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समझौते से मुकदमा खत्म होने पर पूरी कोर्ट फीस लौटाना कानूनी अधिकार, अलग अर्जी जरूरी नहीं: दिल्ली हाईकोर्टदिल्ली हाईकोर्ट ...
27/09/2026

समझौते से मुकदमा खत्म होने पर पूरी कोर्ट फीस लौटाना कानूनी अधिकार, अलग अर्जी जरूरी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी मुकदमे, प्रति-दावे या अपील का आपसी समझौते के आधार पर निपटारा होने पर पक्षकारों को पूरी कोर्ट फीस वापस पाने का कानूनी अधिकार है। इसके लिए अलग से अर्जी या याचिका दाखिल करने की जरूरत नहीं है।

जस्टिस अनिल खेतरपाल और जस्टिस भरत पाराशर की खंडपीठ ने कहा कि कोर्ट फीस अधिनियम, 1870 की संशोधित धारा 16 के तहत समझौते के आधार पर मामला खत्म होने पर पूरी कोर्ट फीस वापस करना एक वैधानिक अधिकार है।

खंडपीठ ने कहा,

“समझौते या सहमति से निपटाए गए मुकदमे, प्रति-दावे या अपील पर दी गई पूरी कोर्ट फीस वापस पाना एक वैधानिक अधिकार है। इसलिए मामले के समझौते या सहमति से निपट जाने और अदालत द्वारा इसका प्रमाणपत्र जारी किए जाने के बाद अलग आवेदन या याचिका की जरूरत नहीं होनी चाहिए।”

हाईकोर्ट एक कंपनी हाइटेक एंटरप्राइजेज की ओर से मॉडर्न कंस्ट्रक्शन कंपनी के खिलाफ दायर अपील में कोर्ट फीस वापस करने की मांग से जुड़ी अर्जी पर सुनवाई कर रहा था।

अदालत ने बताया कि दिल्ली सरकार ने 6 मार्च को अधिसूचना जारी कर कोर्ट फीस अधिनियम की धारा 16 में संशोधन किया और पहले लागू धारा 16ए को हटाकर नया प्रावधान लागू किया।

संशोधित प्रावधान के अनुसार, यदि किसी मुकदमे या अपील में पक्षकार किसी भी स्तर पर आपसी सहमति से विवाद का निपटारा कर लेते हैं तो वादी या प्रति-दावा करने वाला पक्ष पूरी जमा कोर्ट फीस वापस पाने के लिए प्रमाणपत्र का हकदार होगा। यह समझौता अदालत की मदद से हुआ हो या पक्षकारों ने खुद किया हो, इससे इस अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यह भी जरूरी नहीं है कि समझौता दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 89 में बताए गए किसी तरीके के तहत ही हुआ हो।

खंडपीठ ने कहा कि संशोधित प्रावधान को सीधे पढ़ने पर स्पष्ट है कि कोर्ट फीस वापस पाने का अधिकार उस समय पैदा होता है, जब मामला समझौते या सहमति के आधार पर निपटा दिया जाता है।

अदालत ने निर्देश दिया कि जब भी किसी मामले का समझौते के आधार पर निपटारा हो, चाहे वह धारा 89 के तहत बताए गए तरीकों के जरिए हुआ हो या नहीं, अदालत को मामले का निपटारा करते समय कोर्ट फीस वापस करने का निर्देश देना चाहिए और संबंधित पक्षों को पूरी फीस वापस पाने के लिए प्रमाणपत्र जारी करना चाहिए।

खंडपीठ ने कहा कि इससे पक्षकारों को कोर्ट फीस की वापसी के लिए अलग से कार्यवाही शुरू करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को भी निर्देश दिया कि अदालत द्वारा जारी प्रमाणपत्र पेश किए जाने के बाद कोर्ट फीस की वापसी समयबद्ध तरीके से सुनिश्चित करने के लिए जरूरी प्रशासनिक कदम उठाए जाएं।

खंडपीठ ने कहा कि संबंधित अधिकारियों को इस तरह के मामलों में आवश्यक कदम उठाने चाहिए, ताकि कोर्ट फीस की वापसी के लिए पक्षकारों को अनावश्यक मुकदमेबाजी न करनी पड़े।

अदालत ने अपने आदेश की प्रति हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का भी निर्देश दिया, ताकि इसे सभी प्रधान जिला एवं सत्र जजों के बीच प्रसारित किया जा सके!

पति के पर्सनल लोन की वसूली के लिए विधवा के खाते से ₹17.30 लाख काटना प्रथम दृष्टया गलत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SBI को रिफंड...
26/09/2026

पति के पर्सनल लोन की वसूली के लिए विधवा के खाते से ₹17.30 लाख काटना प्रथम दृष्टया गलत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SBI को रिफंड का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को एक विधवा के बैंक खाते से काटे गए ₹17,29,999 वापस करने का अंतरिम निर्देश दिया है। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया कहा कि बैंक मृतक पति के पर्सनल लोन की बकाया राशि की वसूली के लिए विधवा को मिले लाइफ इंश्योरेंस के पैसे से रकम नहीं काट सकता।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ विधवा की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने SBI की कर्नलगंज शाखा, प्रयागराज में अपने सेविंग अकाउंट से की गई कटौती को चुनौती दी थी।

पति की मौत के बाद मिला था ₹50 लाख का इंश्योरेंस

याचिकाकर्ता के पति अंबेश कुमार सिंह कौशांबी के बालापुर, चायल स्थित प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक थे। उन्होंने SBI से पर्सनल लोन लिया था। 7 जून 2025 को सड़क हादसे में उनकी मृत्यु हो गई।

पति की मृत्यु के बाद पत्नी को लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी से करीब ₹50 लाख प्राप्त हुए। इसके बाद SBI ने उनके खाते से पति के पर्सनल लोन की बकाया राशि के तौर पर ₹17,29,999 काट लिए।

