Shobhit yadav

Shobhit yadav एडवोकेट शोभित यादव उच्च न्यायालय इला?

29/01/2022
30/08/2021

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं |
🙏💐

शोभित यादव
अधिवक्ता
इलाहाबाद उच्च न्यायालय
मो०- 8115296086

11/08/2021

दहेज निरोधक कानून
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दहेज प्रताड़ना और ससुराल में महिलाओं पर अत्याचार के दूसरे मामलों से निबटने के लिए कानून में सख्त प्रावधान किए गए हैं। महिलाओं को उसके ससुराल में सुरक्षित वातावरण मिले, कानून में इसका पुख्ता प्रबंध है। दहेज प्रताड़ना से बचाने के लिए 1986 में आईपीसी की धारा 498-ए का प्रावधान किया गया है। इसे दहेज निरोधक कानून कहा गया है। अगर किसी महिला को दहेज के लिए मानसिक, शारीरिक या फिर अन्य तरह से प्रताड़ित किया जाता है तो महिला की शिकायत पर इस धारा के तहत केस दर्ज किया जाता है। इसे संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। साथ ही यह गैर जमानती अपराध है। दहेज के लिए ससुराल में प्रताड़ित करने वाले तमाम लोगों को आरोपी बनाया जा सकता है।
सजा: इस मामले में दोषी पाए जाने पर अधिकतम 3 साल तक कैद की सजा का प्रावधान है। वहीं अगर शादीशुदा महिला की मौत संदिग्ध परिस्थिति में होती है और यह मौत शादी के 7 साल के दौरान हुआ हो तो पुलिस आईपीसी की धारा 304-बी के तहत केस दर्ज करती है। 1961 में बना दहेज निरोधक कानून रिफॉर्मेटिव कानून है। दहेज निरोधक कानून की धारा 8 कहता है कि दहेज देना और लेना संज्ञेय अपराध है। दहेज देने के मामले में धारा-3 के तहत मामला दर्ज हो सकता है और इस धारा के तहत जुर्म साबित होने पर कम से कम 5 साल कैद की सजा का प्रावधान है। धारा-4 के मुताबिक, दहेज की मांग करना जुर्म है।
शोभित यादव
अधिवक्ता उच्च न्यायालय इलाहाबाद
मो० 8115296086

Sh
25/07/2021

Sh

23/07/2021

वारंट के साथ तलाशी और बिना वारंट के तलाशी में क्या अंतर होता है ,

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (Code of Criminal Procedure, 1973) भारत में आपराधिक कानून के क्रियान्यवन के लिये मुख्य कानून है. यह सन् 1973 में पारित हुआ तथा 1 अप्रैल 1974 से लागू हुआ. ' CrPC ' दंड प्रक्रिया संहिता का संक्षिप्त नाम है.

जब कोई अपराध किया जाता है, तो सदैव दो प्रक्रियाएं होती हैं, जिन्हें पुलिस अपराध की जांच करने में अपनाती है. एक प्रक्रिया पीड़ित के संबंध में और दूसरी आरोपी के संबंध में होती है. CrPC में इन दोनों प्रकार की प्रक्रियाओं का ब्योरा दिया गया है. दंड प्रक्रिया संहिता के द्वारा ही अपराधी को दंड दिया जाता है.

वारंट का सीधा मतलब होता है अधिकार पत्र जबकि सर्च वारंट का मतलब होता है “खोजने का अधिकार” अर्थात तलाशी वारंट.

तलाशी वारंट किसे कहते हैं?
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तलाशी वारंट जारी करने का अधिकार किसी मजिस्ट्रेट या जज या किसी अन्य योग्य अथॉरिटी को होता है. इस वारंट में पुलिस अधिकारियों को यह अधिकार दिया जाता है कि वे किसी स्थान जैसे वाहन, ऑफिस, मकान, गोदाम या किसी अन्य जगह के साथ-साथ किसी व्यक्ति विशेष की तलाशी भी ले सकते हैं और सम्बंधित लोगों से पूछताछ कर सकते हैं.

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में 2 तरह से तलाशी लेने के अधिकार दिए गये हैं,

1. तलाशी वारंट के साथ तलाशी

2. बिना वारंट के तलाशी

1. तलाशी वारंट के साथ तलाशी:

दण्ड प्रक्रिया संहिता के सेक्शन 93,94,95 और 97 के अंतर्गत तलाशी वारंट जारी किया जाता है. इस प्रकार के तलाशी वारंट के अंतर्गत पुलिस या उसके अधिकारी आपके घर, दुकान या मकान पर आएंगे और आपको मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया गया वारंट दिखायेंगे कि किस आधार पर आपके घर की तलाशी ली जा रही है.

सर्च वारंट जारी करने के उद्येश्य क्या होते हैं;
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1. किसी दस्तावेज का वस्तु को प्राप्त करने या उपलब्ध करवाने के लिए

2. ऐसे किसी घर की तलाशी लेना जहाँ पर कोई चुरायी गयी संपत्ति रखी होने या किसी जाली दस्तावेज के रखे होने की संभावना हो.

