Adv. Vinod Kumar Patwa

Adv. Vinod Kumar Patwa विनोद कुमार पटवा एडवोकेट शिवपुर बाजार (बौण्डी) थाना खैरीघाट परगना व तहसील नानपारा जिला बहराइच। Legal profession
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22/02/2026

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18/01/2026

*आत्मा को खोजो*

मनुष्य जीवन भर बाहर की दुनिया को गिनता-परखता रहता है—सुख, दुःख, संबंध, धन और उपलब्धियाँ। पर इस गिनती में वह स्वयं को ही भूल जाता है। प्रस्तुत कहानी उसी विस्मृति की ओर संकेत करती है, जहाँ सब कुछ होते हुए भी भीतर एक अभाव बना रहता है। *“आत्मा को खोजो”* हमें यह समझाती है कि वास्तविक कमी बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर आत्मा की उपेक्षा में छिपी है।

बारह यात्री एक नगर से दूसरे नगर की ओर जा रहे थे। चलते-चलते उनके सामने एक गहरी नदी आ गई। न कोई पुल था, न नाव। पार जाना आवश्यक था, पर उपाय सूझ नहीं रहा था।
तभी उनमें से एक सयाने व्यक्ति ने कहा,
“घबराओ मत। सब एक-दूसरे का हाथ थाम लो। मिलकर चलेंगे, तो नदी पार हो जाएगी।”
सभी ने एक-दूसरे का हाथ मजबूती से पकड़ लिया और सावधानीपूर्वक नदी पार कर ली। दूसरे किनारे पहुँचकर स्याना बोला,
“अब गिनती कर लो, कहीं कोई साथी नदी में तो नहीं रह गया?”
एक ने कहा,
“तू ही सबसे बुद्धिमान है, तू ही गिन।”
स्याना गिनने लगा—
“एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह…”
वह स्वयं को गिनना भूल गया। घबराकर बोला,
“अरे! हम तो ग्यारह ही हैं। एक साथी कहाँ गया?”
दूसरे ने गिनती की, उसने भी स्वयं को छोड़ दिया। फिर तीसरे, चौथे—सबने गिना, पर हर बार संख्या ग्यारह ही निकली। सब रोने-बिलखने लगे कि एक साथी खो गया है।
तभी वहाँ से एक राहगीर गुज़रा। उसने उनके दुःख का कारण पूछा।
स्याने ने सारी कथा सुना दी।
राहगीर ने उन्हें ध्यान से देखा और मन-ही-मन गिन लिया—वे पूरे बारह थे।
वह मुस्कराकर बोला,
“अगर मैं तुम्हारा बारहवाँ साथी खोज दूँ, तो?”
वे बोले,
“तो हम तुम्हें भगवान मान लेंगे।”
राहगीर ने कहा,
“सब ज़मीन पर बैठ जाओ। मैं एक-एक को हल्की चपत मारूँगा। जिसे चपत लगे, वह क्रम से गिनता जाए।”
जैसे-जैसे चपत पड़ती गई, गिनती होती गई—
एक… दो… तीन… और देखते-देखते बारह पूरे हो गए।
सब खुशी से चिल्ला उठे—
“आप तो सचमुच भगवान हैं!”
हमें इन यात्रियों पर हँसी आती है,
पर सच्चाई यह है कि हम स्वयं भी यही भूल दोहराते हैं।
हम अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों—
(आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा)
और पाँच कर्मेन्द्रियों—
(हाथ, पैर, वाणी, उपस्थ, गुदा)
को तो पहचानते हैं।
ग्यारहवें मन को भी मान लेते हैं,
पर बारहवीं आत्मा को भूल जाते हैं।
हम इन्द्रियों और मन की तृप्ति में उलझे रहते हैं, दुनिया-भर के बखेड़े करते हैं,
पर आत्मा के लिए कुछ नहीं करते।
इसी गिनती की भूल में मनुष्य दुःखी और अशान्त बना रहता है।
> सीख :- जो व्यक्ति इन्द्रियों और मन से ऊपर उठकर अपनी आत्मा को पहचान लेता है, वही सच्चे अर्थों में पूर्ण होता है। बाहरी संसार की गिनती छोड़कर जब हम भीतर झाँकते हैं, तभी जीवन में शांति, संतुलन और वास्तविक सुख का अनुभव होता है।
> आत्मा को भूलना ही सबसे बड़ी कमी है, और उसे पहचान लेना सबसे बड़ी उपलब्धि🙏🙏🙏।

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