विधवा ने हाईकोर्ट में दलील दी कि वह न तो उस लोन की उधारकर्ता थीं और न ही गारंटर। इसलिए उनके खाते से रकम की वसूली का बैंक के पास कोई अधिकार नहीं था।

SBI ने लोन एग्रीमेंट की शर्त का दिया हवाला

SBI ने लोन एग्रीमेंट की Clause 18(iii) पर भरोसा किया। इस शर्त में बैंक को उधारकर्ता के पैसे, खातों, सिक्योरिटीज और अन्य संपत्तियों पर सेट-ऑफ और जनरल लियन का व्यापक अधिकार दिया गया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि यह क्लॉज "बहुत व्यापक रूप से लिखा गया है", लेकिन प्रथम दृष्टया इससे SBI को विधवा को मिले इंश्योरेंस के पैसे से मृतक के लोन की वसूली का अधिकार नहीं मिलता।

'इंश्योरेंस की रकम मृतक की संपत्ति नहीं'

कोर्ट ने कहा कि लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी की रकम बीमित व्यक्ति की मृत्यु के बाद देय होती है और संभव है कि वह रकम कभी भी बीमित व्यक्ति की संपत्ति रही ही न हो।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह मृतक की रकम या संपत्ति नहीं, बल्कि लाभार्थी की संपत्ति है।”

पीठ ने आगे कहा कि ऐसी इंश्योरेंस राशि मृतक द्वारा अपने उत्तराधिकारियों के लिए छोड़ी गई एस्टेट का हिस्सा नहीं होती, बल्कि यह एक सामाजिक सुरक्षा उपाय या लाभ है, जिसे लाभार्थी अपनी स्वतंत्र हैसियत में प्राप्त करता है।

इसी आधार पर कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि SBI विधवा के खाते में इंश्योरेंस कंपनी द्वारा जमा की गई रकम से लोन की वसूली करने का हकदार नहीं था।

SBI को ₹17.29 लाख वापस करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए प्रतिवादियों को दो सप्ताह में काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर 2026 को होगी।

इस बीच, स्टे एप्लीकेशन पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने SBI रीजनल ऑफिस, जॉनस्टनगंज, प्रयागराज के सीनियर मैनेजर और SBI कर्नलगंज शाखा के ब्रांच मैनेजर को विधवा के खाते में ₹17,29,999 वापस करने का अंतरिम निर्देश दिया है।

अधिकारियों को या तो रकम वापस करनी होगी या फिर दो सप्ताह के भीतर अपने-अपने व्यक्तिगत हलफनामे दाखिल कर यह बताना होगा कि इस अंतरिम आदेश को अंतिम क्यों न कर दिया जाए।

गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं बताए तो पुलिस अधिकारी पर होगी विभागीय जांच: सुप्रीम कोर्टसुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपू...
24/09/2026

गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं बताए तो पुलिस अधिकारी पर होगी विभागीय जांच: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी ने यदि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए हैं तो उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जानी चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में और आरोपी की समझ वाली भाषा में देना अनिवार्य है। इसका पालन नहीं होने पर गिरफ्तारी गैरकानूनी मानी जाएगी।

जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की खंडपीठ ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध नहीं कराने की स्थिति में आरोपी की गिरफ्तारी और उसके बाद की हिरासत असंवैधानिक हो जाती है। ऐसे मामले में यदि जांच एजेंसी आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करना चाहती है तो पहले उसे गिरफ्तारी के लिखित आधार देने होंगे और संबंधित मजिस्ट्रेट से अनुमति लेनी होगी।

कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर भी ऐसी स्थिति में संबंधित पुलिस अधिकारी को आरोपी की आगे की हिरासत के लिए अपने वरिष्ठ अधिकारी से अनुमति लेनी होगी। वरिष्ठ अधिकारी को मामले की आगे की जांच किसी दूसरे पुलिस अधिकारी को सौंपनी होगी और गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध न कराने वाले अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश देना होगा। यदि जांच में अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष सामने आते हैं तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए और इसकी प्रविष्टि उसके सेवा अभिलेख में की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों को भेजने का निर्देश भी दिया।

यह फैसला शिरोमणि अकाली दल से जुड़े मुल्लांपुर दाखा विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी जसकरणजीत सिंह की गिरफ्तारी के मामले में आया। सिंह पर नाबालिग से यौन उत्पीड़न से जुड़े आरोप थे। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उन्हें गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए गए थे और इसी वजह से उनकी गिरफ्तारी को गैरकानूनी घोषित किया।

सिंह ने सुप्रीम कोर्ट का रुख तब किया, जब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्थानीय अदालत के उस आदेश पर रोक लगाई थी, जिसमें उनकी गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया गया।

फैसला सुनाते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 22 के दोनों उपबंधों के उल्लंघन के बाद आरोपी को दोबारा गिरफ्तार किए जाने और ऐसी स्थिति में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया से जुड़ा महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल सामने आया है।

कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर पहले के कुछ फैसलों के बीच दिखाई देने वाले अंतर के बावजूद 2025 में मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सही कानूनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। वही कानून बाध्यकारी है और सुप्रीम कोर्ट की लगातार चली आ रही न्यायिक व्यवस्था के अनुरूप है।

खंडपीठ ने अनुच्छेद 22(1) के संबंध में कई महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किए। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में होने चाहिए और ऐसी भाषा में होने चाहिए, जिसे आरोपी समझता हो। गिरफ्तारी के लिखित आधार की प्रति गिरफ्तार व्यक्ति को बिना किसी अपवाद के स्वतः उपलब्ध कराना पुलिस का दायित्व है।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में जानने का मौलिक और वैधानिक अधिकार है। इस अधिकार का उल्लंघन होने पर गिरफ्तारी और रिमांड की प्रक्रिया प्रभावित होती है तथा गिरफ्तार व्यक्ति को तत्काल रिहा करना होगा, क्योंकि ऐसी हिरासत असंवैधानिक होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में आरोपपत्र दाखिल हो जाने या अदालत द्वारा संज्ञान ले लेने से ऐसी गैरकानूनी गिरफ्तारी वैध नहीं हो जाती। अनुच्छेद 22(1) का संरक्षण सभी तरह के अपराधों पर लागू होता है, चाहे अपराध भारतीय दंड संहिता के तहत हो या किसी विशेष कानून के तहत। यह केवल किसी विशेष कानून तक सीमित प्रावधान नहीं है और न ही महज औपचारिक प्रक्रिया है।

कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध कराना संवैधानिक सुरक्षा है। इसमें किसी तरह की कमी को केवल प्रक्रियागत चूक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन हुआ है तो आरोपी को जमानत पर रिहा नहीं किया जाता, बल्कि उसे गैरकानूनी और असंवैधानिक हिरासत से मुक्त किया जाता है।

दोबारा गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी स्थिति में दोबारा गिरफ्तारी के लिए भी स्पष्ट प्रक्रिया तय की। कोर्ट ने कहा कि यदि अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण रिहा किए गए आरोपी को जांच एजेंसी आगे की जांच के लिए हिरासत में लेकर पूछताछ करना जरूरी समझती है तो उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देना होगा।

इस आवेदन में आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने का कारण और हिरासत में लेने की आवश्यकता बतानी होगी। साथ ही पहली गिरफ्तारी के समय गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध नहीं कराने का स्पष्टीकरण भी देना होगा। हालांकि, यह आवेदन आरोपी को गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध कराने के बाद ही दाखिल किया जा सकेगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी तरह की मिलीभगत या गलत प्रक्रिया की आशंका को दूर करने के लिए ऐसे आवेदन पर संबंधित पुलिस अधिकारी के तत्काल वरिष्ठ अधिकारी की पुष्टि होनी चाहिए। वरिष्ठ अधिकारी को यह जानकारी होनी चाहिए कि संबंधित अधिकारी ने संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन किया है और इसके लिए आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई की जरूरत है।

मजिस्ट्रेट को ऐसा आवेदन मिलने के बाद मामले पर जल्द फैसला करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मिहिर राजेश शाह मामले में दिए गए निर्देश के अनुरूप, जहां तक संभव हो, आवेदन दाखिल होने के एक सप्ताह के भीतर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए निर्णय लिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन करने वाले उसी अधिकारी के विवेक पर आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने की शक्ति नहीं छोड़ी जा सकती। ऐसी दोबारा गिरफ्तारी न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होनी चाहिए।

यदि मजिस्ट्रेट इस बात से संतुष्ट होता है कि वास्तविक और उचित कारणों से पहली गिरफ्तारी के समय आरोपी को गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध नहीं कराए जा सके थे और बाद में उसकी रिहाई के बाद वे आधार उपलब्ध करा दिए गए तथा आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने की जरूरत है, तो मजिस्ट्रेट जांच एजेंसी को दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति दे सकता है।

दोषी पाए जाने पर सेवा अभिलेख में दर्ज होगी कार्रवाई

कोर्ट ने प्रशासनिक स्तर पर भी पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब वरिष्ठ अधिकारी के सामने अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण रिहा किए गए आरोपी की हिरासत के लिए अनुमति का आवेदन आएगा तो मामले की जांच किसी दूसरे अधिकारी को सौंपनी होगी।

इसके साथ ही गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध नहीं कराने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश देना होगा। यदि जांच में अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष आते हैं तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी और इसका उल्लेख उसके सेवा अभिलेख में किया जाएगा।

खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन की स्थिति में भी इसी तरह की प्रक्रिया अपनाने की बात कही। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की संवैधानिक आवश्यकता का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन के मामलों में परिस्थितियों के आधार पर हाईकोर्ट सार्वजनिक कानून के तहत मुआवजा देने का निर्देश दे सकते हैं। इसके साथ आरोपी को निजी दीवानी कानून के तहत उपलब्ध उपाय अपनाने की स्वतंत्रता भी रहेगी।

फैसले के अंत में खंडपीठ ने कहा कि संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या केवल वैधानिक प्रावधानों के आधार पर नहीं की जा सकती। संविधान उससे कहीं ऊंचे सिद्धांतों पर आधारित है। इसलिए संविधान या उसके प्रावधानों का उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जा सकता और इससे सख्ती से निपटना जरूरी है।

कोर्ट ने कहा कि किसी संवैधानिक सुरक्षा का पालन अपराध की प्रकृति या गंभीरता पर निर्भर नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को केवल इसलिए प्रभावित नहीं किया जा सकता कि उसके खिलाफ आरोप गंभीर हैं। संविधान या कानून में किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने के लिए जो प्रक्रिया निर्धारित की गई है, उसका सख्ती से पालन करना अदालतों का दायित्व है।

अंतरधार्मिक समलैंगिक जोड़े को शांतिपूर्ण लिव-इन में साथ रहने का मौलिक अधिकार: इलाहाबाद हाईकोर्टइलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा ...
23/09/2026

अंतरधार्मिक समलैंगिक जोड़े को शांतिपूर्ण लिव-इन में साथ रहने का मौलिक अधिकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरधार्मिक समलैंगिक जोड़े को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शांतिपूर्ण तरीके से लिव-इन संबंध में साथ रहने का मौलिक अधिकार है। परिवार के सदस्य, रिश्तेदार या समाज का कोई अन्य व्यक्ति उनके साथ रहने के फैसले में कानूनी तौर पर हस्तक्षेप नहीं कर सकता, न ही उन्हें धमका या परेशान कर सकता है।

जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी ने यह आदेश समलैंगिक जोड़े की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि साथ रहने के फैसले को लेकर उन्हें निजी पक्षों और परिवार के सदस्यों की ओर से धमकियों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने अपनी सुरक्षा की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि दोनों बालिग, अविवाहित और अलग-अलग धर्मों से संबंधित हैं तथा अपनी इच्छा से लिव-इन संबंध में साथ रह रही हैं। सुनवाई के दौरान दोनों व्यक्तिगत रूप से अदालत में भी पेश हुईं।

