Vicky Rastogi Advocate

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जाली वसीयत पर आधारित संपत्ति खरीदने वाला खरीदार आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ...
29/04/2026

जाली वसीयत पर आधारित संपत्ति खरीदने वाला खरीदार आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी जाली वसीयत (Will) के आधार पर खरीदी गई संपत्ति के मामले में, यदि खरीदार को उस जालसाजी की जानकारी नहीं थी, तो उसे आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने एक खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब खरीद के समय खरीदार को कथित फर्जी वसीयत की जानकारी नहीं थी और वह संबंधित अवधि में विदेश में था, तो उसे धोखाधड़ीपूर्ण लेन-देन के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में खरीदार स्वयं पीड़ित होता है, क्योंकि उसकी संपत्ति का स्वामित्व ही विवादित हो जाता है, यदि विक्रेता ने फर्जी दस्तावेज के आधार पर बिक्री की हो।

यह मामला तमिलनाडु में पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा है, जहां शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके पिता की 1988 की कथित वसीयत जाली थी। इसी वसीयत के आधार पर 1998 में संपत्ति को कई खरीदारों को बेच दिया गया, जिनमें अपीलकर्ता भी शामिल था।

बाद में जालसाजी, धोखाधड़ी और साजिश के आरोपों में मामला दर्ज किया गया। अपीलकर्ता ने यह कहते हुए कार्यवाही रद्द करने की मांग की कि वह एक bona fide खरीदार है और वसीयत की जालसाजी में उसकी कोई भूमिका नहीं थी।

कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि संपत्ति का सौदा बाद में जाली दस्तावेज पर आधारित पाया गया, खरीदार को स्वतः आपराधिक आरोपी नहीं बनाया जा सकता। जब तक यह साबित न हो कि खरीदार को जालसाजी की जानकारी थी या वह साजिश में शामिल था, उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकती।

अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता और खरीदार के बीच कोई प्रत्यक्ष अनुबंध (privity of contract) नहीं था, इसलिए तीसरा पक्ष खरीदार पर धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगा सकता।

इसी के साथ, कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए खरीदार के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

एक्सपायरी प्रोडक्ट बेचने पर Amazon और विक्रेता दोषी: उपभोक्ता आयोगउपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, त्रिशूर ने एक महत्वपूर्ण...
28/04/2026

एक्सपायरी प्रोडक्ट बेचने पर Amazon और विक्रेता दोषी: उपभोक्ता आयोग

उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, त्रिशूर ने एक महत्वपूर्ण फैसले में विक्रेता Mosaic Wellness Pvt. Ltd. और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म Amazon Seller Services Pvt. Ltd. को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार (unfair trade practice) का दोषी ठहराया। आयोग ने कहा कि मानव उपभोग के लिए निर्धारित उत्पाद को एक्सपायरी के बाद बेचना स्पष्ट रूप से अनुचित व्यापार व्यवहार है।

मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता ने 14 मार्च 2024 को अमेज़न के माध्यम से ₹799 में “हेयर गमीज़” खरीदी थी, जो 17 मार्च को डिलीवर हुई। उपभोक्ता ने छह दिनों तक इसका सेवन किया, जिसके दौरान उसे पेट दर्द, उल्टी और चक्कर आने की शिकायत हुई। बाद में पैकेजिंग जांचने पर पता चला कि उत्पाद फरवरी 2024 में ही एक्सपायर हो चुका था।

इसके बाद उपभोक्ता ने 23 मार्च 2024 को रिफंड के लिए आवेदन किया, लेकिन प्लेटफॉर्म ने यह कहते हुए मना कर दिया कि यह “नॉन-रिटर्नेबल” आइटम है और रिटर्न विंडो समाप्त हो चुकी है। शिकायतकर्ता ने इसे सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार बताते हुए आयोग का रुख किया। नोटिस के बावजूद दोनों कंपनियां उपस्थित नहीं हुईं, जिसके चलते मामला एकतरफा (ex-parte) सुना गया।

आयोग ने अपने फैसले में कहा कि एक्सपायरी के बाद उत्पाद की बिक्री अनुचित व्यापार व्यवहार है और रिटर्न पॉलिसी का हवाला देकर रिफंड से इनकार करना सेवा में कमी है। हालांकि, स्वास्थ्य संबंधी दावों के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले, लेकिन मानसिक पीड़ा और असुविधा को स्वीकार किया गया।

आयोग ने शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कंपनियों को ₹799 की राशि लौटाने, ₹25,000 मुआवजा और ₹5,000 मुकदमा खर्च देने का निर्देश दिया। साथ ही, शिकायत दायर करने की तिथि से भुगतान तक 9% वार्षिक ब्याज देने का भी आदेश दिया।

अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय कोर्ट आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्टसुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर देकर...
26/04/2026

अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय कोर्ट आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि अग्रिम ज़मानत खारिज करते समय किसी आरोपी को ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश देने का अधिकार कोर्ट के पास नहीं है।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"अगर कोर्ट अग्रिम ज़मानत खारिज करना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है, लेकिन कोर्ट के पास यह कहने का अधिकार नहीं है कि याचिकाकर्ता को अब सरेंडर कर देना चाहिए।"

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ऐसे व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिस पर धोखाधड़ी और जालसाज़ी का आरोप है। यह याचिका झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई, जिसमें उसकी अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की थी और उसे सरेंडर करके नियमित ज़मानत मांगने के लिए कहा गया था।

