Ravi Beniwal

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06/06/2026

*🚨 किसान भाईयों सावधान! 🚨*

* *खरीफ फसलों की बुवाई में जल्दबाजी न करें एवं बीज खरीदते समय बरतें विशेष सावधानी*

* 🌧️ 20 जून से पूर्व खरीफ फसलों की बुवाई करने से बचें!

* *जल्दबाजी में बुवाई करने के नुकसान*

A. बीजों का कम अंकुरण
B. पुनः बुवाई का अतिरिक्त खर्च
C. कीट एवं रोगों का अधिक प्रकोप
D. खरपतवार की बढ़ती समस्या E. फसल की कमजोर बढ़वार
F. उत्पादन एवं आय में कमी

* *⏳ कम अवधि (80–100 दिन) वाली फसलों के लिए विशेष सावधानी*

* ⚠️ जून के प्रारम्भ में बुवाई करने पर फसल अगस्त के अंत अथवा सितंबर के प्रथम सप्ताह में पक जाती है। इस समय वर्षा जारी रहती है, जिससे कटाई के समय फसल के खेत में ही खराब होने की संभावना बढ़ जाती है।

* *कटाई के समय लगातार वर्षा से संभावित नुकसान*

🔸कटी हुई फसल सड़ सकती है।
🔸 दानों में फफूंद लग सकती है। 🔸 दाने बालियों में ही अंकुरित हो सकते हैं।
🔸 कटाई एवं मड़ाई में कठिनाई आती है।
🔸 मंडी में उचित भाव नहीं मिल पाता।

*🌾 कृषि विभाग की सलाह**:-

A. पर्याप्त एवं स्थायी वर्षा होने के बाद ही बुवाई करें।
B. खेत में पर्याप्त नमी होने पर ही बीज बोएँ।
C. मौसम पूर्वानुमान देखकर निर्णय लें।
D. कम अवधि वाली फसलों की बुवाई जून के अंतिम सप्ताह अथवा जुलाई के प्रथम सप्ताह में करना अधिक सुरक्षित है।

*🌱 खरीफ फसलों की बुवाई हेतु बीज खरीदते समय रखें ये सावधानियां*:-

*🚜 किसान भाई अवश्य ध्यान दें:-*

✅ केवल प्रमाणित एवं अनुशंसित किस्मों का बीज खरीदें।
✅ टैगयुक्त एवं सीलबंद पैकेट ही खरीदें।
✅ अंकुरण प्रतिशत, उत्पादन तिथि एवं वैधता अवधि अवश्य जांचें।
✅ अधिकृत विक्रेता (लाइसेंस) से खरीदकर पक्का बिल प्राप्त करें।
✅ अपने क्षेत्र एवं भूमि के अनुसार उपयुक्त किस्म का चयन करें।
✅ बुवाई से पूर्व बीजोपचार अवश्य करें।
✅ बिना लेबल, खुले अथवा संदिग्ध गुणवत्ता वाले बीज खरीदने से बचें।

*⚠️ विशेष सावधानी*:-

❌ केवल कम कीमत देखकर बीज न खरीदें।
❌ अप्रमाणित स्रोतों के दावों पर भरोसा न करें।
❌ बिना बिल के बीज न खरीदें।

🌱 सही समय पर बुवाई + सही बीज का चयन = अधिक उत्पादन एवं अधिक लाभ 🌱

✍️नोट:- ऐसी महत्वपूर्ण एवं उपयोगी जानकारी सभी जगह शेयर कर दिया करें *रोज ऐसी नई जानकारी हेतु आप *View Chennel* पर क्लिक कर हमें *Follow* कर सकते है

17/04/2026

पशु को ड्राई पीरियड (ब्याने से पहले का समय) में सही पोषण देना बहुत जरूरी है, क्योंकि यही समय होता है जब पशु अपने शरीर को अगले दूध के चक्र (lactation) के लिए तैयार करता है और गर्भ में पल रहे बच्चे का विकास भी तेजी से होता है।
पशु को स्वस्थ और "मोटा" (तंदुरुस्त) बनाने के लिए आप फीड में निम्नलिखित चीजें शामिल कर सकते हैं:

