02/06/2026
‼ श्री पुरुषोत्तम मास माहात्म्य (अध्याय १०) ‼
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नारद जी बोले, "हे तपोनिधे! परम क्रोधी दुर्वासा मुनि ने विचार करके उस कन्या को क्या उपदेश दिया? वह सब आप कृपा करके मुझसे कहिए।"
सूत जी बोले, "हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों! नारद जी के वचन सुनकर, समस्त प्राणियों का हित करने वाले बदरीनारायण भगवान्, दुर्वासा ऋषि के उन गोपनीय वचनों को कहने लगे।"
श्रीनारायण बोले, "हे नारद! मेधावी ऋषि की कन्या के दुःख को दूर करने के लिए दुर्वासा ऋषि ने जो कुछ भी कहा, उसे आप ध्यानपूर्वक सुनिए।"
दुर्वासा ऋषि बोले, "हे पुत्री! मैं आपसे अत्यंत गोपनीय उपाय कहता हूँ। यह विषय किसी अन्य से कहने योग्य नहीं है, तथापि आपके कल्याण के लिए मैंने इस पर विचार किया है। मैं बहुत विस्तारपूर्वक न कहकर आपसे संक्षेप में कहता हूँ।
हे सुभगे! इस मास से जो तीसरा मास आएगा, वह 'पुरुषोत्तम मास' है। इस मास में पवित्र तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य भ्रूणहत्या जैसे महापाप से भी मुक्त हो जाता है।
हे कल्याणी! कार्तिक आदि बारह महीनों में इस पुरुषोत्तम मास के समान कोई दूसरा मास नहीं है। जितने भी मास, पक्ष और पर्व हैं, वे सब पुरुषोत्तम मास की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं। वेदोक्त साधन और परमपद की प्राप्ति कराने वाले जितने भी मार्ग हैं, वे भी इस मास के सोलहवें अंश के तुल्य नहीं हैं।
बारह हजार वर्षों तक निरंतर गंगा स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है और सिंहस्थ गुरु के समय गोदावरी नदी में एक बार स्नान करने से जो पुण्य मिलता है, हे कल्याणी! वही फल पुरुषोत्तम मास में किसी भी सामान्य तीर्थ पर केवल एक बार निष्ठापूर्वक स्नान करने मात्र से सहज ही मिल जाता है।
हे बाले! यह मास भगवान् श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है और अपने नाम के कारण ही यह साक्षात् भगवान् का स्मरण कराने वाला है। इस मास में भगवान् पुरुषोत्तम की सेवा और पूजा करने से मनुष्य की समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं।
अतः आप शीघ्र ही इस पुरुषोत्तम मास का व्रत कीजिए। भगवान् पुरुषोत्तम को प्रसन्न करने के लिए पूर्व काल में मैंने स्वयं भी इस मास की विधिपूर्वक सेवा की है।
एक समय की बात है, मैंने अत्यंत क्रोध में आकर राजा अम्बरीष को भस्म करने के लिए 'कृत्या' (एक मारक शक्ति) उत्पन्न की थी। हे कल्याणी! तब भगवान् श्रीहरि ने सुदर्शन चक्र को मुझे ही भस्म करने के लिए तुरंत भेज दिया। उस समय इस पुरुषोत्तम मास के अद्भुत प्रभाव से ही वह चक्र शांत होकर लौट गया। हे पुत्री! तीनों लोकों को भस्म करने की सामर्थ्य रखने वाला वह चक्र जब मेरे पास आकर निष्फल लौट गया, तब मुझे बड़ा विस्मय हुआ। इसलिए हे सुभगे! आप श्रीपुरुषोत्तम मास का व्रत अवश्य कीजिए।" इस प्रकार उस मुनिकन्या को समझाकर दुर्वासा ऋषि शांत हुए।
श्रीकृष्ण जी बोले, "हे राजन्! दुर्वासा ऋषि के इन वचनों को सुनकर, अपने पूर्व कर्मों की प्रबलता और अज्ञानता के कारण, वह कन्या मूर्खतावश दुर्वासा जी से इस प्रकार कहने लगी।"
वह कन्या बोली, "हे ब्रह्मन्! हे मुने! आपने जो कुछ कहा, वह मुझे प्रिय नहीं लग रहा है। माघ आदि मास भला फल देने वाले कैसे नहीं हैं? कार्तिक मास श्रेष्ठ क्यों नहीं है? आप ऐसा कैसे कह सकते हैं, कृपा करके मुझे समझाइए। क्या विधिपूर्वक सेवित वैशाख मास इच्छित कामनाओं को नहीं देता? क्या देवाधिदेव महादेव आदि समस्त देवता सेवा करने पर मनोवांछित फल नहीं देते? अथवा इस पृथ्वी पर प्रत्यक्ष देवता सूर्यदेव और जगत् की माता भगवती दुर्गा क्या सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली नहीं हैं? क्या श्रीगणेश जी सेवा पाकर इच्छित वर प्रदान नहीं करते?