अदालत के आदेश के अनुसार, दोनों ने स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में कहा कि वे बालिग हैं और बिना किसी दबाव, भय या अनुचित प्रभाव के अपनी इच्छा से एक साथ रहने का फैसला कर चुकी हैं। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि वे भविष्य में भी इसी तरह साथ रहना चाहती हैं।

लिखित बयानों में याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि परिवार के सदस्य उनके शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

राज्य की ओर से पेश सरकारी वकील ने दलील दी कि समलैंगिक संबंधों को समाज में स्वीकार्यता नहीं मिली है। हालांकि, राज्य ने यह माना कि व्यक्ति को अपनी पसंद का साथी चुनने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है। साथ ही यह दलील दी गई कि इस पसंद को विवाह के रूप में कानूनी मान्यता मिलना मौलिक अधिकार नहीं है।

राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि समाज के एक पारंपरिक वर्ग के अनुसार विवाह और परिवार की संस्था पुरुष और महिला के बीच होती है तथा इसका उद्देश्य संतानोत्पत्ति भी है। दलील दी गई कि समलैंगिक संबंध इस प्राकृतिक और पारंपरिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं।

हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सुप्रियो उर्फ सुप्रिया चक्रवर्ती बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले पर विचार किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विवाह का कोई असीमित मौलिक अधिकार नहीं है, जब तक किसी विवाह को कानून या प्रचलित रीति-रिवाज के तहत मान्यता प्राप्त न हो।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि समलैंगिक और एलजीबीटीक्यू+ व्यक्तियों को अनुच्छेद 21 के तहत संबंध या साथ रहने का अधिकार प्राप्त है, जो निजता, पसंद और व्यक्तिगत स्वायत्तता से जुड़ा है। वहीं, ऐसे संबंध को विवाह के रूप में कानूनी मान्यता देना विधायिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है।

इसी आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि समलैंगिक या एलजीबीटीक्यू+ जोड़ों को अनुच्छेद 21 के तहत अपने संबंध और लिव-इन में साथ रहने का अधिकार है। हालांकि, उन्हें विवाह का कानूनी दर्जा दिया जाना अलग विषय है और यह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।

अदालत ने बालिग व्यक्तियों की अपनी जीवनशैली और साथ रहने की व्यवस्था चुनने की स्वतंत्रता पर भी जोर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा,

“जब दो बालिग नागरिक अपनी व्यक्तिगत स्वायत्तता और पसंद का इस्तेमाल करते हुए साथ रहने का फैसला करते हैं तो लिव-इन संबंध में रहना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनका मौलिक अधिकार है।”

अदालत ने आगे कहा कि परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों या समाज के किसी वर्ग को उनके शांतिपूर्ण साथ रहने में बाधा डालने, उन्हें डराने-धमकाने या उनकी शारीरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करने का कानूनी अधिकार नहीं है। विवाह को कानूनी मान्यता न मिलने का मतलब यह नहीं है कि किसी तीसरे व्यक्ति या प्रशासनिक तंत्र को बालिग नागरिकों की गरिमा और शारीरिक सुरक्षा में हस्तक्षेप करने की छूट मिल जाती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान की व्यवस्था में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि है।

अदालत ने पाया कि दोनों याचिकाकर्ताएं बालिग और शिक्षित हैं तथा अपने हितों को समझने में सक्षम हैं। उन्होंने बिना किसी दबाव के अपनी इच्छा से साथ रहने का फैसला किया है। इसलिए किसी अन्य व्यक्ति को उनके इस फैसले का विरोध करने का अधिकार नहीं है।

याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने दोनों को शांतिपूर्वक साथ रहने की स्वतंत्रता दी और स्पष्ट किया कि उनके परिवार के सदस्य या कोई अन्य व्यक्ति उनके फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं को साथ रहने में किसी तरह की बाधा का सामना करना पड़ता है तो वे संबंधित पुलिस आयुक्त, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या पुलिस अधीक्षक से संपर्क कर सकती हैं। संबंधित पुलिस अधिकारी दोनों के बालिग होने और स्वेच्छा से साथ रहने की पुष्टि करने के बाद उन्हें तत्काल सुरक्षा उपलब्ध कराएंगे।

हालांकि, निजी पक्षों को अदालत ने यह स्वतंत्रता दी है कि यदि वे यह साबित कर सकें कि याचिकाकर्ताओं द्वारा भरोसा किए गए दस्तावेज जाली या फर्जी हैं तो वे आदेश वापस लेने के लिए अदालत का रुख कर सकते हैं।

डेजर्टेशन के आधार पर तलाक मिलने से पत्नी का भरण-पोषण का अधिकार खत्म नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्टइलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत...
22/09/2026

डेजर्टेशन के आधार पर तलाक मिलने से पत्नी का भरण-पोषण का अधिकार खत्म नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि किसी महिला को पति से डेजर्टेशन यानी परित्याग के आधार पर तलाक मिला हो, तब भी वह सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पूर्व पति से भरण-पोषण मांग सकती है। इसके लिए शर्त है कि उसने दोबारा शादी न की हो और वह स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम न हो।

जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने सुल्तानपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। फैमिली कोर्ट ने महिला के भरण-पोषण का दावा खारिज किया था।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रोहताश सिंह बनाम श्रीमती रामेंद्रि (2000) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि तलाकशुदा महिला सीमित उद्देश्य के लिए CrPC की धारा 125 के तहत 'पत्नी' का दर्जा बनाए रखती है और निर्धारित शर्तों के तहत भरण-पोषण की मांग कर सकती है।