शिकायतकर्ता ने 2021 में मजिस्ट्रेट के सामने निजी शिकायत दायर की, जिसमें ज़मीन विवाद के सिलसिले में IPC की धारा 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाना), 420 (धोखाधड़ी), 467 (कीमती दस्तावेज़ की जालसाज़ी), 468 (धोखाधड़ी के मकसद से जालसाज़ी), 471 (जाली दस्तावेज़ का इस्तेमाल करना), और 120B (धारा 34 के साथ पठित) के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दूसरी अग्रिम ज़मानत याचिका इस आधार पर खारिज की कि कोई नई परिस्थितियां सामने नहीं आई थीं। कोर्ट ने अपने पिछले आदेश पर भरोसा किया, जिसमें उसने याचिकाकर्ता की पहली अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की थी और याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करे और 'सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI' मामले में दिए गए फैसले के अनुसार नियमित ज़मानत मांगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा निर्देश पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर था। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कोर्ट अग्रिम ज़मानत खारिज करने का फैसला करता है तो वह ऐसा कर सकता है, लेकिन वह आरोपी को सरेंडर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।

कोर्ट ने समझाया कि एक बार जब कोई मजिस्ट्रेट संज्ञान लेता है और प्रक्रिया जारी करता है तो सामान्य तरीका समन जारी करना होता है। साथ ही आरोपी को केवल कोर्ट के सामने पेश होने और कार्यवाही में हिस्सा लेने की ज़रूरत होती है।

CrPC, 1973 की धारा 87 का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि समन के बजाय या उसके अतिरिक्त वारंट केवल तभी जारी किया जा सकता है, जब कोर्ट के पास यह मानने के उचित कारण हों कि आरोपी फरार हो गया है या वह समन का पालन नहीं करेगा, या यदि आरोपी को समन तामील होने के बावजूद बिना किसी उचित कारण के कोर्ट में पेश होने में विफल रहता है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस के पास किसी शिकायत वाले मामले में आरोपी को गिरफ़्तार करने का कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि कोर्ट से कोई गैर-जमानती वारंट जारी न हो जाए। कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि CrPC की धारा 202 के तहत जांच के दौरान भी, जहां मजिस्ट्रेट कोई प्रक्रिया शुरू करने से पहले पुलिस रिपोर्ट माँग सकते हैं, पुलिस आरोपी को गिरफ़्तार नहीं कर सकती।

कोर्ट ने पाया कि इस कानूनी स्थिति के बावजूद, अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ियाँ नियमित रूप से दायर की जा रही हैं और उन पर सुनवाई हो रही है - खासकर बिहार और झारखंड में - जिसके चलते बेवजह के मुक़दमे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच रहे हैं।

कोर्ट ने कहा,

"बेवजह अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ियों पर सुनवाई की जाती है, और जब वे खारिज हो जाती हैं तो मुक़दमा लड़ने वालों को इस देश की सबसे बड़ी अदालत तक का सफ़र तय करना पड़ता है। हम हाईकोर्ट को यह भी याद दिलाते हैं कि याचिकाकर्ता को कोर्ट के सामने सरेंडर करके नियमित ज़मानत माँगने का जो निर्देश दिया गया, वह भी पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर है।"

चूंकि इस मामले में मुक़दमा पहले से ही चल रहा था, इसलिए कोर्ट ने यह देखते हुए याचिका का निपटारा किया कि अब और किसी आदेश की ज़रूरत नहीं है।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति बिहार और झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए, ताकि वे इसे अपने-अपने चीफ जस्टिस के सामने रख सकें। कोर्ट ने राज्य के वकील से यह भी कहा कि वे इस मुद्दे की जांच करें और उसी के अनुसार राज्य को उचित सलाह दें।

Case Title – Om Prakash Chhawnika @ Om Prakash Chabnika @ Om Prakash Chawnika v. State of Jharkhand & Anr.

मस्जिद से जुड़ी 'सर्विस इनाम' ज़मीन वक्फ़ संपत्ति, इसे बेचा नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्टसुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 अप्...
25/04/2026

मस्जिद से जुड़ी 'सर्विस इनाम' ज़मीन वक्फ़ संपत्ति, इसे बेचा नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 अप्रैल) को कहा कि मस्जिदों से जुड़ी जिन ज़मीनों को 'सर्विस इनाम' कहा जाता है, वे वक्फ़ संपत्ति का हिस्सा होती हैं, और इसलिए उन्हें बेचा नहीं जा सकता।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा,

"यह बात बिना किसी विवाद के तय है कि धार्मिक या चैरिटी के कामों के लिए 'सर्विस इनाम' के तौर पर दी गई ज़मीनें दान की गई संपत्ति (Endowed Property) का रूप ले लेती हैं और उन पर सार्वजनिक या धार्मिक ट्रस्ट का अधिकार होता है, जिससे उन्हें बेचने या किसी और को देने पर रोक लग जाती है।"

कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें हाईकोर्ट ने वक्फ़ ट्रिब्यूनल का फ़ैसला पलट दिया, जिसमें ट्रिब्यूनल ने प्रतिवादी (Respondent) के पक्ष में 'सर्विस इनाम' ज़मीन को बेचने का सौदा रद्द कर दिया था।