आप इन सभी पवित्र योगों और शिव आदि परम देवताओं की अवहेलना करके इस पुरुषोत्तम मास की इतनी प्रशंसा कर रहे हैं, क्या आपको संकोच नहीं होता? यह मास तो अत्यंत मलीन (मलमास) और सभी शुभ कार्यों में निंदित माना गया है। हे मुने! इस सूर्य की संक्रांति से रहित मास को आप भला सर्वश्रेष्ठ कैसे कह सकते हैं? मैं तो समस्त दुःखों से मुक्ति दिलाने वाले परमेश्वर श्रीहरि को ही जानती हूँ। हे देव! दिन-रात श्रीहरि का चिंतन करती हुई मैं जानकीनाथ भगवान् श्रीराम और पार्वतीपति भगवान् शिव के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं देखती। हे विपेन्द्र! संसार में ऐसा कोई दूसरा देवता नहीं है जो मेरे इस गहन दुःख को दूर कर सके।
अतः हे मुने! इन समस्त प्रत्यक्ष फलदाताओं को छोड़कर आप किस प्रकार इस मलमास की इतनी स्तुति कर रहे हैं?"
इस प्रकार उस ब्राह्मण कन्या के कटु वचनों को सुनकर दुर्वासा मुनि का शरीर क्रोध से प्रज्वलित हो उठा और उनके नेत्र लाल हो गए। परंतु अत्यंत क्रोध आने पर भी, अपने परम मित्र की कन्या होने के कारण उन्होंने उसे शाप नहीं दिया। वे मन ही मन सोचने लगे कि यह कन्या सर्वथा अज्ञानी है, यह अपने हित और अहित को नहीं जानती।
अभी इसकी बुद्धि परिपक्व नहीं हुई है। जिस पुरुषोत्तम मास के महात्म्य को बड़े-बड़े विद्वान भी पूर्णतः नहीं जानते, उसे अल्प बुद्धि वाले मनुष्य और विशेषकर कुमारियाँ भला कैसे समझ सकती हैं? यह कुमारी कन्या माता-पिता से हीन है और पहले से ही दुःखाग्नि में जल रही है; अतः यह मेरे अत्यंत उग्र शाप को सहन नहीं कर पाएगी। ऐसा विचार करके मुनि ने दयावश अपने भीतर उठे क्रोध को शांत किया और पूर्णतः स्वस्थ होकर उस अत्यंत व्याकुल कन्या से बोले।
दुर्वासा जी बोले, "हे मित्र की पुत्री! आपके प्रति मेरे मन में तनिक भी क्रोध नहीं है। हे भाग्यहीन कन्या! अब आपके मन में जैसा आए, आप वैसा ही कीजिए। हे बाले! मैं आपके भविष्य की कुछ बातें कहता हूँ, उन्हें ध्यान से सुनिए। आपने जो इस परम पवित्र पुरुषोत्तम मास का अनादर किया है, उसका कड़वा फल आपको अवश्य ही भोगना पड़ेगा—चाहे इस जन्म में मिले अथवा अगले जन्म में।
अब मैं यहाँ से नर-नारायण के पवित्र आश्रम की ओर प्रस्थान करूँगा। आपके पूज्य पिता मेरे परम मित्र थे, केवल इसी कारण मैंने आपको शाप नहीं दिया है। आप अभी बाल बुद्धि के कारण अपने शुभ-अशुभ और हित-अहित को नहीं समझ पा रही हैं। परंतु होनी को कोई टाल नहीं सकता, जो भाग्य में लिखा है वह अवश्य घटित होगा। अस्तु, हमारा बहुत समय यहाँ व्यतीत हो गया है, अब हम जाते हैं; आपका कल्याण हो।"
श्रीकृष्ण जी बोले, "हे राजन्! ऐसा कहकर महाक्रोधी दुर्वासा मुनि वहाँ से शीघ्र ही चले गए। दुर्वासा ऋषि के प्रस्थान करते ही, भगवान् पुरुषोत्तम की उपेक्षा करने के कारण वह कन्या कांतिहीन (तेजहीन) हो गई। इसके पश्चात् बहुत देर तक सोच-विचार करने के बाद उसने यह दृढ़ निश्चय किया कि अब मैं देवताओं के भी देव, तत्काल फल प्रदान करने वाले पार्वतीपति भगवान् शिव की तपस्या द्वारा आराधना करूँगी।
हे नृप! मेधावी ऋषि की कन्या ने मन में ऐसा संकल्प करके अपने आश्रम में ही रहकर भगवान् शंकर के निमित्त अत्यंत कठिन तपस्या आरंभ कर दी।"
सूत जी बोले, "इस प्रकार, अनंत फलों को प्रदान करने वाले लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु और सावित्रीपति ब्रह्मा जी को छोड़कर, तथा दुर्वासा ऋषि के परम हितकारी वचनों की अवहेलना करके, वह ऋषिकन्या अपने ही आश्रम में अंधकासुर का वध करने वाले भगवान् शिव की सेवा में लीन हो गई।"
II इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तम मास
माहात्म्ये दशमोऽध्यायः॥१०॥
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‼ श्री पुरुषोत्तम मास माहात्म्य (अध्याय ११) ‼
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नारद जी बोले — "हे महामुने! समस्त मुनियों के लिए भी जो अत्यंत कठिन और दुष्कर कर्म है, ऐसा महान तप उस ऋषि-कन्या ने किस प्रकार किया, वह वृत्तांत कृपा कर हमें सुनाइए।
