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📞 8318038295 | कानून के समुद्र में गोता लगाते हुए दिन रात SLPs| Writs |Criminal Trials| करते हुए और Hon'ble High Courts ,Supreme Court के फैसलों पर नजर बनाए हुए है।
मेरे ओपिनियन पर सन्देह नहीं करना , मेरी राय आपका आने वाले विधिक संकटों से जरूर बचाएगी ।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 — धारा 7 | माँग एवं स्वीकृति का सिद्धांतभ्रष्टाचार के प्रकरण में "माँग" और "स्वीकृति" दो...
13/03/2026

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 — धारा 7 | माँग एवं स्वीकृति का सिद्धांत
भ्रष्टाचार के प्रकरण में "माँग" और "स्वीकृति" दोनों सिद्ध होना आवश्यक है। परन्तु यदि माँग किसी एक आरोपी द्वारा की गई हो और स्वीकृति भी उसी के द्वारा हुई हो, तो धारा 7 के अंतर्गत उसकी स्वतंत्र दोषसिद्धि वैध है — भले ही सह-आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया हो।

2. भारतीय दंड संहिता — धारा 120B | षड्यंत्र एवं स्वतंत्र दायित्व

षड्यंत्र (conspiracy) सिद्ध न होने पर भी किसी आरोपी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत स्वतंत्र रूप से दोषी ठहराया जा सकता है, यदि उसके विरुद्ध माँग व स्वीकृति का पृथक आरोप विद्यमान हो और साक्ष्य से सिद्ध हो।

3. साक्ष्य विधि — ट्रैप गवाहों की विश्वसनीयता

ट्रैप कार्यवाही में भाग लेने वाले गवाह (PW1/शिकायतकर्ता एवं TLO) "साझेदार अपराधी" (accomplice) नहीं माने जाते। उनकी गवाही को सावधानीपूर्वक जाँचने के बाद, यदि विश्वसनीय पाई जाए तो, स्वतंत्र साक्ष्य के साथ अभिनिश्चित की जा सकती है। [State of Bihar v. Basawan Singh, AIR 1958 SC 500; Prakash Chand v. State, (1979) 3 SCC 90; Neeraj Dutta v. State, (2023) 4 SCC 731 — अनुमोदित]

यदि स्वतंत्र गवाह (PW10 व PW18) आंशिक रूप से शत्रुतापूर्ण हो जाएँ, तो उनके साक्ष्य का वह भाग जो विश्वसनीय हो, दोषसिद्धि का आधार बन सकता है। गवाही को पूर्णतः निरस्त नहीं किया जा सकता।

यदि A2 ने कहा कि रिश्वत A1 की ओर से माँगी गई, तो इस कथन के आधार पर A1 को दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता। सह-आरोपी के विरुद्ध सह-आरोपी के कथन पर्याप्त साक्ष्य नहीं होते।

भारत का सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)

निर्णय की तिथि: 10 मार्च, 2026
[2026 INSC 221 | CBI बनाम बलजीत सिंह | SLP (Crl.) No.12486/2025 |

#भ्रष्टाचार_विरोध #सुप्रीम_कोर्ट_इंडिया #न्याय_की_जीत #रिश्वत_नहीं #भ्रष्टाचार_निवारण_अधिनियम िभाग #कानूनी_जागरूकता

क्या रजिस्ट्रार आपकी प्रॉपर्टी की सेल डीड रद्द कर सकता है?  क्या आप जानते हैं कि अगर आपकी जमीन या मकान की रजिस्ट्री (Sal...
12/03/2026

क्या रजिस्ट्रार आपकी प्रॉपर्टी की सेल डीड रद्द कर सकता है?

क्या आप जानते हैं कि अगर आपकी जमीन या मकान की रजिस्ट्री (Sale Deed) को लेकर कोई विवाद है, तो उसका फैसला कौन करेगा?

अक्सर लोग शिकायत लेकर सीधे रजिस्ट्रार ऑफिस पहुंच जाते हैं, लेकिन मद्रास हाई कोर्ट ने एक बहुत ही जरूरी बात साफ कर दी है।

हाल ही में गुरुमूर्ति बनाम जिला रजिस्ट्रार (2026 LiveLaw (Mad) 109) के मामले में कोर्ट ने कहा है कि रजिस्ट्रार कोई 'जज' नहीं है! कोर्ट ने साफ किया कि पंजीकरण अधिकारी के पास यह पावर नहीं है कि वह आपके दीवानी अधिकारों (Civil Rights) का फैसला करे या आपकी सेल डीड को रद्द कर दे। यह काम सिर्फ और सिर्फ सिविल कोर्ट का है।

