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24/12/2017

श्रीराम जी हनुमानजी को लक्ष्मण जी से दुगना प्रिय क्यों कहे?
या इस "दूना" का रहस्य क्या है??

सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते "दूना"।।

मानस के हनुमानजी का श्रीराम जी से ये पहली मुलाकात है और भैया लक्ष्मण...जनमे एक संग सब भाई...करनबेध उपबीत बिआहा। अर्थात श्रीराम जी के साथ ही लक्ष्मणावतार हुआ, यज्ञोपवित, शिक्षा, विवाह और वनवास में भी साथ साथ हैं।
बारेहिं ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी।।
बाल्यावस्था में ही लक्ष्मण जी ने ये निर्णय कर लिया था कि श्रीराम जी ही मेरे असली हितैषी, असली स्वामी हैं (गुरु पितु मातु न जानउ काहू...)।
और ये हनुमानजी पहली मुलाकात में ही इनके बराबर भी नहीं बल्कि दुगुने प्रिय हो गए!!!
"दूना"- अर्थात श्रीराम जी प्रेम को तौल रहे हैं और भैया तौला तो उसी को जाता है जिसके मुल्य का आकलन करना हो।
किन्तु... प्रेम न हाट बिकाय"
और मेरे विचार से लक्ष्मण जी और हनुमानजी में किसी को बड़ा या छोटा कहना अपराध ही होगा... को बड़ छोट कहत अपराधू...।
अतः इस प्रश्न के समाधान के लिए इसके पूर्व के दृश्य पर ध्यान देना उचित है।
जब श्रीराम जी हनुमानजी से अपना चरित गाकर सुनाए..."आपन चरित कहा मैं गाई"
और पुनः कहते हैं....
कहहु विप्र निज कथा "बुझाई"।
भाव- आप "सांगोपांग इति विप्रत्वम्" अर्थात शास्त्रज्ञ, परम विद्वान हैं अतः आप अपनी कथा को सरल भाषा में (बुझाई) समझा कर कहने की कृपा करें। बस श्रीराम मुख से यह सुनते ही हनुमानजी को अपनी गलती का आभास हो गया और वे श्रीराम चरण कमलों पर गिर पड़े। और अब वे स्वयं के दोषों को देखने लगे...
एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान-
प्रभु! "एकु मैं मंद" - संसार में मुझसे बड़ा मंद बुद्धि का कोई नहीं है।
मुझसे बड़ा मोह जाल में फंसा हुआ कोई नहीं है।
मुझसे बड़ा कुटिल हृदय वाला कोई नहीं है।
मुझसे बड़ा अज्ञानी कोई नहीं है क्योंकि आज परमात्मा मेरे सन्मुख खड़े हैं और मैं उनसे परिचय पूछ रहा हूं।
हाय! मैं कितना महामूर्ख हूं जो अपने स्वामी को नहीं पहचान सका। हनुमानजी व्याकुल होकर श्रीराम जी के चरण कमलों पर गिर पड़े...अस कहि परेउ चरन अकुलाई।
हनुमानजी एक अबोध बालक की भांति रो रहे हैं तो श्रीराम जी का भी चूंकि वे जगत पिता हैं अतः एक पिता की भांति ही संतुष्ट करने का प्रयास करते हैं...
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना..
सुनु कपि - यहां कपि शब्द शीघ्रता का परिचायक है अर्थात श्रीराम जी हनुमानजी से कहते हैं कि- हे हनुमान! मैंने यों ही पूछा और तुम इतनी जल्दी ये निर्णय कर लिया कि मैं तुम्हें भूल गया हूं?
"ऊना"- हे हनुमान! तुम्हें मेरे वचनों को अन्यथा नहीं लेना चाहिए था।
अरे भाई! तुम तो मुझे लक्ष्मण से भी दुगुना प्रिय हो।
श्रीराम जी द्वारा "दूना" शब्द का प्रयोग करना कि हनुमानजी अब प्रसन्न हो गए और आगे के श्रीराम चरित में सहयोगी बन गए।
अतः "दूना" कहना चाहे यहां श्रीराम जी या,
अशोक वाटिका में हनुमानजी द्वारा,
सुनु "कपि" जियँ मानसि जनि ऊना...,
सुनि"कपि" बचन भरोष तब भयऊ...।
"कपि" अर्थात इसका प्रभाव इति शीघ्रता से पड़ा।
अतः"दूना" कहने का यही उद्देश्य था कि वे शीघ्र प्रसन्न हो जाएं....

सीताराम जय सीताराम..... सीताराम जय सीताराम

03/06/2017

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