Juris Legal Associate

Juris Legal Associate Professional Advocate - Swati Jain

9 साल पहले परिवार के खिलाफ जाकर लव मैरिज की, अब पति के दोस्त के साथ रहना और शादी करना चाहती है महिला। छतरपुर के ईसानगर थ...
28/09/2026

9 साल पहले परिवार के खिलाफ जाकर लव मैरिज की, अब पति के दोस्त के साथ रहना और शादी करना चाहती है महिला। छतरपुर के ईसानगर थाने में शुक्रवार को यह मामला पहुंचा, जहां शिवानी और उसके पति प्रदुम सिंह परिहार ने अलग-अलग आवेदन देकर पुलिस के सामने अपना-अपना पक्ष रखा है। दोनों का करीब 8-9 साल का एक बेटा भी है।

पति प्रदुम का कहना है कि उसका करीबी दोस्त सुमित अग्रवाल अक्सर घर आता-जाता था। प्रदुम के मुताबिक, सुमित उसकी पत्नी शिवानी को बहन मानता था और उससे राखी भी बंधवाता था। पति का दावा है कि बाद में उसे दोनों के बीच नजदीकियों की जानकारी मिली।

वहीं शिवानी ने पुलिस को दिए आवेदन में पति से अलग होकर सुमित के साथ रहने और शादी करने की इच्छा जताई है। फिलहाल पति द्वारा लगाए गए आरोप उसके पक्ष पर आधारित हैं और मामले में पुलिस के समक्ष दोनों पक्षों ने अपनी बात रखी है।

रीवा की चाकघाट नगर परिषद से कथित आपत्तिजनक बातचीत का एक ऑडियो सामने आया है। इसमें एक अधिकारी की आवाज में महिला कंप्यूटर ...
26/09/2026

रीवा की चाकघाट नगर परिषद से कथित आपत्तिजनक बातचीत का एक ऑडियो सामने आया है। इसमें एक अधिकारी की आवाज में महिला कंप्यूटर ऑपरेटर से कथित तौर पर दो घंटे कमरे में साथ रहने की बात कही जा रही है। बातचीत में अधिकारी के पत्नी-बच्चों के बाहर जाने का भी जिक्र है।

ऑडियो सामने आने के बाद महिला कर्मचारी ने नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के आयुक्त से शिकायत कर नगर परिषद के सीएमओ शंखधर पांडेय और अध्यक्ष विभव कुमार जायसवाल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। महिला का आरोप है कि उस पर गलत अपेक्षा पूरी करने का दबाव बनाया गया और इनकार करने पर उसकी नौकरी चली गई।

महिला के मुताबिक वह 15 मार्च 2018 से दैनिक वेतन पर कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में काम कर रही थी। उसने आरोप लगाया कि 18 जून 2026 को कार्यालय में उसके साथ अभद्रता और गाली-गलौज की गई तथा नौकरी से हटाने की धमकी दी गई। महिला ने उस दिन की CCTV रिकॉर्डिंग की जांच कराने की मांग भी की है।

25/09/2026

498a IPC का झूठा केस पत्नी कर देती है तो पति क्या कर सकता है...?? IPC

case



24/09/2026

न्यायालय में जरूरी है कुछ बातों का ध्यान रखना




23/09/2026

समझौते के बाद तलाक का केस चल सकता है
#पारिवारिकविवाद

सफ़ाइयाँ देने से दूर रहा कीजिए।अगर कोई कहे कि तुम बुरे हो,तो कह देना— "बहुत ज़्यादा!"हर किसी को सही साबित करना ज़रूरी नह...
22/09/2026

सफ़ाइयाँ देने से दूर रहा कीजिए।
अगर कोई कहे कि तुम बुरे हो,
तो कह देना— "बहुत ज़्यादा!

