The Legal Voice

The Legal Voice My goal is to protect your rights and find effective solutions.

My name is Vijay Shankar Mishra, and I am a practicing lawyer with over 15 years of experience in the legal field. My core expertise lies in criminal law, where I have successfully represented clients in complex and high-stakes cases. Over the years, I have also gained substantial exposure to civil litigation, family disputes, corporate matters, and property-related cases, allowing me to provide c

omprehensive legal counsel across multiple domains. Known for my analytical approach, persuasive advocacy, and commitment to justice, I focus on delivering practical solutions tailored to each client’s unique situation. My goal is to uphold integrity in every case while ensuring fair representation and favorable outcomes.

26/07/2026

🚨 क्या पुलिस आपकी शिकायत लेने से मना कर सकती है? जानिए कानून क्या कहता है।
अक्सर लोग शिकायत लेकर थाने जाते हैं, लेकिन उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता है कि "यह मामला हमारे थाने का नहीं है" या "यह सिविल मामला है"।
महत्वपूर्ण बात: यदि मामला संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) से संबंधित है, तो कानून के अनुसार पुलिस को शिकायत पर उचित कार्रवाई करनी होती है। यदि शिकायत दर्ज नहीं की जाती, तो कानून में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों या सक्षम न्यायालय के समक्ष जाने जैसे वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं।
⚖️ याद रखें: ✔️ अपनी शिकायत हमेशा लिखित में दें। ✔️ शिकायत की प्राप्ति का प्रमाण सुरक्षित रखें। ✔️ सभी दस्तावेज़ और साक्ष्य संभालकर रखें। ✔️ बिना पूरी कानूनी जानकारी के किसी के बहकावे में न आएँ।
📚 कानून की जानकारी ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है।
क्या कभी आपकी शिकायत दर्ज करने से मना किया गया है? अपना अनुभव कमेंट में लिखिए।
👍 ऐसी महत्वपूर्ण और विश्वसनीय कानूनी जानकारी के लिए हमारा page Follow करें और इस पोस्ट को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

08/04/2026

कोई भी #दरोगा नया-नया जब किसी चौकी पर आता है तो सबसे पहले अपने क्षेत्र का भ्रमण करता है भ्रमण करने के साथ-साथ सबसे पहले वह क्षेत्र के #प्रतिष्ठित_होटल का निरीक्षण करता है यह निरीक्षण कानून व्यवस्था का पार्ट नहीं होता है ये निरिक्षण इसलिए होता है ताकि होटल वाले को यह बताया जा सके की बेटा अब मैं आ गया हूं और जब मेरे यहां से फोन आए तो चुपचाप आज्ञा का अनुपालन हो जाना चाहिए और इस आज्ञा अनुपालन का सबसे आधारभूत शब्द है छापा मारना
दरोगा जी दो सिपाहियों के साथ होटल में धड़ धडाते हुए घुस आए और तुरंत रजिस्टर लाओ कौन-कौन कमरे में कौन-कौन है ब्ला ब्ला करके उन्होंने अपना भौकाल दिखाया . स्वरूप दरोगा जी #प्रकट_होने_के_मूल_आधार यानी छापे पर चर्चा करते हैं

सीधी भाषा में समझिए—पुलिस को छापा मारने का अधिकार है, लेकिन “जैसे मन किया वैसे” नहीं।

1. छापा मारने का कानूनी आधार क्या है
मुख्य रूप से Criminal Procedure Code, 1973 (CrPC) के तहत powers मिलती हैं:

CrPC 93 (Search वारंट ) → BNSS 96
CrPC 165 (Urgent Search बिना वारंट) → BNSS 185
CrPC 100 (Search Procedure) → BNSS 103
CrPC 102 (Seizure) → BNSS 106

