12/06/2026
तोड़ के पुश्तों को नदिया की रवानी निकली
नासमझ समझे थे वो सबसे सयानी निकली
अबू ताहिर हो या ख़लील हो या यूसुफ़ सा
गया जो वक़्त तो हरकी मुसलमानी निकली
कल तक दीदी के दीदों पे क़सम खाते थे सब
आज जून की आँखों से ज़बानी निकली
जोड़ा फूल जो टूटा तो राज़ फ़ाश हो गया
हमारे निशान से औरों की निशानी निकली
बाग़ मितली से आजिज़ काकुली बेकरार है
जो चीज़ दहन से निगली वो ग़रानी निकली
किसको अपना कहें दर्द भी बांटें किससे
नई मुहब्बत में भी आदत वो पुरानी निकली
एक ख़ामोश कह के सबको चुप करा देता था
उसकी चुप्पी से नई एक कहानी निकली
कौन कहाँ से निकल जाए किधर से निकले
मामा दरवाज़े से तो खिड़की से मुमानी निकली
वलायती दूर की कौड़ी रही वली साहब
गुल-ए-महुआ के भरोसे पे जवानी निकली
ये जो अप लाइन है डाउन भी वही है ताऊ
शताब्दी आई और देखो राजधानी निकली