मामले में महिला सुनीता ने वर्ष 2009 में CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए अर्जी दाखिल की थी। उसका कहना था कि हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार उसकी शादी हुई और गौना होने के बाद उसे ससुराल भेज दिया गया।

महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति के भारतीय सेना में शामिल होने के बाद पति और उसके परिवार के सदस्यों ने उसे प्रताड़ित किया। उस पर अतिरिक्त दहेज के रूप में एक लाख रुपये नकद, हीरो होंडा मोटरसाइकिल और रंगीन टेलीविजन की मांग का भी आरोप लगाया गया।

उसने यह भी आरोप लगाया कि बाद में उसके पति ने दूसरी शादी करने की बात कही और उसे तथा उनके बच्चे का भरण-पोषण करने से इनकार किया।

पति ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि पत्नी ने खुद उसे छोड़ दिया और उसके साथ रहने के लिए तैयार नहीं थी। उसने यह भी बताया कि उसने दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए कार्यवाही शुरू की थी।

बाद में भरण-पोषण से संबंधित कार्यवाही सुल्तानपुर फैमिली कोर्ट में स्थानांतरित की गई। फैमिली कोर्ट ने महिला का दावा खारिज करते हुए कहा कि वह पति से अलग रहने के लिए पर्याप्त और उचित कारण साबित करने में विफल रही है।

फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए महिला हाईकोर्ट पहुंची। सुनवाई के दौरान सामने आया कि पति ने 25 सितंबर 2014 को डेजर्टेशन के आधार पर एकतरफा तलाक की डिक्री हासिल की थी।

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि इसके बाद पति ने दूसरी शादी की थी और दूसरी महिला का नाम उसके सेवा संबंधी रिकॉर्ड में पत्नी के रूप में दर्ज था।

ऐसे में हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या महिला के खिलाफ डेजर्टेशन के आधार पर पारित तलाक की डिक्री उसे तलाकशुदा पत्नी के रूप में CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांगने से रोकती है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रोहताश सिंह मामले के फैसले का उल्लेख किया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी यही सवाल देखा कि यदि पत्नी के डेजर्टेशन के आधार पर तलाक हुआ हो, तो क्या वह CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांग सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तलाक के बाद वैवाहिक संबंध समाप्त हो जाता है लेकिन CrPC की धारा 125 और धारा 125(1) के स्पष्टीकरण (बी) के तहत तलाकशुदा महिला भरण-पोषण के सीमित उद्देश्य के लिए 'पत्नी' बनी रहती है।

यदि तलाकशुदा महिला अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है और उसने दोबारा शादी नहीं की तो वह भरण-पोषण पाने की हकदार है। केवल यह तथ्य कि तलाक डेजर्टेशन के आधार पर दिया गया था, अपने आप में भरण-पोषण के दावे पर रोक नहीं लगाता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कानून इस पहलू पर स्पष्ट है कि तलाकशुदा महिला को दोबारा शादी करने तक या खुद की कमाई से अपना भरण-पोषण करने में सक्षम होने तक भरण-पोषण मिल सकता है, बशर्ते कानून में कोई अन्य रोक न हो। हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा महिला के भरण-पोषण के दावे को पूरी तरह खारिज करना कायम नहीं रखा जा सकता। फैमिली कोर्ट का आदेश कानूनी और तथ्यात्मक त्रुटियों से प्रभावित था।

हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा महिला के भरण-पोषण के दावे को पूरी तरह खारिज करना कायम नहीं रखा जा सकता। फैमिली कोर्ट का आदेश कानूनी और तथ्यात्मक त्रुटियों से प्रभावित था।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि महिला तलाक से पहले की अवधि के लिए भरण-पोषण की हकदार नहीं पाई जाती है, तब भी वह तलाक की तारीख यानी 25 सितंबर 2014 से भरण-पोषण की मांग कर सकती है, बशर्ते उसने दोबारा शादी न की हो।

कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला का नाबालिग बेटा बालिग होने तक भरण-पोषण पाने का हकदार है। हालांकि, सेना के अधिकारियों के माध्यम से पहले से प्राप्त भरण-पोषण की राशि को ध्यान में रखा जाएगा।

मामले को नए सिरे से विचार के लिए फैमिली कोर्ट भेजते हुए हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को अपनी संपत्ति, आय और देनदारियों का खुलासा करने वाले हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के राजनेश बनाम नेहा मामले में दिए गए निर्देशों का पालन करने को कहा गया।

मामले पर नए सिरे से फैसला होने तक हाईकोर्ट ने पति को महिला को हर महीने 4,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया।

इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की।

किरायेदार-लैंडलॉर्ड विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बिक्री समझौते से अपने आप खत्म नहीं होती किरायेदारीइलाहाबाद...
21/09/2026

किरायेदार-लैंडलॉर्ड विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बिक्री समझौते से अपने आप खत्म नहीं होती किरायेदारी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई किरायेदार अपने मकान मालिक से किराए की संपत्ति खरीदने का एग्रीमेंट टू सेल करता है, तो केवल समझौता हो जाने से किरायेदारी खत्म नहीं होती। साथ ही, किरायेदार की कब्जे की स्थिति अपने आप ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 53-A के तहत बिक्री समझौते के आंशिक पालन में कब्जा नहीं मानी जा सकती।

जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि किरायेदार को यह साबित करना होगा कि समझौते के बाद पुरानी किरायेदारी स्पष्ट रूप से या निहित रूप से समाप्त (surrender) हो गई थी और उसके बाद का कब्जा बिक्री समझौते के आधार पर था।

कोर्ट ने कहा कि केवल बिक्री की पूरी कीमत का भुगतान कर देना और संपत्ति पर भौतिक कब्जा जारी रहना पर्याप्त नहीं है। यह भी स्थापित करना जरूरी है कि कब्जे का कानूनी आधार किरायेदारी से बदलकर बिक्री समझौता हो गया था।

क्या था मामला?