2. सही प्रोसीजर क्या होना चाहिए (A) सामान्य स्थिति: वारंट के साथ छापा मजिस्ट्रेट द्वारा Search Warrant जारी होना चाहिए वारंट में साफ लिखा हो: जगह (दुकान/होटल/घर)
क्या ढूंढना है पुलिस को वारंट दिखाना जरूरी है
बिना वारंट के अगर छापा है, तो पुलिस को justify करना पड़ेगा कि “urgent” क्यों था

(B) बिना वारंट के छापा (Urgent Case)

धारा 165 CrPC के तहत: पुलिस को लिखित में कारण दर्ज करना होगा बताना होगा कि वारंट लेने में देर से सबूत नष्ट हो सकते थे बाद में Magistrate को इसकी सूचना देना अनिवार्य है “सिर्फ शक था” — यह पर्याप्त कारण नहीं है

(C) तलाशी के समय जरूरी बातें

धारा 100 CrPC के अनुसार:
2 स्वतंत्र गवाह (local respectable persons) होने चाहिए,तलाशी से पहले पुलिस खुद की तलाशी देने को तैयार हो,महिलाओं की तलाशी महिला पुलिस द्वारा
पूरी सर्च की Panchnama/Seizure Memo बननी चाहिए
जिसकी जगह पर छापा पड़ा, उसे उसकी कॉपी दी जाए

(D) समय और तरीका
रात में छापा (private place) → विशेष कारण होना चाहिए
बिना जरूरत “force” या तोड़फोड़ नहीं intimidation (डराना-धमकाना) नहीं होना चाहिए

पुलिस द्वारा मारा गया हर छापा अवैध है अगर वह इन चार बातों को #जस्टिफाई नहीं करता है और उसे स्थिति में यह छापे अवैध हो जाएंगे और पुलिस को हाई कोर्ट के अंदर दायर होने वाली याचिका में जवाब देना भारी पड़ जाएगा

ऐसे अवैध छापे पर पुलिस पर क्या कार्रवाई हो सकती है
अगर छापा गलत तरीके से हुआ है, तो पुलिस खुद फँस सकती है:

Indian Penal Code की धाराएं:

IPC 166 → BNS 198 कानून का उल्लंघन
IPC 220 → BNS 248 गलत तरीके से हिरासत
IPC 342 → BNS 127 अवैध बंदी

Departmental inquiry बोनस में
Compensation (constitutional remedy)

5. सुप्रीम कोर्ट का डंडा अभी बाकी है क्योंकि Supreme Court of India बार-बार कह चुका है: Search और seizure “procedure established by law” के अनुसार होना चाहिए Arbitrary action = fundamental rights का violation (Article 21)

आजकल कुछ जगह “छापा” ऐसा मारा जाता है जैसे “चलो आज कुछ action करते हैं…”

पहले पुलिस आती है
फिर कारण ढूंढती है
और अंत में कागज़ बनते हैं

जबकि कानून कहता है—
पहले कारण, फिर कागज़, फिर कार्रवाई।

छापा पुलिस का अधिकार है, लेकिन यह “unlimited power” नहीं है। हर कदम कानून से बंधा हुआ है।

अगर प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ,
तो वही छापा अदालत में टिकता नहीं—
और कभी-कभी पुलिस के खिलाफ केस बन जाता है।

लेकिन किताबों में पढ़कर, पोस्टों में समझकर और बहसों में जीतकर खुद को मजबूत समझ लेना आसान है…
लेकिन असली मजबूती तब आती है, जब आप सिस्टम से टकराने की हिम्मत रखते हों।

वरना सच्चाई तो यह है कि अधिवक्ता की ताकत उसके तर्क नहीं, उसका क्लाइंट होता है…
और जब क्लाइंट ही अंदर से कमजोर निकले, तो फिर कानून की मोटी-मोटी किताबें भी चुपचाप तमाशा देखती रह जाती हैं।

ज्ञान कितना भी हो…
अगर हिम्मत उधार की है, तो लड़ाई पहले ही हार चुके होते हैं।

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