Akash kumar

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15/08/2020
07/02/2020

क्यूरेटिव पिटीशन...
क्यूरेटिव पिटीशन और कब इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. क्यूरेटिव पिटीशन तब दाखिल की जाती है, जब किसी मुजरिम की राष्ट्रपति के पास भेजी गई दया याचिका और सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी जाती है. ऐसे में क्यूरेटिव पिटीशन उस मुजरिम के पास मौजूद अंतिम मौका होता है, जिसके ज़रिए वह अपने लिए सुनिश्चित की गई सज़ा में नरमी की गुहार लगा सकता है.
क्यूरेटिव पिटीशन किसी भी मामले में अभियोग की अंतिम कड़ी होता है, इसमें फैसला आने के बाद मुजरिम के लिए आगे के सभी रास्ते बंद हो जाते हैं. आमतौर पर राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज करने के बाद कोई भी मामला खत्म हो जाता है, लेकिन 1993 के बॉम्बे सीरियल ब्लास्ट मामले में दोषी याकूब अब्दुल रज़्ज़ाक मेमन के मामले में ये अपवाद हुआ और राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज करने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने क्यूरेटिव पिटीशन पर सुनवाई करने की मांग स्वीकार की थी.
क्यूरेटिव पिटीशन की शुरुआत कब हुई ये हम आपको बताते है. क्यूरेटिव पिटीशन की अवधारणा साल 2002 में रूपा अशोक हुरा बनाम अशोक हुरा और अन्य मामले की सुनवाई के दौरान हुई. बहस के दौरान जब ये पूछा गया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद भी क्या किसी दोषी को राहत मिल सकती है. नियम के मुताबिक ऐसे मामलों में पीड़ित व्यक्ति रिव्यू पिटीशन डाल सकता है लेकिन सवाल ये पूछा गया कि अगर रिव्यू पिटीशन भी खारिज कर दिया जाता है तो क्या किया जाए. तब सुप्रीम कोर्ट अपने ही द्वारा दिए गए न्याय के आदेश को फिर से उसे दुरुस्त करने लिए क्यूरेटिव पिटीशन की धारणा लेकर सामने आई.
क्यूरेटिव पिटीशन के तहत सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसलों पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हो गई. वास्तव में Curative Petition शब्द का जन्म ही Cure शब्द से है, जिसका मतलब होता है उपचार. क्यूरेटिव पिटीशन में ये बताना ज़रूरी होता है कि आख़िर वो किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती कर रहा है.
क्यूरेटिव पिटीशन किसी सीनियर वकील द्वारा सर्टिफाइड होना ज़रूरी होता है, जिसके बाद इस पिटीशन को सुप्रीम कोर्ट के तीन सीनियर मोस्ट जजों और जिन जजों ने फैसला सुनाया था, उनके पास भी भेजा जाना ज़रूरी होता है. अगर इस बेंच के ज़्यादातर जज इस बात से इत्तेफाक़ रखते हैं कि मामले की दोबारा सुनवाई होनी चाहिए तब क्यूरेटिव पिटीशन को वापस उन्हीं जजों के पास भेज दिया जाता है.
Akash Agrahari
Advocate
9415579332

07/02/2020

#देशभर में हज़ारोंं लोग प्रतिवर्ष लॉ ग्रेजुएट होकर आते हैंं। अलग अलग राज्यों की अधिवक्ता सूची में शामिल होकर विधि व्यवसाय आरंभ करते हैंं, परन्तु वकालत नितांत चुनौतीपूर्ण पेशा है। इस पेशे में लाइम लाइट के साथ चुनौतियां भी बहुत हैं। यदि इस पेशे में थोड़ी गंभीरता रख ली जाए तो आपका भविष्य स्वर्णिम है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने सुप्रीम कोर्ट बार के एक समागम में कहा था, "वकीलों को कोई लड़की नहीं देना चाहता।" पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर के इस बयान में तर्क तो है। समाज में वकीलों की अंधाधुंध भीड़ बढ़ने से इस पेशे की किरकिरी तो हुई है, परंतु फिर भी कुछ मार्ग ऐसे हैं, जिसमे आप इस नोबल पेशे को अपनाकर अपना स्वर्णिम भविष्य गढ़ सकते हैं। नोबेल प्रोफेशन वकालत सदा से नोबेल पेशा रहा है।