मकान मालिक ने 2019 में कानपुर नगर की स्मॉल कॉज कोर्ट में एक दुकान से किरायेदारों को बेदखल करने के लिए मुकदमा दायर किया था। आरोप था कि किरायेदारों ने 1 जनवरी 2003 से 31 अगस्त 2019 तक किराया नहीं दिया। मकान मालिक ने 1 सितंबर 2019 को नोटिस देकर किरायेदारी समाप्त कर दी थी।

किरायेदारों ने दावा किया कि 24 दिसंबर 2002 को उनके और मकान मालिक के बीच बिक्री समझौता हुआ था तथा अलग से कब्जा सौंपने संबंधी पत्र भी तैयार किया गया था। उनके अनुसार, इसके बाद मकान मालिक-किरायेदार का संबंध समाप्त हो गया और वे बिक्री समझौते के आंशिक पालन में संपत्ति पर कब्जे में थे।

स्मॉल कॉज कोर्ट ने 14 मई 2026 को मकान मालिक के पक्ष में फैसला दिया। इसके खिलाफ किरायेदारों ने हाईकोर्ट में रिवीजन दाखिल किया।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि किरायेदार पहले से ही संपत्ति पर कब्जे में था, इसलिए केवल लगातार कब्जा बने रहने से यह साबित नहीं होता कि कब्जा अब बिक्री समझौते के आधार पर है। कब्जे के कानूनी आधार में बदलाव साबित करना जरूरी है।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि रजिस्टर्ड बिक्री समझौते में स्पष्ट रूप से लिखा था कि कब्जा बिक्री विलेख के निष्पादन के समय दिया जाएगा। यह बात किरायेदारों के उस दावे के विपरीत थी कि उन्हें 24 दिसंबर 2002 को ही कब्जा दे दिया गया था।

कब्जा पत्र के संबंध में भी कोर्ट ने कहा कि उसके गवाहों की गवाही नहीं कराई गई, इसलिए दस्तावेज को पर्याप्त रूप से साबित नहीं किया गया।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पूरी बिक्री कीमत का भुगतान करने के बावजूद एग्रीमेंट टू सेल संपत्ति का स्वामित्व हस्तांतरित करने वाला दस्तावेज नहीं बन जाता।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि किरायेदारी बिक्री समझौते के बावजूद जारी रही और 1 सितंबर 2019 का नोटिस वैध रूप से किरायेदारी समाप्त करता था। कोर्ट ने रिवीजन खारिज करते हुए स्मॉल कॉज कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

BNSS की धारा 180 के तहत गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार करे UP Police: हाईकोर्टइलाहाबाद...
17/09/2026

BNSS की धारा 180 के तहत गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार करे UP Police: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी को निर्देश दिया कि BNSS की धारा 180 के तहत दर्ज किए जाने वाले सभी गवाहों के बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार किया जाए। कोर्ट ने कहा कि इससे आपराधिक जांच अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने में मदद मिलेगी और जमानत सहित अन्य न्यायिक कार्यवाही में भी अदालत के लिए यह रिकॉर्ड उपयोगी होगा।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने दहेज से जुड़े मामले में आरोपी महिला की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष मौजूद विवेचक ने स्वीकार किया कि उसने प्रथम सूचनाकर्ता का BNSS की धारा 180 के तहत बयान दर्ज करते समय उसकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की थी।

कोर्ट द्वारा 21 जुलाई 2025 और 4 अगस्त 2026 को डीजीपी की ओर से जारी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग संबंधी परिपत्रों का हवाला दिए जाने पर विवेचक ने बिना शर्त माफी मांगी। हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें DGP के परिपत्रों में उपलब्ध विकल्प के बावजूद विवेचकों ने बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की।

कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में विवेचक इस डर से रिकॉर्डिंग नहीं करते कि उन पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होंने BNSS की धारा 180 के तहत गवाहों के बयान खुद लिखे हैं और FIR की सामग्री को ही बयान के रूप में दर्ज किया। हाईकोर्ट ने कहा कि इस विकल्प का कई विवेचकों ने व्यापक रूप से दुरुपयोग किया।

कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 180(3) और BNSS नियमावली, 2024 के नियम 20(1) के तहत विवेचक को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से गवाह का बयान दर्ज करने की अनुमति है। डीजीपी के परिपत्र संख्या 24/2025 में दुष्कर्म पीड़िता के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की गई, जबकि BNSS की धारा 180 के तहत अन्य बयानों की रिकॉर्डिंग को वैकल्पिक रखा गया।

इसी पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने DGP को निर्देश दिया कि BNSS की धारा 180 के तहत दर्ज होने वाले सभी बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार किया जाए। कोर्ट ने कहा कि इससे जांच अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष होगी तथा जमानत और अन्य न्यायिक कार्यवाही में अदालत को भी मदद मिलेगी।

हाईकोर्ट ने DGP को यह भी निर्देश दिया कि सभी विवेचकों को संबंधित दिशानिर्देशों की जानकारी दी जाए ताकि वास्तविक दोषी को न्याय के कटघरे तक पहुंचाया जा सके और गलत या त्रुटिपूर्ण जांच के कारण निर्दोष व्यक्ति को उत्पीड़न का सामना न करना पड़े।

अदालत ने आपराधिक जांच के उद्देश्य पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। BNSS और उत्तर प्रदेश पुलिस विनियमों के तहत विवेचक के कर्तव्यों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि विवेचक केवल लिपिक की भूमिका निभाने वाला अधिकारी नहीं है। उसे तथ्यों का निरीक्षण और उनसे निष्कर्ष निकालना होता है तथा उसका दायित्व सत्य का पता लगाना है न कि केवल किसी आरोपी के खिलाफ दोषसिद्धि सुनिश्चित करना।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राज्य उत्तर प्रदेश बनाम भगवंत किशोर जोशी और विनय त्यागी बनाम इरशाद अली मामलों में दिए गए फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जांच में साक्ष्य एकत्र करना और उसके आधार पर राय बनाना शामिल है। निष्पक्ष और उचित जांच पक्षपात से मुक्त, ईमानदार, न्यायसंगत और कानून के अनुरूप होनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि जांच का उद्देश्य संबंधित अपराध के बारे में सामग्री एकत्र करना है उसे गढ़ना नहीं। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कई मामलों में विवेचक स्वयं प्रथम सूचनाकर्ताओं या गवाहों को आरोपी के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री बताते या सुझाते पाए गए हैं। कोर्ट ने इस तरह की प्रक्रिया को पहले भी अनुचित ठहराया है।