यह मामला कुरनूल ज़िले में 3 एकड़ ज़मीन के एक टुकड़े से जुड़ा था। इसमें मुख्य सवाल यह था कि क्या यह ज़मीन वक्फ़ संपत्ति (सर्विस इनाम) थी, जो मस्जिद में धार्मिक सेवाओं के लिए दी गई थी। इसलिए इसे बेचा नहीं जा सकता था; या यह एक निजी संपत्ति (निजी इनाम) थी, जिसे बिक्री के कागज़ों (Sale Deeds) के ज़रिए कानूनी तौर पर बेचा जा सकता है।

वादी (Plaintiffs) ने 1985 और 1996 में हुए बिक्री के कागज़ों के आधार पर ज़मीन पर अपना मालिकाना हक़ जताया और बोर्ड के ख़िलाफ़ यह आदेश मांगा कि उन्हें ज़मीन का शांतिपूर्ण इस्तेमाल करने दिया जाए। हालांकि, वक्फ़ बोर्ड ने यह दलील दी कि यह ज़मीन ऐतिहासिक रूप से धार्मिक कामों के लिए दी गई थी और इसे वक्फ़ संपत्ति के तौर पर ही दर्ज किया गया था।

इस मामले में एक अहम मोड़ 1945 के बँटवारे के एक कागज़ (Partition Deed) से आया, जिसका सहारा खुद वादी ने ही ज़मीन पर अपना मालिकाना हक़ साबित करने के लिए लिया था। हालांकि, उस बँटवारे के कागज़ में विवादित ज़मीन को 'सर्विस इनाम' के तौर पर ही बताया गया।

वक्फ़ ट्रिब्यूनल ने वादी-प्रतिवादी (Plaintiff-Respondent) का वह मुक़दमा ख़ारिज किया, जिसमें उसने अपील करने वाले-प्रतिवादी (Appellant-Defendant) के ख़िलाफ़ ज़मीन पर हमेशा के लिए रोक लगाने और अपना मालिकाना हक़ घोषित करने की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने यह फ़ैसला इसलिए दिया, क्योंकि प्रतिवादी बिक्री के कागज़ों के ज़रिए खरीदी गई बताई जा रही ज़मीन पर अपना मालिकाना हक़ साबित नहीं कर पाया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फ़ैसला पलट दिया और वादी-प्रतिवादी के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि वक्फ़ बोर्ड ज़मीन पर अपना मालिकाना हक़ साबित करने में नाकाम रहा, जिसके बाद राज्य वक्फ़ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द करते हुए जस्टिस मसीह द्वारा लिखे गए फ़ैसले में सैयद अली बनाम ए.पी. वक्फ़ बोर्ड, (1998) 2 SCC 642 पर भरोसा करते हुए यह कहा गया,

“धार्मिक या धर्मार्थ सेवाएं देने के लिए दी गई ज़मीन का पूरा मालिकाना हक़ किसी व्यक्ति को नहीं मिल जाता। ऐसी ज़मीनें, जो मुस्लिम क़ानून के तहत पवित्र, धार्मिक या धर्मार्थ माने जाने वाले कामों के लिए दी जाती हैं, उन पर वक्फ़ संपत्ति का दर्जा लागू हो जाता है।”

इसके अलावा, कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि जब प्रतिवादी-वादी संपत्ति पर अपने मालिकाना हक़ को साबित करने का अपना दायित्व पूरा नहीं कर पाया तो अपीलकर्ता-प्रतिवादी का संपत्ति पर मालिकाना हक़ जताने में कमज़ोर पड़ना भी प्रतिवादी को निषेधाज्ञा (Injunction) और मालिकाना हक़ की घोषणा पाने में कोई फ़ायदा नहीं पहुंचाएगा।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

“यह भी ध्यान देना ज़रूरी है कि एक स्थापित सिद्धांत यह है कि जो वादी मालिकाना हक़ की घोषणा चाहता है, उसे अपने मामले की मज़बूती के आधार पर जीतना चाहिए, न कि प्रतिवादी पक्ष की कमज़ोरी के आधार पर। इस मामले में प्रतिवादी पक्ष ने घोषणा और निषेधाज्ञा पाने के लिए ट्रिब्यूनल का दरवाज़ा खटखटाया, इसलिए उन्हें विवादित संपत्ति पर अपना साफ़ और वैध मालिकाना हक़ साबित करना ज़रूरी था। हालांकि, जैसा कि ऊपर बताया गया, जिस दस्तावेज़ पर उन्होंने भरोसा किया, वही उनके दावे के ख़िलाफ़ जाता है। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फ़ैसला पलटते हुए असल में मालिकाना हक़ साबित करने का दायित्व अपीलकर्ता पर डाल दिया, जो इस मामले के तथ्यों के आधार पर क़ानूनी रूप से सही नहीं है।”

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अपील स्वीकार की गई और वक्फ़ ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया फ़ैसला बहाल कर दिया गया।

कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया,

“हमारी यह सुविचारित राय है कि विवादित संपत्ति 'सेवा इनाम' (Service Inam) ज़मीन है, जो एक धार्मिक संस्था से जुड़ी हुई और उस पर वक्फ़ संपत्ति का दर्जा लागू होता है। प्रतिवादी पक्ष कोई भी वैध मालिकाना हक़ या क़ानूनी कब्ज़ा साबित करने में नाकाम रहा है, जिसके आधार पर उसे माँगी गई राहतें मिल सकें।”

Cause Title: A.P. STATE WAKF BOARD THROUGH CHAIRPERSON VERSUS JANAKI BUSAPPA

दूसरी शादी करने पर नौकरी से निकाला तो बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- यह 'चौंकाने वाला'एक अहम फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुव...
24/04/2026

दूसरी शादी करने पर नौकरी से निकाला तो बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- यह 'चौंकाने वाला'