मामला क्या था?
एक जिला रजिस्ट्रार ने धोखाधड़ी के आरोपों के आधार पर तीन सेल डीड को रद्द कर दिया था। जब यह मामला हाई कोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट ने कहा कि रजिस्ट्रार ने अपनी मर्यादा लांघी है। कोर्ट के मुताबिक, "अगर धोखाधड़ी रिकॉर्ड पर एकदम साफ दिख रही है, तभी रजिस्ट्रार कुछ कर सकता है, वरना उसे मामला सिविल कोर्ट को ही भेजना चाहिए।"

समझौता करने से भी नहीं धुलेंगे भ्रष्टाचार के दाग! बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला।नमस्कार दोस्तों! आज एक बहुत ही जरूरी कान...
12/03/2026

समझौता करने से भी नहीं धुलेंगे भ्रष्टाचार के दाग! बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला।
नमस्कार दोस्तों! आज एक बहुत ही जरूरी कानूनी अपडेट पर चर्चा करते हैं जो हम सबके लिए जानना बेहद आवश्यक है।
अक्सर हमें लगता है कि अगर शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच सुलह हो जाए, तो मामला खत्म हो जाता है। लेकिन क्या भ्रष्टाचार (Corruption) जैसे गंभीर मामलों में भी ऐसा संभव है? हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने 'सचिन बनाम महाराष्ट्र राज्य' (Case No. 1482/2025) के मामले में इस पर एक कड़ा रुख अपनाया है।
मामला क्या था?
एक वकील साहब पर आरोप था कि उन्होंने पुलिस अधिकारियों के नाम पर कैदी को सुविधाएं दिलाने के लिए रिश्वत की मांग की। पुलिस ने वॉयस रिकॉर्डिंग और सबूतों के आधार पर केस दर्ज किया। बाद में, शिकायतकर्ता और आरोपी वकील के बीच 'सेटलमेंट' हो गया और उन्होंने कोर्ट से गुहार लगाई कि अब तो हमारा समझौता हो गया है, इसलिए केस बंद कर दिया जाए।
कोर्ट ने क्या कहा?
माननीय न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फालके ने साफ शब्दों में कहा कि भ्रष्टाचार कोई निजी झगड़ा नहीं है जिसे हाथ मिलाकर सुलझा लिया जाए। कोर्ट ने इसे समाज के लिए 'कैंसर' बताया और कहा कि ऐसे मामलों में Zero Tolerance की नीति अपनानी होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (P.C. Act) के तहत दर्ज FIR को महज समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता।
यह फैसला याद दिलाता है कि कानून की नजर में ईमानदारी सर्वोपरि है। अगर सबूत मौजूद हैं, तो 'सेटलमेंट' का बहाना काम नहीं आएगा!
आप इस फैसले के बारे में क्या सोचते हैं? कमेंट्स में जरूर बताएं। ✍️

शादी तोड़ने की इजाज़त देने वाले रिवाज की खास तौर पर दलील दी जानी चाहिए और सख्ती से साबित किया जाना चाहिए; सिर्फ़ सेटलमें...
11/03/2026

शादी तोड़ने की इजाज़त देने वाले रिवाज की खास तौर पर दलील दी जानी चाहिए और सख्ती से साबित किया जाना चाहिए; सिर्फ़ सेटलमेंट डीड या फ़रख़तनामा करने से J&K हिंदू मैरिज एक्ट, 1980 के तहत कानूनी शादी तलाक़ के आदेश या सही रिवाज़ के सबूत के बिना खत्म नहीं हो सकती।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट, जम्मू बेंच ने 6 मार्च 2026 को सरिता देवी बनाम मोहन सिंह (CRM(M) No. 444/2020) मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। ⚖️
मामला क्या था?
पति-पत्नी की शादी 1990 में हुई। 1995 में दोनों के बीच समझौता हुआ, पत्नी ने ₹10,000 लेकर सभी दावे वापस लिए और अलग रहने लगी। इसके बाद सालों तक पत्नी ने खुद को "तलाकशुदा" बताया — अदालत में, लोक अदालत में, हर जगह। लेकिन जब पति को सरकारी नौकरी मिली, तो उन्होंने फिर से गुज़ारा भत्ते का दावा ठोक दिया।
कोर्ट ने क्या कहा?
माननीय न्यायमूर्ति संजय परिहार ने स्पष्ट किया —
रीति-रिवाज़ से तलाक साबित नहीं हुआ, इसलिए कानूनी तौर पर शादी बरकरार है।
लेकिन! धारा 488(5) CrPC के तहत — अगर पत्नी आपसी सहमति से अलग रह रही है, तो वो गुज़ारा भत्ते की हकदार नहीं।
अदालत में बार-बार दिए गए बयान खुद के खिलाफ सबूत माने जाते हैं।
एक तरफ तलाक का दावा करना और दूसरी तरफ भत्ते की मांग — यह "एस्टॉपल" का सिद्धांत लागू करता है यानी अपने ही बयानों से पलटा नहीं जा सकता।

