Advocate Vivek Pal Tiger

Advocate Vivek Pal Tiger अधिवक्ता उच्च न्यायालय, इलाहाबाद, अधिवक्ता , उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ।
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15 साल साथ रहे, बच्चा भी है। अब शादी नहीं हुई तो रेप का आरोप कैसे...?  — सुप्रीम कोर्टमामले की पृष्ठभूमि:एक महिला ने अपन...
28/04/2026

15 साल साथ रहे, बच्चा भी है। अब शादी नहीं हुई तो रेप का आरोप कैसे...? — सुप्रीम कोर्ट

मामले की पृष्ठभूमि:

एक महिला ने अपने लिव-इन पार्टनर (जो पहले से शादीशुदा था) पर शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाने और रेप/यौन शोषण का आरोप लगाया! दोनों करीब 15 साल तक साथ रहे (लिव-इन रिलेशनशिप में) उनके बीच एक बच्चा (लगभग 7 साल का) भी है।

रिश्ता टूटने के बाद महिला ने पुलिस में FIR दर्ज कराई, जिसमें रेप, मारपीट आदि के आरोप लगाए गए।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पहले ही आरोपी के खिलाफ FIR को रद्द (quash) कर दिया था।

महिला ने सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की।

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ (Justice B.V. Nagarathna की बेंच):

सहमति का सवाल: जब दोनों वयस्क थे और 15 साल तक आपसी सहमति से साथ रहे, तो अब रिश्ता टूटने पर उसे रेप कैसे माना जा सकता है? “Where is the question of offence when there is a consensual relationship?”

बच्चे का होना: अगर सहमति से बच्चा पैदा हुआ, तो 15 साल बाद “शादी नहीं हुई तो रेप” का आरोप लगाना तर्कसंगत नहीं।

समय का फैक्टर: 15 साल तक शादी की मांग क्यों नहीं की? इतने लंबे समय तक बिना शादी के साथ रहने का मतलब यह नहीं कि शुरू से ही “झूठा वादा” था।

लिव-इन रिलेशनशिप का जोखिम: कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में शादी जैसी कानूनी सुरक्षा नहीं होती। यह एक जोखिम भरा रिश्ता है। अगर महिला बिना शादी के इतने साल साथ रही, तो बाद में इसे यौन शोषण कहना मुश्किल है।

कोर्ट ने महिला को नसीहत भी दी कि ऐसे मामलों में पीड़ित को ही शर्मिंदा न समझा जाए, लेकिन तथ्यों को देखना जरूरी है।

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“हक पर मुहर ⚖️ — तलाकशुदा बेटी की मृत्यु के बाद मां होगी समझौता राशि की हकदार!” Advocate Vivek Pal Tiger       095596 95...
28/04/2026

“हक पर मुहर ⚖️ — तलाकशुदा बेटी की मृत्यु के बाद मां होगी समझौता राशि की हकदार!”

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केस का नाम: A (Mother of X) vs State of Maharashtraयह SLP (C) No. 4774/2026 है।बेंच: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज...
25/04/2026

केस का नाम: A (Mother of X) vs State of Maharashtra

यह SLP (C) No. 4774/2026 है।

बेंच: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां।

फैसला: 6 फरवरी 2026 को दिया गया।

इसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल की नाबालिग लड़की (जो अब 18 साल की हो चुकी है) को 28-30 हफ्ते की अनचाही प्रेग्नेंसी समाप्त करने की अनुमति दी और कहा कि कोई कोर्ट उसे जबरन गर्भ नहीं रखने के लिए मजबूर कर सकती।

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बॉम्बे उच्च न्यायालय ने पूर्व सैनिकों और अधिवक्ताओं को बेवजह हथकड़ी लगाने को उनका अपमान करार देते हुए 50000 का जुर्माना ...
25/04/2026

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने पूर्व सैनिकों और अधिवक्ताओं को बेवजह हथकड़ी लगाने को उनका अपमान करार देते हुए 50000 का जुर्माना ठोका!

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“झूठे आरोप पर सख्ती ⚖️ — कोर्ट: दुष्कर्म के आरोप से मुकरने पर युवती को भी उतनी ही सजा भुगतनी होगी!” Advocate Vivek Pal T...
24/04/2026

“झूठे आरोप पर सख्ती ⚖️ — कोर्ट: दुष्कर्म के आरोप से मुकरने पर युवती को भी उतनी ही सजा भुगतनी होगी!”