1. संतुलित दाना मिश्रण (Concentrate Mix)
सूखे समय में पशु को ऊर्जा और प्रोटीन की आवश्यकता होती है। आप घर पर बना यह मिश्रण दे सकते हैं:
अनाज (40%): मक्का, जौ या गेहूं का दलिया (ऊर्जा के लिए)।
खली (30%): बिनौला खल, सरसों की खल या सोयाबीन मील (प्रोटीन के लिए)।
चोकर/छिलका (25%): गेहूं का चोकर या चने का छिलका (फाइबर के लिए)।
गुड़: 100-200 ग्राम प्रतिदिन (ऊर्जा और स्वाद के लिए)।

2. मिनरल मिक्सचर (सबसे जरूरी)
ड्राई पीरियड में पशु के शरीर में खनिजों की कमी हो जाती है।
प्रतिदिन 50-60 ग्राम अच्छी कंपनी का मिनरल मिक्सचर जरूर दें।
इससे आने वाले समय में जेर (placenta) रुकने या मिल्क फीवर (कैल्शियम की कमी) जैसी समस्याएं नहीं होंगी।

3. फैट और चमक के लिए (Bypass Fat)
पशु के शरीर पर मास और चमक लाने के लिए:
बाइपास फैट (Bypass Fat): 50-100 ग्राम रोजाना। यह सीधे पशु के शरीर में लगता है और दूध बढ़ाने में मदद करता है।
मेथी और तारा मीरा: सीमित मात्रा में देने से पाचन ठीक रहता है।

4. हरा और सूखा चारा
सूखा चारा (Dry Fodder): तूड़ी या कड़बी पर्याप्त मात्रा में दें।
हरा चारा (Green Fodder): बहुत ज्यादा मात्रा में न दें, लेकिन पाचन के लिए 10-15 किलो हरा चारा जरूरी है।

5. कुछ विशेष सावधानियां
नमक: चारे में थोड़ा सा नमक जरूर मिलाएं।
डीवॉर्मिंग (पेट के कीड़े की दवा): ड्राई होने के तुरंत बाद पशु चिकित्सक की सलाह से पेट के कीड़ों की दवा जरूर दें। इसके बिना आप कितना भी अच्छा खिला लें, पशु मोटा नहीं होगा।
साफ पानी: पशु को दिन में कम से कम 3-4 बार साफ और ताजा पानी पिलाएं।

विशेष सुझाव: ब्याने से 15-20 दिन पहले 'ट्रांजिशन फीड' (Transition Feed) शुरू करना चाहिए ताकि पशु के थनों का विकास (Order quality) अच्छा हो और वह भारी दूध के लिए तैयार हो सके।

13/12/2025
गेहूँ की वृद्धि अवस्थाएँ: बेहतर प्रबंधन के लिए फसल विकास को समझनागेहूँ की वृद्धि अवस्थाओं को जानने से किसानों को सही समय...
12/12/2025

गेहूँ की वृद्धि अवस्थाएँ: बेहतर प्रबंधन के लिए फसल विकास को समझना

गेहूँ की वृद्धि अवस्थाओं को जानने से किसानों को सही समय पर पानी, पोषक तत्व और कीट या रोग नियंत्रण का प्रयोग करने में मदद मिलती है, जिससे उपज में 15-25 प्रतिशत की वृद्धि होती है।

गेहूँ की मुख्य वृद्धि अवस्थाएँ

1. अंकुरण और अंकुरण अवस्था (0-25 दिन)

* बीज पानी सोखते हैं, फूलते हैं और अंकुरित होते हैं।
* जड़ें और अंकुर विकसित होते हैं।
* प्रबंधन: मिट्टी में नमी सुनिश्चित करें, उपचारित बीजों का उपयोग करें और शुरुआती खरपतवारों को नियंत्रित करें।

2. टिलरिंग अवस्था (25-45 दिन)