श्री नारायण बोले — "तदनंतर, उस ऋषि-कन्या ने शांत, पंचमुख, सनातन भगवान शिव का हृदय में ध्यान करके अत्यंत दारुण तप आरंभ किया। सर्पों का आभूषण धारण करने वाले, देवगण तथा नन्दी-भृंगी आदि गणों से सेवित, चौबीस तत्वों और तीनों गुणों से युक्त, अष्ट महासिद्धियों तथा प्रकृति और पुरुष से सुशोभित, मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाले और जटाजूट से सुसज्जित भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए उस कन्या ने परम तप किया।
ग्रीष्म ऋतु के प्रचंड सूर्य की तपन में वह पंचाग्नि के मध्य बैठती थी। हेमंत और शिशिर ऋतुओं की कँपकँपाती शीत में वह शीतल जल के भीतर स्थित रहती थी, जहाँ जल से बाहर निकला उसका मुख, जल में खिले हुए कमल के समान सुशोभित होता था। सिर के नीचे फैली हुई उसकी काली और नीली अलकें (केश-राशि) जल में ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो कीचड़ की लता सेवारों (शैवाल) के समूह से घिरी हुई हो।
शीत के कारण नासिका से निकलने वाली श्वास की दिव्य धूम-राशि ऐसी दिखाई देती थी, मानो कमल का मकरंद पान करके भौरों की पंक्ति जा रही हो। वर्षाकाल में वह बिना किसी छत्र या छाया के, वेदी (चौतरे) पर शयन करती थी। वह सुंदर अंगों वाली कन्या प्रातः और सायंकाल केवल धुएँ का पान (धूमपान/वायु भक्षण) करके ही रहती थी। उस कन्या के इस प्रकार के कठोर तप को देखकर देवराज इंद्र अत्यंत चिंतित हो गए।
सभी देवताओं के लिए अजेय और ऋषियों के लिए भी स्पृहणीय (प्रेरणादायक) उस ऋषि-कन्या को तप में लीन रहते हुए नौ हजार वर्ष व्यतीत हो गए। हे नृपनन्दन! हे क्षत्रिय भूषण! उस बाला के इस घोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे अपना इन्द्रियातीत (दिव्य) स्वरूप दिखलाया।
भगवान शंकर के दर्शन पाकर, उस कन्या के निष्प्राण शरीर में जैसे पुनः प्राणों का संचार हो गया हो, वह सहसा उठकर खड़ी हो गई। तपस्या के कारण अत्यंत दुर्बल होने पर भी, भगवान की कृपा-दृष्टि पड़ते ही वह बाला तत्काल हृष्ट-पुष्ट और कांतियुक्त हो गई। अत्यधिक वायु और धूप के कष्टों को सहन करने वाली वह कन्या भगवान शिव को अत्यंत प्रिय लगी। उस कन्या ने परम आदरपूर्वक पार्वतीपति श्री शंकर जी के चरणों में दंडवत प्रणाम किया। तत्पश्चात, विश्व-वंदित भगवान का मानसिक उपचारों से विधिपूर्वक पूजन कर, भक्ति भाव से युक्त चित्त से जगत के स्वामी की स्तुति करने लगी।
कन्या बोली — "हे पार्वती-प्रिय! हे प्राणनाथ! हे प्रभो! हे भर्ग! हे भूतेश! हे गौरीश! हे शम्भो! हे सूर्य, चंद्रमा और अग्नि रूपी नेत्रों वाले महादेव! हे अज्ञान-तिमिर का नाश करने वाले! हे मेरे एकमात्र आधार! मुंडमालधारी शिव! आपको मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है।
अनेक कष्टों और संतापों से जिसके अंग-अंग में पीड़ा व्याप्त है तथा जो इस अत्यंत घोर संसार रूपी समुद्र में डूबा हुआ है, एवं दुष्ट सर्प रूपी काल के तीक्ष्ण दांतों से डँसा हुआ है—ऐसा मनुष्य भी यदि आपकी शरण में आ जाए, तो वह सब बंधनों से मुक्त हो जाता है।
हे विभो! जिन्होंने बाणासुर को अपना आश्रय प्रदान किया और राजा अलर्क की मृत पत्नी को पुनः जीवित कर दिया, ऐसे आप दया के सागर हैं। हे दयानाथ! हे भूतेश! हे चंडीश! हे भव्य! हे भवत्राण (संसार से रक्षा करने वाले)! हे मृत्युंजय! हे दक्ष-प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस करने वाले! हे समस्त शत्रुओं के विनाशक! हे भक्तों को सदैव भवसागर से पार उतारने वाले! हे जन्म-मरण के बंधनों को हरने वाले और सृष्टि के आदि-कर्ता! हे पाप-नाशक प्राणनाथ! आपको बारंबार नमस्कार है। मुझ दासी की रक्षा कीजिए।
हे राजन्! परम भाग्यवती और मेधावी ऋषि की वह तपस्विनी कन्या इस प्रकार मन और वाणी से भगवान शंकर की दिव्य स्तुति करके मौन हो गई।
श्री कृष्ण बोले — "कन्या द्वारा की गई इस स्तुति को सुनकर और उसकी उग्र तपस्या से अत्यंत प्रसन्न होकर, मंद मुस्कान युक्त मुखकमल वाले भगवान सदाशिव उस कन्या से बोले
—'हे तपस्विनी! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मन में जो भी अभिलाषा हो, वह वरदान तुम मुझसे मांग लो। हे महाभागे! मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ, अब तुम किसी प्रकार का खेद मत करो।'
भगवान शंकर के ऐसे करुणामयी वचन सुनकर वह कुमारी अत्यंत आनंदित हुई और प्रसन्नमुख सदाशिव से विनम्र वाणी में बोली।