कोर्ट ने कहा — महिला के पास आय का कोई साधन नहीं, बेटे पर निर्भर है। इसलिए अपनी अंतर्निहित शक्ति (Section 482 CrPC) का उपयोग करते हुए कोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वो ₹2.50 लाख एकमुश्त 6 महीने में दे। न देने पर 6% ब्याज भी देना होगा।

केस विवरण:
सरिता देवी बनाम मोहन सिंह
CRM(M) No. 444/2020 c/w CRM(M) No. 279/2021
उच्च न्यायालय, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, जम्मू
न्यायमूर्ति: श्री संजय परिहार
निर्णय दिनांक: 06.03.2026
उद्धरण: 2026:JKLHC-JMU:734

#गुजाराभत्ता #हिंदीकानून

पत्रकार के खिलाफ धोखाधड़ी (धारा 420) के आरोप रद्द; जबरन वसूली (धारा 384) के तहत मुकदमा जारीअक्सर पत्रकारों के खिलाफ जबरन...
08/03/2026

पत्रकार के खिलाफ धोखाधड़ी (धारा 420) के आरोप रद्द; जबरन वसूली (धारा 384) के तहत मुकदमा जारी
अक्सर पत्रकारों के खिलाफ जबरन वसूली (Extortion) या धोखाधड़ी (Cheating) के मामले दर्ज किए जाते हैं, लेकिन कानून की बारीकियों को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। इस मामले में माननीय उच्च न्यायालय ने एक बहुत ही स्पष्ट कानूनी रेखा खींची है।

मामले की पृष्ठभूमि

एक पत्रकार पर आरोप था कि उसने एक निर्माण कार्य को अवैध बताते हुए, उसके संबंध में समाचार प्रकाशित न करने के बदले ₹10,000 की मांग की थी। इस आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 384 (जबरन वसूली) और धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत मामला दर्ज किया था।

1. धारा 420 (धोखाधड़ी) को रद्द करना:
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से माना कि यहाँ 'धोखाधड़ी' का कोई मामला नहीं बनता। इसका कारण यह है कि शिकायतकर्ता को किसी झूठ के माध्यम से गुमराह नहीं किया गया था, बल्कि उसे डराया गया था।
कानूनी बिंदु: जहाँ कोई छल (Deception) नहीं होता, वहाँ धारा 420 लागू नहीं की जा सकती।

2. धारा 384 (जबरन वसूली) का जारी रहना:
चूंकि आरोप 'प्रतिष्ठा को नुकसान' पहुँचाने का डर दिखाकर पैसे मांगने का था, इसलिए अदालत ने इसे 'जबरन वसूली' (Extortion) की श्रेणी में रखा। कोर्ट ने आदेश दिया कि इस धारा के तहत कानूनी कार्यवाही जारी रहेगी क्योंकि यह एक गंभीर आरोप है।

अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि धोखाधड़ी और जबरन वसूली में अंतर होता है:
धोखाधड़ी (420): इसमें पीड़ित को झूठ बोलकर या छल करके संपत्ति देने के लिए प्रेरित किया जाता है।
जबरन वसूली (384): इसमें पीड़ित को भय या चोट (मानसिक या शारीरिक) के डर में डालकर संपत्ति देने के लिए मजबूर किया जाता है।

आज के कानूनी दौर में एक बहुत बड़ा सवाल उठ रहा था: क्या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के आने के बाद, चेक बाउंस (Sect...
08/03/2026

आज के कानूनी दौर में एक बहुत बड़ा सवाल उठ रहा था: क्या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के आने के बाद, चेक बाउंस (Section 138 NI Act) के मामलों में मजिस्ट्रेट को संज्ञान (Cognizance) लेने से पहले आरोपी को सुनना जरूरी है?
कर्नाटक हाईकोर्ट के हालिया फैसले (Ashok vs Fayaz Aahmad) NC: 2025:KHC-D:6966
CRL.P No. 101514 of 2025 ने इस पर स्थिति साफ कर दी है।