जस्टिस देशवाल ने अपने पूर्व के आदेश आतिश उर्फ कृष्णकांत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का उल्लेख किया। इस आदेश के बाद DGP ने एक परिपत्र जारी कर पुलिसकर्मियों को गवाहों को आरोपी के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री सुझाने से रोकने और केवल स्पष्टीकरण से जुड़े सवाल पूछने का निर्देश दिया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि जांच का उद्देश्य सच्चाई सामने लाना है न कि आरोपी के खिलाफ पूर्वाग्रह के साथ साक्ष्य जुटाना। यदि कोई आरोपी अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए विवेचक के सामने कोई साक्ष्य पेश करता है तो विवेचक को उसका भी सावधानीपूर्वक परीक्षण करना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि दहेज मांग, दहेज मृत्यु, POCSO Act और SC/ST Act जैसे कुछ मामलों में ऐसे उदाहरण सामने आएं, जहां ऐसे लोगों को भी आरोपी बना दिया जाता है, जिनकी घटना में कोई भूमिका नहीं होती। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवेचक का दायित्व निष्पक्ष तरीके से साक्ष्य जुटाकर वास्तविक दोषी को सक्षम अदालत के समक्ष लाना है और आपराधिक कार्यवाही का इस्तेमाल निर्दोष व्यक्तियों को परेशान करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने जांच की प्रक्रिया को लेकर कई अन्य निर्देश भी दिए। इनमें घटना स्थल पर जल्द पहुंचना, सूचनाकर्ता और गवाहों के बयान शीघ्र दर्ज करना, जहां संभव हो वहां ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए ई-साक्ष्य ऐप का इस्तेमाल करना और ऐसी रिकॉर्डिंग अदालत के समक्ष उपलब्ध कराना शामिल है। कोर्ट ने स्वतंत्र गवाहों के बयान दर्ज करने और दुष्कर्म व यौन अपराधों से जुड़े मामलों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने को भी कहा।

इसके अलावा विवेचकों को अश्लील वीडियो से जुड़े मामलों में मोबाइल और फोरेंसिक साक्ष्य जुटाने, जरूरत के अनुसार कॉल डिटेल रिकॉर्ड प्राप्त करने, आवश्यक मामलों में पहचान परेड कराने और कानून के अनुसार संपत्ति की पहचान करने के निर्देश दिए गए।

यह मामला मृतका की सास चंद्रकांता की जमानत याचिका से संबंधित था। उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 85, 80(2), 352, 115(2) और 351(3) तथा दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत मामला दर्ज किया गया।

कोर्ट ने FIR और BNSS की धारा 180 के तहत दर्ज बयान के बीच अंतर पाया। अदालत ने यह भी कहा कि आवेदिका के खिलाफ आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे तथा मृतका की मौत से पहले उसके साथ दहेज उत्पीड़न किए जाने का पर्याप्त प्रथमदृष्टया सामग्री उपलब्ध नहीं थी। आवेदिका का कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं था और वह 18 मई 2026 से जेल में थी।

मामले की परिस्थितियों, आरोपों की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य, आरोपी की भूमिका, महिला होने की स्थिति और अन्य तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने चंद्रकांता को जमानत दी। कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति अनुपालन के लिए उत्तर प्रदेश के DGP को भेजने का भी निर्देश दिया।

बड़े पैमाने पर चलने वाले बूचड़खाने के लिए रेगुलर FSSAI लाइसेंस ज़रूरी, सिर्फ़ रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट काफ़ी नहीं: इलाहाब...
15/09/2026

बड़े पैमाने पर चलने वाले बूचड़खाने के लिए रेगुलर FSSAI लाइसेंस ज़रूरी, सिर्फ़ रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट काफ़ी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'छोटे फ़ूड बिज़नेस' (Petty Food Business) के लिए तय क्षमता से ज़्यादा क्षमता पर चलने वाले बड़े पैमाने के बूचड़खाने के लिए 'फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006' (FSSAI) के तहत रेगुलर लाइसेंस की ज़रूरत होती है और सिर्फ़ रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट से ऐसी गतिविधि की इजाज़त नहीं मिल सकती।

जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 19(1)(g) के तहत व्यापार या कारोबार करने का मौलिक अधिकार, फ़ूड सेफ़्टी और पब्लिक हेल्थ के हित में लागू वैध लाइसेंसिंग की ज़रूरत को खत्म नहीं करता है।

इस तरह बेंच ने कानपुर नगर के ज़िला मजिस्ट्रेट के मई 2025 के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें याचिकाकर्ता के बूचड़खाने को फिर से खोलने के आवेदन को नामंज़ूर कर दिया गया था।

याचिकाकर्ता (जुनैद आलम) ने दो-यूनिट वाले बूचड़खाने को आधुनिक बनाने और उसका कामकाज फिर से शुरू करने के लिए उचित समय की भी मांग की थी।

याचिकाकर्ता आलम ने 29 जून 2024 के फ़ूड सेफ़्टी रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट का हवाला दिया, जो 29 नवंबर 2028 तक वैध बताया गया। सर्टिफ़िकेट में कारोबार को "स्लॉटरिंग यूनिट्स, डिस्ट्रीब्यूटर" के तौर पर बताया गया, जबकि इसके प्रोडक्ट एनेक्ज़र (अनुबंध) में फ्रोज़न बीफ़ और फ्रोज़न पोल्ट्री मीट का ज़िक्र है।