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आज लंच के समय कैंटीन में अधिवक्ता साथियों के साथ वर्तमान समय में इलाहाबाद हाईकोर्ट में व्याप्त समस्याओं तथा अधिवक्ता हित...
24/04/2026

आज लंच के समय कैंटीन में अधिवक्ता साथियों के साथ वर्तमान समय में इलाहाबाद हाईकोर्ट में व्याप्त समस्याओं तथा अधिवक्ता हितों पर परिचर्चा हुई! इस मौके पर उपस्थित रहे पूर्व कोषाध्यक्ष बड़े भाई अधिवक्ता श्री आशीष मिश्रा जी, श्री जनार्दन यादव जी, श्री श्याम मोहन सिंह जी आदि!

श्री जनार्दन यादव जी आगामी इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन चुनाव में कार्यकारिणी सदस्य के प्रत्याशी रहेंगे! हम सभी अधिवक्ता साथियों ने इन्हे तन मन धन से समर्थन करने का भरोसा दिलाया!

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DNA टेस्ट में पिता न होने पर भरण-पोषण नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने मां की अपील खारिज की !सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कहा है कि ...
24/04/2026

DNA टेस्ट में पिता न होने पर भरण-पोषण नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने मां की अपील खारिज की !

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कहा है कि यदि डीएनए परीक्षण से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही बच्चा वैवाहिक संबंध के दौरान जन्मा हो।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने मां द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

मामले का विवरण

पक्षकारों की शादी 2016 में हुई थी। बाद में विवाद उत्पन्न होने पर महिला ने घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत अपने और बच्चे के लिए अंतरिम भरण-पोषण की मांग की।

सुनवाई के दौरान पति की मांग पर डीएनए परीक्षण कराया गया, जिसमें यह सामने आया कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है। इसके आधार पर ट्रायल कोर्ट ने बच्चे के लिए भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया, जिसे अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्यतः कानून के तहत विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को वैध माना जाता है, लेकिन जब डीएनए टेस्ट जैसी वैज्ञानिक जांच से पितृत्व स्पष्ट रूप से खारिज हो जाए और उस रिपोर्ट को चुनौती भी न दी गई हो, तो ऐसे साक्ष्य को प्राथमिकता दी जाएगी।

बच्चे के हितों पर निर्देश

हालांकि, कोर्ट ने बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश दिया कि वह बच्चे की स्थिति—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण—का आकलन करे और आवश्यक होने पर सहायता सुनिश्चित करे।

अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के मामलों में जैविक संबंध महत्वपूर्ण है और वैज्ञानिक साक्ष्य के सामने पारंपरिक कानूनी धारणा टिक नहीं सकती।

केस का नाम: निकहत परवीन @ खुशबू खातून बनाम रफीक @ शिल्लू

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जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पति के साथ शादी के बाहर संबंध रखने वाली महिला रणबीर दंड संहिता (RPC)...
22/04/2026

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पति के साथ शादी के बाहर संबंध रखने वाली महिला रणबीर दंड संहिता (RPC) की धारा 498-A (जो IPC की धारा 498-A के बराबर है) के तहत "रिश्तेदार" नहीं मानी जाएगी। इसलिए उस प्रावधान के तहत उस पर क्रूरता या उत्पीड़न का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

कोर्ट ने एक महिला के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। इस महिला पर पति की प्रेमिका होने का आरोप था और उसे परिवार के अन्य सदस्यों के साथ इस मामले में आरोपी बनाया गया। इस मामले में शिकायतकर्ता पत्नी ने दहेज की मांग और मानसिक उत्पीड़न के अस्पष्ट और सामान्य आरोप लगाए।

कोर्ट जम्मू-कश्मीर CrPC की धारा 561-A (CrPC की धारा 482) के तहत दायर दो संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। इन याचिकाओं में ऊधमपुर के महिला पुलिस थाने में RPC की धारा 498-A और 506 के तहत दर्ज FIR, चार्जशीट और आरोप तय करने वाले आदेश को रद्द करने की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं में पति, उसके माता-पिता, भाई, भाभी, बहन और एक महिला (आरती देवी) शामिल थे, जिस पर पति की प्रेमिका होने का आरोप है।