एक अहम फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार (23 अप्रैल) को कहा कि हालांकि हिंदू धर्म में पहली शादी के रहते दूसरी शादी करना जायज़ नहीं है। फिर भी ऐसा 'गलती' करने वाले किसी सरकारी कर्मचारी को नौकरी से निकालने जैसी 'चौंकाने वाली' सज़ा नहीं दी जा सकती।

जस्टिस रविंद्र घुगे और जस्टिस हितेन वेनेगांवकर की डिवीज़न बेंच ने संतोष चव्हाण को नौकरी पर वापस लेने का आदेश दिया। संतोष चव्हाण ने शुरू में बिलासपुर में रेलवे पुलिस फोर्स (RPF) में पुलिस कांस्टेबल के तौर पर जॉइन किया था और बाद में उनका ट्रांसफर ठाणे ज़िले के कल्याण में जूनियर क्लर्क के तौर पर हो गया। उन्हें इस आधार पर नौकरी से निकाल दिया गया था कि उन्होंने अपनी पहली शादी के रहते हुए भी दूसरी शादी की थी।

चव्हाण के वकील अभिनव चंद्रचूड़ के मुताबिक, चव्हाण ने 21 अप्रैल, 2008 को शादी की थी। हालांकि, कुछ अनबन की वजह से दोनों अलग हो गए और अब उनके बीच कानूनी लड़ाई चल रही है। साल 2016 में चव्हाण ने दूसरी शादी की, जबकि उनकी पहली शादी अभी कानूनी तौर पर खत्म भी नहीं हुई। इसलिए उनके एम्प्लॉयर ने रेलवे सर्विस (कंडक्ट) रूल्स, 1968 का उल्लंघन करने के आरोप में चव्हाण के खिलाफ एक 'शुरुआती जांच' शुरू की।

जांच करने के लिए अधिकारी को नियुक्त किया गया, जिसने गवाहों और खुद चव्हाण के बयान दर्ज किए। फिर 1968 के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में उनके खिलाफ चार्जशीट दायर की। इसके बाद फरवरी, 2021 में RPF, कल्याण के असिस्टेंट सिक्योरिटी कमिश्नर ने यह देखते हुए कि चव्हाण की नौकरी के अभी कम से कम 19 साल बाकी हैं, उन्हें एक इंक्रीमेंट रोकने की सज़ा दी।

हालांकि, RPF की रिविजनल अथॉरिटी ने इस मामले का 'खुद से' (suo motu) संज्ञान लिया। साथ ही चव्हाण के खिलाफ एक नई जांच का आदेश दिया। साथ ही एक नया जांच अधिकारी भी नियुक्त किया।

अथॉरिटी ने नए अधिकारी से चव्हाण के लिए एक 'बड़ी' सज़ा की सिफारिश करने को कहा, क्योंकि पिछले अधिकारी ने एक 'छोटी' सज़ा की सिफारिश की थी। इसके बाद, चव्हाण को एक नई चार्जशीट जारी की गई और मार्च 2025 से उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का आदेश पारित किया गया।

अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए चव्हाण ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) का रुख किया, लेकिन वहां से कोई राहत न मिलने पर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

Case Title: Santosh Motiram Chavan vs Union of India (Writ Petition 540 of 2025)

UP Goonda Act: सिर्फ दो मुकदमों से किसी को गुंडा नहीं कहा जा सकता- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश रद्द कियाइलाहाबाद हाईकोर्ट ...
23/04/2026

UP Goonda Act: सिर्फ दो मुकदमों से किसी को गुंडा नहीं कहा जा सकता- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल एक या दो आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को 'गुंडा' घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करना व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है।

जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने यह टिप्पणी याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें छह महीने के बाहरीकरण आदेश को चुनौती दी गई। यह आदेश बुलंदशहर के एडिशनल जिला मजिस्ट्रेट (वित्त एवं राजस्व) द्वारा पारित किया गया, जिसे मेरठ मंडल के आयुक्त ने भी बरकरार रखा था।

प्रशासन ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज दो आपराधिक मामलों के आधार पर उसे आदतन अपराधी बताते हुए समाज के लिए खतरा माना था। यह भी कहा गया कि उसकी गतिविधियों से इलाके में भय का माहौल बन गया, जिससे लोग उसके खिलाफ गवाही देने से कतराते हैं।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदतन अपराधी साबित करने के लिए केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के तहत कार्रवाई के लिए यह दिखाना जरूरी है कि व्यक्ति लगातार अपराधों में लिप्त रहा हो।

अदालत ने अपने पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एक या दो मामलों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि व्यक्ति आदतन अपराधी है। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि घटनाओं के बीच लंबा अंतर हो तो आदतन होने का तत्व और भी कमजोर हो जाता है।

इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता को केवल दो मामलों के आधार पर गुंडा घोषित करना उचित नहीं है। इसलिए उसके खिलाफ की गई पूरी कार्यवाही को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया गया।

सबरीमला संदर्भ: जन्म के आधार पर देवता को छूने से रोकना क्या संवैधानिक है? सुप्रीम कोर्ट का सवालसुप्रीम कोर्ट में सबरीमला...
21/04/2026

सबरीमला संदर्भ: जन्म के आधार पर देवता को छूने से रोकना क्या संवैधानिक है? सुप्रीम कोर्ट का सवाल

