24/11/2025
🔪कौन थे रंगा-बिल्ला
1. पृष्ठभूमि और अपराधी
कुलजीत सिंह (रंगा खुस): रंगा मुख्य रूप से दिल्ली का रहने वाला था। वह पहले से ही चोरी, लूटपाट और छोटे-मोटे अपराधों में शामिल था। उसका नाम 'खुस' इसलिए पड़ा क्योंकि वह 'असामाजिक' था।
जसबीर सिंह (बिल्ला): बिल्ला पंजाब से था और वह भी एक आवारा और अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति था।
अपराध की तैयारी: ये दोनों 1978 के मध्य में मिले और पैसे कमाने के लिए बड़े अपराध की योजना बनाने लगे। उन्होंने एक कार चुराई और उसका इस्तेमाल डकैती और किडनैपिंग की वारदातों के लिए करने लगे।
2. जघन्य अपराध: गीता और संजय चोपड़ा का अपहरण और हत्या (26 अगस्त 1978)
पीड़ित:
गीता चोपड़ा (16 वर्ष): दिल्ली के नौसेना अधिकारी कैप्टन एम.एम. चोपड़ा की बेटी।
संजय चोपड़ा (14 वर्ष): गीता का छोटा भाई।
अपहरण: 26 अगस्त 1978 की शाम को, गीता और संजय दिल्ली कैंट के पास 'सेना भवन' के लिए एक बस का इंतजार कर रहे थे। रंगा और बिल्ला ने अपनी चुराई हुई फिएट कार से उन्हें लिफ्ट देने की पेशकश की। बच्चों ने इसे स्वीकार कर लिया।
हत्या का कारण: कार में बैठने के बाद, रंगा और बिल्ला ने उन्हें बंधक बनाने की कोशिश की। ऐसा माना जाता है कि बच्चों ने विरोध किया, जिसके कारण अपराधियों ने पकड़े जाने के डर से उन्हें मार डालने का फैसला कर लिया।
वारदात: रंगा और बिल्ला उन्हें दिल्ली के एक सुनसान इलाके, रिज क्षेत्र, में ले गए। वहाँ गीता के साथ बलात्कार किया गया और फिर दोनों बच्चों की निर्ममता से हत्या कर दी गई। संजय को उसकी बेल्ट से गला घोंटकर मारा गया, जबकि गीता को भी गला घोंटकर मारा गया था।
3. जांच, राष्ट्रव्यापी आक्रोश और गिरफ्तारी
शवों की खोज: 28 अगस्त 1978 को बच्चों के क्षत-विक्षत शव मिले।
जन आक्रोश: चूंकि पीड़ित एक नौसेना अधिकारी के बच्चे थे और अपराध की क्रूरता अभूतपूर्व थी, इसलिए इस घटना ने पूरे देश में क्रोध की लहर पैदा कर दी। संसद में हंगामा हुआ और दिल्ली पुलिस पर दबाव बढ़ गया।
अपराधियों की पहचान: पुलिस को रंगा और बिल्ला के बारे में सुराग मिला, जो पहले से ही कुछ अन्य छोटी-मोटी वारदातों में वांछित थे।
गिरफ्तारी: पुलिस से बचने के लिए दोनों ट्रेन से भाग रहे थे। उन्हें मथुरा रेलवे स्टेशन के पास गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार होने के समय भी वे एक और यात्री के साथ दुर्व्यवहार कर रहे थे।
4. कानूनी प्रक्रिया और सज़ा
मुकदमा: यह मामला निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चला।
दोषसिद्धि: सबूतों और गवाहों के आधार पर, कोर्ट ने दोनों को अपहरण, बलात्कार (रेप) और हत्या का दोषी पाया।
सज़ा: यह मामला भारत में 'दुर्लभ में दुर्लभतम' (Rarest of Rare) मामलों की श्रेणी में रखा गया, जिसके चलते दोनों को मौत की सज़ा (फांसी) सुनाई गई। तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने भी उनकी दया याचिका (Mercy Petition) को खारिज कर दिया।
फांसी: 31 जनवरी 1982 को, रंगा और बिल्ला को तिहाड़ जेल, दिल्ली में फांसी दी गई।
Adv Amrit Solanki