25/06/2025
. कर्म का फल
अंतिम सासों में चल रहे गिद्धराज जटायु ने कहा मुझे पता था कि मैं रावण से नहीं जीत सकता फिर भी मैं लड़ा, क्योंकि अगर मैं नहीं लड़ता तो आने वाली पीढियां मुझे कायर कहती। जब रावण ने जटायू के दोनों पंख काट डाले तब उसकी मृत्यु निकट आई।
तो गिद्धराज ने मृत्यू को ललकारा और कहा कि
ऐ मृत्यु आगे मत बढ़, तुझे मैं स्वीकार करूँगा लेकिन अभी नहीं पहले मुझे माता सीता की हकीकत भगवान श्रीराम को बतानी है उसके बाद तुझे स्वीकार करूँगा। मौत उसे छू भी पा रही खड़ी होकर कांप रही है वहीं पर खड़ी है गिद्धराज जटायु को इच्छा मृत्यू का वरदान मिला।
दूसरी तरफ भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे हुए हैं मृत्यू की प्रतीक्षा कर रहे हैं रो रहे हैं पश्चाताप कर रहे हैं। एक तरफ गिद्धराज मृत्यु की शय्या पर हैं और हंस रहे हैं और भगवान राम रो रहे हैं, दूसरी तरफ भीष्म पितामह मृत्यु की शय्या पर हैं रो रहे हैं और भगवान कृष्ण हंस रहे हैं।
ऐसा क्यों, इतना अंतर क्यों
ऐसा इसीलिए कि गिद्धराज जटायु ने सच्चाई के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी सच्चाई के लिए लड़े उन्हें पता था नहीं जीत सकता फिर भी रावण का विरोध किया सच्चाई के लिए आवाज उठाई।
भीष्म पितामह जब भरे दरबार में द्रोपदी जी आत्म रक्षा के लिए रो रही थी, बिलख रही थी चिल्ला रही थी तो भीष्म पितामह उसी दरबार में बैठे रहे गलत का विरोध नहीं किया उनमे दम होने के बावजूद दुःशासन को ललकारते, दुर्योधन को ललकारते परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया चुप होकर सब कुछ देखते रहे सच्चाई का साथ नहीं दिया।
इसका परिणाम यह निकला कि गिद्धराज ने असमर्थ होते हुए भी औरों के लिए संघर्ष किया सच्चाई का साथ दिया इसीलिए उन्हें मृत्यु के समय भगवान की गोद मिली। भीष्म पितामह ने समर्थ होते हुए सच्चाई का साथ नहीं दिया इसलिए उन्हें मृत्यु के समय बाणों की शय्या मिली।
निष्कर्ष:- जो लोग दूसरों के साथ गलत होते देख अपनी आंखें बंद कर लेते हैं उनकी गति भीष्म जैसे होती है। जो लोग परिणाम जानते हुए भी औरों के लिए संघर्ष करते हैं उनका जटायु जैसाकीर्तिमान होता है।
वर्तमान में भी हम बहुत देखते हैं कि कुछ लोग चारपाई पर महीनों तक बिलखते रहते हैं तड़पते रहते हैं और मृत्यु की प्रतीक्षा करते हैं तो कुछ लोगों को लेने परमात्मा आते हैं एक दम से ले जाते