"हर किसी को सही
साबित करना ज़रूरी नहीं,

कुछ लोगों को गलत समझने का
हक़ भी दे दीजिए।

जो आपको समझना चाहेगा,
वो आपकी ख़ामोशी भी समझ लेगा।

और जो आपको गलत समझना ही चाहता है,
उसे आपकी सफ़ाई भी बहाना लगेगी।"😅😅
जय जिनेंद्र 🙏

21/09/2026

वैवाहिक विवादों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जो पति-पत्नी के बीच चल रहे कानूनी मामलों में संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत पर जोर देती है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि वैवाहिक विवाद के बीच पत्नी पति के नियोक्ता (Employer) को शिकायत भेजती है और उससे पति की नौकरी प्रभावित होती है, तो इसका असर न केवल उसकी आजीविका पर पड़ सकता है, बल्कि भविष्य में गुजारा-भत्ता (Maintenance) से जुड़े दावों पर भी पड़ सकता है।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि तलाक की मांग करना एक अलग बात है, लेकिन जीवनसाथी की रोजी-रोटी छीन लेना उससे भी अधिक गंभीर मामला हो सकता है।

यह टिप्पणी एक ट्रांसफर याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें पत्नी ने अपने पति से जुड़े अन्य कानूनी मामलों का हवाला देते हुए मानहानि के एक मुकदमे को असम से गाजियाबाद स्थानांतरित करने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पत्नी ने अपने एयर फोर्स अधिकारी पति के खिलाफ संबंधित अधिकारियों को एक शिकायत भेजी थी।

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को विवाद सुलझाने की सलाह दी और समझौते की संभावना तलाशने के लिए मामले को सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता केंद्र भेज दिया। अदालत ने यह भी कहा कि पारिवारिक विवादों का समाधान आपसी सहमति और संवाद के जरिए निकालने का प्रयास किया जाना चाहिए।

करीब 15 साल से अलग रह रहे पति-पत्नी का Supreme Court ने कराया तलाक, पत्नी को ₹1.25 करोड़ Permanent Alimony; ₹25-₹25 लाख ...
20/09/2026

करीब 15 साल से अलग रह रहे पति-पत्नी का Supreme Court ने कराया तलाक, पत्नी को ₹1.25 करोड़ Permanent Alimony; ₹25-₹25 लाख की 5 किस्तों का आदेश

नई दिल्ली, 14 अगस्त 2025:

Supreme Court ने करीब 15 साल से अलग रह रहे एक दंपति के विवाह को Article 142 के तहत समाप्त करते हुए पत्नी के लिए ₹1.25 करोड़ की One-Time Permanent Alimony तय की है।

Court ने पति को यह रकम ₹25-₹25 लाख की पांच बराबर Quarterly Instalments में देने का आदेश दिया। Supreme Court ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी किस्त के भुगतान में Default होने पर पूरा Order Recall हो सकता है और पहले से भुगतान की गई राशि भी Forfeit की जा सकती है।

यह मामला लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक विवाद, करीब 15 वर्षों की Separation और पति की दूसरी शादी के बाद Supreme Court के सामने आया था।

क्या था पूरा मामला?

रिकॉर्ड के अनुसार, पति-पत्नी का विवाह 15 फरवरी 2009 को हुआ था।

विवाह के कुछ समय बाद दोनों अमेरिका चले गए थे। Judgment में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि वहां पति Employed था।

दोनों का एक बेटा 7 अप्रैल 2010 को पैदा हुआ।

लेकिन वर्ष 2010 के बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे।

Supreme Court के सामने मामला आने तक दोनों करीब 15 वर्षों से अलग रह रहे थे।

पति ने तलाक के लिए क्या आरोप लगाए?

पति ने Hindu Marriage Act की Section 13(1)(ia) और 13(1)(ib) के तहत Divorce Petition दाखिल की थी।

उसने पत्नी के खिलाफ मुख्य रूप से:

• Cruelty यानी मानसिक/वैवाहिक क्रूरता

और

• Adultery यानी विवाहेतर संबंध

के आधार पर विवाह समाप्त करने की मांग की थी।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य है—

Family Court ने Adultery का आरोप साबित नहीं माना था।

Family Court ने Divorce किस आधार पर दिया?