* पौधा अतिरिक्त अंकुर उत्पन्न करता है जिन्हें टिलर्स कहा जाता है।
* प्रत्येक टिलर्स में एक दाना विकसित हो सकता है।
* प्रबंधन: नाइट्रोजन उर्वरक का पहला छिड़काव करें, एफिड्स और आर्मीवर्म की निगरानी करें।

3. तने का विस्तार / जोड़ अवस्था (45-65 दिन)

* तने लंबे हो जाते हैं और पत्तियाँ फैल जाती हैं।
* प्रबंधन: नाइट्रोजन का दूसरा छिड़काव, ज़रूरत पड़ने पर सिंचाई करें, रस्ट और पत्ती रोगों की निगरानी करें।

4. अंकुरण अवस्था (65-75 दिन)

* विकसित होने वाला शीर्ष पत्ती के आवरण में बंद होता है।
* प्रबंधन: कीटों और रोगों से सुरक्षा, मिट्टी की नमी बनाए रखें।

5. अंकुरण / पुष्पन अवस्था (75-85 दिन)

* पुष्पन होता है और परागण होता है।
* प्रबंधन: गिरने से बचाने के लिए अत्यधिक नाइट्रोजन से बचें, सावधानीपूर्वक सिंचाई करें, यदि आवश्यक हो तो कवकनाशी का प्रयोग करें।

6. दाना भरने / परिपक्वता अवस्था (85-120 दिन)

* दाना स्टार्च और प्रोटीन से भर जाता है।
* पोषक तत्वों के दानों में जाने पर पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं।
* प्रबंधन: परिपक्वता के समय सिंचाई कम करें, देर से होने वाले रोगों की निगरानी करें, कटाई की तैयारी करें।

अवस्थाओं को समझने का महत्व

* उर्वरक, सिंचाई और कीट नियंत्रण का सही समय पर उपयोग करने में मदद करता है।
* टिलर की उत्तरजीविता और दाने के वजन में सुधार करता है।
* रोगों, कीटों और सूखे से होने वाले नुकसान को कम करता है।
* कुल गेहूँ की उपज और गुणवत्ता को अधिकतम करता है।

विकास चरणों की निगरानी से यह सुनिश्चित होता है कि गेहूं की फसल को सही समय पर सही देखभाल मिले, जिससे पौधे अधिक स्वस्थ होंगे और अनाज का उत्पादन अधिक होगा।

*📍सरसों की बुवाई से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें:🌱 ये बहुत काम की बात है आप मानोगे और शेयर करोगे तो लोगो को बहुत लाभ मिलेगा* 1...
13/10/2025

*📍सरसों की बुवाई से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें:🌱 ये बहुत काम की बात है आप मानोगे और शेयर करोगे तो लोगो को बहुत लाभ मिलेगा*

1. *बीज का बीजोपचार*: सरसों की फसल को प्रारंभिक अवस्था से लेकर अंत तक कई रोगों और बीमारियों से बचाने के लिए बीजोपचार बहुत ही जरूरी है।

*बीजोपचार के लिए सिफारिशें:*

- *फफूंदनाशी दवा*: कार्बेंडाजिम 50% WP या Metalaxyl 8% + Mancozeb 64% का उपयोग करें, जो 3-4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से प्रभावी है। यह तना गलन (सफेद रोली रोग) से बचाती है।
- *कीटनाशक*: इमिडाक्लोरपीड 17.5 SL का उपयोग करें, जो 5 मिली/किलोग्राम बीज की दर से प्रभावी है।

2. *उर्वरकों का चयन*: DAP की जगह SSP (सिंगल सुपर फॉस्फेट) का उपयोग करना बेहतर हो सकता है, क्योंकि इसमें फॉस्फोरस के साथ-साथ सल्फर भी होता है, जो पौधों के लिए फायदेमंद है।

*इन सिफारिशों का पालन करके, आप अपनी सरसों की फसल को स्वस्थ और उत्पादक बना सकते हैं।*

सरसों की फसल में सल्फर (गंधक) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि यह तेल की मात्रा और दानों की गुणवत्ता को बढ़ाता है। ...
13/10/2025