कन्या बोली — "हे दीनानाथ! हे दयासिंधु! यदि आप मेरे ऊपर सचमुच प्रसन्न हैं, तो हे प्रभो! मेरी मनोकामना पूर्ण करने में तनिक भी विलंब न करें। हे महादेव! मुझे पति प्रदान कीजिए, मुझे पति प्रदान कीजिए, मुझे पति प्रदान कीजिए। मैं केवल श्रेष्ठ पति की कामना करती हूँ, मुझे पति दीजिए। मेरे हृदय में इसके अतिरिक्त अन्य कोई विचार नहीं है।"
वह ऋषि-कन्या भगवान महादेव से इस प्रकार कहकर शांत हो गई। उसकी बात सुनकर महादेव जी उससे बोले।
शिव जी बोले — "हे मुनिकन्या! तुमने अपने मुख से जैसा अनुनय किया है, वैसा ही होगा। चूंकि तुमने मुझसे पाँच बार 'पति दीजिए' कहकर प्रार्थना की है, इसलिए हे सुंदरी! अगले जन्म में तुम्हारे पाँच पति होंगे। वे पाँचों ही परम वीर, सर्वधर्म ज्ञाता, सज्जन, सत्य-पराक्रमी, महायज्ञ करने वाले, अपने उत्तम गुणों के लिए संसार में विख्यात, जितेंद्रिय और सदैव तुम्हारा आदर करने वाले होंगे। वे सभी श्रेष्ठ क्षत्रिय और गुणवान होंगे।"
श्री कृष्ण बोले — "भगवान महादेव के इस वचनामृत को सुनकर, जो न तो पूर्णतः प्रिय लग रहा था और न ही अप्रिय, वह वाक-चतुर कन्या पुनः विनम्न होकर भगवान से बोली।
बाला बोली — "हे गिरिजाकांत! हे सदाशिव! इस चराचर संसार में एक स्त्री का केवल एक ही पति होता है। अतः मुझे पाँच पतियों का वरदान देकर लोक में मेरी उपहास (हँसी) का कारण मत बनाइए। संसार में कभी किसी एक स्त्री के पाँच पति न तो देखे गए हैं और न ही सुने गए हैं। हाँ, यह अवश्य संभव है कि एक पुरुष की पाँच पत्नियाँ हों।
हे शम्भो! हे कृपानिधे! आपकी सेविका होते हुए मैं पाँच पतियों वाली स्त्री कैसे कहला सकती हूँ? आपका मेरे लिए ऐसा विधान करना सर्वथा उचित प्रतीत नहीं होता। आपकी सेविका होने के नाते, इस स्थिति से मुझे जो लज्जा आ रही है, उसे आप अपने ही सम्मान की हानि समझिए।"
कन्या के इन तार्किक वचनों को सुनकर भगवान शंकर पुनः उससे बोले।
शंकर जी बोले — "हे भीरु! तुम्हें इस वर्तमान जन्म में पति-सुख प्राप्त नहीं होगा। अपने अगले जन्म में, जब तुम अपने तपोबल से बिना योनि के (अयोनिजा रूप में) उत्पन्न होगी, तब तुम इस पति-सुख को भोगकर अंत में परम पद (मोक्ष) को प्राप्त करोगी। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि तुमने पूर्व में मेरी ही प्रिय मूर्ति, महर्षि दुर्वासा का अपमान किया था।
हे सुभ्रु! वे महर्षि दुर्वासा यदि क्रोधित हो जाएं तो तीनों भुवनों को भस्म करने की सामर्थ्य रखते हैं, किंतु तुमने अपने अहंकार वश उनके ब्रह्मतेज का अनादर किया। इसके अतिरिक्त, जिस अधिमास (मलमास) को स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने अपना सर्वस्व ऐश्वर्य प्रदान किया है, तुमने उस भगवान के परम प्रिय 'पुरुषोत्तम मास' का व्रत भी नहीं किया।
मैं, ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा नारद आदि सभी महर्षि जिनकी आज्ञा का सदैव शिरोधार्य करके पालन करते हैं, हे बाले! उनकी आज्ञा का उल्लंघन करने का दुस्साहस कौन कर सकता है? लोक-पूजित पुरुषोत्तम मास की, महर्षि दुर्वासा की आज्ञा होने पर भी तुमने पूजा नहीं की। हे मूढ़ द्विजात्मजे (ब्राह्मण कन्या)! इसी अपराध के फलस्वरूप तुम्हें अगले जन्म में पाँच पति प्राप्त होंगे।
हे बाले! भगवान पुरुषोत्तम का अनादर करने के कारण अब यह विधान बदला नहीं जा सकता। जो मनुष्य उस पुरुषोत्तम मास की निंदा या उपेक्षा करता है, वह रौरव नरक का भागी होता है। पुरुषोत्तम देव का अपमान करने वाले को सर्वथा विपरीत और कष्टकारी फल ही भोग पड़ता है, यह अकाट्य सत्य है। इसके विपरीत, जो पुरुषोत्तम मास के अनन्य भक्त हैं, वे पुत्र, पौत्र, धन-धान्य से समृद्ध होते हैं और इस लोक के समस्त सुख भोगकर परलोक में भी परम सिद्धि को प्राप्त करते हैं। स्वयं हम सभी देवता भी भगवान पुरुषोत्तम की निरंतर सेवा करते हैं।
जिस पुरुषोत्तम मास में थोड़े से ही व्रत-नियमों से भगवान पुरुषोत्तम शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं, उस परम फलदायी मास का हे सुमध्यमे! हम भला भजन क्यों न करें? उचित और अनुचित का सूक्ष्म विचार करने वाले और संपूर्ण जगत के लिए अनुकरणीय जो परम तपस्वी मुनि जन हैं, उनके मुख से निकले वचन भला कैसे मिथ्या हो सकते हैं?"