3. किसी ऐसे पब्लिश डॉक्यूमेंट को प्राप्त करने के लिए जिसका सम्बन्ध किसी नकली पब्लिकेशन से हो या जो कि देश के विरुद्ध किसी साजिश से सम्बंधित हो

4. ऐसे व्यक्तियों को तलाशने के लिए जिनको कि गैर-कानूनी रूप से बंधक बनाकर कर रखा गया हो.

सेक्शन 93 के अंतर्गत जारी किया जाने वाला वारंट निम्न आधारों पर जारी किया जा सकता है;

a. जब न्यायालय को यह लगता है कि किसी व्यक्ति को सेक्शन 91 के तहत किसी डॉक्यूमेंट को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने को कहा गया है और वह व्यक्ति ऐसा नहीं करता है तो न्यायालय उसके खिलाफ तलाशी वारंट जारी कर सकता है.

b. जिस मामले में कोर्ट के यह लगता है कि किसी इन्क्वारी या ट्रायल का उद्येश्य, सर्च के आधार पर सोल्व किया जा सकता है.

सेक्शन 94 के अंतर्गत तलाशी वारंट:
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इस धारा के अंतर्गत जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी और प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी स्थान की तलाशी के लिए वारंट जारी सकते हैं यदि उनको लगता है कि;

a. ऐसी जगह पर चुरायी गयी संपत्ति पाई जा सकती है.

b. इस जगह पर ऐसे चीज छुपाई गयी है जिसका सम्बन्ध किसी कोर्ट में लंबित मामले से है

सेक्शन 95 के अंतर्गत तलाशी वारंट:
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इसके अंतर्गत कुछ प्रकाशनों को जब्त करने के बारे में बताया गया है;

राज्य सरकार, मजिस्ट्रेट से यह अनुरोध कर सकती है कि वह निम्नलिखित मामलों से सम्बंधित सामग्री, डॉक्यूमेंट या पब्लिकेशन को जारी करने के लिए किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ वारंट जारी करे जिसका सम्बन्ध;

a. सेक्शन 124-A अर्थात देश देशद्रोह से हो. ऐसा कोई दस्तावेज जो देश के खिलाफ साजिश से जुड़ा हुआ हो.

b. सेक्शन 153 A, 153-B से हो अर्थात सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने से जुड़ा हुआ हो.

c. सेक्शन 293 या सेक्शन 295-A से हो, अर्थात ऐसी बातें या सामग्री जो कि अश्लील श्रेणी में आतीं हैं और उनका पब्लिकेशन करना, लोगों में बाँटना गैर कानूनी है.

नोट: यहाँ पर सेक्शन 96 के बारे में भी बताना जरूरी है. यह सेक्शन कहता है कि यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी किताबों को, समाचार पत्रों, मैगज़ीन को बिना किसी ठोस सबूत या आधारहीन रूप से जब्त कर लिया गया है तो वह सीधे उच्च न्यायालय में इस कदम के खिलाफ अपील कर सकता है.

सेक्शन 97 के अंतर्गत वारंट:
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इस प्रकार का वारंट उस स्थिति में जारी किया जाता है जब कोई व्यक्ति या पुलिस किसी अन्य व्यक्ति को गैर-कानूनी तरीके से बंदी बनाता है तो मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि बंदी बनाये गए व्यक्ति को प्राप्त करने के लिए कुछ संदिग्ध जगहों की तलाशी के लिए वांरट जारी किया जाये.

इस प्रकार का वारंट, जिला जज, सब डिविजनल मेजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी का न्यायिक मजिस्ट्रेट जारी कर सकता है.

2. बिना वारंट के तलाशी: इस प्रकार की तलाशी CrPC के सेक्शन 103, 153, 165 और 166 के अंतर्गत बिना तलाशी के सर्च करने की सुविधा देती है.

कुछ संज्ञेय मामलों में पुलिस को सिर्फ सूचना और शक के आधार पर किसी व्यक्ति के घर,दुकान, ऑफिस, वाहन या उस व्यक्ति की तलाशी लेने का अधिकार होता है.

सीआरपीसी के सेक्शन 103 के तहत सर्च
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इस सेक्शन में मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि उसकी उपस्तिथि में किसी घर, स्थान, दुकान और मकान की तलाशी ली जाये.

सीआरपीसी के सेक्शन 104 के तहत सर्च में मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह पुलिस अधिकारी को यह अधिकार दे कि तलाशी के दौरान किसी डॉक्यूमेंट को जब्त करके कोर्ट के सामने प्रस्तुत करे.