सरसों की फसल में सल्फर (गंधक) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि यह तेल की मात्रा और दानों की गुणवत्ता को बढ़ाता है। सल्फर डालने का सही समय और तरीका निम्नलिखित है:

*📍सल्फर डालने का सही समय:*

1. *बुवाई के समय (बेसल डोज़):* सल्फर को बुवाई के समय ही मिट्टी में मिला देना सबसे अच्छा होता है। यह पौधे को शुरुआत से ही सल्फर की आवश्यकता को पूरा करता है।
2. *टॉप ड्रेसिंग (जरूरत हो तो):* यदि मिट्टी में सल्फर की कमी हो, तो 30-35 दिन बाद जब पौधे में 5-6 पत्तियाँ आ जाएं या फूल आने से पहले टॉप ड्रेसिंग की जा सकती है।

*📍सल्फर की मात्रा प्रति एकड़:*

- 10-12 किलो सल्फर (S) की आवश्यकता होती है।
- यदि सल्फर युक्त खाद का उपयोग कर रहे हैं, तो मात्रा इस प्रकार रखें:
- बेंटोनाइट सल्फर (90%): 12-15 किलो प्रति एकड़
- जिप्सम (18% S): 60-70 किलो प्रति एकड़

*📍सल्फर देने का तरीका:*

- *बुवाई के समय:* अन्य खादों (DAP, यूरिया, पोटाश) के साथ मिलाकर मिट्टी में मिला दें।
- *टॉप ड्रेसिंग के समय:* बारीक पाउडर वाली सल्फर मिट्टी में हल्की सिंचाई के साथ डालें ताकि पौधे को जल्दी अवशोषण हो।

*📍महत्वपूर्ण बातें:*

- सल्फर को बीज के सीधे संपर्क में न आने दें।
- सिंचाई के बाद या नमी वाली मिट्टी में सल्फर डालना बेहतर होता है।
- सल्फर की कमी से पत्तियाँ पीली और छोटी रह जाती हैं, फूल और फली कम लगती है।

*नोट:- ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी के लिए Chennel पर क्लिक कर *Follow* करें

🌾 (TSP vs SSP)"TSP या SSP — कौन सी खाद आपकी फसल के लिए सही?" 🌱क्या आप जानते हैं❓👉 SSP (Single Super Phosphate) में लगभग ...
13/10/2025

🌾 (TSP vs SSP)

"TSP या SSP — कौन सी खाद आपकी फसल के लिए सही?" 🌱

क्या आप जानते हैं❓
👉 SSP (Single Super Phosphate) में लगभग 16% फॉस्फोरस और 12% सल्फर होता है।
👉 जबकि TSP (Triple Super Phosphate) में 46% फॉस्फोरस होता है लेकिन सल्फर नहीं।

✅ सल्फर पसंद फसलें (सरसों, प्याज, लहसुन, चना) ➜ SSP बेहतर है
✅ फॉस्फोरस चाहने वाली फसलें (गेहूँ, मक्का, धान) ➜ TSP उपयुक्त है

💡 सही खाद का चुनाव = ज़्यादा उत्पादन और कम खर्चा!
🌾

*बुवाई से पूर्व भूमि में ट्राइकोडर्मा मिलाना:*चने की फसल में उकठा रोग की समस्या को कम करने के लिए बुवाई से पूर्व भूमि मे...
13/10/2025

*बुवाई से पूर्व भूमि में ट्राइकोडर्मा मिलाना:*

चने की फसल में उकठा रोग की समस्या को कम करने के लिए बुवाई से पूर्व भूमि में ट्राइकोडर्मा मिलाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। ट्राइकोडर्मा एक प्रकार का कवक है जो मिट्टी में पाए जाने वाले हानिकारक कवकों को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसके अलावा, यह मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार करता है और पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देता है।