#ब्रिटेन में भी संपन्न घरों के लोग वकालत किया करते थे। वकीलों के पहने जाने वाले गाउन में पीछे दो पॉकेट हुआ करते थे। वकील जिन लोगो की पैरवी करते थे, वे लोग अपनी आस्था के हिसाब से उन पॉकेट में जो होता था, वह धन डाल देते थे। क्या कहता है अधिवक्ता अधिनियम 1961, जानिए खास बातें वकील अपने इस पारिश्रमिक को सहर्ष स्वीकार करते थे। एक अर्थ में वकील का पेशा धनवान शिक्षित लोगों द्वारा अपनाया जाने वाला सेवार्थ पेशा हुआ करता था। कालांतर में इस पेशे के अर्थ बदलते गए और वर्तमान में यह पेशा अपने नितांत अलग परिदृश्य के साथ हमारे सामने है। वकालत से लाइम लाइट आज यह पेशा लाइम लाइट का ज़रिया भी है। देशभर का कोई ऐसा अखबार नहीं है जो कानून और न्यायलय पर कोई ख़बर न लिखता हो। इस लाइम लाइट से प्रभावित होकर बहुत से लोग इस पेशे में आते हैं लेकिन ऐसा भी देखा गया है कि वे चुनौती झेल नहीं पाते और बहुत जल्द इस पेशे से स्वीच भी कर जाते हैं।

#आज हम उन बिंदुओं पर बात करेंगे, जिनको अभ्यास में लाकर कोई भी लॉ ग्रेजुएट अपनी वकालत चमका सकता है। या इसे कह सकते हैं कि एक सफल वकील बनने के लिए कौन सी खूबियां होनी चाहिए।

#वाकपटुता और बोलने की कला- यदि आपमे बोलने की असाधारण स्किल्स हैं तो आप इस पेशे में सफल हो सकते हैं। वाकपटुता के साथ बोलने वालों के लिए यह पेशा सार्थक है। शब्दों को बांधकर और तौलकर कहिये। कोई भी बात तर्क पर और व्यवस्थित होना चाहिए। अपने निजी जीवन में भी अनावश्यक टिप्पणी से बचिए। शब्दों का चयन अच्छा रखिए और लगभग सभी शब्दों को उसके ठीक उच्चारण के साथ कहिये।

#साहित्य और विधि पर अधिक से अधिक पढ़ना- पढ़ना वकालत के लिए ऐसा है जैसे शरीर के लिए प्रोटीन। वकील को निरंतर अभ्यास और पढ़ने की आवश्यकता होती है। पढ़ने पर व्यय किये समय को वकील को निवेश समझना चाहिए। पढ़ने से आदमी की तर्क शक्ति का जन्म होता है और नए नए शब्दों को मस्तिष्क कंठस्थ करता है। इन शब्दों का प्रयोग वक़ील न्यायालयों में की जाने वाली बहस में कर सकता है। संसदीय शब्दों पर अधिक बल दिया जाना चाहिए। लेखन कला, रेडीमेड फॉर्मेट से बचें यदि आप पढ़ने के साथ स्वयं में लेखन कला को विकसित करते हैं तो यह भी सार्थक प्रयोग होगा। वकील न्यायालय में बहस के साथ ही ड्राफ्टिंग में भी करता है। जितनी सार्थक और गूढ़ गहन ड्राफ्टिंग होगी, उतना लाभ अपने वाद में प्राप्त कर सकते हैं।

#बिना वकील के आप खुद भी लड़ सकते हैं अपना मुकदमा, यह है प्रक्रिया गहन चिंतन के साथ अपना पक्ष रखते हुए लिखी ड्राफ्टिंग पर न्यायधीश भी रुककर विचार करते हैं। पृथक सृजनशीलता के साथ की गई ड्राफ्टिंग रोचक होती है। न्यायधीशगण उसे पढ़ते भी हैं। न्यायधीश जितने आपकी लेखन शैली से प्रभावित होंगे, आपकी बात उतनी शक्ति के साथ बोर्ड पर रखी जाएगी तथा उतनी ही शक्ति आपके वाद को भी मिलेगी। वकीलों को रेडीमेड फॉर्मेट को अपने वादों में प्रयोग करने से बचना चाहिए।

#प्रैक्टिस यहां से शुरू करें नए लॉ ग्रेजुएट को इस बात पर अधिक ध्यान देना चाहिए कि उन्हें अपनी वकालत की प्रैक्टिस कहां से शुरू करनी चाहिए। यह उनके लिए सार्थक परामर्श सिद्ध हो सकता है। किसी भी विश्वविद्यालय से स्नातक होते ही अपने मूल कस्बे या नगर के न्यायालय से ही वकालत आरंभ करना चाहिए। व्यक्ति जिस नगर कस्बे में जन्म लेता और स्कूली शिक्षा लेता है उस नगर कस्बे में उसके अधिक संर्पक होते हैं और वकालत संपर्कों पर निर्भर होती है। मुख्यतः नातेदार और मित्रगण ही हमारे लिए काम लेकर आते हैं। अंजान और नए शहरों में प्रारम्भ में वकालत करने से बचना चाहिए।