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला मामले की सुनवाई के दौरान 9-न्यायाधीशों की पीठ ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाया है कि क्या किसी आस्तिक को केवल उसके जन्म या पहचान के आधार पर देवता को छूने से रोका जा सकता है।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने सीनियर एडवोकेट वी. गिरी से पूछा कि यदि कोई व्यक्ति गहरी आस्था के साथ मंदिर जाता है, लेकिन उसे केवल जन्म के आधार पर स्थायी रूप से प्रतिबंधित किया जाता है, तो क्या संविधान ऐसे मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला 2018 के उस फैसले की समीक्षा से संबंधित है, जिसमें सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गई थी। मंदिर के थंथ्री (मुख्य पुजारी) ने इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है।

पक्षकार की दलील

सीनियर एडवोकेट वी. गिरी ने दलील दी कि अनुच्छेद 25 के तहत पूजा का अधिकार उसी व्यक्ति को है, जो संबंधित देवता और उसकी विशेषताओं में विश्वास रखता हो। उन्होंने कहा कि सबरीमला के देवता को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है, इसलिए मंदिर की परंपराएं उसी के अनुरूप हैं। उनके अनुसार, कोई भी आस्तिक मंदिर की मूल धार्मिक प्रथाओं के विपरीत आचरण नहीं कर सकता।

पीठ की टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि एक सच्चा आस्तिक धार्मिक प्रथाओं की तर्कसंगतता पर सवाल नहीं उठाता, जबकि गैर-आस्तिक को इन पर प्रश्न उठाने का अधिकार नहीं है।

वहीं, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने पूछा कि क्या आधुनिक शिक्षा और बदलते समय के साथ एक आस्तिक पुरानी परंपराओं पर सवाल नहीं उठा सकता।

जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने यह भी सवाल किया कि यदि कोई आस्तिक स्वयं किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती देता है, तो ऐसी स्थिति में अदालत की भूमिका क्या होगी।

बहुमत और व्यक्तिगत अधिकार

जस्टिस सुन्द्रेश ने कहा कि यदि किसी संप्रदाय के अधिकांश सदस्य किसी प्रथा का पालन करते हैं, तो एक व्यक्ति की असहमति के आधार पर उस प्रथा को चुनौती देना जटिल हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि एक व्यक्ति के अधिकार को लागू करते समय अन्य लोगों के अधिकारों का भी ध्यान रखना होगा।

जन्म आधारित प्रतिबंध पर बहस

सुनवाई के दौरान यह भी उभरकर सामने आया कि यदि किसी व्यक्ति को केवल जन्म के आधार पर पूजा या मंदिर के कुछ हिस्सों तक पहुंच से वंचित किया जाता है, तो यह संवैधानिक जांच का विषय हो सकता है।

इस पर वी. गिरी ने कहा कि यदि केवल जन्म के आधार पर किसी को पुजारी बनने या पूजा से रोका जाता है, तो यह उचित नहीं होगा।

आगे की स्थिति

मामले की सुनवाई जारी है और सुप्रीम कोर्ट धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन के जटिल प्रश्नों पर विचार कर रहा है।

यह सुनवाई एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस को सामने लाती है, जिसमें यह तय होना है कि धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं की सीमाएं क्या हैं और संविधान इन पर किस हद तक हस्तक्षेप कर सकता है।

क्या संभावित आरोपी को सुने जाने का अधिकार है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ FIR का निर्देश देने वाले आदेश पर...
20/04/2026

क्या संभावित आरोपी को सुने जाने का अधिकार है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ FIR का निर्देश देने वाले आदेश पर लगाई रोक

एक अहम घटनाक्रम में इलाहाबाद हाई कोर्ट (लखनऊ बेंच) ने BJP कार्यकर्ता की याचिका पर अपना अंतिम आदेश रोक दिया। इस याचिका में लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP) राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई थी। यह मांग उन दावों के संबंध में की गई कि राहुल गांधी एक ब्रिटिश नागरिक हैं।

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने उस फैसले के अमल को प्रभावी रूप से टाल दिया, जो शुक्रवार को ओपन कोर्ट में पहले ही सुनाया जा चुका था। उस फैसले में गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया। बेंच ने इस आदेश को टाइप होने और उस पर हस्ताक्षर होने से पहले ही प्रभावी रूप से रोक दिया।

गौरतलब है कि 17 अप्रैल के अपने आदेश में—जिसे कुछ ही मिनट पहले अपलोड किया गया—कोर्ट ने टिप्पणी की कि गांधी को अपनी बात रखने (सुने जाने) का अवसर मिलने का अधिकार हो सकता है।

2-पृष्ठ के इस आदेश के अनुसार, बेंच ने हाईकोर्ट की एक पूर्ण पीठ (Full Bench) का फैसला देखने के बाद अपना फैसला रोकने का निर्णय लिया। यह फैसला 'जगन्नाथ वर्मा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य, 2014' मामले में आया था।

इस मामले में कोर्ट ने यह माना कि किसी केस को दर्ज करने और उसकी जांच के लिए CrPC की धारा 156(3) के तहत दायर आवेदन खारिज करने वाला मजिस्ट्रेट का आदेश कोई 'अंतर्वर्ती आदेश' (Interlocutory Order) नहीं होता। बल्कि, ऐसे आदेश के खिलाफ CrPC की धारा 397 के तहत 'आपराधिक पुनरीक्षण' (Criminal Revision) का उपाय उपलब्ध होता है।

