

अपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 225-विधि विरुद्ध इकट्ठे होना जिसमें आरोप प्राणघातक न हों, जिसका सामूहिक उद्देश्य सरकार के विरुद्ध हो, उल्लंघन है।

जहां गैर-कानूनी एकत्रीकरण का सामूहिक उद्देश्य शिकायत में स्पष्ट किया गया, न्यायालय द्वारा पाया गया हो तो आरोप में इत्तके छूट जाने से सुनवाई दोषयुक्त नहीं हो जाती-21 कलकत्ता 827 अपील 22 कलकत्ता 276 'डिस्ट' (पृ. 814 'सी' 2)

आंबेडकर एवं बी.जी. मोडक अपीलार्थी की ओर से

मेकलियोड सी.जे. सत्र न्यायाधीश द्वारा अपने निर्णय से यह स्वीकार किया गया है कि अवैध एकत्रीकरण का उद्देश्य आरोप में नहीं बताया गया था। प्रश्न यह है कि क्या आरोपी अपने बचाव के इस कारण से पूर्वाग्रहित हुआ अथवा उसे किसी प्रकार से गलतफहमी में डाला गया ताकि उसके प्रति न्याय की विफलता हुई। न्यायाधीश ने कहा है-

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि सारे आरोपी जुलूस को रोकने के उद्देश्य से इकट्ठे हुए और इस उद्देश्य से शिकायतकर्ता और अन्य पर आक्रमण किया। दण्डनायक ने इस निष्कर्ष को लिखा- "साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि आरोपी ने आक्रमण करने का पहले से तय कर लिया था, इस कारण वे आरोपी सं. 5 के घर पर तथा सड़क पर समूह रूप में इकट्ठे हुए।" मैंने अभिलेखों का अध्ययन किया और मैं सहमत हूं कि साक्ष्य निष्कर्षों को न्यायोचित ठहराते हैं। ऐसा होने पर आरोपों में जो कमी है, उससे ऐसा दिखाई नहीं देता कि आरोपी के साथ कोई दुराग्रह रखा गया और इससे प्रक्रिया दूषित नहीं होती। देखे बसीराद्दी बनाम साम्राज्ञी (1)

इस प्रकरण में व्यक्ति विशेष पर दंगे का आरोप था और ऐसा दिखाई देता था कि आरोपों में सामूहिक उल्लेख को स्पष्ट नहीं किया गया था और न तो मूल न्यायालय और न ही सत्र न्यायाधीश ने अपील में यह पाया कि उस समूहीकरण में जिसमें कि कैदी सदस्य थे उसे अवैधानिक है और किस सामूहिक उद्देश्य से बनाया गया था। इसमें यह माना गया था कि ये कमियां सुनवाई को दूषित नहीं करतीं। इसमें समूहीकरण का सामूहिक उद्देश्य के प्रचुर साक्ष्य अभिलेखों में है, जो आरोप की सजा को न्यायोचित ठहराते हैं, जिन पर निचली अदालत ने आरोपियों को दोषी पाया है।

माननीयों का कथन है (पृष्ठ 884)

हम सोचते हैं कि हमें इस उद्देश्य से कोई मान्यता स्वीकृत करनी चाहिए, जब तक कि हम इसके लिए तैयार हो सकें, कि ऐसी सामग्री हो, जिसके आधार पर हम इसे स्वीकार करें। इसे परिपूर्ण करने के लिए दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कैदियों को बरी करने के लिए, अगर इसके खिलाफ कोई कारण नहीं बताया गया हो, और निश्चित रूप से इन लोगों को बरी करने के लिए तैयार नहीं होना चाहिए, केवल उस कमी के लिए जिसे मैने आरोप में बताया और वह दोनों निर्णयों में भी है। उनसे असहमत होने के लिए पर्याप्त सामग्री का साक्ष्य होना चाहिए, अभिलेखों पर जो साक्ष्य हैं, उनके आधार पर हमें इन कैदियों को सजा देने के लिए तैयार होना चाहिए, दंगे के अपराध में उसी सजा को बरकरार रखना चाहिए जो उप-दण्डनायक ने तय की है। तदनुसार हमने उपस्थित अधिवक्ता को ऐसे साक्ष्य हमारे सामने रखने को कहा कि हम कैदियों को दंगा करने के अपराधी घोषित नहीं करें और उस उद्देश्य से उन्हें हमें बताएं। उन्होंने कुछ सीमा तक ऐसा किया भी, और हमने उनका परीक्षण भी किया। हम उन कैदियों को बरी करने की सोच सकें, उससे वे काफी दूर रहे, हम सोचते हैं कि यहां जो प्रचुर साक्ष्य हैं, हमें उन पर अविश्वास करने का कोई कारण दिखाई नहीं देता कि वे एक समूहीकरण के सदस्य थे और उनका सामूहिक उद्देश्य था, नए हाट में दुकानदारी के लिए जाने वाले व्यापारियों को बलपूर्वक रोकना।

यह साफ है कि हमारे सामने जो प्रकरण है उससे वह प्रकरण काफी तगड़ा था। यहां शिकायत सामूहिक उद्देश्य को स्पष्ट करती है, और दण्डनायक तथा सत्र न्यायाधीश ने अपील में, दोनों ने आरोपियों के उस सामूहिक उद्देश्य को पा लिया था।