Family Court ने 17 अक्टूबर 2016 को पति के पक्ष में Divorce Decree पारित की थी।

लेकिन Divorce केवल Cruelty के आधार पर दिया गया था।

Court ने पत्नी के खिलाफ लगाए गए Adultery के आरोप को Proved नहीं माना था।

इसलिए इस मामले को “पत्नी का अवैध संबंध साबित हो गया था” कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।

पत्नी ने Divorce के खिलाफ Appeal की

Family Court के Divorce Order के बाद पत्नी ने High Court में Appeal दाखिल की।

Madras High Court ने Family Court के फैसले की समीक्षा की और Divorce Decree को Set Aside कर दिया।

High Court ने माना कि Family Court द्वारा Cruelty का प्रमुख आधार पत्नी के पिता द्वारा की गई कथित Rude Utterances से संबंधित था।

High Court के अनुसार पत्नी के पिता के कथित व्यवहार के लिए पत्नी को सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

इसी आधार पर High Court ने Family Court द्वारा दी गई Divorce Decree को रद्द कर दिया।

इसी दौरान पति ने दूसरी शादी कर ली

High Court में पत्नी की Appeal लंबित रहने के दौरान पति ने 5 मार्च 2017 को दूसरी शादी कर ली।

इसके बाद मामला Supreme Court पहुंचा।

Supreme Court ने Mediation की कोशिश भी की

Supreme Court ने मामले में दोनों पक्षों के बीच Settlement की संभावना तलाशने के लिए Mediation का प्रयास किया।

लेकिन Mediation सफल नहीं हो सकी।

इसके बाद पति ने Constitution के Article 142 के तहत Supreme Court से विवाह समाप्त करने का अनुरोध किया।

Supreme Court ने क्या पाया?

Supreme Court ने देखा कि पति-पत्नी वर्ष 2010 से अलग रह रहे थे।

यानी Court के सामने मामला आने तक लगभग 15 वर्ष बीत चुके थे।

Court ने कहा कि दोनों के बीच अब कोई वास्तविक Matrimonial Relationship बाकी नहीं रह गया था।

Court ने यह भी पाया कि दोनों में से किसी ने भी अपने मतभेद दूर करके वैवाहिक जीवन दोबारा शुरू करने की इच्छा नहीं दिखाई।

इसके अलावा पति की दूसरी शादी भी हो चुकी थी।

इन परिस्थितियों को देखते हुए Supreme Court ने माना कि Marriage Irretrievably Broken Down हो चुकी है।

Article 142 के तहत विवाह समाप्त

Supreme Court ने इसे ऐसा उपयुक्त मामला माना जिसमें Constitution के Article 142 के तहत अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इसके बाद Supreme Court ने 15 फरवरी 2009 को हुआ विवाह Dissolve कर दिया।

लेकिन Court ने केवल Divorce ही नहीं दिया।

पत्नी के लिए ₹1.25 करोड़ Permanent Alimony

Supreme Court ने Financial Support के मुद्दे पर भी विचार किया।

Court के सामने यह तथ्य रखा गया कि इतने वर्षों के दौरान पति की ओर से पत्नी को Financial Support नहीं दिया गया था।

दोनों पक्षों की Financial Status और मामले की पूरी परिस्थितियों को देखते हुए Supreme Court ने पत्नी के लिए ₹1.25 करोड़ की One-Time Lump-Sum Permanent Alimony तय की।

Judgment में Court ने यह राशि पत्नी और उनके बेटे के संदर्भ में तय की गई Financial Arrangement के रूप में दर्ज की है।

₹25 लाख की पांच किस्तें

Supreme Court ने ₹1.25 करोड़ को एक साथ भुगतान करने के बजाय पांच बराबर Quarterly Instalments में देने का आदेश दिया।

हर किस्त:

₹25 लाख

कुल:

₹25 लाख × 5 = ₹1.25 करोड़

Court द्वारा निर्धारित Payment Schedule इस प्रकार था:

पहली किस्त — 15 सितंबर 2025 तक

दूसरी किस्त — 15 दिसंबर 2025 तक

तीसरी किस्त — 15 मार्च 2026 तक

चौथी किस्त — 15 जून 2026 तक

पांचवीं और अंतिम किस्त — 15 सितंबर 2026 तक

Payment Default पर सख्त शर्त

Supreme Court ने Payment Default की स्थिति में कड़ा आदेश दिया।

Court ने कहा कि यदि पांच में से किसी भी किस्त का भुगतान निर्धारित समय पर नहीं किया जाता है, तो यह Order Recall हो जाएगा।

साथ ही पति द्वारा पहले से भुगतान की गई राशि भी Forfeit हो जाएगी।

यानी Court ने Divorce और Financial Settlement को एक-दूसरे से जोड़ते हुए Payment को महत्वपूर्ण शर्त बनाया।

Divorce Decree कब तैयार होगी?