जस्टिस शहजाद अजीम की बेंच ने 'U. Suvetha बनाम State by Inspector of Police' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए यह टिप्पणी की:

"किसी भी तरह से कोई गर्लफ्रेंड या यहां तक ​​कि शाब्दिक अर्थ में कोई रखैल भी 'रिश्तेदार' की श्रेणी में नहीं आती। 'रिश्तेदार' शब्द अपने दायरे में एक विशेष 'दर्जा' (Status) समेटे हुए है। ऐसा दर्जा किसी को दिया जाना अनिवार्य है।"

शिकायतकर्ता पेशे से पुलिसकर्मी है। उसने वर्ष 2016 में याचिकाकर्ता नंबर 5 (जो सेना में कार्यरत है) से शादी की थी। शादी के सात महीने के भीतर ही उसने शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उसने अपने ससुराल वालों पर क्रूरता, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न, तथा दहेज की मांग करने का आरोप लगाया। साथ ही उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके पति ने आरती देवी के साथ अवैध संबंध बना लिए हैं।

पुलिस ने FIR दर्ज की और चार्जशीट दाखिल की। ट्रायल कोर्ट ने RPC की धारा 498-A और 506 के तहत आरोप तय किए।

याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि पति ने पत्नी की FIR से पहले ही—यानी 2016 में—हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह रद्द करने के लिए याचिका और पत्नी के खिलाफ RPC की धारा 420/506 के तहत एक आपराधिक शिकायत दायर की।

उन्होंने यह दलील दी कि वर्तमान कार्यवाही केवल एक जवाबी कार्रवाई (counter-blast) है।

Case Title: Mela Ram & Ors. Vs State of J&K & Anr. Arti Devi Vs State of J&K & Anr.

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मामला: प्रयागराज के परिवार न्यायालय (Family Court) ने पति को पत्नी को ₹4,000 प्रति माह अंतरिम गुजारा भत्ता (interim main...
22/04/2026

मामला: प्रयागराज के परिवार न्यायालय (Family Court) ने पति को पत्नी को ₹4,000 प्रति माह अंतरिम गुजारा भत्ता (interim maintenance) देने का आदेश दिया था (CrPC धारा 125 के तहत)। पति ने अपनी गरीबी का हवाला देकर इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा। इसी फैसले में कोर्ट ने वो सख्त टिप्पणी की!

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वादा किया तो निभाना पड़ेगा!नही तो जेल जाना पड़ेगा !
20/04/2026

वादा किया तो निभाना पड़ेगा!
नही तो जेल जाना पड़ेगा !

⚖️ पुरस्कार राशि न मिलने पर छात्रा पहुंची हाईकोर्ट: इलाहाबाद HC ने मांगे निर्देशने प्रयागराज की छात्रा दीक्षा मिश्रा द्व...
20/04/2026

⚖️ पुरस्कार राशि न मिलने पर छात्रा पहुंची हाईकोर्ट: इलाहाबाद HC ने मांगे निर्देश

ने प्रयागराज की छात्रा दीक्षा मिश्रा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित अधिकारियों से निर्देश (instructions) तलब किए हैं। मामला जिला स्तरीय चित्रकला प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने के बावजूद घोषित पुरस्कार राशि न मिलने से जुड़ा है।

📌 क्या है पूरा मामला?
याचिका के अनुसार—
• उत्तर प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा “सेवा पखवाड़ा-2025” के तहत 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2025 तक विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं
• 29 सितंबर 2025 को प्रयागराज में जिला स्तरीय चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित हुई
• याचिकाकर्ता ने वरिष्ठ वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त किया

💰 पुरस्कार राशि का विवाद
👉 प्रतियोगिता के लिए ₹51,000 की पुरस्कार राशि घोषित थी
👉 लेकिन जीत के बावजूद अब तक भुगतान नहीं किया गया

⚖️ अदालत की कार्रवाई
खंडपीठ—
👨‍⚖️ न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव
👩‍⚖️ न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद

ने आदेश दिया कि—
• अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता संबंधित अधिकारियों से जानकारी प्राप्त करें
• अगली सुनवाई में कोर्ट के समक्ष स्पष्ट रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए

📅 अगली सुनवाई
मामले की अगली तारीख 23 अप्रैल 2026 निर्धारित की गई है

📢 कानूनी महत्व
✔️ यह मामला दर्शाता है कि प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ नागरिक न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं
✔️ सरकार द्वारा घोषित योजनाओं/पुरस्कारों का समय पर भुगतान सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है
✔️ कोर्ट ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है

📚 Case Title: Diksha Mishra v. State of U.P. & Ors.