इस प्रकार उस कन्या को समझाते हुए भगवान नीलकंठ तत्क्षण वहीं अंतर्ध्यान हो गए। भगवान के ओझल होने पर वह बाला अपने यूथ (झुंड) से बिछड़ी हुई किसी हिरणी के समान चकित और व्याकुल हो गई।
सूत जी बोले — "हे मुनीश्वरों! मस्तक पर बाल-चंद्रमा को धारण करने वाले भगवान सदाशिव जब उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान कर गए, तब वृत्रासुर का वध करने के पश्चात देवराज इंद्र को जैसी भारी चिंता ने घेर लिया था, वैसी ही गंभीर चिंता उस ऋषि-कन्या के हृदय को भी व्यथित करने लगी।
II इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तम मास
माहात्म्ये एकादशोऽध्यायः ॥११॥
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‼️ श्री पुरुषोत्तम मास माहात्म्य (अध्याय १२)‼️
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नारद जी बोले: "हे प्रभो! जब भगवान शंकर वहाँ से प्रस्थान कर गए, तब उस बालिका ने शोक में व्याकुल होकर क्या किया? मुझ विनीत और धर्मसिद्धि के अभिलाषी को कृपा करके यह वृत्तांत विस्तार से बताइए।
श्रीनारायण बोले: "हे नारद जी! ठीक इसी प्रकार का प्रश्न राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था। भगवान ने राजा युधिष्ठिर को जो उत्तर दिया था, वही मैं आपसे कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनिए।
श्रीकृष्ण बोले: "हे राजन्! इस प्रकार जब भगवान शिव अंतर्धान हो गए, तब वह बालिका अत्यंत प्रभावित और भयभीत हो गई। वह लंबी-लंबी सांसें लेती हुई और अश्रुपात करती हुई विलाप करने लगी। हृदय की वियोगाग्नि से उत्पन्न ज्वाला से झुलसे अंगों वाली वह तपस्विनी कन्या, वनाग्नि से झुलसे पत्तों वाली किसी लता के समान प्रतीत होने लगी।
दुःख और संताप से घिरी उस कन्या का एक लंबा समय व्यतीत हो गया। जिस प्रकार कोई सर्प चूहे के बिल में प्रवेश कर उस पर आक्रमण करता है और उसे अपने वश में कर लेता है, ठीक उसी प्रकार उस शोचनीय अवस्था को प्राप्त तपस्विनी बालिका पर सर्वसमर्थ काल ने आक्रमण कर उसे अपने वश में कर लिया (अर्थात उसकी मृत्यु का समय आ गया)। वर्षा ऋतु में आकाश में बादलों के बीच बिजली चमककर जैसे तत्काल नष्ट हो जाती है, वैसे ही तपस्या के प्रभाव से जिसके समस्त पाप भस्म हो चुके थे, वह कन्या अपने आश्रम में शांत हो गई।
तदनंतर, परम धर्मिष्ठ राजा यज्ञसेन (द्रुपद) ने विशाल सामग्रियों से युक्त एक उत्तम यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञवेदी के कुंड से सुवर्ण के समान कांति वाली एक परम सुंदरी कन्या प्रकट हुई। वही कुमारी संसार में द्रुपदराज की कन्या 'द्रौपदी' के नाम से विख्यात हुई।
जो पूर्वजन्म में मेधावी ऋषि की कन्या थी, वही इस जन्म में समस्त लोकों में द्रौपदी नाम से प्रसिद्ध हुई। स्वयंवर की सभा में, जहाँ भीष्म और कर्ण जैसे महापराक्रमी राजा उपस्थित थे, अर्जुन ने मत्स्य-वेध करके उन समस्त राजाओं के अहंकार को तिनके के समान कर दिया और धूल से भरे उस युद्ध-मंडल के मध्य पांचाली को प्राप्त किया।
हे मुने! वही द्रौपदी दुष्ट दुःशासन द्वारा केशों से पकड़कर राजसभा में खींची गई और उसे अत्यंत हृदयविदारक कटु वचन सुनाए गए। पूर्वजन्म में उसके द्वारा पुरुषोत्तम मास की अवहेलना किए जाने के कारण, प्रारंभ में मैंने भी उसकी उपेक्षा की। परंतु जब उसने मेरे प्रति अनन्य स्नेह रखकर आर्तभाव से मेरा नाम पुकारना आरंभ किया—
'हे दामोदर! हे दयासिंधु! हे कृष्ण! हे जगत्पते! हे नाथ! हे रमानाथ! हे केशव! हे क्लेशनाशन! इस संसार में मेरे माता, पिता, भाई, सखियाँ, बहनें, भांजे, बंधु-बांधव अथवा पति... कोई भी रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं। हे हृषीकेश! मेरे तो सर्वस्व केवल आप ही हैं। हे गोविंद! हे गोपिकानाथ! हे दीनबंधु! हे दयानिधे! दुःशासन द्वारा प्रताड़ित की जाती हुई मुझ दासी की विकट स्थिति क्या आपसे छिपी है?