*ट्राइकोडर्मा का उपयोग करने का तरीका:*

1. *बुवाई से पूर्व:* ट्राइकोडर्मा को मिट्टी में मिलाने से पहले इसकी मात्रा का ध्यान रखें और इसे अच्छी तरह से मिट्टी में मिला दें।
2. *मात्रा:* ट्राइकोडर्मा की मात्रा मिट्टी की प्रकृति और फसल की आवश्यकता के अनुसार तय की जानी चाहिए।
3. *मिश्रण:* ट्राइकोडर्मा को गोबर की खाद या अन्य जैविक पदार्थों के साथ मिलाकर मिट्टी में मिलाने से इसकी प्रभावशीलता बढ़ सकती है।

चने की फसल में उकठा रोग की समस्या को कम करने के लिए ट्राइकोडर्मा का उपयोग एक प्रभावी और पर्यावरण अनुकूल तरीका हो सकता है। इसके अलावा, चने की उच्च उत्पादक किस्मों का चयन करके और उचित कृषि पद्धतियों का पालन करके भी फसल की उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है।

किस्में हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में उगाई जा सकती हैं। इनमें से कुछ प्रमुख किस्में निम्नलिखित हैं:--

*📍चने की प्रमुख किस्में:*

1. *पूसा मानव*: यह एक लोकप्रिय किस्म है जो उच्च उत्पादन क्षमता और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए जानी जाती है।
2. *RVG 202*: यह किस्म भी उच्च उत्पादन क्षमता और विभिन्न रोगों के प्रति सहनशीलता के लिए प्रसिद्ध है।
3. *फुले बिक्रम*: यह किस्म महाराष्ट्र में बहुतायत में उगाई जाती है और इसकी उत्पादन क्षमता बहुत अधिक होती है।
4. *JG 130*: यह एक और महत्वपूर्ण किस्म है जो विभिन्न क्षेत्रों में उगाई जाती है और इसकी उत्पादन क्षमता भी बहुत अच्छी होती है।
5. *GNG 2171, GNG 2461, GNG 1958, GNG 2144, और GNG 2207*: ये सभी किस्में उच्च उत्पादन क्षमता और विभिन्न रोगों के प्रति सहनशीलता के लिए जानी जाती हैं।

🌾DBW-327 (करण शिवानी) गेहूं की टॉप किस्म – किसानों की पहली पसंददोस्तों, अगर आप सिंचाई वाले इलाकों में गेहूं की खेती करते...
13/10/2025

🌾DBW-327 (करण शिवानी) गेहूं की टॉप किस्म – किसानों की पहली पसंद

दोस्तों, अगर आप सिंचाई वाले इलाकों में गेहूं की खेती करते हैं —
तो DBW-327 (करण शिवानी) आपके लिए एक बेहतरीन और ज्यादा उपज देने वाली किस्म है 👇
🌱मुख्य विशेषताएँ:-

✅ औसत पैदावार – 31 क्विंटल प्रति एकड़
✅ अधिकतम पैदावार – 35 क्विंटल तक
✅ पकने की अवधि – लगभग 155 दिन
✅ पौधे की ऊँचाई – 95 से 100 सेमी
✅ बीज की मात्रा – 40 किलो प्रति एकड़
✅ सिंचाई – 5 से 6 बार जरूरी (पहली सिंचाई 20–25 दिन बाद)
✅ चपाती गुणवत्ता – बहुत बढ़िया
✅ जिंक और आयरन की मात्रा अधिक
✅ गर्मी और सूखा सहनशील किस्म

⚠️ध्यान दें:-

❌ यह किस्म सिंचित खेतों के लिए ही उपयुक्त है
❌ खेत में अच्छी नमी, सही खाद और रोग नियंत्रण जरूरी है

👉 बुवाई का सही समय:-
🗓️ *20 अक्टूबर से 5 नवंबर तक*

💬 किसान भाइयों, अगर आप गेहूं में ज्यादा उत्पादन और बढ़िया गुणवत्ता चाहते हैं,
तो इस सीजन DBW-327 (करण शिवानी) ज़रूर लगाएँ 🌾

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25/06/2025

राजस्थान को बेहाल कर सकता है 26 जून का दिन, 11 जिलों में अति भारी-12 जिलों में भारी बारिश की चेतावनी

मौसम विभाग जयपुर

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