इसी फैसले का हवाला देते हुए जस्टिस विद्यार्थी ने टिप्पणी की कि ऐसे पुनरीक्षण मामलों में संभावित आरोपी—या वह व्यक्ति जिस पर अपराध करने का संदेह हो—को अंतिम फैसला लिए जाने से पहले अपनी बात रखने का अवसर मिलने का अधिकार होता है। हालांकि, शिशिर की याचिका BNSS की धारा 528 [CrPC की धारा 482 के समतुल्य] के तहत दायर की गई।

इसलिए यह देखते हुए कि इस मामले में गांधी को भी सुने जाने की आवश्यकता हो सकती है, कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 20 अप्रैल की तारीख तय की। इस दिन कोर्ट इस पहलू पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनेगा।

महत्वपूर्ण बात यह है कि आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने याचिकाकर्ता और अन्य वकीलों से एक विशेष प्रश्न पूछा था। कोर्ट ने पूछा कि क्या इस मामले में 'विपक्षी पक्ष' (Opposite Party) को नोटिस जारी करना आवश्यक था या नहीं।

आदेश में यह दर्ज है,

"उन सभी ने यह दलील दी कि BNSS की धारा 173(4) को धारा 175(3) के साथ मिलाकर पढ़ी जाने वाली धारा के तहत किसी आवेदन पर फैसला करते समय प्रस्तावित आरोपी को नोटिस जारी करने की कोई ज़रूरत नहीं है। इसलिए BNSS की धारा 528 के तहत किसी आवेदन पर फैसला करते समय, जिसमें BNSS की धारा 173(4) को धारा 175(3) के साथ मिलाकर पढ़ी जाने वाली धारा के तहत किसी आवेदन को खारिज करने वाले आदेश की वैधता को चुनौती दी गई हो, प्रस्तावित आरोपी-विपक्षी पक्ष संख्या 1 को कोई नोटिस जारी करने की ज़रूरत नहीं है।"

बता दें, शुक्रवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ओपन कोर्ट में अपने आदेश का मुख्य हिस्सा सुनाया, जिसमें कर्नाटक के BJP कार्यकर्ता (S. Vignesh Shishir) द्वारा दायर याचिका पर गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया।

शिशिर ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा तब खटखटाया, जब इस साल जनवरी में लखनऊ की ACJM कोर्ट ने गांधी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), सरकारी गोपनीयता अधिनियम, पासपोर्ट अधिनियम और विदेशी अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के तहत FIR दर्ज करने की उनकी याचिका खारिज की थी।

हाईकोर्ट के समक्ष आवेदक (शिशिर) ने यह दलील दी कि गांधी यूके के नागरिक हैं। उन्होंने M/S Backops Ltd. नाम की एक कंपनी बनाई, जो अगस्त 2003 में पंजीकृत हुई।

आगे यह भी दलील दी गई कि गांधी ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया और स्वेच्छा से अपनी राष्ट्रीयता ब्रिटिश घोषित की थी। उनके पास एक निदेशक पहचान ID (Director Identification ID) तथा लंदन और हैम्पशायर के पते थे।

यह दावा भी किया गया कि गांधी ने अक्टूबर 2005 और अक्टूबर 2006 में कंपनी के वार्षिक रिटर्न जमा किए, जिनमें उन्होंने अपनी राष्ट्रीयता ब्रिटिश बताई। इसके बाद फरवरी 2009 में कंपनी को भंग करने का आवेदन दायर करके उक्त कंपनी को भंग कर दिया गया।

इसके अलावा, यह दलील दी गई कि गांधी ने 2004 का लोकसभा चुनाव लड़ा था, जिसमें उन्होंने M/S Backops Ltd. के स्वामित्व और Barclays Bank, लंदन शाखा, यूके में अपने विदेशी बैंक खाते की बात स्वीकार की थी और उसका खुलासा किया।

शिशिर ने आगे यह तर्क दिया कि गांधी पर विदेशी अधिनियम, पासपोर्ट अधिनियम और यहां तक कि सरकारी गोपनीयता अधिनियम के तहत भी आरोप लगाए जाने चाहिए।

आपराधिक कार्यवाही पर रोक होने पर पासपोर्ट को रोका नहीं जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्टइलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक मह...
18/04/2026

आपराधिक कार्यवाही पर रोक होने पर पासपोर्ट को रोका नहीं जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि किसी आपराधिक मामले की कार्यवाही पर उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगा दी गई है, तो जब्त किए गए पासपोर्ट को जारी किया जाना चाहिए। मामले की प्रकृति को “मामूली” (petty nature) बताते हुए, हाईकोर्ट ने क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय को तीन सप्ताह के भीतर पासपोर्ट वापस करने का आदेश दिया है।

यह आदेश जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सुनील कुमार सिंह द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने पासपोर्ट विभाग द्वारा उसके पासपोर्ट को जब्त किए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी, जो एक लंबित आपराधिक मामले के आधार पर लिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता का पासपोर्ट क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय (प्रतिवादी संख्या 2) द्वारा वर्ष 2020 के एक आपराधिक मामले के कारण जब्त किया गया था। यह मामला लखनऊ के विभूति खंड थाने में आईपीसी की धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 406 (आपराधिक विश्वासघात) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज किया गया था।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को सूचित किया कि उसने पासपोर्ट वापस पाने के लिए विभाग को नया प्रतिवेदन दिया था। उसने दलील दी कि हाईकोर्ट ने पहले ही एक अन्य आवेदन (धारा 482 संख्या 7772 वर्ष 2025) के तहत इस पूरे आपराधिक मामले की कार्यवाही पर रोक लगा दी है और इससे संबंधित दस्तावेज भी पासपोर्ट कार्यालय को उपलब्ध कराए जा चुके हैं

