09/04/2025
क्या रविंद्र सिंह भाटी के प्रभाव को तोड़ने की कोशिश है यह पंचायत पुनर्गठन? या फिर सिर्फ एक प्रशासनिक संयोग?
राजस्थान के बाड़मेर ज़िले में पंचायत समितियों के हालिया पुनर्गठन ने एक बार फिर बाड़मेर की राजनीति के तापमान को बढ़ा दिया है। निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी के प्रभाव वाले गांवों को जिस तरह अलग-अलग पंचायत समितियों में बांटा गया है, उसने पूरे इलाके में चर्चा और संशय दोनों को जन्म दिया है।
भाटी का पैतृक गांव दुधोड़ा, हरसाणी. अब रामसर पंचायत समिति में डाल दिया गया है। वहीं हरसाणी और तानु मानजी को गिराब, फोगेरा को किराडू और मगरा को गडरा रोड पंचायत समिति में शामिल किया गया है। स्थानीय लोग इसे केवल ‘प्रशासनिक सुविधा’ नहीं मान रहे, बल्कि इसे एक सोची-समझी ‘सियासी सर्जरी’ कहा जा रहा है, जिसका मकसद भाटी के राजनीतिक प्रभाव को छिन्न-भिन्न करना हो सकता है।
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस पुनर्गठन में सिर्फ भाटी ही नहीं, बल्कि उनके प्रतिद्वंद्वी भी इसकी चपेट में आए हैं। कांग्रेस के पूर्व विधायक, जिन्होंने विधानसभा चुनाव में भाटी के खिलाफ चुनाव लड़ा था, उनके गांव देतानी को भी रामसर पंचायत समिति में जोड़ा गया है। वहीं, निर्दलीय फतह ख़ान, जो उसी चुनाव में मैदान में थे, पहले से रामसर समिति का हिस्सा हैं। यानी भाजपा ने अप्रत्यक्ष रूप से तीनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों को एक ही प्रशासनिक ढांचे में ला दिया है. जो महज़ इत्तेफाक नहीं लगता।
रविंद्र सिंह भाटी, जो शिव विधानसभा से निर्दलीय विधायक हैं और हाल ही में बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट से भी निर्दलीय प्रत्याशी रहे, भाजपा के लिए लगातार असहज करने वाली चुनौती बने हुए हैं। उनकी स्वतंत्र राजनीतिक शैली और जनाधार से सरकार असहज होती दिख रही है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह प्रशासनिक निर्णय राजनीतिक मंशा से प्रेरित है? और क्या भाटी व सरकार के बीच यह टकराव भविष्य में और गहराएगा, या दोनों पक्ष यह समझेंगे कि यह लड़ाई अब एक-दूसरे को नुकसान पहुंचा रही है?