हमारे समक्ष साबिर बनाम साम्राज्ञी (2) प्रकरण संदर्भित किया गया। यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 148 तथा 149 के अंतर्गत जूरी द्वारा सर्वसम्मति से दोषप्तिद्धि के निर्णय के विरुद्ध सिद्ध दोषियों की ओर से एक अपील है। इसमें माननीय न्यायाधीशों का कथन था (पृ. 284-285) धारा 147 के अंतर्गत दोषसिद्धि के पहले हम यह कह सकते हैं कि हमें इस बात से संतुष्ट हो लेना चाहिए कि क्या जूरी ने गैर-कानूनी सामूहिक उद्देश्य की खोज कर ली है। इस निष्कर्ष पर हमारे लिए यह कहना कठिन है कि यह गैर-कानूनी सामूहिक उद्देश्य नीदू को चोट पहुंचाना था या सामूहिक उद्देश्य का गैर-कानूनी होना आमों को ले लेने का था। ऐसा बहुत संभव भी था, और ऐसे प्रकरणों पर विचार करते समय किसी का भी आरोपी के प्रति संवेदनशील होना भी स्वाभाविक है, अतः उन्होंने नीदू को चोट पहुंचाने के सामूहिक उद्देश्य को स्वीकार करने को प्राथमिकता दी, इसे ही पर्याप्त समझ कर उन्होंने बाग के आधिपत्य के प्रश्न पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से दूर हो गए। यदि उन्होंने सामूहिकीकरण के सामूहिक उद्देश्य को नीदू को चोट पहुंचाने का पा लिया तो यह उनके लिए काफी था और उन्होंने दूसरे की खोज की जरूरत ही नहीं समझी। किंतु इस शीर्ष में तो कोई आरोप ही नहीं है; एक नितांत भिन्न सामूहिक उद्देश्य का आरोप लगाया गया है।

हमारा ध्यान आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 225 की ओर आकर्षित किया गया, जिसमें यह प्रावधान है कि आरोपों में जो विवरण उल्लिखित किए जाने चाहिए, और उनमें कोई बात छूटना नहीं चाहिए, अन्यथा प्रकरण के किसी भी मुकाम पर इस गलती और छूट के कारण अभियुक्त को भ्रम हो सकता है। इस प्रकार के प्रकरणों में कई सामूहिक उद्देश्यों के साक्ष्य हो सकते हैं, किंतु यहां, जैसा कि हम देख सकते हैं, कि जैसे आरोप हैं और जिस प्रकार के साक्ष्य हैं, हमारे लिए यह कह पाना कठिन है कि जूरी में इन सामूहिक उद्देश्यों में से एक या दूसरे उद्देश्य को स्वीकार किया है। उन्होंने एक को स्वीकार किया है, यह सही है, किंतु उन्होंने किस एक को स्वीकार किया है यह हमारे लिए कहना असंभव है। इससे प्रकरण में अंतर आ सकता था, जैसा कि तथ्य है, उन्होंने सामूहिक उद्देश्य यह मान्य किया कि वह नीदू को चोट पहुंचाना था। किंतु यह सामूहिक उद्देश्य था और इसे कभी आरोपित ही नहीं किया गया और अभियुक्तों के पास इसका सामना करने के लिए कोई अवसर ही सुलभ नहीं था।

मुझे यह प्रकरण एक बहुत ही अलग प्रकरण लगता है और इसे अपने तथ्यों पर निर्णित किया गया था। मैं सोचता हूं बतिराद्दि बनाम साम्राज्ञी (1) सीधे इस बिन्दु पर है। यहां कोई संदेह नहीं हो सकता कि अभियुक्त किसी भी प्रकार से उद्देश्य गैर-कानूनी जमावड़े के सामूहिक उद्देश्य के आरोपों में छूट जाने से पूर्वाग्रहित नहीं हुए हैं और यहां धारा 225 के लागू करने की प्रचुर न्यायोचितता है। अतः हम प्रार्थना पत्र को खारिज करते हैं।

प्रार्थना पत्र अपास्त।

08/11/2025

भभुआ में बहन जी के स्वागत में बहुजन समाज पार्टी के लोग बसपा प्रमुख बहन कुमारी मायावती का स्वागत करने का तरीका अनोखा

जो गरीबों की जमीन पर कब्जा करेगा उसे लेने के देने पड़ जाएंगे जबकि भाजपा सरकार में भाजपा की नेताओं ने सबसे ज्यादा अवैध कब...
06/11/2025

जो गरीबों की जमीन पर कब्जा करेगा उसे लेने के देने पड़ जाएंगे जबकि भाजपा सरकार में भाजपा की नेताओं ने सबसे ज्यादा अवैध कब्जा प्रॉपर्टी डीलिंग तथा रियल एस्टेट से पैसा कमाया है तो माफिया राज सपा तथा भाजपा दोनों में एक बराबर है।
संविधान के लिए खड़े हों, सच जानिये!
#झूठयापाखंड #संविधानबचाओ #योगी_सरकार #बुलडोजर_न्याय

Akhlendra Pratap Singh Advocate High Court Allahabad 095321 12005 उत्तर प्रदेश जिला प्रयागराज तहसील करछना में हुई घटना क...
30/06/2025

Akhlendra Pratap Singh
Advocate High Court Allahabad
095321 12005
उत्तर प्रदेश जिला प्रयागराज तहसील करछना में हुई घटना कि पुलिस द्वारा गलत तरह से एफआईआर दर्ज करना और 400 लोगों को जेल भेजना के मामले में मैं उनके मुकदमों की पैरवी निशुल्क कानूनी सहायता करूंगा

29/04/2025

Akhlendra Pratap Singh
Advocate High Court Allahabad
095321 12005

10/06/2024
17/07/2023

महान धर्म के महान आदर्श और महान परंपरा व सभ्यताएं

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