13/03/2026
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 — धारा 7 | माँग एवं स्वीकृति का सिद्धांत
भ्रष्टाचार के प्रकरण में "माँग" और "स्वीकृति" दोनों सिद्ध होना आवश्यक है। परन्तु यदि माँग किसी एक आरोपी द्वारा की गई हो और स्वीकृति भी उसी के द्वारा हुई हो, तो धारा 7 के अंतर्गत उसकी स्वतंत्र दोषसिद्धि वैध है — भले ही सह-आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया हो।
2. भारतीय दंड संहिता — धारा 120B | षड्यंत्र एवं स्वतंत्र दायित्व
षड्यंत्र (conspiracy) सिद्ध न होने पर भी किसी आरोपी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत स्वतंत्र रूप से दोषी ठहराया जा सकता है, यदि उसके विरुद्ध माँग व स्वीकृति का पृथक आरोप विद्यमान हो और साक्ष्य से सिद्ध हो।
3. साक्ष्य विधि — ट्रैप गवाहों की विश्वसनीयता
ट्रैप कार्यवाही में भाग लेने वाले गवाह (PW1/शिकायतकर्ता एवं TLO) "साझेदार अपराधी" (accomplice) नहीं माने जाते। उनकी गवाही को सावधानीपूर्वक जाँचने के बाद, यदि विश्वसनीय पाई जाए तो, स्वतंत्र साक्ष्य के साथ अभिनिश्चित की जा सकती है। [State of Bihar v. Basawan Singh, AIR 1958 SC 500; Prakash Chand v. State, (1979) 3 SCC 90; Neeraj Dutta v. State, (2023) 4 SCC 731 — अनुमोदित]
यदि स्वतंत्र गवाह (PW10 व PW18) आंशिक रूप से शत्रुतापूर्ण हो जाएँ, तो उनके साक्ष्य का वह भाग जो विश्वसनीय हो, दोषसिद्धि का आधार बन सकता है। गवाही को पूर्णतः निरस्त नहीं किया जा सकता।
यदि A2 ने कहा कि रिश्वत A1 की ओर से माँगी गई, तो इस कथन के आधार पर A1 को दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता। सह-आरोपी के विरुद्ध सह-आरोपी के कथन पर्याप्त साक्ष्य नहीं होते।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
निर्णय की तिथि: 10 मार्च, 2026
[2026 INSC 221 | CBI बनाम बलजीत सिंह | SLP (Crl.) No.12486/2025 |
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