मामला क्या था?
दरअसल, BNSS की धारा 223 में एक नया प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट बिना आरोपी को सुने संज्ञान नहीं लेगा। इसी का फायदा उठाकर याचिकाकर्ता ने चेक बाउंस केस को चुनौती दी थी क्योंकि उसे संज्ञान से पहले सुना नहीं गया था।

कोर्ट का फैसला:

कोर्ट ने साफ कहा कि Negotiable Instruments Act एक 'विशेष कानून' (Special Statute) है और इसके अपने नियम हैं। कोर्ट के मुख्य बिंदु ये रहे:
विशेष कानून की प्रधानता: NI Act एक स्पेशल लॉ है, इसलिए BNSS के सामान्य नियम इस पर लागू नहीं होंगे।

चेक बाउंस के मामले 'समरी ट्रायल' के जरिए जल्दी निपटाए जाते हैं। अगर हर केस में संज्ञान से पहले आरोपी को सुना जाने लगा, तो न्याय में बहुत देरी होगी।
मजिस्ट्रेट को चेक बाउंस केस में संज्ञान लेने के लिए आरोपी को नोटिस देना जरूरी नहीं है।
यह फैसला उन लोगों के लिए बड़ी राहत है जिनके पैसे चेक बाउंस की वजह से फंसे हुए हैं। कानून की सही जानकारी ही आपका सबसे बड़ा हथियार है! 💡
आपकी इस बारे में क्या राय है? कमेंट में जरूर बताएं। 👇

#चेकबाउंस

कलकत्ता हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: सबूतों के अभाव में दहेज हत्या के आरोपी बरी!नमस्ते दोस्तों! आज एक बहुत ही महत्वपूर्ण कान...
07/03/2026

कलकत्ता हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: सबूतों के अभाव में दहेज हत्या के आरोपी बरी!

नमस्ते दोस्तों! आज एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी अपडेट आपके साथ साझा कर रहा हूँ जो हमारे देश की न्याय व्यवस्था और 'सबूतों की अहमियत' को दर्शाता है। हाल ही में कलकत्ता हाई कोर्ट ने पूर्णा चंद्र राउल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

मामला क्या था?

एक महिला की मृत्यु के बाद उसके ससुराल वालों पर दहेज उत्पीड़न (धारा 498A) और आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306) का आरोप लगा था। निचली अदालत ने उन्हें दोषी भी मान लिया था, लेकिन जब मामला हाई कोर्ट पहुँचा, तो तस्वीर पूरी तरह बदल गई।

कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस प्रसेनजीत विश्वास ने पाया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने ट्रायल के दौरान पोस्टमार्टम रिपोर्ट को आधिकारिक तौर पर पेश (Exhibit) ही नहीं किया था!
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
पोस्टमार्टम रिपोर्ट एक बुनियादी दस्तावेजी सबूत है। इसके बिना केवल डॉक्टर की गवाही से मौत की वजह साबित नहीं मानी जा सकती।
अगर मौत का कारण ही स्पष्ट नहीं है, तो आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप कैसे टिक सकता है?
गवाहों के बयानों में काफी विरोधाभास था और दहेज की मांग के कोई ठोस सबूत नहीं मिले।

सीख: कानून भावनाओं पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों और प्रक्रियाओं पर चलता है। एक छोटी सी प्रक्रियात्मक चूक (Procedural Lapse) पूरे केस की जड़ें हिला सकती है।

Purna Chandra Raul v. State of West Bengal (Neutral Citation: 2026:CHC-AS:362)

आपका इस फैसले पर क्या सोचना है? क्या जांच एजेंसियों की ये लापरवाही न्याय में देरी का कारण बनती है? कमेंट्स में बताएं! 👇

Court

अक्सर देखने में आता है कि चेक बाउंस (NI Act 138) के मामलों में लोग दूर-दराज के इलाकों में केस कर देते हैं और मजिस्ट्रेट ...
06/03/2026

अक्सर देखने में आता है कि चेक बाउंस (NI Act 138) के मामलों में लोग दूर-दराज के इलाकों में केस कर देते हैं और मजिस्ट्रेट बिना सोचे-समझे दूसरे शहर में रहने वाले आरोपी को समन भेज देते हैं।

उत्तराखंड हाईकोर्ट के जस्टिस आशीष नैथानी ने हाल ही में साफ किया है कि CrPC की धारा 202 कोई मामूली औपचारिकता (Hollow Formality) नहीं है। यह एक मज़बूत सुरक्षा कवच है!