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से वकील श्री शिवांशु गोस्वामी, अर्पित वर्मा और प्रेरणा जालान ने तर्क दिया कि चूंकि ट्रायल कोर्ट की पूरी कार्यवाही पर हाईकोर्ट द्वारा रोक लगा दी गई है, इसलिए पासपोर्ट को जब्त रखने का अब कोई कानूनी आधार नहीं रह गया है।

वहीं, क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय की ओर से पेश हुए श्री एस.बी. पांडेय (सीनियर एडवोकेट एवं DSGI), जिनके साथ श्री वरुण पांडेय भी थे, ने विरोध करते हुए कहा कि पासपोर्ट वापस पाने के लिए याचिकाकर्ता को संबंधित मजिस्ट्रेट से अनुमति लेनी चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा रीता वर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2024) के मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि पासपोर्ट की बहाली के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति आवश्यक है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

मामले के तथ्यों का अवलोकन करने के बाद, बेंच ने पाया कि आईपीसी की धारा 323, 406 और 506 के तहत दर्ज यह मामला काफी मामूली प्रकृति का है। हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वह पहले ही मामले की मेरिट को देखते हुए ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा चुका है।

बेंच ने टिप्पणी की:

" विभिन्न प्रावधानों जिन पर यह आपराधिक मामला आधारित है के अवलोकन के बाद हमारा विचार है कि मामला मामली प्रकृति का है और यह वर्ष 2020 में दर्ज किया गया था हमारा मानना है कि चुकी मामला जब्त पासपोर्ट को वापस करने से संबंधित है और हाईकोर्ट पहले ही रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर विचार करने के बाद ट्रायल कोर्ट की कारवाही पर रोक लगा चुका है, इसलिए हम संबंधित अधिकारी को याचिकाकर्ता का पासपोर्ट कानून के अनुसार जारी करने का निर्देश देते हैं"!

न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने रिट याचिका को निस्तारित करते हुए पासपोर्ट कार्यालय को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता का पासपोर्ट इस आदेश की तारीख से तीन सप्ताह के भीतर कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए वापस करे।

केस विवरण:

केस शीर्षक: सुनील कुमार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, सचिव विदेश मंत्रालय, नई दिल्ली और अन्य के माध्यम से

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अनुसार, पुलिस पूरे बैंक खाते को तब तक फ्रीज नहीं कर सकती जब तक कि पूरी राशि को संदिग्ध अपराध स...
16/04/2026

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अनुसार, पुलिस पूरे बैंक खाते को तब तक फ्रीज नहीं कर सकती जब तक कि पूरी राशि को संदिग्ध अपराध से न जोड़ा जाए।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना है कि यद्यपि बैंक खाते जांच के दौरान ज़ब्त किए जाने योग्य "संपत्ति" की श्रेणी में आते हैं, फिर भी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 106 के तहत ज़ब्ती की शक्ति केवल उस राशि तक सीमित है जिस पर अपराध से जुड़े होने का संदेह है। न्यायालय ने कहा कि पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना, यह साबित किए बिना कि पूरी राशि कथित आपराधिक गतिविधि से जुड़ी है, वैधानिक अधिकार का उल्लंघन है और अस्वीकार्य है।

मामले की खूबियों पर विचार करते हुए, न्यायालय ने धारा 106 बीएनएसएस के अर्थ में बैंक खाते को "संपत्ति" माना और सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित पूर्व मत की पुष्टि की। हालांकि, न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया: इस संदर्भ में "संपत्ति" शब्द का तात्पर्य केवल संदिग्ध राशि से है, न कि खाते की पूरी शेष राशि से। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि ज़ब्ती शक्तियां जांचात्मक और अस्थायी हैं, जिनका उद्देश्य साक्ष्यों को संरक्षित करना है, और वे खातों को पूरी तरह से फ्रीज करने का औचित्य नहीं ठहरा सकतीं।

न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी ने यह मानते हुए कि बैंक खाता "संपत्ति" है, इस मुद्दे पर कि क्या धारा 106 बीएनएसएस पूरी राशि पर लागू होती है या केवल संदिग्ध राशि पर, पीठ ने टिप्पणी की, "...धारा 106(1) बीएनएसएस एक पुलिस अधिकारी को किसी भी संपत्ति को जब्त करने का अधिकार देती है, जिसमें वर्तमान संदर्भ में एक बैंक खाता भी शामिल है, जिसके चोरी होने का आरोप या संदेह हो, या जो किसी अपराध के घटित होने के संदेह को जन्म देने वाली परिस्थितियों में पाई जाती है।

यह प्रावधान स्पष्ट रूप से कहता है कि केवल ऐसी संपत्ति, जिसके चोरी होने का संदेह हो या जो संदिग्ध परिस्थितियों से जुड़ी हो, जब्त की जा सकती है। इसलिए, हम मानते हैं कि जब्ती की शक्ति कथित या संदिग्ध राशि तक ही सीमित है और धारा 106 बीएनएसएस में निर्धारित दो शर्तों के अभाव में बैंक खाते के पूरे संचालन को फ्रीज करने की अनुमति देने के रूप में नहीं मानी जा सकती, जो पुलिस अधिकारी को जब्ती का अधिकार देती है। संपत्ति एक विशिष्ट राशि होने के कारण, बैंक खाते में पड़ी पूरी राशि को फ्रीज नहीं किया जा सकता है और बैंक खाते के संचालन को रोका नहीं जा सकता है।"