#प्रारंभ में सत्र एवं जिला न्यायालय में वकालत करें- जिला एवं सत्र न्यायालय नए नए लॉ में स्नातक होकर वकील हुए व्यक्ति के लिए मां समान है। फर्स्ट क्लास कोर्ट मां के समान सिखाती है। नए लोग लाइम लाइट के लिए बड़े शहरों में स्थापित उच्च न्यायालय और भारत के उच्चतम न्यायालय की ओर रुख करते हैं, परन्तु वे निचली अदालत के काम काज से कोसों दूर होते हैं। ऐसे लोग संक्षिप्त विचारण और सत्र विचारण तक मे अंतर नहीं समझ पाते। उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय केवल अपीलीय न्यायायल हैं। वहां केवल विधि के बिंदुओं पर विचार किया जाता है, जबकि निचली अदालत विचारण करती है एवं वाद का संचालन करती है। पहले विचारण और वाद के संचालन की प्रकिया को समझना चाहिए फिर विधि के बिंदु जैसे विषय पर ध्यान देना चाहिए।

#व्यवस्थित रहना- जिस न्यायालय में हम काम कर रहे हैं। वहां पूरी तरह व्यवस्थित रहने के प्रयास करने चाहिए। समय से पहले न्यायालय में पहुंचा जाए। साफ सुथरी वेशभूषा रखी जाए और कभी भी वक़ील की वेशभूषा से इतर वेशभूषा नहीं पहनें। न्यायधीश के बोर्ड पर जाते समय बैंड्स का ध्यान रखना चाहिए। कभी भी अपनी जेब पैन और मार्कर से खाली से नहीं रहना चाहिए।

#प्रारंभ में किसी सीनियर वकील के सहायक बनें- न्यायालय में सीधे अपने वाद लेकर नहीं जाना चाहिए। कुछ वर्ष सीनियर वकील के साथ सहायक की भूमिका में रहना चाहिए। सीनियर वक़ील का चयन करते समय बड़े प्रसिद्ध और लोकप्रिय वकील के स्थान पर ऐसे वकीलों का चयन करें, जहां आप शांति के साथ कम काम मे काम सीख सकें। लाइम लाइट से वशीभूत होकर नए स्नातक ऐसा मार्ग पकड़ते हैं, जहां वे चर्चा में रह सकें पर ऐसा विचार रखना ठीक नहीं है। लाइम लाइट के स्थान पर अपने भविष्य का ध्यान रखें। सीनियर वकील की वकील डायरी को मैंटन करें और समय पर तारीख लें जिससे न्यायायल की प्रक्रिया समझ पाएं।

#अधिक लोगो से मिले और सामाजिक कार्यो में आगे रहें- अधिक लोगो से संपर्क साधने के प्रयास करना चाहिए और ऐसे सामाजिक मंचो पर अधिक सक्रिय रहना चाहिए, जहां से आपकी वकील की इमेज लोगो तक पहुंचे। यह सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आप जितने लोगो से संपर्क रखेंगे, उतनी माउथ पब्लिसिटी होगी और उतना ही काम आप तक आएगा।

#छोटे वादों पर ध्यान दें- सीखने के उद्देश्य से छोटे वादों पर ध्यान देना चाहिए। प्रारम्भ में कोई व्यवस्थित आदमी अपना वाद किसी नए वकील को नहीं देता है। हर व्यक्ति चाहता है उसके वाद में कोई निषांत अधिवक्ता पैरवी करे, इसलिए छोटे मामले जैसे मारपीट, वसूली, भरण पोषण, कुटुंब न्यायालय के विवाह विच्छेद के मामले, चैक बाउंस इत्यादि पर पर पकड़ बना कर प्रक्रिया को समझने का प्रयास करें। प्रारंभ में आपको निःशुल्क भी काम करना पड़ सकता है।