मामला क्या था?
एक व्यक्ति जो नैनीताल का रहने वाला था, उसके खिलाफ ऊधम सिंह नगर (खटीमा) की अदालत में चेक बाउंस का केस हुआ। मजिस्ट्रेट ने बिना किसी जांच-पड़ताल के सीधे समन जारी कर दिया। हाईकोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यदि आरोपी कोर्ट के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से बाहर रहता है, तो मजिस्ट्रेट के लिए यह अनिवार्य है कि वह समन जारी करने को 'टाल' दे और पहले खुद पूछताछ करे या पुलिस से जांच करवाए।

अदालत की मुख्य बातें:

धारा 202 में "करेगा" शब्द का इस्तेमाल है, जिसका मतलब है कि मजिस्ट्रेट के पास इसे न मानने का कोई विकल्प नहीं है।
बिना जांच के समन भेजना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

कोर्ट ने इसी आधार पर समन ऑर्डर और चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया।

तो याद रखिये, कानून आपकी सुरक्षा के लिए है। अगर आपके साथ भी ऐसा कुछ हो रहा है जहाँ बिना प्रारंभिक जांच के आपको दूर की अदालत से समन मिल गया है, तो आप इस कानूनी प्रावधान का लाभ उठा सकते हैं।

पश्चिम बंगाल के एक न्यायिक अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, जिन्होंने पारिवारिक विवाद में अपने पद का गलत इस्तेमाल किया...
06/03/2026

पश्चिम बंगाल के एक न्यायिक अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, जिन्होंने पारिवारिक विवाद में अपने पद का गलत इस्तेमाल किया।

क्या पद और पावर का इस्तेमाल व्यक्तिगत रंजिश निकालने के लिए किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस पर बेहद सख्त रुख अपनाया है।
मामला पश्चिम बंगाल का है, जहाँ एक न्यायिक अधिकारी (जज) ने अपने ही भाई के खिलाफ जालसाजी का केस दर्ज कराने के लिए पुलिस के पास जाने के बजाय सीधे 'मजिस्ट्रेट रूट' का रास्ता चुना। मामला भाई द्वारा जमा की गई एक एलएलएम (LLM) शोध-पत्रिका में फर्जी हस्ताक्षर और सील से जुड़ा था।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच इस बात से काफी नाराज दिखी। कोर्ट ने इसे "न्यायिक पद का सबसे बड़ा दुरुपयोग" करार दिया और यहाँ तक कह दिया कि "ऐसे जज को घर भेज देना चाहिए।" 🏛️

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पहले ही इस केस को खारिज कर दिया था, और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कर दिया कि एक जज को अपने व्यक्तिगत मामलों में एक आम नागरिक की तरह ही प्रक्रिया का पालन करना चाहिए, न कि अपने ओहदे का फायदा उठाना चाहिए। अंततः जज को अपनी अपील वापस लेनी पड़ी।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि कानून सबके लिए बराबर है। न्याय की कुर्सी पर बैठने वाले से समाज और भी ज्यादा नैतिकता की उम्मीद करता है।

आपकी इस बारे में क्या राय है? क्या रसूखदार पदों पर बैठे लोगों के लिए नियम और भी सख्त होने चाहिए? कमेंट्स में बताएं! 👇

अगर आप दोस्त की गाड़ी मांगकर चला रहे हैं और दुर्घटना हो जाती है, तो आप "थर्ड पार्टी" (तीसरा पक्ष) नहीं माने जाएंगे।मंजुब...
06/03/2026

अगर आप दोस्त की गाड़ी मांगकर चला रहे हैं और दुर्घटना हो जाती है, तो आप "थर्ड पार्टी" (तीसरा पक्ष) नहीं माने जाएंगे।

मंजुबेन बनाम सिराजभाई के मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गाड़ी उधार लेने वाला व्यक्ति कानून की नजर में "मालिक की जगह" ले लेता है। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 163A के तहत, जो बिना गलती साबित किए मुआवजे का प्रावधान देती है, अब बीमा कंपनी से क्लेम करना संभव नहीं होगा।

अदालत का तर्क सरल है: आप एक ही समय में गाड़ी के 'मालिक' और 'थर्ड पार्टी पीड़ित' दोनों नहीं हो सकते। जब तक दूसरी दोषी गाड़ी के मालिक या बीमा कंपनी को केस में शामिल नहीं किया जाता, तब तक उधार ली गई गाड़ी के बीमा से मुआवजा नहीं मिल पाएगा।

सावधानी बरतें और दूसरों की गाड़ी चलाने से पहले कानूनी जोखिमों को जरूर समझें!

Citation 2026:GUJHC:13229
Case Title: Manjuben Alias Manjulaben Shantilal Garasia & Ors. v. Sirajbhai Imamuddin Luhar & Anr.
Court: High Court of Gujarat
Bench: Justice Nisha M. Thakore

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