पीठ ने बैंक खातों को फ्रीज करने को चुनौती देने वाली कई रिट याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए यह निर्णय दिया।

ये याचिकाएँ उन अनेक मामलों से संबंधित हैं जिनमें विभिन्न राज्यों में साइबर अपराध की शिकायतों से जुड़े संदिग्ध लेन-देन के कारण खाते फ्रीज़ कर दिए गए थे। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उनके खाते बिना किसी सूचना के, संदिग्ध राशि का उल्लेख किए बिना और धारा 106 बीएनएसएस के तहत वैधानिक आवश्यकताओं का पालन किए बिना फ्रीज़ किए गए थे। कई मामलों में, वेतन और पेंशन निधि सहित संपूर्ण खाते निष्क्रिय कर दिए गए थे।

याचिकाकर्ताओं ने साइबर अपराध अधिकारियों के निर्देशों पर विभिन्न बैंकों द्वारा उनके खातों को फ्रीज किए जाने को चुनौती देते हुए अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय का रुख किया। कार्यवाही के दौरान, कुछ खातों को आंशिक या पूर्ण रूप से डीफ्रीज कर दिया गया, जबकि अन्य प्रतिबंधित रहे, जिसके कारण न्यायालय ने ऐसी कार्रवाइयों की वैधता और बीएनएसएस के तहत पुलिस शक्तियों के दायरे की जांच की।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस की धारा 106 और 107 अलग-अलग क्षेत्रों में लागू होती हैं। धारा 106 के तहत पुलिस द्वारा तत्काल ज़ब्ती की अनुमति है, बशर्ते घटना के बाद इसकी सूचना दी जाए, जबकि धारा 107 संपत्ति की कुर्की को नियंत्रित करती है और इसके लिए पूर्व न्यायिक स्वीकृति आवश्यक है। खाता संचालन पर किसी भी प्रकार का दीर्घकालिक या पूर्ण प्रतिबंध धारा 107 के अंतर्गत दिए गए सख्त सुरक्षा उपायों का अनुपालन करना चाहिए।

“BNSS के विधायी ढांचे में जानबूझकर संपत्ति संबंधी शक्तियों को जांच के दो अलग-अलग चरणों में विभाजित किया गया है: धारा 106 के तहत 'जब्ती' और धारा 107 के तहत 'अटैचमेंट'। अटैचमेंट, जब्ती की तुलना में कहीं अधिक गंभीर कदम है, जबकि जब्ती पुलिस द्वारा भौतिक साक्ष्य प्राप्त करने के लिए की गई एक प्रारंभिक, आपातकालीन कार्रवाई है जिसके लिए केवल बाद में सूचना देना आवश्यक होता है। अटैचमेंट संपत्ति के अधिकारों का वास्तविक हनन है और इसके लिए न्यायिक विवेक का सख्ती से प्रयोग करने के बाद अटैचमेंट का आदेश देना अनिवार्य है। अतः धारा 106 के तहत शक्ति पुलिस के विवेक पर निर्भर करती है, जबकि धारा 107 के तहत शक्ति केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास होती है” , पीठ ने टिप्पणी की।

अधिकार क्षेत्र के संबंध में, न्यायालय ने कहा कि सक्षम मजिस्ट्रेट का निर्धारण बैंक खाते के स्थान के आधार पर किया जाता है, भले ही संदिग्ध लेनदेन की उत्पत्ति कहीं से भी हुई हो।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि धारा 106 बीएनएसएस के तहत खाता फ्रीज करने के लिए खाताधारक को पूर्व सूचना देना अनिवार्य नहीं है, फिर भी खाता फ्रीज करने के बाद कड़ाई से अनुपालन करना आवश्यक है। इसमें संबंधित मजिस्ट्रेट को तुरंत सूचना देना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि कार्रवाई केवल अपराध से प्राप्त संदिग्ध धनराशि को सुरक्षित रखने तक ही सीमित रहे। न्यायालय ने आगे कहा कि बैंकों को खाता फ्रीज करने के बाद खाताधारकों को सूचित करना होगा, ताकि वे कानूनी उपाय अपना सकें और अपनी कठिनाइयों को कम कर सकें।

तदनुसार, न्यायालय ने बैंकों को आदेश दिया कि वे जांच एजेंसियों द्वारा निर्धारित विशिष्ट राशि को ही प्रतिबंधित करें और एक सप्ताह के भीतर खातों का पूर्ण संचालन बहाल करें। न्यायालय ने जांच अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे खातों को फ्रीज करने के निर्देशों में संदिग्ध राशियों का स्पष्ट रूप से उल्लेख करें और बैंकों को यह अनिवार्य किया कि वे खाताधारकों को ऐसी कार्रवाई की तुरंत सूचना दें। याचिकाकर्ताओं को आगे की राहत के लिए संबंधित मजिस्ट्रेटों से संपर्क करने की स्वतंत्रता दी गई।

इन निर्देशों के साथ बैच का निपटारा कर दिया गया, कुछ याचिकाएँ पूर्व में ही बर्फ़ पिघलाए जाने के कारण निष्फल हो गईं और अन्य को तदनुसार स्वीकार कर लिया गया। लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।

मामले का शीर्षक: आशीष रावत बनाम भारत संघ और अन्य। [तटस्थ उद्धरण: 2026:एएचसी:78406-डीबी]

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Chamber No:-05 High Court
Allahabad

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