CrPC के सेक्शन 153 में प्रावधान
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CrPC के सेक्शन 153 में यह प्रावधान है कि यदि किसी पुलिस ऑफिसर को इस बात की सूचना है या शक है कि किसी दुकान या ऑफिस इत्यादि में वजन नापने के उपकरण "बाँट" या माप तौल या निरीक्षण करने वाले उपकरण इत्यादि गलत माप के हैं तो उसको यह अधिकार है कि वह उस दुकान, ऑफिस या मकान में बिना वारंट दिखाए प्रवेश कर सकता है और वहां पर पाए गए माप तौल के उपकरणों को जब्त कर सकता है और इससे सम्बंधित जानकारी मजिस्ट्रेट को सौंप सकता है.

CrPC के सेक्शन 165 में प्रावधान
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जब भी किसी थाने के प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाले पुलिस अधिकारी के पास यह मानने के लिए उचित आधार होते हैं कि किसी भी अपराध की जांच के लिए आवश्यक कुछ सवूत किसी जगह पर मिल सकते हैं तो वह बिना देरी किये बिना वारंट के ऐसी जगह पर तलाशी ले सकता है.

हालाँकि उसे उस मकान या दुकान में घुसने से पहले लिखित रूप से यह बताना जरूरी होता है कि उसे उस परिसर में किस तरह के सुराग या सबूत मिलने की आशा है. इस लिखित शपथ की एक कॉपी सम्बंधित मजिस्ट्रेट और घर या ऑफिस के स्वामी को सौंपना जरूरी होता है. इसके साथ ही वह अधिकारी उसी जगह की सर्च ले सकता है जो कि सम्बंधित थाने की सीमा में आती हो.

कुट्टन पिल्लई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि तलाशी का वांरट जारी करना मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर करता है लेकिन यह “मनमाना” नहीं होना चाहिए अर्थात किसी के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव नही पड़ना चाहिए.
शोभित यादव
अधिवक्ता उच्च न्यायालय इलाहाबाद
मो० 8115296086

13/06/2021

*LEGAL Update*

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*इलाहाबाद हाई कोर्ट का अवैध हिरासत पर बड़ा फैसला; देना होगा 25000 रूपए मुआवजा; हर तहसील पर प्रचार प्रसार करने का आदेश*

⚫शुक्रवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे पर एक अहम फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को अवैध रूप से हिरासत में लिए गए नागरिकों को 25000 रूपए मुआवजे के प्रावधान को सख्ती से लागू करने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

*पृष्ठभूमि:*

🟢याचिकाकर्ताओं और उनके परिवार के सदस्यों के बीच पैतृक भूमि के बंटवारे को लेकर कुछ विवाद था, जिसके कारण उनके बीच तकरार हो गई।

🔵नतीजतन, सार्वजनिक शांति भंग की आशंका में, पुलिस ने याचिकाकर्ताओं को धारा 151 सीआरपीसी के तहत 08.10.2020 को गिरफ्तार कर लिया। उप निरीक्षक, पुलिस थाना रोहनिया, जिला वाराणसी द्वारा धारा 151/107/116 सीआरपीसी के तहत उपमंडल मजिस्ट्रेट, जिला वाराणसी को एक चालानी रिपोर्ट दिनांक 08.10.2020 प्रस्तुत की गई थी, जो मुद्रित रूप में थी और केवल याचिकाकर्ताओं का नाम था।

🟣चालानी रिपोर्ट मिलने पर अनुमंडल पदाधिकारी ने मामला दर्ज कर याचिकाकर्ता को मुचलका जमा करने तक हिरासत में रखने का निर्देश दिया.

🔴12.10.2020 को याचिकाकर्ताओं ने व्यक्तिगत बांड और अन्य कागजात जमा किए लेकिन कथित तौर पर, प्रतिवादी संख्या 3 ने उन्हें रिहा नहीं किया और इसके बजाय, सत्यापन के बहाने 21.10.2020 को फाइल रखने का निर्देश दिया।

🟠इसके बाद 21.10.2020 को याचिकाकर्ताओं को रिहा कर दिया गया। प्रतिवादियों की मनमानी और अवैध हिरासत से व्यथित, याचिकाकर्ताओं ने मुआवजे की प्रार्थना करते हुए रिट याचिका दायर की।

*अवैध हिरासत और मुआवजा*

*धारा 107, 116, 116 (3) और 151 सीआरपीसी के प्रावधानों का उल्लेख करने के बाद, न्यायमूर्ति सूर्य प्रकाश केसरवानी और न्यायमूर्ति शमीम अहमद की बेंच ने कहा कि:*

*“प्रतिवादी संख्या 3 के समक्ष याचिकाकर्ताओं द्वारा 12.10.2020 को व्यक्तिगत बांड और अन्य कागजात जमा करने के बावजूद , उन्हें प्रतिवादी संख्या 3 द्वारा रिहा नहीं किया गया था। व्यक्तिगत बांड/जमानत बांड और अन्य कागजात जमा करने के बाद भी प्रतिवादी संख्या 3 द्वारा याचिकाकर्ताओं को रिहा न करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का स्पष्ट उल्लं

Adv Shobhit Yadav
13/06/2021

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