Supreme Court ने स्पष्ट किया कि Divorce Decree तभी तैयार की जाएगी जब Registry के सामने यह Proof प्रस्तुत किया जाएगा कि ₹1.25 करोड़ की निर्धारित राशि का भुगतान कर दिया गया है।

इस प्रकार Financial Settlement Divorce Order की महत्वपूर्ण शर्तों में शामिल रहा।

पति की Profession क्या थी?

Supreme Court के Judgment में पति की Specific Profession का उल्लेख नहीं किया गया है।

Judgment में केवल यह स्पष्ट है कि विवाह के बाद दोनों अमेरिका चले गए थे और वहां पति Employed था।

इसलिए पति को Engineer, IT Professional, Businessman या किसी अन्य Specific Profession में बताना उचित नहीं होगा।

पत्नी की Profession के बारे में भी Judgment में कोई स्पष्ट Specific Profession नहीं दी गई है।

इसलिए Privacy और Fact Accuracy दोनों को ध्यान में रखते हुए पत्नी की कोई Profession इस रिपोर्ट में नहीं जोड़ी जा रही है।

₹1.25 करोड़ तय करने में Court ने किन बातों को देखा?

Supreme Court ने मुख्य रूप से मामले की Overall Circumstances और दोनों पक्षों की Financial Status को ध्यान में रखा।

इसके साथ Court के सामने ये महत्वपूर्ण परिस्थितियां थीं:

• वर्ष 2010 से करीब 15 वर्षों की Separation

• Matrimonial Relationship का लगभग पूरी तरह समाप्त हो जाना

• Reconciliation की कोई संभावना नहीं होना

• पति की दूसरी शादी हो जाना

• इतने वर्षों के दौरान पत्नी को पति की ओर से Financial Support न मिलना

इन परिस्थितियों को देखते हुए Court ने One-Time Lump-Sum Permanent Alimony निर्धारित की।

क्या ₹1.25 करोड़ सिर्फ बच्चे के लिए था?

नहीं।

Judgment में ₹1.25 करोड़ को पत्नी के लिए Permanent Alimony के रूप में निर्देशित किया गया है।

Court ने पत्नी और उनके बेटे के संदर्भ में One-Time Lump-Sum Financial Arrangement का उल्लेख किया है।

इसलिए इसे केवल बच्चे के लिए ₹1.25 करोड़ कहना भी गलत होगा।

क्या Supreme Court ने Monthly Maintenance तय की?

नहीं।

Supreme Court ने इस मामले में ₹25,000 या ₹50,000 जैसी कोई Monthly Maintenance तय नहीं की।

यह ₹1.25 करोड़ की One-Time Lump-Sum Permanent Alimony थी, जिसे पांच बराबर किस्तों में देने का आदेश दिया गया।

क्या Court ने पत्नी का Adultery साबित माना था?

नहीं।

यह इस मामले का बहुत महत्वपूर्ण Fact है।

पति ने Divorce Petition में Adultery का आरोप लगाया था, लेकिन Family Court ने उस आरोप को Proved नहीं माना था।

Family Court ने Divorce Cruelty के आधार पर दिया था।

Supreme Court ने Divorce किस आधार पर दिया?

Supreme Court ने Article 142 का इस्तेमाल करते हुए मुख्य रूप से यह पाया कि:

पति-पत्नी करीब 15 वर्षों से अलग रह रहे थे,

उनके बीच कोई वास्तविक Matrimonial Relationship बाकी नहीं था,

दोनों में Reconciliation की कोई संभावना नहीं थी,

और पति की दूसरी शादी भी हो चुकी थी।

इन परिस्थितियों में Court ने Marriage को Irretrievably Broken Down माना और Article 142 के तहत Divorce दे दिया।

फैसले का बड़ा कानूनी संदेश

यह फैसला दिखाता है कि Supreme Court असाधारण परिस्थितियों में Article 142 के तहत लंबे समय से टूट चुके वैवाहिक संबंध को समाप्त कर सकता है।