#धैर्य रखें- किसी नए वकील के लिए वकालत की शुरुआत करने वाला ज़माना बेहद चुनौतीपूर्ण रहता है। लंबे समय तक आप संघर्षकाल में रहते हैं। ऐसी अवधि में धैर्य बनाये रखें और जीवन को फ़िज़ूलख़र्ची से दूर रखें। समय के साथ आप भी धन अर्जित करेंगे। इस समय को अपना निवेश समझें। इसके अलावा कुछ साधारण बिंदु भी हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए अच्छे से लोगों की बात सुनें ,कोई भी व्यक्ति व्यर्थ नहीं कहता। प्रत्येक व्यक्ति कोई न कोई ज्ञान से प्रेरित करके जाता ही है। अच्छे फैसले लें और प्रज्ञा, विवेक इत्यादि का सदैव प्रयोग करते रहें। किसी भी मामले पर अच्छा विश्लेषण करें फिर अपनी बात रखें। अलग अलग मुकदमों की फाइल पढ़ने की आदत डालें। इन बिंदुओं पर विचार कर आप सुनहरे भविष्य और भविष्य के बड़े नामी वक़ील के रूप में खुद स्थापित कर सकते हैं।
Akash Agrahari
Advocate
9415579332

03/02/2020

परिचय

भारत में पर्यावरण संरक्षण का इतिहास बहुत पुराना है। हडप्पा संस्कृति पर्यावरण से ओत-प्रोत थी, तो वैदिक संस्कृति पर्यावरण-संरक्षण हेतु पर्याय बनी रही। भारतीय मनीषियों ने समूची प्रकृति ही क्या, सभी प्राकृतिक शक्तियों को देवता स्वरूप माना। ऊर्जा के स्त्रोत सूर्य को देवता माना तथा उसको ‘सूर्य देवो भव’ कहकर पुकारा। भारतीय संस्कृति में जल को भी देवता माना गया है। सरिताओं को जीवन दायिनी कहा गया है, इसीलिए प्राचीन संस्कृतियां सरिताओं के किनारे उपजीं और पनपी। भारतीय संस्कृति में केला, पीपल, तुलसी, बरगद, आम आदि पेड पौधों की पूजा की जाती रही है। मध्यकालीन एवं मुगलकालीन भारत में भी पर्यावरण प्रेम बना रहा। अंग्रेजों ने भारत में अपने आर्थिक लाभ के कारण पर्यावरण को नष्ट करने का कार्य प्रारंभ किया। विनाशकारी दोहन नीति के कारण पारिस्थितिकीय असंतुलन भारतीय पर्यावरण में ब्रिटिश काल में ही दिखने लगा था। स्वतंत्र भारत के लोगों में पश्चिमी प्रभाव, औद्योगीकरण तथा जनसंख्या विस्फोट के परिणामस्वरूप तृष्णा जाग गई जिसने देश में विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों को जन्म दिया।

स्वतंत्र भारत में पर्यावरण नीतियां तथा कानून
भारतीय संविधान जिसे 1950 में लागू किया गया था परन्तु सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण के प्रावधानों से नहीं जुड़ा था। सन् 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन ने भारत सरकार का ध्यान पर्यावरण संरक्षण की ओर खिंचा। सरकार ने 1976 में संविधान में संशोधन कर दो महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद 48 ए तथा 51 ए (जी) जोड़ें। अनुच्छेद 48 ए राज्य सरकार को निर्देश देता है कि वह ‘पर्यावरण की सुरक्षा और उसमें सुधार सुनिश्चित करे, तथा देश के वनों तथा वन्यजीवन की रक्षा करे’। अनुच्छेद 51 ए (जी) नागरिकों को कर्तव्य प्रदान करता है कि वे ‘प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे तथा उसका संवर्धन करे और सभी जीवधारियों के प्रति दयालु रहे’। स्वतंत्रता के पश्चात बढते औद्योगिकरण, शहरीकरण तथा जनसंख्या वृद्धि से पर्यावरण की गुणवत्ता में निरंतर कमी आती गई। पर्यावरण की गुणवत्ता की इस कमी में प्रभावी नियंत्रण व प्रदूषण के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने समय-समय पर अनेक कानून व नियम बनाए। इनमें से अधिकांश का मुख्य आधार प्रदूषण नियंत्रण व निवारण था।

पर्यावरणीय कानून व नियम निम्नलिखित हैं:
जलु प्रदूषण संबंधी-कानून
रीवर बोडर्स एक्ट, 1956
जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण ) अधिनियम, 1974
जल उपकर (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण ) अधिनियम, 1977
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
वायु प्रदूषण संबंधी कानून
फैक्ट्रीज एक्ट, 1948
इनफ्लेमेबल्स सबस्टा

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