उन्होंने GST और उद्यम रजिस्ट्रेशन, लेबोरेटरी टेस्ट रिपोर्ट और नगर निगम, कानपुर नगर द्वारा जारी 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफ़िकेट' (NOC) का भी हवाला दिया।

उन्होंने तर्क दिया कि इन दस्तावेज़ों से दो स्लॉटरिंग यूनिट्स के संचालन की इजाज़त मिलती थी और अधिकारियों को उन्हें सुनवाई का मौका और आधुनिकीकरण के लिए उचित समय देना चाहिए था।

हालांकि, राज्य ने कहा कि रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट, स्लॉटरिंग के प्रस्तावित पैमाने के लिए ज़रूरी रेगुलर लाइसेंस नहीं है।

यह बताया गया कि नए राज्य लाइसेंस के लिए याचिकाकर्ता के आवेदन में 20 बड़े जानवरों की प्रस्तावित क्षमता बताई गई और कमियों को दूर करने के लिए आवेदन वापस कर दिया गया। इस तरह जब ज़िला मजिस्ट्रेट ने विवादित आदेश पारित किया, तब तक कोई रेगुलर लाइसेंस नहीं दिया गया।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने 'फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006' की धारा 31 की जांच की। कोर्ट ने देखा कि धारा 31(1) लाइसेंस के बिना फ़ूड बिज़नेस शुरू करने या चलाने पर रोक लगाती है, जबकि धारा 31(2) में छोटे फ़ूड मैन्युफ़ैक्चरर (जैसे कि छोटे स्तर पर काम करने वाले) के लिए छूट दी गई है, जिन्हें फिर भी रजिस्ट्रेशन कराना ज़रूरी है।

कोर्ट ने 'फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स (फ़ूड बिज़नेस का लाइसेंसिंग और रजिस्ट्रेशन) रेगुलेशन, 2011' के रेगुलेशन 1.2.1(4) का ज़िक्र किया। इसके तहत, जानवरों को काटने (Slaughtering) के काम को तभी 'छोटा फ़ूड बिज़नेस' माना जाता है, जब इसकी क्षमता रोज़ाना दो बड़े जानवर, दस छोटे जानवर या 50 पोल्ट्री पक्षी (मुर्गे-मुर्गियाँ) या उससे कम हो। इस छूट के अलावा, रेगुलेशन 2.1.2 के तहत एक वैलिड लाइसेंस की ज़रूरत होती है।

यह पाते हुए कि याचिकाकर्ता की प्रस्तावित क्षमता (20 बड़े जानवर) इस सीमा से ज़्यादा थी, कोर्ट ने यह टिप्पणी की:

"29.06.2024 का रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट उस स्तर के लिए काफ़ी नहीं है, जिस पर याचिकाकर्ता स्लॉटर हाउस (बूचड़खाना) चलाना चाहता है। यह क्षमता छोटे फ़ूड बिज़नेस के लिए तय सीमा से ज़्यादा है। इसलिए, एक्ट की धारा 31(1) और रेगुलेशन 2.1.2 (रेगुलेशन, 2011) के तहत एक रेगुलर लाइसेंस की ज़रूरत है।"

कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि रेगुलर लाइसेंस के लिए याचिकाकर्ता की एप्लीकेशन से ही स्लॉटर हाउस चलाने की इजाज़त नहीं मिल जाती।

राज्य लाइसेंस के लिए आवेदन में कमियों को दूर करने के लिए उसे वापस भेज दिया गया।

कोर्ट ने कहा:

"इसकी पावती (Acknowledgement) केवल आवेदन जमा होने का सबूत है और यह उस गतिविधि के लिए अनुमति नहीं देती जिसके लिए लाइसेंस मांगा गया।"

कोर्ट ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता का GST और उद्यम रजिस्ट्रेशन, लेबोरेटरी रिपोर्ट और म्युनिसिपल NOC सहायक दस्तावेज़ हैं और वे एक्ट और नियमों के तहत ज़रूरी लाइसेंस की जगह नहीं ले सकते।

कोर्ट ने यह भी देखा कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के आदेश ने किसी मौजूदा रेगुलर लाइसेंस रद्द नहीं किया। बल्कि, दोबारा खोलने का अनुरोध इसलिए खारिज कर दिया गया, क्योंकि प्रस्तावित गतिविधि के लिए ज़रूरी रेगुलर लाइसेंस और अन्य अनुमतियां नहीं ली गईं।

इसके बाद कोर्ट ने कहा:

"ज़रूरी लाइसेंस न होने पर याचिकाकर्ता को बूचड़खाना (Slaughter House) दोबारा खोलने और चलाने की अनुमति देने का कोई निर्देश जारी नहीं किया जा सकता।"

लक्ष्मी नारायण मोदी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि बिना अनुमति या बिना लाइसेंस वाले बूचड़खानों को बंद करने का निर्देश दिया गया और उन्हें ज़रूरी लाइसेंस लेने और लागू नियमों व कानूनों का पालन करने के बाद ही काम करने की अनुमति दी गई।

इसके अनुसार रिट याचिका खारिज कर दी गई।

हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता के लिए यह विकल्प खुला रखा कि वह कमियों को दूर करे और राज्य लाइसेंस आवेदन पर आगे बढ़े या कानून के अनुसार ज़रूरी दस्तावेज़ों और मंजूरियों के साथ नया आवेदन जमा करे। कोर्ट ने कहा कि ऐसे किसी भी आवेदन पर उसके गुण-दोष और कानून के अनुसार विचार किया जाएगा।

कोर्ट ने पुलिस द्वारा परेशान किए जाने के आरोपों पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला, क्योंकि याचिका में उन आरोपों के आधार पर कोई राहत नहीं मांगी गई।

Case Title : Junaid Alam vs. State Of U.P. And 3 Others 2026

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Chamber No:-05 High Court
Allahabad

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