यद्यपि पहली पुकार पर मैंने उसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया था, किंतु जब दुःशासन से सर्वथा पराभूत होकर उसने पूर्ण शरणागति के साथ मेरा पुनः स्मरण किया, तब मैं गरुड़ पर आरूढ़ होकर अत्यंत शीघ्रता से वहाँ पहुँचा और हे राजन्! मैंने उसे अनंत वस्त्रों से परिपूर्ण कर दिया।
श्रीकृष्ण ने आगे कहा: "जो सदैव मुझसे अगाध स्नेह करती हैं, जिनके प्राण मुझमें ही बसते हैं, जो निरंतर मेरे भजन में तत्पर रहती हैं, वह मेरी परम प्रिय सती और सखी द्रौपदी मुझे अपने प्राणों के समान प्रिय हैं। इसके उपरांत भी, केवल पुरुषोत्तम मास का तिरस्कार करने के कारण मुझे प्रारंभ में उसकी उपेक्षा करनी पड़ी; क्योंकि जो भी पुरुषोत्तम मास का निरादर करता है, उसका पतन निश्चित है।
यह पुरुषोत्तम मास परम पूजनीय ऋषियों और देवताओं द्वारा भी सेव्य है। अतः समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले इस श्रेष्ठ मास की सेवा मनुष्यों को तो अवश्य ही करनी चाहिए। इसलिए हे पाण्डव! आप सब आगामी पुरुषोत्तम मास की विधिपूर्वक आराधना कीजिए। चौदह वर्ष (अज्ञातवास सहित) पूर्ण होने पर आप सबका परम कल्याण होगा।
हे पांडुनंदन! जिन दुष्टों ने द्रौपदी को केशों से खींचते हुए देखा और मूकदर्शक बने रहे, हे महाराज! मैं अत्यंत क्रोधित होकर उनकी स्त्रियों के केशों को कटवाऊँगा (अर्थात उन्हें विधवा करूँगा)। मैं दुर्योधन आदि पापी राजाओं को यमराज के भवन पहुँचाऊँगा, तत्पश्चात् आप समस्त शत्रुओं का समूल नाश करके निष्कण्टक राज्य के स्वामी होंगे।
मुझे न तो लक्ष्मी जी उतनी प्रिय हैं, न बलभद्र जी उतने प्रिय हैं, न पूजनीय माता देवकी प्रिय हैं, और न ही प्रद्युम्न अथवा सात्यकि मुझे उतने प्रिय हैं—जितने प्रिय मुझे मेरे भक्त हैं। जो मेरे भक्तों को पीड़ित करता है, उससे मैं स्वयं को सदैव पीड़ित अनुभव करता हूँ। हे पांडव! भक्तों को सताने वाले के समान मेरा अन्य कोई शत्रु नहीं है। उसके इस घोर अपराध का दंड स्वयं यमराज देते हैं, क्योंकि वह दुष्ट दंड पाने के योग्य तो है, परंतु मेरे द्वारा देखे जाने योग्य भी नहीं है।
श्रीनारायण बोले: "इस प्रकार जगदीश्वर श्रीकृष्ण ने पांडुपुत्र युधिष्ठिर आदि भाइयों और द्रौपदी को सांत्वना दी। तत्पश्चात् द्वारका प्रस्थान करने की इच्छा प्रकट करते हुए वे बोले—'हे राजन्! अब मैं हमारे वियोग से व्याकुल द्वारकापुरी को जाऊँगा, जहाँ परम पूजनीय वसुदेव जी, अग्रज बलदेव जी, माता देवकी तथा गद, साम्ब, आहुक आदि समस्त यादवगण और रुक्मिणी आदि देवियाँ मेरे आगमन की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए निरंतर मेरा ही चिंतन कर रहे होंगे।
भगवान श्रीकृष्ण के गमन की बात सुनकर पांडुपुत्र अत्यंत भावुक हो गए और गद्गद कंठ से बोले—'प्रभो! जिस प्रकार जल में रहने वाले जीवों का जीवन केवल जल होता है, उसी प्रकार हम सब का जीवन भी केवल आप ही हैं। हे जनार्दन! कृपया थोड़े ही दिनों में हमें पुनः दर्शन दीजिएगा।' संपूर्ण त्रिलोकी में यह सर्वविदित है कि पांडवों के रक्षक साक्षात् श्रीहरि हैं और उनके अतिरिक्त हमारा कोई दूसरा आश्रय नहीं है। अतः हे जगदीश्वर! आप सदा-सर्वदा हमारी रक्षा करें। हम सब पूर्ण रूप से आपके ही हैं, हमें कभी विस्मृत न कीजिएगा। हमारे चित्तरूपी भ्रमरों का एकमात्र जीवन आपके चरण-कमल ही हैं। आप ही हमारे मुख्य आधार हैं, इसीलिए हम सब आपसे बारंबार यही प्रार्थना करते हैं।
पांडवों के इस प्रकार प्रेमपूर्ण और विनीत वचनों को सुनकर श्रीकृष्णचन्द्र परमानंद में मग्न हो गए। वे मंद-मंद मुस्कुराते हुए रथ पर सवार हुए और पीछे-पीछे आ रहे पांडवों को प्रेमपूर्वक विदा करके द्वारकापुरी की ओर प्रस्थान कर गए।