लेकिन Divorce के साथ आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।

इस मामले में Court ने दोनों पक्षों की Financial Status और पूरे मामले की परिस्थितियों को देखते हुए पत्नी के लिए ₹1.25 करोड़ की One-Time Permanent Alimony तय की।

यह कोई सामान्य Formula नहीं है।

हर पत्नी को लंबे Separation के आधार पर ₹1.25 करोड़ मिलने का कोई नियम इस फैसले से नहीं बनता।

Permanent Alimony की राशि प्रत्येक मामले की Financial Capacity, Needs, Circumstances और अन्य Relevant Factors पर निर्भर करती है।

निष्कर्ष

करीब 15 वर्षों से अलग रह रहे इस दंपति का विवाह Supreme Court ने Article 142 के तहत समाप्त कर दिया।

Court ने माना कि वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुका था और Reconciliation की कोई वास्तविक संभावना नहीं थी।

पति की दूसरी शादी भी हो चुकी थी।

इसके साथ Supreme Court ने पत्नी के लिए ₹1.25 करोड़ की One-Time Permanent Alimony तय की।

यह राशि ₹25-₹25 लाख की पांच Quarterly Instalments में देने का आदेश दिया गया।

किसी भी किस्त में Default होने पर Order Recall और पहले से भुगतान की गई राशि Forfeit होने की सख्त शर्त भी रखी गई।

पत्नी ने बैंक खातों की पूरी जानकारी नहीं दी फैमिली कोर्ट ने भरण-पोषण की याचिका खारिज कीभरण-पोषण मांगने वाले पक्ष से अदाल...
19/09/2026

पत्नी ने बैंक खातों की पूरी जानकारी नहीं दी फैमिली कोर्ट ने भरण-पोषण की याचिका खारिज की

भरण-पोषण मांगने वाले पक्ष से अदालत के सामने अपनी आर्थिक स्थिति की सही और पूरी जानकारी रखना जरूरी है आय, बैंक खाते संपत्ति और अन्य आर्थिक साधनों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने पर न्यायालय राहत देने से इनकार कर सकता है।

एक मामले में पत्नी ने भरण-पोषण की मांग की, लेकिन अपने बैंक खातों से संबंधित पूरी जानकारी अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं की इस तथ्य को गंभीरता से लेते हुए फैमिली कोर्ट ने उसकी भरण-पोषण याचिका खारिज कर दी।

भरण-पोषण की कार्यवाही में अदालत के सामने सही वित्तीय स्थिति रखना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायालय को दोनों पक्षों की वास्तविक आय और आर्थिक स्थिति देखकर उचित राशि तय करनी होती है यदि कोई पक्ष महत्वपूर्ण जानकारी छिपाता है, तो इससे न्यायालय के सामने गलत तस्वीर प्रस्तुत हो सकती है।
#भरणपोषण #फैमिलीकोर्ट #बैंकखाता #पतिपत्नीविवाद #कानूनीजागरूकता

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) से जुड़े कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं ...
18/09/2026

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) से जुड़े कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई 3 हफ्ते बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि जब कानून में वैवाहिक बलात्कार का अपवाद मौजूद है तो पत्नी के साथ बलात्कार के आरोप में पति पर मुकदमा कैसे चलाया जा सकता है?

पीठ ने पूछा कि जब तक वैवाहिक बलात्कार अपवाद ( Marital R**e Exception) की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक किसी पति के खिलाफ पत्नी के साथ बलात्कार के आरोप में अभियोजन कैसे चलाया जा सकता है। यह सवाल कर्नाटक हाई कोर्ट के उस फैसले के संदर्भ में उठा, जिसमें कहा गया था कि वैवाहिक बलात्कार के मामले में पति को कानून के तहत पूरी छूट हासिल नहीं है। पत्नी की इच्छा के खिलाफ यौन संबंध बनाने पर उसके खिलाफ बलात्कार का मुकदमा चलाया जा सकता है।

जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट अपवाद की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं करता, तब तक क्या अभियोजन की अनुमति दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि कोर्ट पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या अभियोजक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चला सकता है, जब IPC की धारा 375 में स्पष्ट रूप से अपवाद मौजूद था।

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