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⚖️ POCSO मामलों को रद्द (Quash) करने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने तय किए अहम सिद्धांतDelhi High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले मे...
18/04/2026

⚖️ POCSO मामलों को रद्द (Quash) करने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने तय किए अहम सिद्धांत

Delhi High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि किन परिस्थितियों में POCSO Act के तहत दर्ज मामलों को रद्द (quash) किया जा सकता है—खासकर उन मामलों में जहां संबंध सहमति (consensual) और बाद में विवाह या आपसी समझौते में बदल गया हो।

📌 क्या था मामला?
अदालत के सामने ऐसे कई मामले आए, जहां—
• लड़का-लड़की के बीच संबंध सहमति से था
• बाद में दोनों ने शादी कर ली या साथ रहने लगे
• पीड़िता (victim) ने किसी प्रकार के शोषण या ज़बरदस्ती से इनकार किया

ऐसे मामलों में अदालत ने यह तय करने के लिए गाइडलाइन/प्रिंसिपल्स तय किए कि FIR को जारी रखा जाए या रद्द किया जाए।

⚖️ हाईकोर्ट द्वारा तय मुख्य सिद्धांत (Principles):

🔹 1. वास्तविक शोषण (Exploitation) होना ज़रूरी है
यदि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हो कि संबंध सहमति से था और किसी प्रकार का दबाव या शोषण नहीं था, तो मामला जारी रखना उचित नहीं।

🔹 2. पीड़िता का स्पष्ट बयान महत्वपूर्ण
यदि पीड़िता खुद कहती है कि—
👉 उसे कोई नुकसान नहीं हुआ
👉 संबंध उसकी इच्छा से था
तो अदालत इस पहलू को गंभीरता से देखेगी।

🔹 3. ‘Revictimisation’ से बचाव
अगर मुकदमा चलाने से पीड़िता को और मानसिक/सामाजिक नुकसान (revictimisation) होता है, तो केस रद्द किया जा सकता है।

🔹 4. विवाह या स्थायी संबंध एक महत्वपूर्ण फैक्टर
यदि दोनों पक्ष अब शादीशुदा हैं या स्थायी रिश्ते में हैं, तो अदालत इस सामाजिक वास्तविकता को भी ध्यान में रखती है।

🔹 5. कानून का उद्देश्य – सुरक्षा, न कि दंड हर हाल में
कोर्ट ने दोहराया कि POCSO का मकसद बच्चों को यौन शोषण से बचाना है, न कि हर सहमति वाले रिश्ते को अपराध बना देना।

🔹 6. तथ्यों का गहराई से परीक्षण जरूरी
हर केस अपने तथ्यों पर निर्भर करेगा—कोर्ट बिना जांच के सिर्फ समझौते के आधार पर केस खत्म नहीं करेगी।

⚠️ महत्वपूर्ण सीमा (Limitations):
👉 POCSO में 18 वर्ष से कम उम्र की “सहमति” कानूनी रूप से मान्य नहीं होती
👉 कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि हर “near-majority” या किशोर प्रेम संबंध को स्वतः वैध नहीं माना जा सकता

📢 अदालत का संतुलित दृष्टिकोण:
👉 जहां शोषण है → सख्त कार्रवाई
👉 जहां वास्तविक प्रेम संबंध और कोई नुकसान नहीं → न्यायिक विवेक से राहत

🧾 कानूनी संदेश:
क्रिमिनल लॉ का उद्देश्य वास्तविक अपराधों को दंडित करना है, न कि सहमति आधारित संबंधों को जबरन अपराध में बदलना।

📚 Case Title: X v. State (NCT of Delhi) & Anr. (POCSO Quashing Principles Case)

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