श्रीनारायण बोले: "द्वारकानाथ श्रीकृष्ण के पधारने के उपरांत, राजा युधिष्ठिर अपने अनुजों के साथ तपस्या करते हुए विभिन्न पवित्र तीर्थों के भ्रमण पर निकल गए। हे ब्रह्मर्षि नारद! भगवान के प्रिय पुरुषोत्तम मास में अपना चित्त लगाकर और श्रीकृष्ण के वचनों का स्मरण करते हुए, राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदी से बोले—'अहो! हमने पुरुषोत्तम मास का अत्यंत उग्र और अलौकिक माहात्म्य सुना है। भगवान पुरुषोत्तम की आराधना के बिना जीवन में वास्तविक सुख कैसे प्राप्त हो सकता है? इस भारतवर्ष में वही मनुष्य धन्य है, वही पूज्य है और वही श्रेष्ठ है, जो अनेक प्रकार के पवित्र नियमों का पालन करते हुए भगवान पुरुषोत्तम का अर्चन-वंदन करता है।'
इस प्रकार समस्त तीर्थों में विचरण करते हुए पांडुपुत्र, पुरुषोत्तम मास के आने पर विधिपूर्वक व्रत और नियम करने लगे। हे मुने! इस कठिन व्रत के प्रभाव से और चौदह वर्ष पूर्ण होने पर, भगवान श्रीकृष्ण की असीम अनुकंपा से पांडवों ने पुनः अपने निष्कण्टक और अतुलनीय राज्य को प्राप्त किया।
पूर्वकाल में सूर्यवंश में राजा दृढ़धन्वा नाम के एक प्रतापी राजा हुए थे। उन्होंने भी इस पुरुषोत्तम मास का श्रद्धापूर्वक सेवन किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें अतुल लक्ष्मी, पुत्र-पौत्रों का सुख और संसार के समस्त उत्तम भोग प्राप्त हुए। अंत में वे योगियों के लिए भी दुर्लभ, भगवान के परम धाम 'वैकुंठ लोक' को सिधारे। हे मुनिश्रेष्ठ नारद! इस पुरुषोत्तम मास के दिव्य और असीम माहात्म्य को यदि करोड़ों कल्पों तक भी कहा जाए, तो भी मैं इसे पूर्ण रूप से व्यक्त करने में समर्थ नहीं हूँ।
सूत जी बोले: "हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों! मैंने इस पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य परम पूजनीय कृष्णद्वैपायन (वेदव्यास जी) के मुखारविंद से सुना है, तथापि इसे संपूर्ण रूप से कह पाने में मैं स्वयं को सर्वथा असमर्थ पाता हूँ। इस मास के संपूर्ण और दिव्य माहात्म्य को या तो स्वयं भगवान नारायण जानते हैं अथवा साक्षात् वैकुंठवासी श्रीहरि जानते हैं। यहाँ तक कि ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा जिनके चरण कमलों की वंदना की जाती है, वे गोलोकनाथ श्रीकृष्णचन्द्र भी अपने इस प्रिय पुरुषोत्तम मास का संपूर्ण माहात्म्य पूर्णतः प्रकट नहीं करते; तो फिर एक साधारण मनुष्य भला इसे कैसे जान सकता है?
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥
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‼️ श्रीपुरुषोत्तम मास माहात्म्य : अध्याय १३ ‼️
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राजा दृढ़धन्वा की वैराग्य कथा और शुक पक्षी का रहस्यमयी उपदेश — ऋषिगण अत्यंत आदरपूर्वक बोले— "हे सूत जी! हे महाभाग! हे प्रवक्ताओं में सर्वश्रेष्ठ! कृपा कर हमें यह बताइए कि पुरुषोत्तम मास के सेवन अर्थात व्रत-अनुष्ठान से राजा दृढ़धन्वा ने ऐसा श्रेष्ठ राज्य, सुयोग्य पुत्र तथा परम पतिव्रता पत्नी को कैसे प्राप्त किया? और वे योगियों के लिए भी दुर्लभ भगवान् के परम धाम को किस प्रकार प्राप्त हुए? हे तात! आपके मुख-कमल से बार-बार कथा का सार सुनते हुए भी, हम कथा-अमृत का पान करने वालों की तृप्ति नहीं हो रही है। ठीक वैसे ही, जैसे अमृत पीने वालों की प्यास कभी शांत नहीं होती। इसलिए कृपा करके इस प्राचीन इतिहास को विस्तारपूर्वक कहिए। हमारे महान भाग्य के बल से ही विधाता ने हमें आपके दर्शन कराए हैं।
सूत जी ने कहा— "हे श्रेष्ठ विप्रगण! सनातन मुनि श्री नारायण ने इस प्राचीन इतिहास को देवर्षि नारद जी से कहा था। वही पावन इतिहास इस समय मैं आप लोगों से कह रहा हूँ। मैंने अपने गुरुदेव के मुख से राजा दृढ़धन्वा का जो पापनाशक चरित्र पढ़ा और समझा है, उसे आप सभी मुनि एकाग्रचित्त होकर श्रवण करें।
श्रीनारायण बोले— "हे ब्रह्मन् नारद! ध्यानपूर्वक सुनिए। मैं पतित-पावनी गंगा के समान राजा दृढ़धन्वा की सुंदर और अत्यंत प्राचीन कथा कहता हूँ।
हैहय देश के रक्षक, श्रीमान, अत्यंत बुद्धिमान और सत्यपराक्रमी चित्रधर्मा नाम के एक विख्यात राजा थे। उन्हें दृढ़धन्वा नाम का एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ, जो संपूर्ण दिव्य गुणों से संपन्न, सत्यवादी, परम धर्मात्मा और पवित्र आचरण वाले थे। विशाल नेत्रों, चौड़ी छाती और लंबी भुजाओं वाले महातेजस्वी राजा दृढ़धन्वा श्रेष्ठ गुणों के साथ-साथ बड़े होने लगे।
वे अत्यंत चतुर थे। उन्होंने केवल एक बार गुरुदेव के मुख से सुनने मात्र से ही—मानो पहले से पढ़ा हुआ हो—व्याकरण आदि छह अंगों सहित चारों वेदों का संपूर्ण अध्ययन कर लिया। इसके बाद गुरुदेव को दक्षिणा देकर और विधिपूर्वक उनका पूजन कर, वे बुद्धिमान राजकुमार अपने पिता चित्रधर्मा की नगरी को लौट आए।
जब वे नगर में आए, तो प्रजा उनके दर्शन कर आनंदित हो उठी। अपने ऐसे सर्वगुण संपन्न पुत्र को देखकर राजा चित्रधर्मा भी अत्यंत हर्षित हुए। इस नाशवान संसार में भला इससे बढ़कर और क्या सुख हो सकता है कि पुत्र युवा हो, संपूर्ण धर्मों को जानने वाला हो और प्रजा के पालन में पूरी तरह समर्थ हो? अर्थात इसके समान दूसरा कोई सुख नहीं है।
राजा चित्रधर्मा विचार करने लगे— "अब मैं दो भुजाओं वाले, हाथ में मुरली (वंशी) धारण करने वाले, प्रसन्न मुख, शांत और भक्तों को अभय प्रदान करने वाले साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र की आराधना करता हूँ।
जिस प्रकार ध्रुव, अम्बरीष, शर्याति, ययाति जैसे महान राजा और शिवि, रन्तिदेव, शशबिन्दु, भगीरथ, भीष्म, विदुर, दुष्यन्त, भरत, पृथु, उत्तानपाद, प्रह्लाद और विभीषण आदि महापुरुषों ने इस अनित्य (नाशवान) शरीर और सांसारिक बंधनों को त्याग कर पुरुषोत्तम भगवान की आराधना की और नित्य रहने वाले विष्णुपद (वैकुंठ) को प्राप्त हुए; उसी प्रकार स्त्री, भवन और पुत्र आदि के स्नेहमय बंधनों को तोड़कर वन में जाकर श्री हरि का भजन करना ही अब मेरा भी परम कर्तव्य है।
ऐसा दृढ़ निश्चय कर, समर्थ राजा चित्रधर्मा ने अपने पुत्र दृढ़धन्वा को राज्य का संपूर्ण भार सौंप दिया और स्वयं विरक्त होकर शीघ्र ही पुलह ऋषि के आश्रम चले गए। वहाँ जाकर वे संपूर्ण कामनाओं से मुक्त हो गए और अन्न-जल का त्याग कर निरंतर मन से श्रीकृष्णचन्द्र का स्मरण करते हुए कठिन तपस्या करने लगे। कुछ समय के पश्चात राजा चित्रधर्मा भगवान श्री हरि के परम धाम को सिधार गए।
राजा दृढ़धन्वा ने भी अपने पिता के इस वैष्णवी गति (मोक्ष) को प्राप्त होने का समाचार सुना। उस समय पिता के परमधाम गमन से राजा दृढ़धन्वा को हर्ष भी हुआ और वियोग के कारण शोक भी हुआ। उन्होंने पितृ-भक्ति की भावना से प्रेरित होकर विद्वानों के कथनानुसार आदरपूर्वक पिता की पारलौकिक (श्राद्ध आदि) क्रियाएँ संपन्न कीं।
इसके पश्चात, नीतिशास्त्र में अत्यंत निपुण राजा दृढ़धन्वा अत्यंत सुंदर और पवित्र पुष्करावर्तक नाम की नगरी में राज्य करने लगे। विदर्भ देश के राजा की कन्या 'गुणसुन्दरी' उनकी महारानी थीं, जिनका स्वभाव अत्यंत उत्तम था और पृथ्वी पर रूप-सौंदर्य में उनके समान दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। उस गुणसुन्दरी ने चार सुंदर, चतुर और शुभ आचरण वाले पुत्रों को तथा संपूर्ण सुलक्षणों से युक्त 'चारुमती' नाम की एक कन्या को जन्म दिया। उन पुत्रों के नाम चित्रवाक्, चित्रवाह, मणिमान और चित्रकुण्डल थे, जो अत्यंत स्वाभिमानी, पराक्रमी और अपने-अपने नामों के अनुरूप संसार में विख्यात हुए।
राजा दृढ़धन्वा स्वयं भी सर्वगुण संपन्न, शांत, जितेंद्रिय, दृढ़प्रतिज्ञ, अत्यंत रूपवान, वीर और वैभवशाली थे। वे स्वभाव से ही अत्यंत सुंदर, चारों वेदों और व्याकरण आदि छह अंगों के ज्ञात